Nepal Crisis: क्रांति जितनी ग्लैमरस होती है, शासन करना उतना ही कठिन होता है। आज से ठीक एक महीने पहले 27 मार्च को जब बालेन शाह ने नेपाल के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी तो दुनियाभर में इसे जन क्रांति कहा गया। कहा गया कि एक पॉप स्टार, एक इंजीनियर, एक युवा चेहरा पूरे नेपाल के पुराने राजनीतिक गठजोड़ को खत्म कर देगा और एक नया नेपाल बनेगा।
आज है 28 अप्रैल और आज से सिर्फ 30 दिन पहले की यह बात है। नेपाल की फिजा पिछले 30 दिनों में पूरी तरह बदल चुकी है। तीन बड़े झटके जो लगे हैं, उन्हें ध्यान से समझना जरूरी है।
पहला झटका: गृह मंत्री का इस्तीफा
सबसे पहला झटका लगा है आंतरिक मोर्चे पर। जहां पर एक राजनीतिक पार्टी, एक राजनीतिक आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध का ऐलान करके सत्ता में आती है। और उसके कैबिनेट के गृह मंत्री के ऊपर मनी लॉन्ड्रिंग का केस चलता है और उसे इस्तीफा देना पड़ता है।
देखा जाए तो यह बालेन सरकार के लिए सबसे बड़ा नैतिक झटका है। गृह मंत्री सुदान गुरुंग, जो इस पूरे आंदोलन का चेहरा थे, उन पर अपने मित्र दीपक भट्ट के माध्यम से मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप लगे।
जब आप एंटी करप्शन के नाम पर वोट मांगते हैं तो फिर जनता आपसे जीरो टॉलरेंस की उम्मीद करती है। एक महीने में दो-दो इस्तीफे यह बताते हैं कि या तो बालेन शाह की टीम कच्ची है या फिर भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी हैं नेपाल में। और नया नेपाल भी उन जड़ों को काट नहीं पा रहा है।
दूसरा झटका: छात्रों पर सख्ती
दूसरा बड़ा झटका उन छात्रों के लिए आया जिनके कंधे पर बैठकर यह पूरा आंदोलन चला। जो सोशल पावर थी, उस पूरे आंदोलन को चलाने वाले और सत्ता में इन्हें पहुंचाने वाले छात्रों के खिलाफ राजनीतिक हथियार छीनने जैसी गतिविधि बालेन शाह सरकार ने की।
बालेन शाह खुद एक आंदोलन की उपज हैं। लेकिन सत्ता संभालते ही उन्होंने जो पहला 100 डे एक्शन प्लान दिया, उसके अंतर्गत शैक्षणिक परिसरों में राजनीति को उखाड़ फेंकने का आदेश दिया। और पूरी तरह से राजनीति पर प्रतिबंध लगा दिया।
समझने वाली बात यह है कि बालेन शाह का तर्क है कि शिक्षा के मंदिर राजनीतिक अखाड़े ना बनें। सुनने में यह बहुत बड़ा सुधार लगता है। लेकिन क्या यह उन युवाओं की आवाज को दबाने की कोशिश है जो कल उनके खिलाफ भी खड़े हो सकते थे?
उन्होंने आदेश दिया कि:
- स्टूडेंट यूनियन पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया जाए
- कोचिंग सेंटर्स को पूरी तरह से बंद कर दिया जाए
- विदेशी स्कूलों के नाम बदलकर उन्हें नेपाली नाम दिया जाए
अगर गौर करें तो यह एक तरह से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और शक्ति के केंद्रीकरण का एक खतरनाक संयोजन है। छात्र यह पूछ रहे हैं कि हवा का रुख बदलने वाले हम थे और अब आप हवा को ही बंद कर रहे हो। यह कौन सा छात्रों का, युवाओं का शासन है?
तीसरा झटका: भारत के साथ तनाव
तीसरा बड़ा झटका भारत जैसे देश के साथ आया, जहां रोटी-बेटी के रिश्ते हुआ करते थे। वहां पर कस्टम ड्यूटी की जो दीवार खड़ी की है, उससे गहरी असंतुष्टि है पूरे सीमांत प्रदेश में।
नेपाल और भारत के आम नागरिकों को प्रभावित करने वाला निर्णय लिया गया। एक ₹100 का रूल बनाया गया। नेपाल में बालेन सरकार ने आदेश दिया कि 100 नेपाली रुपए यानी करीब ₹63 से ऊपर का कोई भी सामान अगर भारत से आप नेपाल ले जाते हैं तो भारी कस्टम ड्यूटी लगेगी।
उन्होंने इसका आर्थिक तर्क यह दिया कि नेपाल की जीडीपी का 10% कस्टम से आता है। सरकार को पैसा चाहिए। सरकार को काम करने के लिए पैसों की जरूरत है।
जमीनी हकीकत क्या है?
दिलचस्प बात यह है कि जमीन पर हकीकत यह है कि नेपाल और भारत का बॉर्डर बहुत खुला है। एक दूसरी तरफ आवागमन आसान है। सीमा पर रहने वाले लोग नमक से लेकर दवा तक एक दूसरे पर निर्भर हैं और एक दूसरे के यहां से ही लेते हैं।
अब इसके बाद जब इन्होंने यह लगा दिया तो भारत सरकार ने भी सख्त रुख अपनाया है। और अब जो रिएक्शन हैं भारत सरकार के, उसमें कई कदम उठाए गए हैं।
भारत का सख्त रुख
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत ने भी जवाबी कदम उठाए हैं:
पहला – सुरक्षा कड़ी: भारत ने सुरक्षा कारणों और तबलीगी इजतमा के चलते चेकिंग सख्त कर दी है।
दूसरा – ईंधन आपूर्ति: नेपाल के लोग भारत में आकर तेल लिया करते थे। कुछ क्षेत्रों में नेपाली वाहनों की तेल की सीमित आपूर्ति की खबरें आ रही थीं और उसको रोक दिया गया है। नेपाली वाहनों को भारत में अब तेल नहीं दिया जा रहा है।
तीसरा – राजनयिक शीत युद्ध: डिप्लोमैटिक कोल्ड वॉर शुरू हो गई है। नेपाल के बालेन शाह का एंबेसडर लेवल अधिकारियों से ना मिलने का फैसला लिया गया। और यह जो ना मिलना था, यह सीधे उन्होंने कहा कि हम फॉरेन मिनिस्टर लेवल की बात करेंगे। उससे नीचे की हम कोई बात नहीं करेंगे।
देखा जाए तो यह एक प्रकार से जो राजनयिक प्रोटोकॉल है उसको तोड़ना था और इसको भी एक नए अपमान की तरह देखा जा रहा है।
सितंबर 2025 की क्रांति का इतिहास
नेपाल में जो हुआ वह कोई सामान्य चुनाव नहीं था। 8 से 12 सितंबर 2025 के बीच भड़की एक ऐसी आग थी जिसने पुराने प्रधानमंत्रियों केपी शर्मा ओली को सत्ता से उखाड़कर बाहर भेज दिया।
इसमें ट्रिगर बना सोशल मीडिया बैन और कीमत थी 77 मौतें और हजार से ज्यादा लोग घायल। अब राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने 47% वोट प्राप्त किए इन चुनावों में तो लगा कि नेपाल ने अपनी नियति बदल दी है।
पुराने नेताओं पर शिकंजा
बालेन शाह ने नायक फिल्म के अनिल कपूर की तरह आते ही पुराने प्रधानमंत्रियों पर जांच बिठा दी। गिरफ्तारियां शुरू कर दी। पुष्प कमल दहल प्रचंड से लेकर सुशीला कारकी तक सब रडार पर आ जाते हैं। जनता तालियां बजाना शुरू कर देती है।
लेकिन उन्हें पता नहीं था कि यह पॉलिटिकल क्लींजिंग है या सिलेक्टिव टारगेटिंग है जो बालेन शाह कर रहे हैं। यहां पर एक बड़ा विरोधाभास देखने को मिल रहा है।
तीन तरफा चुनौतियां
साथियों, बालेन शाह अभी उस मोड़ पर खड़े हैं जहां इतिहास या तो उन्हें युग प्रवर्तक लिखेगा या फिर एक विफल क्रांतिकारी। चुनौतियां तीन तरफा हैं:
पहली – आंतरिक चुनौती: वे अपने कैबिनेट को, अपने मंत्रियों को, अपने लोगों को भ्रष्टाचार मुक्त रख पाएंगे क्या?
दूसरी – सामाजिक चुनौती: छात्रों और युवाओं के गुस्से को शांत करना अब इनके लिए एक बड़ी चुनौती बन चुकी है।
तीसरी – कूटनीतिक चुनौती: क्या वो भारत के साथ ऐतिहासिक संबंधों को अपने अहंकार की भेंट चढ़ा देंगे?
तीन महाशक्तियों का खेल का मैदान
अगर गौर करें तो नेपाल एक बड़ा प्लेग्राउंड है जहां अमेरिका के भी हित हैं। जहां पर चीन भी खुलकर खेल रहा है और जहां पर भारत के भी हित हैं।
ध्यान रखिए कि नेपाल में अमेरिका के हित अलग हैं और भारत के हित अलग हैं। भारत और अमेरिका के समान हित नहीं हैं। तो नेपाल एक ऐसे खेल के मैदान की तरह है जहां तीनों महाशक्तियां यहां पर खेल रही हैं।
क्रांति और शासन में फर्क
महत्वपूर्ण रूप से बालेन शाह को यह समझना होगा कि क्रांति सड़कों पर जीती जा सकती है। लेकिन गवर्नेंस केवल और केवल चलती है संतुलन के खेल से।
अगर आप एक साथ छात्र, पड़ोसी देश और अपनी कैबिनेट से भी लड़ेंगे तो जनता की यह उम्मीद बहुत जल्दी राजनीतिक अस्थिरता के पुराने कुएं में गिर जाएगी। और पुनः वहां पर अस्थिरता आएगी जिसकी प्रबल संभावना कई सारे विशेषज्ञ बता रहे हैं।
आगे क्या होगा?
दिलचस्प बात यह है कि अगले कुछ हफ्तों में यह तय होगा कि बालेन शाह नेपाल को किस दिशा में ले जा रहे हैं। क्या वो उस विजन के अनुसार नेपाल को फिर से तैयार और नया आकार दे रहे हैं?
अथवा वे अति उत्साह में नेपाल को एक और अस्थिरता की तरफ धकेल रहे हैं। एक और संकट की ओर धकेल रहे हैं।
भारत की भूमिका
यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि क्या भारत को नेपाल के प्रति अपनी नीति और सख्त करनी चाहिए? या फिर राजनयिक समझदारी से इस मामले को सुलझाना चाहिए?
भारत-नेपाल के रिश्ते केवल सरकारों के नहीं हैं। यह जनता-जनता के रिश्ते हैं। सीमा पर रहने वाले लाखों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी इन फैसलों से प्रभावित होती है।
मुख्य बातें (Key Points):
- बालेन शाह को प्रधानमंत्री बने एक महीना हुआ, तीन बड़े संकट आए
- गृह मंत्री सुदान गुरुंग मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में इस्तीफा
- छात्रों पर सख्ती: स्टूडेंट यूनियन बैन, कोचिंग बंद
- भारत से तनाव: ₹63 से ऊपर के सामान पर कस्टम ड्यूटी
- सितंबर 2025 की क्रांति में 77 मौतें हुई थीं











