Dehradun War Memorial को लेकर दायर एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए सुनवाई से साफ इनकार कर दिया। उत्तराखंड के देहरादून में बन रहे सैन्य धाम युद्ध स्मारक के निर्माण को चुनौती देने वाली इस याचिका पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता से दो टूक सवाल किया कि “आप किसके इशारे पर यहां आए हैं?” कोर्ट ने इस याचिका को शरारतपूर्ण करार देते हुए ₹1 लाख तक का जुर्माना लगाने और कारण बताओ नोटिस जारी करने की चेतावनी भी दे दी।
क्या है पूरा मामला: सैन्य धाम पर क्यों उठा विवाद
Dehradun War Memorial यानी सैन्य धाम देश के वीर शहीदों की याद में बनाया जा रहा एक भव्य युद्ध स्मारक है, जिसका निर्माण 2021 में शुरू हुआ था और अब लगभग पूरा हो चुका है। इस स्मारक के खिलाफ एक व्यक्ति ने याचिका दायर कर दावा किया कि जिस जमीन पर यह स्मारक बन रहा है, वह वन भूमि (Forest Land) है और वहां निर्माण नहीं होना चाहिए।
यह याचिका सबसे पहले उत्तराखंड हाईकोर्ट (नैनीताल) में दाखिल की गई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे पहले ही खारिज कर दिया। हाईकोर्ट से राहत न मिलने पर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में भी उसे वही जवाब मिला, बल्कि उससे भी सख्त।
CJI सूर्यकांत ने लगाई जमकर फटकार
Dehradun War Memorial मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जयमल्ला बागची और जस्टिस विपुल एम. चमोली की तीन सदस्यीय पीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील से सीधे सवाल किया कि “क्या आपको युद्ध स्मारक बनाने से कोई समस्या है?”
CJI ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि “जिन लोगों ने देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी है, जो देश के लिए शहीद हुए हैं, उनके प्रति कम से कम कुछ सम्मान तो होना चाहिए।” यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की उस भावना को दर्शाती है कि शहीदों के सम्मान से जुड़े मामलों में अदालत किसी भी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं है।
₹1 लाख जुर्माने की चेतावनी, कारण बताओ नोटिस का भी जिक्र
सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी सिर्फ सवालों तक सीमित नहीं रही। पीठ ने याचिकाकर्ता पर ₹1 लाख तक की लागत यानी जुर्माना लगाने की बात भी कही। CJI ने टिप्पणी की कि ऐसी याचिकाएं शरारतपूर्ण तरीके से दायर की जाती हैं और इनका मकसद सिर्फ विकास कार्यों में अड़ंगा लगाना होता है।
इतना ही नहीं, CJI ने यह भी कहा कि “इस याचिकाकर्ता को कारण बताओ नोटिस जारी करेंगे। उन्हें आकर स्पष्टीकरण देना होगा और हम इस बात की जांच करेंगे कि वह किसके कहने पर यह याचिका दायर कर रहे हैं।” कोर्ट की यह टिप्पणी साफ इशारा करती है कि अदालत को संदेह है कि इस याचिका के पीछे कोई और ताकत काम कर रही है।
हाईकोर्ट को भी सुनाई खरी-खरी
Dehradun War Memorial मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ याचिकाकर्ता को ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड हाईकोर्ट को भी एक सीख दी। कोर्ट ने कहा कि “हाईकोर्ट को इस याचिका को जुर्माने के साथ खारिज करना चाहिए था।” मतलब सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि हाईकोर्ट ने जब यह याचिका खारिज की तो उसे सिर्फ खारिज करने की बजाय जुर्माना भी लगाना चाहिए था, ताकि भविष्य में कोई इस तरह की बेबुनियाद याचिकाएं दायर करने की हिम्मत न करे।
राज्य सरकार ने रखा अपना पक्ष: जमीन वन भूमि नहीं है
सुनवाई के दौरान उत्तराखंड सरकार ने भी अपना पक्ष अदालत के सामने रखा। राज्य सरकार ने बताया कि विवादित जमीन का राजस्व विभाग और वन विभाग द्वारा संयुक्त सर्वेक्षण किया गया था। सर्वे रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि यह जमीन वन भूमि नहीं है। इसलिए सैन्य धाम युद्ध स्मारक के निर्माण में कोई भी कानूनी बाधा नहीं है।
सरकार ने यह भी बताया कि सैन्य धाम स्मारक का निर्माण 2021 में शुरू हुआ था और अब यह लगभग पूरा हो चुका है। ऐसे में जब स्मारक तकरीबन बनकर तैयार है और सर्वे रिपोर्ट भी साफ है, तो इस याचिका का कोई औचित्य ही नहीं बनता था।
याचिकाकर्ता ने वापस ली याचिका, कोर्ट ने दी मंजूरी
जब सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने साफ कर दिया कि वह इस याचिका पर विचार करने के मूड में बिल्कुल नहीं है और जुर्माने से लेकर कारण बताओ नोटिस तक की चेतावनी दे दी, तो याचिकाकर्ता के वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस अनुमति को स्वीकार कर लिया।
हालांकि कोर्ट की सख्त टिप्पणियां इस बात का स्पष्ट संदेश हैं कि भविष्य में शहीदों के सम्मान से जुड़े स्मारकों के खिलाफ इस तरह की बेबुनियाद याचिकाएं दायर करने वालों को अदालत बख्शने के मूड में नहीं है।
शहीदों के सम्मान पर अदालत बेहद संवेदनशील
Dehradun War Memorial पर सुप्रीम कोर्ट का यह रुख बताता है कि देश की सर्वोच्च अदालत शहीदों के सम्मान से जुड़े मामलों में बेहद संवेदनशील है। जब कोर्ट ने कहा कि “जिन्होंने देश के लिए जान दी, उनके प्रति कम से कम सम्मान तो होना चाहिए,” तो यह सिर्फ एक टिप्पणी नहीं बल्कि पूरे देश को एक मजबूत संदेश था। वे सैनिक जो सीमाओं पर अपनी जान की बाजी लगाकर देश की रक्षा करते हैं, उनकी याद में बनने वाले स्मारकों को रोकने की कोशिश करना न सिर्फ कानूनी रूप से गलत है, बल्कि नैतिक रूप से भी अस्वीकार्य है। सुप्रीम कोर्ट ने “किसके इशारे पर आए” पूछकर यह भी साफ कर दिया कि अदालत ऐसी याचिकाओं के पीछे की मंशा की भी गहराई से जांच करेगी।
मुख्य बातें (Key Points)
- सुप्रीम कोर्ट ने देहरादून के सैन्य धाम युद्ध स्मारक के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई से इनकार किया, याचिकाकर्ता से पूछा “किसके इशारे पर आए?”
- CJI सूर्यकांत ने कहा कि शहीदों के प्रति सम्मान होना चाहिए, याचिका को शरारतपूर्ण बताया और ₹1 लाख जुर्माने की चेतावनी दी।
- उत्तराखंड सरकार ने बताया कि संयुक्त सर्वे में जमीन वन भूमि नहीं पाई गई, स्मारक का निर्माण 2021 से चल रहा है और लगभग पूरा हो चुका है।
- याचिकाकर्ता ने अंततः याचिका वापस ले ली, पहले उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भी इसे खारिज कर दिया था।








