Women’s Reservation Bill: अप्रैल 2026 का तीसरा हफ्ता। लोकसभा में सन्नाटा पसर गया। 12 सालों में पहली बार ऐसा हुआ जब नरेंद्र मोदी सरकार का संविधान संशोधन बिल पास नहीं हो पाया। Women’s Reservation Bill, जिसे लेकर देशभर में उम्मीदें थीं, वह लोकसभा की दहलीज पार नहीं कर सका। और बस यहीं से शुरू हुई असली राजनीतिक बहस…
अप्रैल 16 से 18 के बीच तीन दिन का विशेष सत्र बुलाया गया था। सरकार दो बड़े सुधारों की बात कर रही थी। पहला – महिला आरक्षण को लागू करना। दूसरा – डीलिमिटेशन यानी सीटों का पुनर्निर्धारण। देखा जाए तो… दोनों मुद्दे एक-दूसरे में इस कदर उलझे थे कि अलग करना नामुमकिन सा लग रहा था।
याद कीजिए 2023 को। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम से सरकार ने 33% महिला आरक्षण का बिल पास किया था। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए जगह सुनिश्चित करने का वादा किया गया था। लेकिन एक शर्त थी। 2021 की जनगणना पूरी हो, फिर डेटा आए, फिर डीलिमिटेशन हो, तब Women’s Reservation Bill लागू होगा। यानी असली खेल तो अभी शुरू ही नहीं हुआ था।
‘संसद में क्या हुआ आखिर?’
परसों सरकार ने 131वां संविधान संशोधन बिल पेश किया। यह बिल Women’s Reservation Bill को डीलिमिटेशन से जोड़ने के लिए था। संविधान संशोधन बिल को पास होने के लिए 2/3 बहुमत चाहिए। लोकसभा में 543 सीटें हैं। इसका दो-तिहाई यानी करीब 360 के आसपास। वोटिंग के वक्त 528 सदस्य मौजूद थे। इसका 2/3 माने 352 वोट। सरकार को यह संख्या चाहिए थी।
हैरान करने वाली बात यह है कि सरकार के पक्ष में सिर्फ 298 वोट आए। 230 वोट विरोध में गए। एनडीए (NDA) के पास 292 सीटें हैं। भारतीय जनता पार्टी अकेले पूर्ण बहुमत से दूर है। टीडीपी और जेडीयू के साथ मिलाकर यह संख्या बनती है। लेकिन संविधान संशोधन के लिए यह काफी नहीं था।
समझने वाली बात है कि यह बिल अगर पास हो जाता, तो सरकार लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 तक कर देती। फिर 250-270 सीटें महिलाओं के लिए रिजर्व कर देती। किसी पुरुष सांसद को अपनी सीट नहीं छोड़नी पड़ती। सब खुश रहते। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
‘विवाद की असली जड़ क्या है?’
विपक्ष महिला आरक्षण का विरोध नहीं कर रहा। वे 33% कोटा के समर्थन में खड़े हैं। लेकिन उनकी नाराजगी डीलिमिटेशन से जुड़ने पर है। विपक्ष का सवाल साफ था – जब 2023 में बिल पास हो गया, तो 2024 के चुनाव में ही 33% रिजर्वेशन क्यों नहीं दिया?
सरकार का तर्क अलग है। वे कहती हैं कि अभी दे देंगे तो बहुत सारे पुरुष सांसद मुश्किल में आ जाएंगे। जैसे प्रधानमंत्री मोदी वाराणसी से जीतते हैं। मान लीजिए वह सीट महिलाओं के लिए रिजर्व हो गई। तो उन्हें वहां से नहीं लड़ना पड़ेगा। इसी समस्या से बचने के लिए सरकार पहले सीटें बढ़ाना चाहती है। फिर नई सीटें महिलाओं के लिए देना चाहती है।
अगर गौर करें… तो यहां भरोसे की कमी साफ दिखती है। दक्षिण भारत के राज्य खासतौर पर परेशान हैं। एम के स्टालिन जैसे नेता इसके खुलकर विरोध में हैं। तमिलनाडु में इसे लेकर काफी बवाल है।
‘दक्षिण बनाम उत्तर का गणित’
डीलिमिटेशन का मतलब समझिए। जितनी आबादी, उतने सांसद। यूके में 1 लाख आबादी पर एक सांसद है। भारत में यह संख्या काफी अलग-अलग है। उत्तर प्रदेश में 25-30 लाख आबादी पर एक सांसद है। तमिलनाडु और केरल में 15 लाख पर एक सांसद है।
दिलचस्प बात यह है कि दक्षिण भारत ने अपनी आबादी नियंत्रित की। उत्तर में आबादी बढ़ी। अब अगर डीलिमिटेशन हुआ तो उत्तर प्रदेश की 80 सीटें 150-160 हो सकती हैं। दक्षिण का हिस्सा घट सकता है। विपक्ष को यही डर है।
राहुल गांधी ने साफ कहा कि यह महिला सशक्तिकरण का बिल नहीं है। यह देश के चुनावी नक्शे को बदलने की कोशिश है। पहले “वोट चोरी” के आरोप लगते थे। अब विपक्ष कह रहा है कि यह “सीट चोरी” है। हिंदी हार्टलैंड में – उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान – जहां भारतीय जनता पार्टी को अच्छी सीटें मिलती हैं, वहां सीटें और बढ़ेंगी। दक्षिण की अहमियत कम होगी।
‘सरकार का पलटवार’
सरकार का तर्क है कि 1971 की आबादी के हिसाब से आज भी चुनाव हो रहे हैं। अब आबादी 1.5 अरब के पार है। उस समय आधी थी। “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” के सिद्धांत के लिए बराबरी जरूरी है। Women’s Reservation Bill तभी सही तरीके से लागू हो सकता है जब सीटों की नई मैपिंग हो।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि सरकार कहती है – जितना प्रतिशत आज है, उतना ही रहेगा। उत्तर प्रदेश की सीटें बढ़ेंगी, लेकिन अनुपात वही रहेगा। विपक्ष इस पर भरोसा नहीं कर रही।
‘अब क्या होगा?’
महिला आरक्षण अब टल गया है। 2029 में होगा या 2034 में? कुछ कहा नहीं जा सकता। संसदीय मामलों के मंत्री किरण रिजिजू ने लोकसभा स्पीकर को दो अन्य बिल भी वापस लेने को कहा है। क्योंकि वे सब Women’s Reservation Bill से जुड़े थे।
केंद्र और राज्यों के बीच रिश्ते तनावपूर्ण हो सकते हैं। संसदीय सुधार रुक गए हैं। राजनीतिक गणित ने एक बार फिर साबित किया कि असली मुद्दे पीछे रह जाते हैं, सत्ता का खेल आगे बढ़ता है।
‘आंकड़े क्या कहते हैं?’
आजादी के बाद पहली लोकसभा में सिर्फ 5% महिलाएं थीं। 9वीं, 10वीं, 11वीं लोकसभा तक यह 6-9% के आसपास ही रही। 15वीं, 16वीं और 17वीं लोकसभा में यह बढ़कर 13-14% तक पहुंची। लेकिन दुनिया के मुकाबले यह बहुत कम है। रवांडा में 63% महिला सांसद हैं। क्यूबा, मेक्सिको, डेनमार्क और न्यूजीलैंड भी आगे हैं।
पार्टीवार देखें तो तृणमूल कांग्रेस (TMC) में 40% के करीब महिला सांसद हैं। जेडीयू, कांग्रेस, डीएमके, सपा और भाजपा में 13-15% के आसपास।
राज्य विधानसभाओं में छत्तीसगढ़ सबसे आगे है। वहां 20% से ज्यादा महिला विधायक हैं। बाकी राज्यों में 10-15% ही हैं।
‘राजनीति का असली चेहरा’
इस पूरे घटनाक्रम से साफ होता है कि सत्ता की राजनीति महिला सशक्तिकरण से ज्यादा मजबूत है। सरकार नहीं चाहती थी कि पुरुष नेता अपनी सीटें खोएं। विपक्ष डर रहा था कि उत्तर भारत की बढ़ती सीटें उनकी ताकत खत्म कर देंगी। इन दोनों की लड़ाई में Women’s Reservation Bill बलि चढ़ गया।
2023 का नारी शक्ति वंदन अधिनियम आज भी वैध है। लेकिन 2026 का संशोधन बिल फेल हो गया। अब आरक्षण के लिए जनगणना, डेटा, डीलिमिटेशन का इंतजार करना होगा। कब तक? कोई नहीं जानता।
मुख्य बातें (Key Points)
- Women’s Reservation Bill लोकसभा में 298 वोट मिले, 352 की जरूरत थी, इसलिए फेल हो गया।
- सरकार ने महिला आरक्षण को डीलिमिटेशन से जोड़ा था, जिसका विपक्ष ने विरोध किया।
- दक्षिण भारत को डर है कि डीलिमिटेशन से उनकी सीटें घटेंगी और उत्तर की बढ़ेंगी।
- महिला आरक्षण अब 2029 या 2034 तक टल सकता है, जनगणना और डीलिमिटेशन का इंतजार है।













