Live-In Relationship को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो अलग-अलग फैसलों ने पूरे देश में बहस छेड़ दी है। क्या एक पुरुष और एक महिला बिना शादी के एक छत के नीचे रह सकते हैं? क्या शादीशुदा पुरुष किसी अन्य शादीशुदा महिला के साथ Live-In Relationship में रह सकता है? क्या यह गैरकानूनी है या अपराध है? ये सवाल बार-बार उठते हैं और सीधे अदालत की चौखट पर पहुंचते हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 20 मार्च और 25 मार्च को दो अलग-अलग मामलों में दो बिल्कुल अलग आदेश दिए हैं, जिनकी अब जबरदस्त चर्चा हो रही है। एक फैसले में कोर्ट ने कपल को सुरक्षा दी, जबकि दूसरे में सुरक्षा देने से साफ इनकार कर दिया।
पहला फैसला (20 मार्च): शादीशुदा कपल को Live-In में रहने का अधिकार नहीं
Live-In Relationship का पहला मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट के सामने तब आया जब एक लड़का और लड़की ने, जो साथ में रह रहे थे, कोर्ट में याचिका दायर की। उन्होंने कहा कि उन्हें जान का खतरा है और उनकी मांग थी कि कोर्ट लोगों को उनकी जिंदगी में दखल देने से रोके और उन्हें सुरक्षा प्रदान करे।
इस मामले की सबसे अहम बात यह थी कि दोनों लोगों की शादी पहले से अलग-अलग लोगों से हो रखी थी। यानी दोनों अपने-अपने जीवनसाथी को छोड़कर एक-दूसरे के साथ Live-In Relationship में रह रहे थे।
20 मार्च को हाई कोर्ट की एक जज की पीठ ने इस मामले पर अपना फैसला सुनाया और सुरक्षा देने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर किसी व्यक्ति की शादी हो रखी है, तो उन्हें किसी और के साथ Live-In Relationship में रहने के लिए पहले अपने पति या पत्नी से तलाक लेना होगा।
“सुरक्षा दी तो बायोगमी (द्विविवाह) को बढ़ावा मिलेगा”: कोर्ट का कड़ा रुख
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस Live-In Relationship मामले में बेहद तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि कोर्ट सुरक्षा का आदेश तभी दे सकता है जब किसी के कानूनी अधिकार को ठेस पहुंच रही हो। लेकिन इस मामले में शादीशुदा होकर किसी और के साथ रहना कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर वह इस कपल को सुरक्षा प्रदान करता है, तो हो सकता है कि वह विवाह बायोगमी (द्विविवाह) के अपराध को बढ़ावा दे रहा हो। कोर्ट का साफ कहना था कि “पूर्व पति-पत्नी से तलाक लिए बिना किसी तीसरे व्यक्ति के साथ Live-In Relationship में रहने की कानूनी अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्हें विवाह करने या Live-In Relationship में प्रवेश करने से पहले सक्षम न्यायालय से तलाक लेना होगा।”
हालांकि कोर्ट ने यह जरूर कहा कि अगर याचिकाकर्ताओं को किसी तरह की हिंसा या परेशानी का सामना करना पड़ता है, तो वे संबंधित वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) या पुलिस अधीक्षक (SP) के समक्ष विस्तृत आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।
दूसरा फैसला (25 मार्च): बालिग है तो अपनी मर्जी से रह सकती है
Live-In Relationship पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का दूसरा फैसला पहले फैसले के ठीक 5 दिन बाद 25 मार्च को आया और इसने सबको चौंका दिया। इस बार हाई कोर्ट के दो जजों की पीठ ने बिल्कुल अलग रुख अपनाया।
इस मामले में एक Live-In Relationship में रह रहा कपल कोर्ट के सामने आया था। उन्होंने कोर्ट से सुरक्षा की मांग की थी। इस केस की पृष्ठभूमि यह थी कि लड़की की मां ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि लड़के ने उनकी बेटी को बहला-फुसलाकर अपने साथ रख लिया है। इस मामले में भी लड़के की किसी और महिला से शादी हो रखी थी।
दोनों ने सुरक्षा के लिए पहले पुलिस का दरवाजा भी खटखटाया था, लेकिन पुलिस ने कोई कदम नहीं उठाया। लड़की के मां-बाप और परिवार इस रिश्ते के सख्त खिलाफ थे और दोनों को अपनी जान का खतरा था।
“नैतिकता और कानून दोनों अपनी जगह हैं”: कोर्ट का अहम बयान
इलाहाबाद हाई कोर्ट की दो जजों की पीठ ने इस Live-In Relationship मामले में कहा कि “नैतिकता और कानून दोनों अपनी-अपनी जगह हैं।” कोर्ट ने कहा कि एक शादीशुदा व्यक्ति भी किसी और के साथ, उनकी मर्जी से, साथ रह सकता है।
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि लड़की बालिग है और लड़के के साथ अपनी मर्जी से रह रही है। किसी बालिग व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह अपनी इच्छा से अपना जीवनसाथी या साथी चुन सके। कोर्ट ने दोनों कपल को सुरक्षा देने का आदेश दिया, जो पहले मामले के फैसले से बिल्कुल उलट था।
दो फैसलों में फर्क क्यों: एक जज बनाम दो जजों की पीठ
Live-In Relationship पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के इन दो अलग-अलग फैसलों को समझने के लिए कुछ अहम बातें ध्यान में रखनी होंगी। पहला फैसला 20 मार्च को एक जज की सिंगल बेंच ने दिया, जबकि दूसरा फैसला 25 मार्च को दो जजों की डिवीजन बेंच ने सुनाया। आमतौर पर डिवीजन बेंच का फैसला सिंगल बेंच के फैसले से ज्यादा वजनदार माना जाता है।
दोनों मामलों की परिस्थितियां भी अलग-अलग थीं। पहले मामले में दोनों पक्ष शादीशुदा थे और दोनों ने अपने-अपने जीवनसाथियों को छोड़कर साथ रहना शुरू किया था। दूसरे मामले में लड़की बालिग थी, अपनी मर्जी से रह रही थी और उसे परिवार से जान का खतरा था। कोर्ट ने दूसरे मामले में बालिग महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और उसकी सुरक्षा को प्राथमिकता दी।
सबसे अहम बात: किसी भी फैसले में Live-In Relationship को गैरकानूनी नहीं कहा
Live-In Relationship पर चल रही इस पूरी बहस में एक बात सबसे अहम है जो हर किसी को समझनी चाहिए। दोनों मामलों में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहीं भी यह नहीं कहा कि Live-In Relationship गैरकानूनी या अपराध है। दोनों फैसले केवल सुरक्षा प्रदान करने या न करने से संबंधित थे।
पहले मामले में कोर्ट ने सुरक्षा इसलिए नहीं दी क्योंकि दोनों शादीशुदा थे और बिना तलाक के किसी और के साथ रहना बायोगमी को बढ़ावा दे सकता था। दूसरे मामले में कोर्ट ने सुरक्षा इसलिए दी क्योंकि लड़की बालिग थी, अपनी मर्जी से साथ रह रही थी और उसकी जान को खतरा था। कोर्ट ने नैतिकता और कानून के बीच फर्क को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया।
आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर
Live-In Relationship पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के ये दोनों फैसले आम लोगों के लिए कई सवालों के जवाब देते हैं और साथ ही कुछ नए सवाल भी खड़े करते हैं। इन फैसलों से यह तो स्पष्ट है कि भारतीय न्यायपालिका Live-In Relationship को अपराध नहीं मानती, लेकिन शादीशुदा लोगों के लिए स्थिति अलग है।
अगर कोई व्यक्ति शादीशुदा है और बिना तलाक लिए किसी और के साथ Live-In Relationship में रहना चाहता है, तो कोर्ट उसे कानूनी सुरक्षा देने से मना कर सकता है। लेकिन अगर कोई बालिग अपनी मर्जी से किसी के साथ रह रहा है और उसकी जान को खतरा है, तो कोर्ट सुरक्षा दे सकता है। ये फैसले उन सभी लोगों के लिए महत्वपूर्ण हैं जो Live-In Relationship में रह रहे हैं या रहने की सोच रहे हैं।
भारत में Live-In Relationship का कानूनी दर्जा क्या है
भारत में Live-In Relationship को लेकर कोई अलग से कानून नहीं बना है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार अपने फैसलों में कहा है कि दो बालिग लोग अपनी मर्जी से साथ रह सकते हैं और यह कोई अपराध नहीं है। हालांकि जब शादीशुदा लोग बिना तलाक के Live-In Relationship में रहते हैं, तो यह कानूनी जटिलताएं पैदा करता है, क्योंकि भारतीय दंड संहिता (अब भारतीय न्याय संहिता) में बायोगमी (द्विविवाह) को अपराध माना गया है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के ये दोनों फैसले इसी कानूनी स्थिति को और स्पष्ट करते हैं। Live-In Relationship अपने आप में कोई अपराध नहीं है, लेकिन शादीशुदा लोगों को इसमें प्रवेश करने से पहले अपने पहले विवाह से कानूनी रूप से मुक्त होना जरूरी है।
मुख्य बातें (Key Points)
- इलाहाबाद हाई कोर्ट ने Live-In Relationship पर 20 मार्च और 25 मार्च को दो अलग-अलग फैसले दिए।
- पहले फैसले में शादीशुदा कपल को Live-In में सुरक्षा देने से इनकार किया, कहा: बिना तलाक के अधिकार नहीं।
- दूसरे फैसले में बालिग लड़की को अपनी मर्जी से रहने का अधिकार माना और कपल को सुरक्षा दी।
- दोनों फैसलों में कोर्ट ने कहीं भी Live-In Relationship को गैरकानूनी या अपराध नहीं कहा, फर्क सिर्फ सुरक्षा देने में था।













