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The News Air - Breaking News - Churu Dust Storm से Delhi तक, अरावली की तबाही का खौफनाक सच

Churu Dust Storm से Delhi तक, अरावली की तबाही का खौफनाक सच

30 मई 2026 को राजस्थान में आई भीषण धूल आंधी ने उजागर किया पर्यावरणीय संकट, 31 पहाड़ियां गायब और 12 बड़े गैप बने, थार का रेगिस्तान अब दिल्ली की ओर बढ़ रहा

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
मंगलवार, 2 जून 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, राष्ट्रीय
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Churu Dust Storm
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Aravalli Range Erosion ने उत्तर भारत के सामने एक भयावह सच्चाई रख दी है। 30 मई 2026 को राजस्थान के चूरू, हनुमानगढ़ और गंगानगर में जो भीषण धूल भरी आंधी चली, वह महज एक मौसमी घटना नहीं थी। दरअसल यह भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रेणी अरावली के लगातार हो रहे विनाश की जीवंत चेतावनी है।

और बस यहीं से शुरू हुई असली कहानी—जब विशेषज्ञों ने खुलासा किया कि अरावली की 31 पहाड़ियां पूरी तरह गायब हो चुकी हैं। 12 बड़े अंतराल (गैप्स) बन गए हैं, जिनसे होकर अब थार मरुस्थल की धूल बिना किसी रुकावट के सीधे दिल्ली-NCR तक पहुंच रही है।

🔍 यह भी पढ़ें- Super El Niño 2026: भारत में आने वाली सदी की सबसे भयंकर गर्मी!

चूरू की धूल आंधी: स्क्रीन से निकलकर बाहर आने जैसा मंजर

देखा जाए तो 29-30 मई की उस दोपहर का नजारा किसी हॉलीवुड डिजास्टर फिल्म से कम नहीं था। राजस्थान के चूरू, हनुमानगढ़ और गंगानगर में अचानक ऐसी धूल भरी आंधी उठी कि लोग घरों में छिप गए। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में दिख रहा था—कैसे धूल की विशाल दीवार तेजी से शहर को निगलती जा रही थी।

लेकिन अगर गौर करें तो यह घबराहट बहुत छोटी है। क्योंकि यह Dust Storm केवल एक अस्थायी घटना नहीं, बल्कि आने वाले दशकों में उत्तर भारत के सामने खड़े होने वाले पर्यावरणीय आपातकाल का ट्रेलर भर है।

पहले जो अत्यधिक तीव्र आंधियां आती थीं, वे अरावली पर्वत द्वारा रोक ली जाती थीं। अब स्थिति यह है कि 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से राजस्थान की धूल सीधे दिल्ली-NCR तक पहुंच रही है। मतलब साफ है—वह मरीज जो पहले से ही ICU में पड़ा है (दिल्ली की वायु प्रदूषण स्थिति), उस पर एक और बीमारी का हमला हो रहा है।

🔍 यह भी पढ़ें- NEET Paper Leak 2026: WhatsApp Group पर बिका 22 लाख छात्रों का भविष्य, जानें पूरा सच और समाधान

अरावली पर्वत: उत्तर भारत की श्वास नली

अरावली को समझना जरूरी है। यह सिर्फ पत्थरों का ढेर नहीं है। यह लगभग 3.5 अरब वर्ष पुरानी दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रेणियों में से एक है। गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली से होकर गुजरती हुई इसकी लंबाई लगभग 800 किलोमीटर है। गुरु शिखर इसका सबसे ऊंचा शिखर है।

राजस्थान में अरावली की 128 से अधिक पहाड़ियां हैं। लेकिन चिंता का विषय यह है कि इनमें से 31 पहाड़ियां पूरी तरह लुप्त हो चुकी हैं। और यही रास्ता बन रहा है धूल के तूफानों के आने का।

अरावली का महत्वविवरण
आयु3.5 अरब वर्ष (विश्व की प्राचीनतम पर्वत श्रेणियों में से एक)
लंबाईलगभग 800 किलोमीटर
विस्तार क्षेत्रगुजरात, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली
उच्चतम शिखरगुरु शिखर
राजस्थान में पहाड़ियां128+ (जिनमें से 31 गायब हो चुकी हैं)
नष्ट वन क्षेत्र5,772 वर्ग किमी (कुल का 8%)
प्रमुख गैप्स12 बड़े अंतराल जहां से धूल प्रवेश कर रही है
अवैध खनन25% क्षेत्रों में सक्रिय

दिलचस्प बात यह है कि अरावली के कई महत्वपूर्ण पर्यावरणीय लाभ हैं:

पहला, यह मरुस्थलीकरण को रोकती है। थार मरुस्थल को पूर्व की ओर फैलने से रोकने में यह प्राकृतिक बाधा का काम करती है।

दूसरा, यह धूल अवरोधक है। रेगिस्तान से आने वाली धूल को यह रोक देती है।

तीसरा, मध्य एशिया से आने वाली ठंडी हवाओं को भी यह नियंत्रित करती है।

चौथा, बनास, लूनी, साबरमती, चंबल जैसी नदियों के उद्गम स्थल के रूप में यह जल स्रोत का काम करती है।

पांचवां, दक्षिण-पश्चिम मानसून को उत्तर की ओर दिशा दिखाती है, जिससे अच्छी बारिश होती है।

धूल आंधी कैसे बनती है और क्यों खतरनाक है?

समझने वाली बात यह है कि इसे तकनीकी भाषा में ‘हबूब’ (Haboob) भी कहते हैं। जब बहुत ज्यादा गर्मी होती है, तो गर्म हवाएं ऊपर उठती हैं। ऊपर की ठंडी हवाएं नीचे आती हैं और प्रेशर ग्रेडिएंट बनता है। इससे तेज दक्षिण-पश्चिम हवाएं चलती हैं जो धूल को पूर्व की ओर ले जाती हैं।

पहले अरावली की पहाड़ियां इस धूल को रोकने के लिए एक प्राकृतिक स्क्रबर या फिल्टर का काम करती थीं। जब मरुस्थल की धूल भरी हवाएं अरावली की पश्चिमी ढलानों से टकराती थीं, तो उनकी गति धीमी हो जाती थी और रेत वहीं गिर जाती थी। लगभग 95-99% धूल रुक जाती थी।

लेकिन अब जो पहाड़ियां गायब हो गई हैं और जो गैप्स बन गए हैं, उनसे होकर यह धूल सीधे दिल्ली-NCR में प्रवेश कर रही है।

विनाश के आंकड़े: 31 पहाड़ियां गायब, 8% जंगल नष्ट

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि स्थिति कितनी गंभीर है। राजस्थान की 128 पहाड़ियों में से 31 पहाड़ियां पूरी तरह से गायब हो चुकी हैं। अरावली का लगभग 5,772 वर्ग किलोमीटर का वन क्षेत्र नष्ट हो चुका है, जो कुल का 8% है। यानी लगभग 1/10 हिस्सा खत्म।

इसके अलावा पहाड़ियों के बीच 12 प्रमुख अंतराल (गैप्स) बन चुके हैं, जहां से रेत और धूल मैदानों में घुस रही है। सबसे खतरनाक बात यह है कि 25% क्षेत्रों में अवैध खनन चल रहा है। एक चौथाई से अधिक क्षेत्र में सिलिका और ग्रेनाइट का अवैध खनन हो रहा है।

और इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने कुछ साल पहले 100 मीटर ऊंचाई का मानदंड स्वीकार किया था। यानी केवल 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियां ही संरक्षित मानी जाएंगी। यह निर्णय इतना विवादास्पद था कि इसके कारण लगभग 90% पहाड़ियां सुरक्षा के दायरे से बाहर हो गईं। 100 मीटर से नीचे की पहाड़ियों पर खनन की छूट मिल गई।

तबाही के पांच बड़े कारण

अगर विश्लेषण करें तो अरावली के विनाश के पीछे पांच प्रमुख कारण हैं:

पहला – अवैध खनन: सबसे बड़ा खतरा यही है। सिलिका और ग्रेनाइट का व्यापक अवैध खनन हो रहा है। कानूनी परिभाषाएं भी खनन माफियाओं के हिसाब से बना दी गई हैं।

दूसरा – वनों की कटाई: वनस्पति हटने से बाधा टीले कमजोर हो रहे हैं। लगभग 0.57% वन क्षेत्र हर वर्ष यहां से खत्म हो रहा है।

तीसरा – अनियंत्रित शहरीकरण: 1975 से मानव बस्तियों में तीन गुना वृद्धि हुई है। शहरीकरण के नाम पर जंगलों को काट दिया जा रहा है।

चौथा – अतिचारण और अतिक्रमण: एक ओर लोग जमीन पर कब्जा कर रहे हैं, दूसरी ओर बहुत ज्यादा पशुचारण से सारी वनस्पति नष्ट हो रही है।

पांचवां – जलवायु परिवर्तन: वैश्विक स्तर पर हो रहे जलवायु परिवर्तन का असर भी इस पर पड़ रहा है।

दिल्ली-NCR पर मंडराता खतरा

भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने जो चेतावनी दी है, वह बेहद चिंताजनक है। उत्तर-पश्चिमी भारत अब सर्वाधिक धूल आंधी वाला क्षेत्र बन गया है। जून महीने में दिल्ली में लगभग 2.5 दिन प्रति माह धूल आंधी के दिन होंगे।

यानी घंटों में गिना जाए तो लगभग 60 घंटे की धूल आंधियां हर महीने दिल्ली में चलेंगी। कभी 1 घंटे, कभी 2 घंटे—इस तरह जोड़ते जाइए तो कुल 60 घंटे बनते हैं।

दिल्ली जहां पहले से ही अप्रैल में हीटवेव झेल चुकी है, जो देश की सबसे भीषण गर्मी से गुजर रही है, उस पर अब यह पर्यावरणीय आपातकाल और बढ़ने वाला है।

भविष्य के लिए खतरे की घंटी

इससे क्या-क्या प्रभाव पड़ सकते हैं? यह समझना बहुत जरूरी है।

पहला, थार मरुस्थल पूर्व की ओर विस्तार करेगा। मरुस्थलीकरण तेजी से बढ़ेगा।

दूसरा, भूजल स्तर में गिरावट आएगी। जब मरुस्थलीकरण होगा तो पानी का स्तर और नीचे जाएगा।

तीसरा, धूल के कणों द्वारा सौर विकिरणों में बदलाव आएगा। NASA के वैज्ञानिकों ने कहा है कि धूल आवृत्ति पर दीर्घकालिक अध्ययन आवश्यक है क्योंकि यह विकिरण को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है।

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चौथा, PM 2.5 का स्तर और बढ़ेगा। दिल्ली-NCR की सबसे बड़ी समस्या यही है। यह सबसे हानिकारक प्रदूषक है और धूल के कणों से यह और बढ़ेगा।

पांचवां, पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कृषि उत्पादकता प्रभावित होगी। खेतों पर रेत की परत जम जाएगी, जिससे प्रकाश संश्लेषण बाधित होगा।

कानून हैं, पर अमल कहां?

नीतियों की कमी नहीं है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986, वन संरक्षण अधिनियम 1980, संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम सम्मेलन (UNCCD) का 1992 का फ्रेमवर्क, NCR में वायु प्रदूषण नियंत्रण हेतु आयोग—सब कुछ है।

लेकिन दिक्कत यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने 100 मीटर ऊंचाई का मानदंड स्वीकार कर लिया। यह निर्णय इतना विवादास्पद था कि इससे अरावली का एक बड़ा भाग खनन क्षेत्रों को सौंप दिया गया। 100 मीटर से नीचे के भाग को संरक्षित नहीं किया गया।

कहने का मतलब साफ है—न कोर्ट, न सरकार इस दिशा में गंभीरता से सोच रही है कि इसके दीर्घकालिक प्रभाव क्या होंगे। क्या देश की राजधानी अगले 10 साल बाद बचेगी भी या नहीं?

अरावली ग्रीन वॉल परियोजना: आशा की किरण या कागजी योजना?

भारत ने 2023 में अरावली ग्रीन वॉल परियोजना शुरू की थी। यह 1400 किलोमीटर लंबी और 5 किलोमीटर चौड़ी हरित पट्टी बनाने की योजना है। इसके तहत:

  • देशी प्रजाति के वृक्ष और झाड़ियां लगाई जाएंगी
  • प्रत्येक जिले में पांच जल निकायों को पुनर्जीवित किया जाएगा
  • कृषि वानिकी और स्थानीय अर्थव्यवस्था का विकास होगा
  • कार्बन सिक्वेस्ट्रेशन (कार्बन को स्टोर करना) किया जाएगा

भारत ने UNCCD के तहत 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर बंजर भूमि को पुनः स्थापित करने का राष्ट्रीय लक्ष्य रखा है। लेकिन सवाल उठता है—क्या इस तरह के निर्णयों से यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है? उत्तर है—नहीं।

2023 से शुरू हुई यह परियोजना अभी तक अपेक्षित प्रगति नहीं कर पाई है।

योजना की राह में चार बड़ी रुकावटें

पहली, खंडित ढांचा। यह 1400 किमी लंबी परियोजना हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और गुजरात से होकर जाती है। हर राज्य में अलग सरकार है, समन्वय का अभाव है।

दूसरी, भूजल की कमी। दक्षिण हरियाणा में भूजल की भारी कमी से नए पौधों की सिंचाई में व्यावहारिक बाधा आ रही है।

तीसरी, शक्तिशाली खनन लॉबी। खनन माफिया और रियल एस्टेट की भारी राजनीतिक ताकत है। वे इस परियोजना को सफल नहीं होने देंगे क्योंकि इससे उनका नुकसान होगा।

चौथी, अवैध कब्जे हटाना। वन भूमि पर अवैध कब्जों को हटाने में बहुत कानूनी उलझनें हैं। बड़ी-बड़ी सरकारें आईं और गईं, लेकिन अवैध कब्जा नहीं हटा सकीं।

आगे का रास्ता: चार जरूरी कदम

अगर सचमुच अरावली को बचाना है तो सरकार को चार ठोस कदम उठाने होंगे:

पहला, एक मजबूत अरावली विकास प्राधिकरण बनाया जाए जो सभी राज्यों से समन्वय करे और ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट को बिना किसी अवरोध के लागू करे।

दूसरा, GIS मानचित्र के जरिए पहाड़ियों, जलस्रोतों और वन्यजीव गलियारों का डिजिटल सर्वे किया जाए। हर पहाड़ी को चिह्नित किया जाए।

तीसरा, कानूनी परिभाषा सख्त की जाए। संवेदनशील पर्यावरण क्षेत्रों की स्पष्ट परिभाषा हो और किसी भी उल्लंघन पर कठोर सजा हो।

चौथा, अवैध खनन पर शून्य सहनशीलता की नीति अपनाई जाए। जो सरकारी संरक्षण अवैध खनन को मिल रहा है, वह तत्काल बंद हो। धूल के प्रभाव का निरंतर वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाए।

साथ ही आदिवासियों और स्थानीय निवासियों को इस अभियान से जोड़ा जाए। उनकी आजीविका की रक्षा की जाए और उनके सांस्कृतिक अधिकारों का भी सम्मान किया जाए।

उत्तर भारत की श्वास नली को बचाना होगा

अंत में यही कहा जा सकता है—अरावली सिर्फ पत्थरों का ढेर नहीं है। यह उत्तर भारत की श्वास नली है, जलवायु रक्षक है। अगर इसके फायदों को इग्नोर करके सरकारें आंखें मूंदे रहेंगी, तो भविष्य बहुत काला होगा।

हम Sustainable Development Goals (SDGs) की बात करते हैं। लेकिन क्या इस कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति से ये लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं? इस पर गंभीरता से सोचना होगा।

चूरू की धूल आंधी महज एक घटना नहीं थी। वह एक चेतावनी थी—या तो अब संभल जाओ, या फिर दिल्ली को रेगिस्तान बनते देखने के लिए तैयार रहो।

मुख्य बातें (Key Points)
  • 30 मई 2026 को राजस्थान के चूरू, हनुमानगढ़ और गंगानगर में भीषण धूल आंधी आई
  • अरावली पर्वत श्रेणी की 31 पहाड़ियां पूरी तरह गायब हो चुकी हैं
  • 12 प्रमुख अंतराल (गैप्स) बन गए हैं जिनसे थार की धूल दिल्ली-NCR तक पहुंच रही है
  • 5,772 वर्ग किमी वन क्षेत्र नष्ट (कुल का 8%), 25% क्षेत्रों में अवैध खनन जारी
  • सुप्रीम कोर्ट का 100 मीटर का मानदंड विवादास्पद, 90% पहाड़ियां सुरक्षा के दायरे से बाहर
  • IMD चेतावनी: जून में दिल्ली में 2.5 दिन/माह (60 घंटे) धूल आंधी की संभावना
  • अरावली ग्रीन वॉल परियोजना (1400 किमी लंबी, 5 किमी चौड़ी) अभी अपेक्षित प्रगति से पीछे
  • प्रमुख कारण: अवैध खनन, वनों की कटाई (0.57% प्रति वर्ष), अनियंत्रित शहरीकरण, अतिचारण

 

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: Aravalli Range में कितनी पहाड़ियां गायब हो चुकी हैं?

राजस्थान में अरावली की 128 पहाड़ियों में से 31 पहाड़ियां पूरी तरह से लुप्त हो चुकी हैं। इसके अलावा 12 प्रमुख अंतराल (गैप्स) बन गए हैं, जिनसे होकर थार मरुस्थल की धूल अब सीधे दिल्ली-NCR तक पहुंच रही है। लगभग 5,772 वर्ग किमी वन क्षेत्र नष्ट हो चुका है।

प्रश्न 2: दिल्ली में धूल आंधी का खतरा क्यों बढ़ गया है?

अरावली पर्वत पहले प्राकृतिक स्क्रबर/फिल्टर का काम करती थी और 95-99% धूल को रोक लेती थी। लेकिन अवैध खनन, वनों की कटाई और पहाड़ियों के गायब होने से बने गैप्स के जरिए अब थार की धूल बिना रुकावट के दिल्ली पहुंच रही है। IMD ने चेतावनी दी है कि जून में दिल्ली में 60 घंटे/माह धूल आंधी की संभावना है।

प्रश्न 3: अरावली ग्रीन वॉल परियोजना क्या है और क्या यह सफल हो रही है?

अरावली ग्रीन वॉल परियोजना 2023 में शुरू की गई 1400 किमी लंबी और 5 किमी चौड़ी हरित पट्टी बनाने की योजना है। इसका उद्देश्य मरुस्थलीकरण रोकना और पर्यावरण संरक्षण करना है। लेकिन खंडित ढांचा, भूजल की कमी, खनन लॉबी के विरोध और अवैध कब्जों के कारण यह अभी अपेक्षित प्रगति नहीं कर पाई है।

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अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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