America Iran Peace Talks को लेकर बड़ी खबर आई है। अमेरिका और ईरान एक बार फिर जंग की तैयारी में जुट गए हैं। वैसे तो अभी 14 दिन का सीजफायर चल रहा है लेकिन यह कभी भी टूट सकता है क्योंकि दोनों के बीच बातचीत फेल हो गई है। वैसे बातचीत के फेल होने की आशंका तो पहले से ही जताई जा रही थी और उसका कारण था डोनाल्ड ट्रंप के बार-बार बदलते बयान। हर बार वो बातचीत की शर्तें बदल रहे थे और जब बातचीत शुरू हुई तो ट्रंप धमकी देने पर उतर आए थे। वहीं ईरान की तरफ से साफ कर दिया गया था कि वो शांति के लिए अपना रवैया नरम करने को तैयार है। लेकिन अमेरिका चाहता था कि वो ईरान से जंग में नहीं जीत पाया तो बातचीत में ही जीत जाए और इसी के चलते बातचीत फेल हो गई है।
इस्लामाबाद में 21 घंटे की बातचीत बेनतीजा
इस्लामाबाद में लगभग 21 घंटे तक ईरानी प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को खाली हाथ ही अपने देश लौटना पड़ा। उनका कहना है कि गुड न्यूज यह है कि हमारी ईरानियों के साथ कई मुद्दों पर सार्थक चर्चाएं हुई हैं और बैड न्यूज यह है कि हम किसी भी समझौते तक नहीं पहुंच पाए हैं और मेरा मानना है कि यह अमेरिका की तुलना में ईरान के लिए ज्यादा बुरी खबर है। अमेरिका ने अपनी रेडलाइन स्पष्ट कर दी है। हमने साफ कर दिया है कि हम किन चीजों पर समझौता कर सकते हैं और किन पर बिल्कुल नहीं। लेकिन ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने हमारी शर्तों को स्वीकार नहीं करने का विकल्प चुना है। यानी ईरान ने अमेरिका की शर्तों के तहत आगे बढ़ने से साफ इंकार कर दिया और इस वजह से इस वार्ता का कोई नतीजा नहीं निकला।
यूरेनियम संवर्धन, होर्मुज जलडमरूमध्य और हिजबुल्ला पर अटकी बात
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर वो कौन से मुद्दे थे जिन पर सहमति नहीं बन पाई। तो ईरान और अमेरिका के बीच जिन मुद्दों पर सहमति नहीं बनी है उसमें सबसे पहला है ईरान का यूरेनियम संवर्धन और परमाणु कार्यक्रम। इसके अलावा होर्मुज जलडमरूमध्य में 28 फरवरी से पहले की तरह शिपिंग और लेबनान में हिजबुल्ला के खिलाफ इजराइल का सैन्य अभियान रोकना। यह वह मुद्दे हैं जिन्हें लेकर सबसे ज्यादा सस्पेंस बना हुआ था क्योंकि इसे लेकर ना तो ईरान पीछे हटने को तैयार है और ना ही अमेरिका उसे इसकी मंजूरी देने को राजी है। अब गौर करने वाली बात तो यह है कि इस वार्ता के फेल होने के पीछे ईरान ने अमेरिका को ही जिम्मेदार बताया है और साथ ही यह आरोप भी लगाया कि वह इस वार्ता को लेकर गंभीर ही नहीं था।
ईरान का आरोप: अमेरिका वार्ता से हटने का बहाना ढूंढ रहा था
ईरानी मीडिया का दावा है कि अमेरिका वार्ता से हटने का बहाना ढूंढ रहा था। हालांकि इस्लामाबाद से लौटने से पहले ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने यह जरूर कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच कई मुद्दों पर समझ बन गई है, लेकिन दो-तीन अहम मुद्दों पर मतभेद अभी भी बने हुए हैं। यह बातचीत 40 दिन की जबरन थोपी गई जंग के बाद हुई और माहौल में अविश्वास और शक था। ऐसे में शुरुआत से ही यह उम्मीद करना ठीक नहीं था कि एक ही बैठक में समझौता हो जाएगा। किसी को भी ऐसी उम्मीद नहीं थी। हमारे लिए कूटनीति ईरानी भूमि के रक्षकों के पवित्र जिहाद की निरंतरता है। हम अमेरिका द्वारा किए गए वादों के उल्लंघन और दुर्भावनापूर्ण कृत्यों को भूले नहीं हैं और ना ही भूलेंगे।
ईरान ने गेंद अमेरिका के पाले में डाली
बघाई के इस बयान से साफ है कि ईरान भी पीछे हटने वाला नहीं है। ईरान की तसनीम न्यूज एजेंसी के मुताबिक ईरान ने अब गेंद अमेरिका के पाले में डाल दी है और उसे बातचीत करने की कोई जल्दी भी नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया है कि होर्मुज स्ट्रेट की स्थिति में तब तक कोई बदलाव नहीं होगा जब तक वाशिंगटन तेहरान की उचित मांगों को नहीं मानता है। वहीं पाकिस्तान के विदेश मंत्री ईशाक डार ने भी वार्ता के बेनतीजा होकर खत्म होने पर यह उम्मीद जताई है कि वे आगे भी सीजफायर की कोशिशें जारी रखेंगे। ऑस्ट्रेलिया ने भी दोनों पक्षों से वार्ता की मेज पर लौटने की अपील की है।
ट्रंप की धमकी: ईरान को स्टोन एज में भेज देंगे
लेकिन जिस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर धमकियों पर उतर आए हैं, उसके बाद दोनों पक्षों में समन्वय बनाना बेहद मुश्किल नजर आ रहा है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म ट्रुथ सोशल पर एक न्यूज आर्टिकल शेयर किया है जिसमें कहा गया है कि अगर ईरान इस अंतिम प्रस्ताव को ठुकराता है तो ट्रंप के पास कई विकल्प तैयार हैं। इतना ही नहीं ट्रंप ईरान को स्टोन एज में वापस भेजने की भी धमकी दे चुके हैं। अमेरिका अब वेनेजुएला की तरह ईरान की भी आर्थिक घेराबंदी कर सकता है। यानी अमेरिका एक बार फिर ईरान पर हमले के संकेत दे रहा है। लेकिन जिस तरह का रुख ईरान ने अपनाया हुआ है और अब तक इस जंग में जिस तरह अमेरिका को मात मिली है, उसके बाद ट्रंप के लिए दोबारा हमले के बारे में सोचना भी आसान नहीं दिखता।
तुर्की-इजराइल: खुलता जंग का नया मोर्चा
ईरान-अमेरिका जंग के बीच इजराइल एक और देश के साथ उलझता नजर आ रहा है। अब तुर्की ने भी इजराइल के खिलाफ आक्रामक रुख अपना लिया है। दोनों देशों में जुबानी जंग छिड़ गई है। इजराइली रक्षा मंत्री ने तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगान पर हमला बोला। उन्होंने एर्दोगान को कागज का शेर कहा है जिस पर तुर्की ने भी जोरदार पलटवार किया। तुर्की के विदेश मंत्रालय ने नेतन्याहू को हिटलर बताया है। तुर्की के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि नेतन्याहू जिन्हें उनके जरिए किए गए अपराधों की वजह से हमारे समय का हिटलर कहा जाता है, एक मशहूर व्यक्ति हैं जिनका आपराधिक रिकॉर्ड बेदाग नहीं है।
इस्तांबुल में नेतन्याहू समेत 36 इजराइली नेताओं के खिलाफ मुकदमा
अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने युद्ध अपराधों और मानवता के खिलाफ अपराधों के आरोप में नेतन्याहू के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया है। नेतन्याहू का मकसद चल रही शांति वार्ताओं को कमजोर करना और क्षेत्र में अपनी विस्तारवादी नीतियों को जारी रखना है। इसमें विफल रहने पर उन पर अपने ही देश में मुकदमा चलाया जा सकता है और संभवतः उन्हें कारावास की सजा सुनाई जाएगी। इस बीच तुर्की ने एक बड़ा कदम भी उठाया है जिससे इजराइली प्रधानमंत्री की मुश्किलें बढ़नी तय है। इस्तांबुल के मुख्य सरकारी वकील ने इजराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू समेत 36 इजराइली नेताओं और अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया है। आरोप है कि अक्टूबर 2025 में गजा के लिए निकले सुमुद फ्लोटिला यानी जहाजी काफिले को अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा में रोककर नागरिकों के खिलाफ सैन्य कार्यवाही की गई।
तुर्की ने मांगी 4596 साल तक की सजा
बता दें कि तुर्की ने कोर्ट से सभी आरोपियों को कम से कम 1,102 साल और अधिकतम 4,596 साल कैद की सजा सुनाने की मांग की है। तुर्की के इस कदम से इजराइल भड़क उठा है। इजराइली प्रधानमंत्री ने इस मामले में तीखी प्रतिक्रिया दी। पीएम नेतन्याहू ने कहा कि मेरे नेतृत्व में इजराइल ईरान के आतंकी शासन और उसके गुर्गों से लड़ना जारी रखेगा, ठीक उसके विपरीत जैसा कि एर्दोगान करते हैं जो उन्हें पनाह देते हैं और अपने ही कुर्द नागरिकों का बड़े पैमाने पर कत्ल करते हैं। इजराइल के रक्षा मंत्री इजराइल कार्ट्स ने एर्दोगान को सलाह दी है कि उनके लिए चुप रहना ही बेहतर होगा। ऐसे में इजराइल और तुर्की के बीच का तनाव गहराता दिखाई दे रहा है।
इराक: ईरान समर्थक निजार अमीदी बने राष्ट्रपति
अमेरिका और ईरान के बीच 40 दिन की जंग में कुछ देश ऐसे भी थे जो ईरान के साथ खुलकर दिखाई दिए और इसमें से एक इराक भी था। इराक में अमेरिका का सैन्य बेस भी है, उनका दूतावास भी है और इराक के अमेरिकी दूतावास पर ईरान समर्थक इराकी मिलिशिया की तरफ से लगातार हमले हो रहे थे। यही कारण है कि अमेरिका को इराक से भागना पड़ा और अब इराक से अमेरिका को एक और बड़ा झटका लगा है। इराक में कुर्द नेता निजार अमीदी को राष्ट्रपति चुन लिया गया है। इराक की संसद ने कुर्द नेता निजार अमीदी को देश का नया राष्ट्रपति चुना है। यह फैसला आम चुनाव के करीब 5 महीने बाद लिया गया है क्योंकि चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था और सरकार बनाने में देरी हो रही थी।
पेट्रियोटिक यूनियन ऑफ कुर्दिस्तान ईरान का करीबी
इसलिए राष्ट्रपति चुनाव के लिए नया गठबंधन तैयार किया गया और इस गठबंधन के पीछे भी ईरान का ही हाथ बताया जा रहा है। इराक में एक परंपरा है कि राष्ट्रपति कुर्द समुदाय से होता है जबकि प्रधानमंत्री शिया और संसद अध्यक्ष सुन्नी समुदाय से चुना जाता है। ऐसे में यह भी जान लेते हैं कि अमीदी का राष्ट्रपति बनना आखिर अमेरिका के लिए झटका क्यों कहा जा रहा है। दरअसल अमीदी पेट्रियोटिक यूनियन ऑफ कुर्दिस्तान यानी पीयूके से आते हैं जिसे ईरान का करीबी माना जाता है। जबकि उसके विरोधी कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी यानी केडीपी को अमेरिका का करीबी माना जाता है। चुनाव में अमीदी ने मौजूदा विदेश मंत्री फवाद हुसैन को भी हराया था।
नूरी अल मलिकी के पीएम बनने का रास्ता साफ
हुसैन को कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी यानी केडीपी का समर्थन था। ऐसे में अमीदी के राष्ट्रपति बनने के बाद इराक में ईरान समर्थक सरकार बनने का रास्ता साफ हो गया है। और सबसे बड़ी बात तो यह है कि इराक में अब गठबंधन सरकार बन रही है जिसे ईरान समर्थक शिया कोऑर्डिनेशन फ्रेमवर्क कहा जा रहा है। जिसके बाद अब शिया नेता नूरी अल मलिकी के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता भी साफ होता दिखाई दे रहा है। मलिकी के रिश्ते ईरान के साथ मजबूत माने जाते हैं जो अमेरिका की टेंशन बढ़ाने वाले हो सकते हैं। इराक में ईरान समर्थक सरकार ऐसे दौर में बन रही है जब अमेरिका और ईरान के बीच दोबारा जंग शुरू होने की आहट सुनाई दे रही है।
ब्रिटेन का यूटर्न: चागोस द्वीप मॉरीशस को नहीं सौंपेंगे
हिंद महासागर के ठीक बीच में 60 द्वीपों का एक समूह है जिसे चागोस कहा जाता है। कहने को तो यह मॉरीशस का हिस्सा है लेकिन 1814 से इस पर कब्जा ब्रिटेन का है। डिएगो गार्सिया द्वीप पर स्थित यह सैन्य अड्डा वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान युद्धों सहित कई अमेरिकी सैन्य अभियानों में इस्तेमाल होता रहा है। मॉरीशस लंबे वक्त से मांग कर रहा था कि उनके द्वीप उन्हें वापस मिलने चाहिए। संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने भी ब्रिटेन से इन द्वीपों को मॉरीशस को लौटाने के आदेश दिए थे और ब्रिटेन इसके लिए तैयार भी हो गया था। ब्रिटेन सरकार इसे लेकर संसद में विधेयक भी ले आई थी जिसके बाद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ब्रिटेन पर भड़क उठे।
ट्रंप का दबाव: यह द्वीप हमारे लिए जरूरी
ट्रंप ने ब्रिटिश पीएम किर स्टारमर को खरी-खरी सुनाते हुए कहा था कि यह द्वीप अगर हमारे हाथ से निकला तो चीन पूरे हिंद महासागर पर दबदबा बना लेगा। हमारे लिए यह द्वीप अपने पास रखना बेहद जरूरी है क्योंकि यहां अमेरिका और ब्रिटेन का संयुक्त सैन्य बेस है। ट्रंप लगातार ब्रिटेन पर दबाव बना रहे थे कि वो इस समझौते से पीछे हट जाए और अब किर स्टारमर ने भी कह दिया है कि वह चागोस द्वीप मॉरीशस को नहीं सौंप रहे। क्योंकि संसद में जो विधेयक लाया गया था वह समय पर पारित नहीं हो पाया है। इसलिए अब यह विधेयक खुद ही खत्म हो गया है। अब किर स्टारमर भले ही यह दावा कर रहे हैं कि समझौते से वह इसलिए पीछे हट रहे हैं क्योंकि संसद ने मंजूरी नहीं दी है।
चागोसियन का घर वापसी का सपना टूटा
लेकिन ब्रिटेन ने ही अपने प्रधानमंत्री की पोल खोलकर रख दी है। विदेश मंत्रालय के पूर्व प्रमुख साइमन मैकडोनाल्ड ने कहा कि जब अमेरिका के राष्ट्रपति खुलकर विरोध कर रहे हों तब सरकार के पास समझौता रोकने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा। यह समझौता फिलहाल ठंडे बस्ते में चला गया है। ब्रिटिश सरकार ने भी माना है कि यह समझौता बेस के भविष्य की सुरक्षा के लिए सबसे अच्छा तरीका था, लेकिन इसे तभी आगे बढ़ाया जाएगा जब अमेरिका का समर्थन मिले। अब ब्रिटेन के यूटर्न के बाद एक बार फिर चागोसियन के लिए अपने घर लौटने का सपना टूटता दिखाई दे रहा है। जिन्हें 1960 से 1970 के बीच यहां से हटा दिया गया था। उनका कहना है कि इस समझौते से उनके घर लौटने की उम्मीद जगी थी, लेकिन ब्रिटेन ने एक बार फिर धोखा दे दिया है।
10 करोड़ साल पुराना मच्छर का लार्वा मिला
और अब चलते-चलते में बात करेंगे मच्छरों की। तो मच्छर का नाम सुनते ही सबसे पहले हमारे हाथ उसे मारने के लिए उठते हैं। लेकिन जिस मच्छर को हम और आप चुटकियों में मसल देते हैं, उसका इतिहास आपको हैरान कर देगा। जी हां, हाल ही में म्यांमार में मिला 9.90 करोड़ साल पुराना मच्छर का एक छोटा सा लार्वा यानी बच्चा वैज्ञानिकों को हैरान कर रहा है। दरअसल जर्मनी के एलएमयू यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं को पेड़ की सख्त हो चुकी गूंद के अंदर एक मच्छर का लार्वा फंसा हुआ मिला है। और सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात तो यह है कि यह करीब 10 करोड़ साल पुराना होने के बावजूद बिल्कुल आज के मच्छरों जैसा दिखता है।
स्टेसिस: 10 करोड़ साल में कोई बदलाव नहीं
मतलब इन 10 करोड़ साल में तमाम जीव-जंतु यहां तक कि हम इंसान तक बदल गए, लेकिन मच्छर बिल्कुल नहीं बदले। विज्ञान की भाषा में इसे स्टेसिस कहते हैं। यानी जब कोई जीव अपने पर्यावरण के हिसाब से इतना परफेक्ट हो जाता है कि उसे करोड़ों सालों तक खुद को बदलने की जरूरत ही नहीं पड़ती। आमतौर पर पेड़ की गोंद में वही जीव फंसते हैं जो पेड़ों पर रेंगते या उड़ते हैं जैसे मक्खियां या मकड़ियां। लेकिन मच्छर का लार्वा तो पानी में रहता है। अब जरा सोचिए कि कितना अजीब है। करोड़ों साल पहले किसी पेड़ के गोंद की बूंद सीधे पानी के उस छोटे से गड्ढे में गिरी होगी जहां यह लार्वा तैर रहा था। तभी यह लार्वा पत्थर बन चुकी गोंद में आज भी सुरक्षित है।
जानें पूरा मामला
वैज्ञानिक आंद्रे अम्रल बताते हैं कि इससे पहले मिले उस दौर के मच्छरों के अवशेष काफी अजीब थे जो आज के मच्छरों से मेल नहीं खाते थे। लेकिन इस नई खोज से पता चलता है कि मच्छरों का एक समूह करोड़ों सालों से एक जैसा भी रहा है। तो अगली बार जब कोई मच्छर आपके आसपास फटकता दिखे तो समझ जाइए कि यह उस परिवार का मच्छर है जो करोड़ों साल पहले डायनासोर के वक्त भी जिंदा थे। यह खोज विज्ञान की दुनिया में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है क्योंकि यह हमें विकास की प्रक्रिया को समझने में मदद करती है।
मुख्य बातें (Key Points)
- अमेरिका-ईरान के बीच इस्लामाबाद में 21 घंटे की वार्ता बेनतीजा, जेडी वेंस खाली हाथ लौटे।
- यूरेनियम संवर्धन, होर्मुज जलडमरूमध्य और हिजबुल्ला पर नहीं बनी सहमति, ट्रंप ने ईरान को स्टोन एज में भेजने की दी धमकी।
- तुर्की-इजराइल तनाव बढ़ा, इस्तांबुल में नेतन्याहू समेत 36 इजराइली नेताओं के खिलाफ मुकदमा दर्ज।
- तुर्की ने मांगी 4,596 साल तक की सजा, नेतन्याहू को हमारे समय का हिटलर बताया।
- इराक में ईरान समर्थक निजार अमीदी बने राष्ट्रपति, नूरी अल मलिकी के पीएम बनने का रास्ता साफ।
- ब्रिटेन ने चागोस द्वीप समझौते से लिया यूटर्न, ट्रंप के दबाव में किर स्टारमर ने पीछे हटे।
- म्यांमार में मिला 10 करोड़ साल पुराना मच्छर का लार्वा, डायनासोर के समय से अब तक कोई बदलाव नहीं।













