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The News Air - Breaking News - Vizhinjam Port: श्रीलंका-सिंगापुर को कैसे दी मात? भारत के इंजीनियरिंग मार्वल की पूरी कहानी

Vizhinjam Port: श्रीलंका-सिंगापुर को कैसे दी मात? भारत के इंजीनियरिंग मार्वल की पूरी कहानी

भारत के सबसे मॉडर्न और पहले सेमी-ऑटोमेटेड ट्रांसशिपमेंट पोर्ट Vizhinjam Port ने एक साल में ही देश का तीसरा सबसे बड़ा कंटेनर टर्मिनल बनकर दुनिया को चौंकाया, जानें इसकी अनोखी कहानी।

The News Air Team by The News Air Team
गुरूवार, 12 मार्च 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, टेक्नोलॉजी, स्पेशल स्टोरी
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Vizhinjam Port
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Vizhinjam Port ने वो कर दिखाया है जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी। भारत के दक्षिणी छोर पर केरल की चट्टानी तटरेखा पर बना यह पोर्ट आज न सिर्फ देश का सबसे आधुनिक कंटेनर टर्मिनल है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय शिपिंग की दुनिया में एक गेम चेंजर बनकर उभरा है। पहले साल में ही Vizhinjam Port देश का तीसरा सबसे बड़ा कंटेनर टर्मिनल बन चुका है और इसने श्रीलंका के कोलंबो और सिंगापुर जैसे दिग्गज ट्रांसशिपमेंट हब्स को सीधी टक्कर देना शुरू कर दिया है।

इस पोर्ट की कहानी चुनौतियों, इंजीनियरिंग के करिश्मों और भारत के समुद्री व्यापार में क्रांति लाने के सपने की कहानी है। आइए विस्तार से जानते हैं कि Vizhinjam Port क्या है, कैसे बना और क्यों इसे इंजीनियरिंग मार्वल कहा जा रहा है।

Vizhinjam Port कहां है और इसकी लोकेशन क्यों है खास?

Vizhinjam Port भारत के सबसे दक्षिणी छोर पर केरल में स्थित है। इसकी लोकेशन को समझना बहुत जरूरी है क्योंकि यही इस पोर्ट की सबसे बड़ी ताकत है। यह पोर्ट दो चट्टानों (क्लिफ्स) के बीच एक कॉनकेव स्ट्रक्चर यानी प्राकृतिक हार्बर में बना है, जहां गहराई भी है और चारों तरफ से प्राकृतिक सुरक्षा भी।

दुनिया का सबसे व्यस्त शिपिंग रूट जिसे ईस्ट-वेस्ट शिपिंग रूट कहा जाता है, उससे Vizhinjam Port सिर्फ 10 नॉटिकल माइल की दूरी पर है। यह दूरी इतनी कम है कि बड़े-बड़े कंटेनर जहाजों को अपने रास्ते से बहुत कम डायवर्शन लेना पड़ता है। ये जहाज यूरोप या गल्फ देशों से सीधे Vizhinjam Port पर रुकते हैं और फिर फार ईस्ट की तरफ बढ़ जाते हैं।

इसके अलावा यहां 18 से 20 मीटर का नेचुरल ड्राफ्ट यानी प्राकृतिक गहराई उपलब्ध है। इसका मतलब है कि दुनिया के सबसे बड़े कंटेनर जहाज भी यहां आसानी से आ सकते हैं, बिना किसी ड्रेजिंग की जरूरत के। यह सुविधा भारत के किसी और पोर्ट पर नहीं मिलती।

भारत का पैसा बाहर जा रहा था: Vizhinjam Port की जरूरत क्यों पड़ी?

Vizhinjam Port बनाने के पीछे एक बड़ी आर्थिक वजह थी। जब पूरी दुनिया में इंडस्ट्रियलाइजेशन हो रहा था तो भारत को भी व्यापार सुविधा के लिए अहम एसेट्स की जरूरत थी। लेकिन हकीकत यह थी कि भारत का ज्यादातर कार्गो देश के बाहर ट्रांसशिप हो रहा था।

इसका मतलब समझिए: भारत से जो सामान विदेश भेजा जाता था या विदेश से आता था, वो पहले श्रीलंका के कोलंबो पोर्ट या सिंगापुर जाता था, वहां बड़े जहाजों में लोड होता था और फिर आगे जाता था। इस पूरी प्रक्रिया में भारत के एक्सपोर्टर्स का फॉरेन एक्सचेंज यानी विदेशी मुद्रा बाहर जा रही थी। भारत अपने ही कार्गो की ट्रांसशिपमेंट के लिए दूसरे देशों पर निर्भर था और इससे बहुत बड़ा रेवेन्यू लॉस हो रहा था।

Vizhinjam Port इसी समस्या का समाधान है। अब भारत का कार्गो अपने ही देश में ट्रांसशिप हो सकता है, जिससे न सिर्फ समय बचता है बल्कि करोड़ों रुपए की विदेशी मुद्रा भी देश में ही रहती है।

2015 में अडानी के साथ हुआ समझौता: 2019 तक बनना था, पर चुनौतियां आड़े आईं

Vizhinjam Port की नींव केरल सरकार ने रखी। सरकार ने इस पोर्ट को बनाने के लिए एक स्पेशल पर्पस व्हीकल (SPV) बनाया। 2015 में अडानी ग्रुप के साथ कंसेशन एग्रीमेंट साइन हुआ। योजना यह थी कि 2019 तक Vizhinjam Port तैयार हो जाएगा।

लेकिन रास्ते में कई बड़ी बाधाएं आईं। सबसे पहले कोविड महामारी ने पूरे प्रोजेक्ट को ठप कर दिया। फिर 100 साल में एक बार आने वाली भीषण बारिश हुई जिसने निर्माण कार्य को भारी नुकसान पहुंचाया। इसके बाद एक साइक्लोन भी इस इलाके से गुजरा, जो सामान्यतः इस तट पर नहीं आता।

इन तमाम रुकावटों के बावजूद निर्माण कार्य जारी रहा और आखिरकार 2024 में Vizhinjam Port का उद्घाटन हो गया। यह भारत के बुनियादी ढांचे के इतिहास में एक ऐतिहासिक क्षण था।

ब्रेकवाटर: वो इंजीनियरिंग मार्वल जिसकी दुनिया में कोई तुलना नहीं

Vizhinjam Port को इंजीनियरिंग मार्वल कहने की सबसे बड़ी वजह इसका ब्रेकवाटर है। इसे समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि इस पोर्ट की सबसे बड़ी चुनौती क्या थी।

मुंबई या कोच्चि जैसे पोर्ट हार्बर के अंदर बने हैं जहां प्राकृतिक रूप से समुद्र शांत (ट्रैंक्विल) रहता है। लेकिन Vizhinjam Port पूरी तरह ओपन सी कंडीशन में है। यहां तीन तरफ से दो समुद्र और एक महासागर का पानी आता है, जिससे लहरों का असर बहुत ज्यादा होता है। ऐसी स्थिति में बड़े जहाज सुरक्षित रूप से बिना किसी सुरक्षा के यहां नहीं रुक सकते।

इसी समस्या का समाधान है ब्रेकवाटर। यह एक विशाल संरचना है जो लहरों को तोड़ती है और पोर्ट के अंदर शांत पानी बनाती है। Vizhinjam Port के ब्रेकवाटर की बात करें तो पहले फेज में 3 किलोमीटर का ब्रेकवाटर बनाया गया। दूसरे फेज में 920 मीटर और बनाया जाएगा, जिससे कुल लंबाई लगभग 4 किलोमीटर हो जाएगी।

इस ब्रेकवाटर के निर्माण में 70 लाख टन पत्थर इस्तेमाल किए गए। रफ कैलकुलेशन के अनुसार, केरल राज्य में करीब दो साल का पूरा स्टोन यूटिलाइजेशन सिर्फ एक ब्रेकवाटर बनाने में लग गया। पोर्ट अधिकारियों का दावा है कि भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में इसकी कोई तुलना नहीं मिलती। यह वाकई एक इंजीनियरिंग मार्वल है।

55 हेक्टेयर समुद्र से छीनी गई जमीन: रिक्लेम्ड लैंड पर बना पूरा पोर्ट

Vizhinjam Port की एक और अनूठी बात यह है कि पोर्ट के लिए जमीन बेहद सीमित थी। पोर्ट अधिकारियों के अनुसार भारत में शायद यह अकेला पोर्ट है जिसके साथ शुरुआत में बहुत कम जमीन जुड़ी हुई थी। इसलिए समुद्र से जमीन रिक्लेम की गई यानी समुद्र को पीछे धकेलकर जमीन बनाई गई।

Vizhinjam Port का निर्माण लगभग 55 हेक्टेयर रिक्लेम्ड लैंड पर किया गया है। जिस बिल्डिंग में पोर्ट का कंट्रोल रूम है, वहां से लेकर पूरे पोर्ट का कंस्ट्रक्शन इसी रिक्लेम्ड लैंड पर हुआ है। लैंड साइड पर बेयर मिनिमम एक्टिविटी रखी गई है ताकि आसपास के समुदायों पर कम से कम प्रभाव पड़े।

भारत का पहला सेमी-ऑटोमेटेड कंटेनर टर्मिनल: बिना ऑपरेटर चलते हैं क्रेन

Vizhinjam Port को भारत का सबसे मॉडर्न टर्मिनल बनाने वाली सबसे बड़ी खासियत इसका ऑटोमेशन है। यह भारत का पहला सेमी-ऑटोमेटेड डेडिकेटेड ट्रांसशिपमेंट कंटेनर टर्मिनल है। देश में कहीं भी ऐसी सुविधा नहीं है।

इसका मतलब समझिए: पारंपरिक पोर्ट्स में क्रेन ऑपरेटर क्रेन के ऊपर कैबिन में बैठकर काम करता है। वह ऊपर से नीचे देखकर कंटेनर उठाता और रखता है, जो बेहद कठिन और खतरनाक काम है। लेकिन Vizhinjam Port में क्रेन ऑपरेटर एक आरामदायक कमरे में बैठकर मॉनिटर्स के जरिए रिमोट कंट्रोल से क्रेन चलाता है।

पोर्ट के यार्ड क्रेन पूरी तरह ऑटोमेटेड हैं। इनमें कहीं भी ऑपरेटर का कैबिन नहीं है। ये क्रेन खुद-ब-खुद कंटेनर उठाते हैं, ले जाते हैं और रखते हैं। वहीं जो STS (Ship-to-Shore) क्रेन हैं, जो जहाज से कंटेनर उतारते या चढ़ाते हैं, वो भी रिमोट कंट्रोल से चलते हैं।

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इस ऑटोमेशन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि ऑपरेशनल सेफ्टी काफी बेहतर हो गई है। पूरे Vizhinjam Port में सिर्फ 36 ऑपरेटर और 10 एम्प्लॉयीज से काम चल जाता है, जो किसी भी पारंपरिक पोर्ट की तुलना में बेहद कम है।

VTMS सिस्टम: पहली बार भारत में बना स्वदेशी, यूरोप से इंपोर्ट नहीं

Vizhinjam Port की एक और गर्व करने लायक बात इसका VTMS (Vessel Traffic Management System) है। यह सिस्टम पोर्ट का दिमाग है जो बताता है कि कौन सा जहाज कहां है, कौन सा ट्रेलर कहां जा रहा है और यार्ड में कितनी जगह बची है।

अब तक भारत के सभी पोर्ट्स में VTMS सिस्टम यूरोप से इंपोर्ट किया जाता था। लेकिन Vizhinjam Port में पहली बार भारत में यह सिस्टम स्वदेशी तकनीक से बनाया गया है। इसे IIT चेन्नई की मदद से डेवलप किया गया है। यह भारत के आत्मनिर्भरता के सपने की एक बड़ी मिसाल है।

इस सिस्टम की लाइव स्क्रीन पर हर ट्रेलर की मूवमेंट, उसका नंबर, यार्ड की ऑक्यूपेंसी सब दिखता है। जब यार्ड में ज्यादा ऑक्यूपेंसी होती है तो स्क्रीन पर कलर ग्रीन से रेड की तरफ बढ़ता है, ठीक वैसे ही जैसे वेदर फोरकास्टिंग में ग्रीन, येलो और ऑरेंज फ्लैग होते हैं। यार्ड प्लानर इसे देखकर कंटेनर्स को अलग-अलग यार्ड में डिस्ट्रीब्यूट करता है ताकि कलर हमेशा ग्रीन या अधिकतम येलो तक रहे।

दुनिया के सबसे बड़े जहाज भी यहां आ सकते हैं: 24,000 कंटेनर का दम

Vizhinjam Port दुनिया के हर साइज के कंटेनर जहाज को हैंडल कर सकता है। इसमें 400 मीटर लंबे जहाज भी आ सकते हैं जिनकी कंटेनर कार्गो कैरिंग कैपेसिटी 24,000 कंटेनर या उससे भी ज्यादा होती है।

इसे और आसान भाषा में समझिए: अगर एक जहाज के सारे कंटेनर सड़क पर एक लाइन में लगा दिए जाएं तो 1,120 किलोमीटर लंबी लाइन बन जाएगी। इतना माल एक जहाज में आता है।

दुनिया के सबसे बड़े जहाज जिन्हें आइरीना क्लास कहा जाता है, वो सामान्यतः साल-डेढ़ साल में एक बार मुंबई या मुंद्रा पोर्ट पर आते हैं। लेकिन Vizhinjam Port पर ऐसे 50 से ज्यादा जहाज पहले ही आ चुके हैं। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है।

Vizhinjam Port पर 7,600 ग्राउंड स्लॉट हैं। पांच कंटेनर ऊपर-नीचे रखने पर कुल 32,000 कंटेनर एक समय में स्टोर किए जा सकते हैं।

पहले साल में ही तोड़ दिए सारे रिकॉर्ड: 1 मिलियन की जगह 1.3 मिलियन

Vizhinjam Port ने अपने पहले साल में ही वो कर दिखाया जो कई पोर्ट्स सालों में नहीं कर पाते। सरकार के साथ कॉन्ट्रैक्ट में जो कैलकुलेटेड कैपेसिटी थी वो 1 मिलियन (10 लाख) कंटेनर की थी। लेकिन Vizhinjam Port ने पहले साल में ही 1.3 मिलियन (13 लाख) कंटेनर हैंडल कर लिए।

पोर्ट अधिकारियों का दावा है कि Vizhinjam Port देश में सबसे तेजी से फुल कैपेसिटी तक पहुंचने वाला पोर्ट है। पहले साल के अंदर ही यह देश का तीसरा सबसे बड़ा कंटेनर टर्मिनल बन गया है। यह उपलब्धि भारत के पोर्ट सेक्टर के इतिहास में अभूतपूर्व है।

मछुआरों के साथ सह-अस्तित्व: विकास और समाज का संतुलन

Vizhinjam Port की कहानी सिर्फ इंजीनियरिंग और व्यापार की नहीं है। इसमें एक मानवीय पहलू भी है। पोर्ट का पूरा तटीय इलाका छोटे मछुआरों और मछली पकड़ने की गतिविधियों से भरा हुआ है। पोर्ट बनाते वक्त सबसे बड़ा सवाल यह था कि इन मछुआरा समुदायों के साथ सह-अस्तित्व (Co-existence) कैसे बनाए रखा जाए।

पोर्ट अधिकारियों ने इस बात का ध्यान रखा कि पोर्ट की जरूरतें भी पूरी हों और आसपास का समाज भी सुरक्षित रहे। यही वजह है कि लैंड साइड पर बेयर मिनिमम एक्टिविटी रखी गई है और ज्यादातर काम रिक्लेम्ड लैंड पर किया गया है।

भविष्य की योजनाएं: नेशनल हाईवे कनेक्शन, टनल और बंकरिंग

Vizhinjam Port का भविष्य और भी भव्य है। अभी कई बड़ी निर्माण गतिविधियां चल रही हैं:

नेशनल हाईवे कनेक्टिविटी: कनेक्शन रोड बन चुकी है और आखिरी हिस्सा एक हफ्ते में पूरा हो जाएगा। उसके बाद एक्सिम (एक्सपोर्ट-इंपोर्ट) कार्गो भी Vizhinjam Port पर आने लगेगा। इसके अलावा NH और राज्य व केंद्र सरकारों के सहयोग से एक बड़ा क्लोवर लीफ स्ट्रक्चर बनाया जा रहा है जो 12 से 18 महीने में तैयार होगा। इसके बाद पूरे देश से Vizhinjam Port तक सीमलेस रोड कनेक्शन मिल जाएगा।

रेल कनेक्शन: Vizhinjam Port से सीधे सदर्न रेलवे लाइन तक 9.4 किलोमीटर का रेल कनेक्शन बनाया जाएगा। इसमें 5 किलोमीटर टनल के जरिए जाएगा। यह भारत में पहली बार होगा कि कार्गो के लिए डेडिकेटेड टनलिंग करके रेल लाइन बनाई जाएगी। सरकार की प्रतिबद्धता है कि यह 2028 तक पूरा हो जाएगा।

बंकरिंग फैसिलिटी: मास्टर प्लान के अनुसार Vizhinjam Port पर बंकरिंग (जहाजों को ईंधन भरने की सुविधा) भी शुरू करने की योजना है। यह इस पोर्ट को और भी ज्यादा आकर्षक बनाएगी क्योंकि जहाज यहीं रुककर ईंधन भी भर सकेंगे।

कैपेसिटी विस्तार: Vizhinjam Port की तत्काल प्राथमिकता कैपेसिटी को 1 मिलियन से 5 मिलियन से ऊपर तक ले जाना है। दूसरे फेज में नई और कटिंग-एज लेटेस्ट टेक्नोलॉजी की मशीनें लगाई जाएंगी।

सिर्फ ट्रांसशिपमेंट हब नहीं, पूरे दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया का गेटवे

Vizhinjam Port के अधिकारियों का विजन बेहद बड़ा है। उनका कहना है कि रेल और रोड कनेक्टिविटी पूरी होने के बाद Vizhinjam Port सिर्फ एक ट्रांसशिपमेंट हब नहीं रहेगा। यह पूरे दक्षिण भारत के लिए गेटवे बन जाएगा। पूरे देश के लिए और शायद दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए भी एक बड़ा ट्रांसशिपमेंट हब बन जाएगा।

आम आदमी के लिए इसका मतलब यह है कि आपके घर में जो मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स या कोई भी सामान आता है, उसका सफर सिर्फ दुकान से घर तक नहीं होता। उसमें रोड्स, एयरवेज और ज्यादातर बार समुद्र का रास्ता शामिल होता है। Vizhinjam Port उसी सफर का एक अहम पड़ाव है। जैसे-जैसे यह पोर्ट बड़ा होगा, भारत में आयातित सामान सस्ता और तेजी से पहुंचने लगेगा। साथ ही भारतीय निर्यातकों को भी बड़ा फायदा होगा क्योंकि उन्हें अपना सामान विदेश भेजने के लिए श्रीलंका या सिंगापुर पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

Vizhinjam Port ने क्यों बदला भारत के समुद्री व्यापार का खेल?

Vizhinjam Port ने भारत के समुद्री व्यापार के नक्शे को पूरी तरह बदल दिया है। पहले भारत का ट्रांसशिपमेंट कार्गो कोलंबो, सिंगापुर और दुबई जैसे पोर्ट्स पर निर्भर था। इससे भारतीय एक्सपोर्टर्स का फॉरेन एक्सचेंज बाहर जाता था, शिपिंग की लागत बढ़ती थी और समय भी ज्यादा लगता था।

अब Vizhinjam Port के आने से यह पूरा खेल बदल गया है। बड़े-बड़े कंटेनर जहाज सीधे भारत में रुकते हैं, कार्गो का ट्रांसशिपमेंट यहीं होता है और भारतीय अर्थव्यवस्था को करोड़ों का फायदा होता है। एक साल में ही देश का तीसरा सबसे बड़ा कंटेनर टर्मिनल बनना, कॉन्ट्रैक्ट कैपेसिटी से 30 प्रतिशत ज्यादा काम करना और दुनिया के सबसे बड़े 50 से ज्यादा जहाजों को हैंडल करना: ये सब बताता है कि Vizhinjam Port वाकई भारत की अर्थव्यवस्था के लिए गेम चेंजर है।


मुख्य बातें (Key Points)
  • Vizhinjam Port भारत का पहला सेमी-ऑटोमेटेड डेडिकेटेड ट्रांसशिपमेंट कंटेनर टर्मिनल है, जो ईस्ट-वेस्ट शिपिंग रूट से सिर्फ 10 नॉटिकल माइल दूर है और 18-20 मीटर नेचुरल ड्राफ्ट उपलब्ध है।
  • पोर्ट का ब्रेकवाटर दुनिया में अद्वितीय इंजीनियरिंग मार्वल है जिसमें 70 लाख टन पत्थर लगे; पूरा पोर्ट 55 हेक्टेयर रिक्लेम्ड लैंड पर बना है और VTMS सिस्टम पहली बार IIT चेन्नई की मदद से स्वदेशी तकनीक से बनाया गया।
  • पहले साल में ही 1.3 मिलियन कंटेनर हैंडल कर Vizhinjam Port देश का तीसरा सबसे बड़ा कंटेनर टर्मिनल बना; दुनिया के सबसे बड़े 50+ जहाज (आइरीना क्लास) यहां आ चुके हैं।
  • भविष्य में 9.4 किमी रेल कनेक्शन (5 किमी टनल), नेशनल हाईवे कनेक्टिविटी और बंकरिंग फैसिलिटी के साथ कैपेसिटी 5 मिलियन+ तक बढ़ाने की योजना है, जिससे यह दक्षिण-पूर्व एशिया का ट्रांसशिपमेंट हब बनेगा।

FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. Vizhinjam Port कहां स्थित है और इसे कौन चलाता है?

Vizhinjam Port केरल के तिरुवनंतपुरम जिले में भारत के दक्षिणी छोर पर स्थित है। केरल सरकार ने इसके लिए स्पेशल पर्पस व्हीकल बनाया और 2015 में अडानी ग्रुप के साथ कंसेशन एग्रीमेंट साइन हुआ। अडानी पोर्ट्स इसका संचालन करता है। यह 2024 में शुरू हुआ और पहले साल में ही देश का तीसरा सबसे बड़ा कंटेनर टर्मिनल बन गया।

2. Vizhinjam Port को इंजीनियरिंग मार्वल क्यों कहा जाता है?

Vizhinjam Port का ब्रेकवाटर दुनिया में अनूठा है जिसमें 70 लाख टन पत्थर लगे हैं। ओपन सी कंडीशन में लहरों को तोड़कर शांत पानी बनाने वाली यह 4 किलोमीटर लंबी संरचना कहीं और नहीं मिलती। पूरा पोर्ट 55 हेक्टेयर रिक्लेम्ड लैंड पर बना है और इसका VTMS सिस्टम IIT चेन्नई द्वारा स्वदेशी तकनीक से बनाया गया है।

3. Vizhinjam Port श्रीलंका और सिंगापुर को कैसे टक्कर दे रहा है?

पहले भारत का ट्रांसशिपमेंट कार्गो कोलंबो और सिंगापुर जाता था जिससे भारत का फॉरेन एक्सचेंज बाहर जाता था। Vizhinjam Port ईस्ट-वेस्ट शिपिंग रूट से सिर्फ 10 नॉटिकल माइल दूर है, 20 मीटर नेचुरल ड्राफ्ट है और दुनिया के सबसे बड़े जहाज यहां आ सकते हैं। पहले साल में 1.3 मिलियन कंटेनर हैंडल कर इसने दोनों पोर्ट्स को सीधी चुनौती दी है।

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