Dr BR Ambedkar Legacy को समझना हो तो एक 9 साल के बालक की कहानी से शुरू करना होगा, जो अपने भाई-बहनों के साथ ट्रेन से मसूर स्टेशन पहुंचा और वहां से कोरेगांव जाने के लिए बैलगाड़ी ढूंढ रहा था। कोई भी बैलगाड़ी वाला उसे बैठाने को तैयार नहीं था, क्योंकि वह महार जाति से था, जिसे उस जमाने में अछूत माना जाता था। आखिरकार एक बैलगाड़ी वाला दोगुने पैसे लेकर और खुद गाड़ी न चलाने की शर्त पर तैयार हुआ। रास्ते में रात हो गई, प्यास लगी, लेकिन किसी ने भी उस बालक को पानी नहीं दिया। खाना पास में था, पर बिना पानी के सूखा खाना चबाना संभव नहीं था और उसे भूखे सोना पड़ा। वह बालक था भीमराव अंबेडकर, जिसने बड़े होकर भारत का संविधान लिखा और करोड़ों वंचितों को अधिकार दिलाए। उनका जन्म 14 अप्रैल 1891 को वर्तमान मध्य प्रदेश के इंदौर जिले में महू नामक गांव में हुआ था।
बचपन से ही भेदभाव की आग में तपे बाबा साहेब
Dr BR Ambedkar Legacy की नींव उनके बचपन के कटु अनुभवों में ही पड़ गई थी। वे अपने माता-पिता की 14वीं संतान थे। उनके दादा मालोजी सकपाल, पिता रामजी सकपाल और माता भीमाबाई थीं। महार जाति को अछूत माना जाता था, लेकिन यह जाति निडर और बहादुर लोगों का समूह थी जो अंग्रेजों से भी लोहा लेने में सबसे आगे रहती थी। इसीलिए 1892 में ब्रिटिश सरकार ने महारों की सेना में भर्ती पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसका रामजी सकपाल सहित पूरे समुदाय ने जमकर विरोध किया।
विद्यालय में भीमराव के साथ कोई भी बालक बैठना नहीं चाहता था। कुएं से पानी तक नहीं पीने दिया जाता था। एक मेधावी छात्र होने के बावजूद उन्हें सम्मान की जगह घृणा और भेदभाव मिला। संस्कृत के शिक्षक ने तो उन्हें कक्षा में बैठने से ही रोक दिया, कहा कि “छोटी और अछूत जाति के लोगों को संस्कृत पढ़ने का अधिकार नहीं है, क्योंकि यह तो देववाणी है।”
लेकिन अंबेडकर ने हार नहीं मानी। उन्होंने स्वाध्याय के बल पर सभी उपलब्ध संस्कृत ग्रंथों को न केवल पढ़ डाला, बल्कि उनकी त्रुटियों को उजागर करते हुए आलोचनात्मक टिप्पणी भी लिखी। उनकी व्याख्या का स्तर इतना ऊंचा था कि उस समय के गिने-चुने शिक्षित लोग ही उसे समझ सकते थे।
शिक्षक महादेव अंबेडकर ने बदल दिया जीवन का रुख
Dr BR Ambedkar Legacy में एक अहम मोड़ तब आया जब विद्यालय में उनकी मुलाकात शिक्षक महादेव अंबेडकर से हुई। कहा जाता है कि इन्हीं शिक्षक ने न केवल बाबा साहेब पर विशेष ध्यान रखा, बल्कि उन्हें अपना उपनाम ‘अंबेडकर’ प्रयोग करने का अधिकार भी दिया। महादेव ब्राह्मण जाति के थे, लेकिन रूढ़िवादी परंपराओं के मुखर विरोधी थे। वे अंबेडकर की प्रतिभा से बेहद प्रभावित थे और उन्हें विश्वास था कि यह बालक बड़ा होकर निश्चित रूप से कुछ बड़ा करेगा।
बुआ के पर्स में आधा आना और जीवन बदलने वाला संकल्प
बचपन में एक और घटना ने अंबेडकर के जीवन की दिशा तय कर दी। एक बार जब उन्हें कुछ अतिरिक्त पैसों की जरूरत पड़ी, तो उन्होंने अपनी बुआ के पर्स से पैसे निकालने की कोशिश की। लेकिन पर्स में महज आधा आना पैसा था। यह देखकर अंबेडकर को गहरा अपराधबोध हुआ, क्योंकि उस पर्स में इतने कम पैसे का होना बता रहा था कि परिवार में पैसों का कितना अभाव है। उसी क्षण उन्होंने निश्चय कर लिया कि वे सही मार्ग पर चलकर शिक्षा के माध्यम से ही धन कमाएंगे और जीवन में दोबारा कभी ऐसा काम नहीं करेंगे।
कोलंबिया विश्वविद्यालय: जहां पहली बार मिली समानता
Dr BR Ambedkar Legacy का एक निर्णायक अध्याय तब खुला जब उनकी मुलाकात मराठी लेखक और समाज सुधारक कृष्णराव केलुस्कर से हुई। केलुस्कर ने ही सबसे पहले बाबा साहेब का परिचय बौद्ध धर्म से कराया और उन्हें भगवान बुद्ध की जीवनी ‘बुद्ध चरित्र’ भेंट की। आगे चलकर केलुस्कर ने अपनी पहुंच का इस्तेमाल करते हुए बड़ौदा रियासत के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ से अंबेडकर की शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति का प्रबंध करवाया।
इसी छात्रवृत्ति के सहारे अंबेडकर अमेरिका के प्रतिष्ठित कोलंबिया विश्वविद्यालय पहुंचे। यहां उन्हें वह चीज मिली जिसकी तलाश उन्होंने जन्म से की थी: समानता। कोलंबिया में उन्होंने अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान, दर्शनशास्त्र, समाजशास्त्र और एंथ्रोपोलॉजी का गहन अध्ययन किया। उनकी एमए की थीसिस का विषय था ‘एंशिएंट इंडियन कॉमर्स’ और पीएचडी की विशेषज्ञता का विषय था ‘नेशनल डिविडेंड ऑफ इंडिया’।
कोलंबिया में ही उन्होंने जाति व्यवस्था पर गहन अध्ययन करते हुए ‘कास्ट्स इन इंडिया: देयर मैकेनिज्म, जेनेसिस एंड डेवलपमेंट’ शीर्षक से एक महत्वपूर्ण शोध लेख भी लिखा। डॉक्टरेट हासिल करने के बाद उन्होंने ब्रिटिश भारत की वित्तीय व्यवस्था पर ‘द एवोल्यूशन ऑफ प्रोविंशियल फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया’ नामक किताब लिखी, जिसने स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं और बुद्धिजीवियों को देश के आर्थिक हालात के बारे में सोचने का नया दृष्टिकोण दिया।
अपने ही देश में पराया: बड़ौदा का दर्दनाक अनुभव
विदेश से पढ़ाई पूरी करके जब अंबेडकर बड़ौदा लौटे, तो स्टेशन पर उन्हें लेने कोई नहीं आया, जबकि महाराजा ने इसका आदेश पहले ही दिया था। ठहरने के लिए कमरा मांगा तो किसी ने अपने घर में प्रवेश तक नहीं करने दिया। किसी तरह एक पारसी सराय में ठहरे। महाराजा सयाजीराव उनकी योग्यता देखकर दंग रह गए और उन्हें वित्त मंत्री का पद देना चाहते थे, लेकिन किसी कारणवश उन्हें मिलिट्री सचिव बनाया गया।
उच्च शिक्षा, ऊंचा पद और अच्छी आर्थिक स्थिति के बावजूद जाति की पहचान ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। कार्यालय में भी सभी अछूत जैसा व्यवहार करते थे। हालात तब और बिगड़ गए जब पारसी मकान मालिक ने उन्हें पीटने की धमकी दी और सराय से निकाल फेंका। यह अपमान महात्मा गांधी के अफ्रीका वाले अपमान से भी कहीं ज्यादा पीड़ादायक था, क्योंकि यह अपने ही देश में हुआ था। दुख से रोते हुए अंबेडकर बड़ौदा छोड़कर मुंबई चले गए और वहां प्रोफेसर की नौकरी कर ली।
महाड़ सत्याग्रह: जब हजारों दलितों ने पहली बार पानी पीया
Dr BR Ambedkar Legacy का एक ऐतिहासिक अध्याय 1927 में लिखा गया जब मुंबई के गवर्नर ने उन्हें विधान परिषद का सदस्य बनाया। अंबेडकर ने बंबई के महाड़ में दलितों के साथ हो रहे भेदभाव का मुद्दा उठाया। वहां एक टैंक का पानी सभी के लिए उपलब्ध था, लेकिन दलितों को उसके पास फटकने तक नहीं दिया जाता था।
अंबेडकर ने एक कॉन्फ्रेंस में दलितों को इतना प्रोत्साहित किया कि हजारों दलितों ने पूरे महाड़ में मार्च करते हुए उस टैंक से पानी पीया। इस घटना ने एक तरफ दलितों में परिवर्तन की उम्मीद जगाई, दूसरी तरफ ऊंची जातियों ने टैंक का विधि-विधान से ‘शुद्धिकरण’ करवाया। 1927 के इसी कॉन्फ्रेंस में अंबेडकर ने संपूर्ण हिंदू समाज को चुनौती देते हुए मनुस्मृति को जला डाला। इस कदम से वीर सावरकर जैसे कई हिंदू राष्ट्रवादी नेताओं के पैरों तले जमीन खिसक गई।
गांधी और अंबेडकर: दो ध्रुवों का ऐतिहासिक टकराव
Dr BR Ambedkar Legacy में गांधी-अंबेडकर के बीच का वैचारिक टकराव सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक है। दोनों के अंतिम उद्देश्य में कोई विशेष अंतर नहीं था, लेकिन रास्ते बिल्कुल विपरीत थे।
गोलमेज सम्मेलन में जब दोनों आमने-सामने हुए, तो गांधी ने कहा कि “अछूत हो या ब्राह्मण, हम सब एक ही भूमि की संतान हैं। अगर अछूतों को अलग निर्वाचक मंडल देंगे तो विभाजन स्थाई हो जाएगा।” अंबेडकर ने संयमित लेकिन दृढ़ स्वर में जवाब दिया: “हम वो हैं जिन्हें अपने ही देश में पराया बनाया गया है। सदियों से कुएं से पानी नहीं ले सकते, स्कूल में बैठ नहीं सकते, मंदिर नहीं जा सकते। क्या यही एकता है?”
गांधी ने कहा कि वे दलितों को ‘हरिजन’ यानी ईश्वर के लोग मानते हैं। इस पर अंबेडकर ने तीखे स्वर में कहा: “हरिजन कह देने मात्र से हम इंसान नहीं बन जाएंगे। सम्मान और बराबरी के बिना एकता केवल दिखावा है। एकता या आत्मसम्मान के बीच अगर मुझे चुनाव करना होगा, तो मैं आत्मसम्मान को चुनूंगा।”
जहां गांधी ने तीन गोलमेज सम्मेलनों में से केवल दूसरे में भाग लिया, वहीं अंबेडकर ने तीनों सम्मेलनों में शिरकत की। यह पहली बार था जब किसी ‘अछूत’ को इतने बड़े वैश्विक मंच पर बराबर का स्थान मिला था।
पूना पैक्ट: जब गांधी के अनशन ने अंबेडकर को झुकने पर मजबूर किया
ब्रिटिश सरकार ने 17 अगस्त 1932 को कम्युनल अवार्ड के तहत दलितों को अलग निर्वाचक मंडल देने का निर्णय लिया। इसके विरोध में गांधी जी पुणे की यरवदा जेल में आमरण अनशन पर बैठ गए। पूरे देश में अंबेडकर की तीखी आलोचना होने लगी, पुतले जलाए गए और दलितों पर अत्याचार बढ़ गए।
गांधी की बिगड़ती तबीयत और दलितों पर बढ़ते अत्याचार को देखते हुए 24 सितंबर 1932 को अंबेडकर यरवदा जेल पहुंचे। यह मुलाकात इतिहास बदलने वाली थी। भारी दबाव में अंबेडकर ने पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किए, जिसमें अलग निर्वाचक मंडल छोड़ने पर सहमति दी, लेकिन बदले में दलितों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 71 से बढ़ाकर 147 कर दी गई और विधानमंडल में उनकी हिस्सेदारी कुल सीटों का 18 फीसदी तय की गई।
अंबेडकर को यह समझौता पूरे मन से स्वीकार नहीं था। उन्हें दोनों तरफ से आलोचना झेलनी पड़ी: एक तरफ दलितों का आक्रोश और दूसरी तरफ सवर्ण नेताओं का दबाव।
“हिंदू रहकर मरूंगा नहीं”: येवला सम्मेलन की ऐतिहासिक घोषणा
13 अक्टूबर 1935 को महाराष्ट्र के नासिक के येवला में एक बड़ा सम्मेलन हुआ जिसमें अंबेडकर ने ऐलान किया: “मैं हिंदू धर्म में पैदा जरूर हुआ हूं, लेकिन हिंदू रहकर मरूंगा नहीं।” इस घोषणा ने हिंदू समाज को हिलाकर रख दिया। अंबेडकर ने देखा था कि बार-बार सुधार की कोशिशों के बावजूद छुआछूत, भेदभाव और अपमान की दीवारें जस की तस बनी रहीं। मंदिरों में प्रवेश, पानी के लिए अलग घड़े, स्कूलों में भेदभाव: यह सब उनके जीवन की रोजमर्रा की हकीकत थी।
14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में उन्होंने 3,65,000 अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार किया। यह केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का प्रतीक था।
एनिहिलेशन ऑफ कास्ट: वो भाषण जिसे प्रसारित करने से भी मना कर दिया गया
1937 में अंबेडकर ने ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ नामक ऐतिहासिक भाषण लिखा, जो इतना क्रांतिकारी था कि जातिपात तोड़क मंडल ने उसे प्रसारित करने से ही मना कर दिया। बाद में जब यह पुस्तक के रूप में छपा तो सामाजिक न्याय आंदोलन का घोषणापत्र बन गया।
अंबेडकर ने दलितों की आवाज दुनिया तक पहुंचाने के लिए मूक नायक, बहिष्कृत भारत, जनता, समता और प्रबुद्ध भारत जैसे प्रकाशनों का संपादन किया। 1936 में उन्होंने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी बनाई और 1937 में मुंबई प्रेसिडेंसी चुनावों में भारी जीत दर्ज की।
संविधान निर्माता: जिसने हर भारतीय को अधिकार दिए
Dr BR Ambedkar Legacy का सबसे चमकदार पन्ना भारतीय संविधान का निर्माण है। ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष के रूप में अंबेडकर ने लगभग 3 साल की अथक मेहनत के बाद 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा के सामने अंतिम मसौदा प्रस्तुत किया। यह केवल एक दस्तावेज नहीं था, बल्कि भारतीय इतिहास की एक नई इबारत थी।
अंबेडकर को महज दलितों का नेता कहकर सीमित करने की कोशिश की गई, जबकि आर्टिकल 15(4), आर्टिकल 14(6) और आर्टिकल 340 के अंतर्गत जिन प्रावधानों का लाभ अन्य पिछड़ा वर्ग आज उठा रहा है, उनके सृजनकर्ता बाबा साहेब ही थे।
बहुत कम लोग जानते हैं कि भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना में भी अंबेडकर की किताब ‘द प्रॉब्लम ऑफ रूपी’ और उनके आर्थिक विचारों की अहम भूमिका थी। 1923 में इसी पुस्तक के लिए उन्हें डॉक्टर ऑफ साइंस की उपाधि मिली थी।
कानून मंत्री से लेकर जल नीति तक: अंबेडकर का बहुआयामी योगदान
स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री बनने के बाद अंबेडकर ने महिला अधिकारों को मजबूत करने के लिए हिंदू कोड बिल पेश किया, जो उस समय क्रांतिकारी कदम था। लेकिन रूढ़िवादी सोच ने इसका विरोध किया। इससे आहत होकर उन्होंने 1951 में मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। बाद में यह विधेयक कमजोर रूप में पारित हुआ, लेकिन फिर भी इसने भारतीय महिलाओं को कई मौलिक अधिकार दिए।
1944 में कोलकाता में उन्होंने नदियों को जोड़ने की योजना रखी, जो आगे चलकर भारत की राष्ट्रीय जल नीति का आधार बनी। हीराकुंड और दामोदर नदी घाटी परियोजनाएं इसी सोच की उपज हैं। 1955 में उन्होंने भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का सुझाव दिया, जो वर्षों बाद वास्तविकता बनी।
‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ नामक पुस्तक में उन्होंने विभाजन से पहले ही आगाह कर दिया था कि “यदि देश बंटा, तो इसका मूल्य रक्त से चुकाना पड़ेगा।” इस पुस्तक में उन्होंने मुस्लिम लीग और कांग्रेस दोनों की जमकर आलोचना की थी।
व्यक्तिगत जीवन: जाति नहीं, मानवीय मूल्यों पर आधारित
अंबेडकर ने अपनी पहली पत्नी रमाबाई को शिक्षा देने की कोशिश की और उन्हें हमेशा सम्मान दिया। रमाबाई के निधन के बाद उन्होंने ब्राह्मण नर्स शारदा कबीर से विवाह किया। यह विवाह सामाजिक रूढ़ियों के खिलाफ एक सशक्त संदेश था, क्योंकि यह जाति नहीं बल्कि मानवीय मूल्यों पर आधारित जीवन था।
1952 में उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा लेकिन हार गए। उसी वर्ष उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाया गया और वे मृत्यु पर्यंत इसके सदस्य रहे। उनकी पुस्तक ‘द बुद्ध एंड हिज धम्म’ उनके जीवन मार्गदर्शन का सार है। यह पुस्तक लिखने के महज 3 दिन बाद, 6 दिसंबर 1956 को दिल्ली में उनका देहांत हो गया। मुंबई में उनका अंतिम संस्कार बौद्ध विधि से हुआ।
1990 में उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया गया और उसी वर्ष उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
बाबा साहेब क्यों आज भी प्रासंगिक हैं?
Dr BR Ambedkar Legacy आज भी इसलिए जीवंत है क्योंकि उन्होंने जिन मूल्यों के लिए लड़ाई लड़ी, वे आज भी पूरी तरह हासिल नहीं हुए हैं। जिस वर्ग से उन्होंने सर्वाधिक यातनाएं झेलीं, शक्ति और पद पाने के बाद भी उन्होंने उनके विरुद्ध न तो एक शब्द लिखा, न कोई गैर-न्यायिक प्रावधान शामिल किया। उनके पास तलवार नहीं थी, लेकिन ज्ञान, तर्क और अदम्य साहस था। उन्होंने आलोचकों को तर्क से और समर्थकों को मार्गदर्शन से जीता। जब भी हम संविधान की प्रस्तावना में समता, स्वतंत्रता, बंधुता और न्याय जैसे शब्द पढ़ते हैं, तो हर शब्द में डॉ. अंबेडकर का सपना झलकता है।
मुख्य बातें (Key Points)
- Dr BR Ambedkar का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू में महार जाति में हुआ था और बचपन से ही उन्हें अछूत होने का भयंकर भेदभाव झेलना पड़ा।
- कोलंबिया विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट करने के बाद भी अपने ही देश में उन्हें पानी, ठहरने की जगह और सम्मान नहीं मिला, जिसने उन्हें जाति व्यवस्था के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया।
- पूना पैक्ट (1932) में भारी दबाव में समझौता किया, लेकिन दलितों के लिए आरक्षित सीटें 71 से बढ़ाकर 147 कराईं और संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष के रूप में भारत को समता, स्वतंत्रता और न्याय पर आधारित संविधान दिया।
- RBI की स्थापना में उनके आर्थिक विचारों की भूमिका, हिंदू कोड बिल, जल नीति, भाषाई राज्य पुनर्गठन जैसे बहुआयामी योगदान उन्हें सिर्फ दलित नेता नहीं बल्कि संपूर्ण भारत का निर्माता बनाते हैं।








