Khalistan Project ISI Exposed: भारत की सुरक्षा एजेंसियों ने जिस खालिस्तान प्रोजेक्ट को दशकों की मेहनत से नाकाम किया, उसकी जड़ें 1940 से लेकर आज तक पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI तक जाती हैं। चाहे 1971 में न्यूयॉर्क टाइम्स में छपा फुल पेज विज्ञापन हो, ऑपरेशन ब्लू स्टार में बरामद पाकिस्तानी मार्किंग वाले हथियार हों, एयर इंडिया फ्लाइट 182 कनिष्का बॉम्बिंग हो, जनरल अरुण वैद्य की हत्या हो या फिर आज के दौर में पंजाब बॉर्डर पर ड्रोन से गिराया जा रहा असला और नशीला पदार्थ, इन सबके पीछे ISI का एक सुनियोजित षड्यंत्र काम करता रहा है। अब डीक्लासिफाइड दस्तावेजों और इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स से यह पूरा Khalistan Project उजागर हो चुका है।
1940 में पहली बार सामने आया था ‘खालिस्तान’ शब्द
Khalistan Project की शुरुआत का बीज 1940 में बोया गया था। मार्च 1940 में जब मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान रेजोल्यूशन पास किया, तो उसके जवाब में उस समय के एक सिख लीडर डॉक्टर वीर सिंह भट्टी ने एक पैम्फलेट छपवाया। इस पैम्फलेट में पहली बार “खालिस्तान” शब्द का जिक्र हुआ था। उन्होंने इसमें एक स्वतंत्र सिख राज्य का आइडिया प्रस्तावित किया था, जो भारत और बनने वाले पाकिस्तान के बीच एक बफर स्टेट का काम करेगा। यही वह पैम्फलेट था जहां से दुनिया ने पहली बार “खालिस्तान” नाम सुना।
1947 में भारत आजाद हुआ, विभाजन हुआ और विभाजन होते ही पाकिस्तान के पूरे सुरक्षा तंत्र ने, उसकी राजनीतिक मशीनरी ने भारत के खिलाफ स्थायी रूप से साजिश रचना शुरू कर दिया। शुरुआती दौर में कश्मीर मुख्य मुद्दा था, लेकिन 1960 और 1970 के दशक के बीच पाकिस्तान की नजर पंजाब पर भी पड़ गई।
पंजाब की शिकायतों को ISI ने बनाया हथियार
1960 और 70 के दशक में पंजाब के अंदर कई राजनीतिक और आर्थिक शिकायतें उभर रही थीं। भाषा का मुद्दा था, नदी जल विवाद था, चंडीगढ़ का मसला चल रहा था और केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव का माहौल था। इन सब तनावों के बीच सिख राजनीति के अंदर कट्टरता पनपनी शुरू हो गई।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि उस समय तक Khalistan Project कोई सशस्त्र अलगाववादी आंदोलन नहीं था। लेकिन जब पाकिस्तान की ISI ने इस मुद्दे को ऑब्जर्व किया तो उन्हें समझ आ गया कि इन राजनीतिक और धार्मिक शिकायतों को व्यवस्थित तरीके से हथियार बनाया जा सकता है। ISI ने इसे अपना एक कोवर्ट टूल बना लिया।
1971 की हार ने पाकिस्तान को बदला लेने पर मजबूर किया
1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ। इस युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को ऐसी करारी हार दी कि वह भौगोलिक और मनोवैज्ञानिक दोनों स्तर पर घुटने टेक गया। बांग्लादेश का जन्म हुआ और पाकिस्तान दो हिस्सों में बंट गया। इसी हार के बाद पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह जनरल जिया-उल-हक ने अपनी कुख्यात डॉक्ट्रिन पेश की: “Bleed India with a Thousand Cuts” यानी हजार घावों से भारत को लहूलुहान करो।
इसका मूल आइडिया यह था कि अब पाकिस्तान भारत को किसी बड़े पारंपरिक युद्ध में हरा नहीं सकता, इसलिए छोटे-छोटे विद्रोह, आतंकवादी हमले और अलगाववादी आंदोलनों के जरिए भारत को अस्थिर किया जाएगा। कभी कश्मीर में, कभी पंजाब में और कभी नॉर्थ-ईस्ट में। प्रॉक्सी ग्रुप्स को इस्तेमाल करना अब पाकिस्तान की स्थायी नीति बन गई।
जगजीत सिंह चौहान को पाकिस्तान ने बनाया मोहरा
इसी दौर में पंजाब के पूर्व वित्त मंत्री जगजीत सिंह चौहान सामने आते हैं। 1968 तक पंजाब में मंत्री रहने के बाद चौहान भारत छोड़कर लंदन चले गए और वहां से Khalistan Project के लिए ग्लोबल कैंपेनिंग शुरू कर दी। जैसे ही उन्होंने यह अभियान शुरू किया, पाकिस्तान की ISI की नजर उन पर पड़ गई।
1971 के युद्ध के दौरान ही पाकिस्तान के जनरल याह्या खान ने चौहान को पाकिस्तान बुलाया। वहां उन्हें स्टेट गेस्ट की तरह ट्रीट किया गया। ननकाना साहिब में सिख लीडर्स के साथ उनकी मुलाकात कराई गई और कई मीटिंग्स ऑर्गेनाइज की गईं। पाकिस्तान और ISI चौहान को एक “पोटेंशियल एसेट” की तरह देख रहे थे, जिसके जरिए भारत को तोड़ा जा सके।
खुद चौहान ने बाद में बताया था कि जुल्फिकार अली भुट्टो के साथ भी उनकी बैठक हुई थी। भुट्टो का कहना था कि जैसे भारत ने बांग्लादेश को पाकिस्तान से अलग किया, वैसे ही हम पंजाब को भारत से अलग कर देंगे। भुट्टो ने चौहान को खालिस्तान का पूरा लीडर और प्रेसिडेंट बनाने का वादा किया।
न्यूयॉर्क टाइम्स का वो विज्ञापन जिसने आग भड़काई
पाकिस्तान से लौटने के बाद जगजीत सिंह चौहान वापस लंदन गए और 12 अक्टूबर 1971 को न्यूयॉर्क टाइम्स में एक फुल पेज विज्ञापन छपवाया। इस विज्ञापन में उन्होंने एक आजाद सिख राज्य “खालिस्तान” की मांग रखी। जब भारत की इंटेलिजेंस एजेंसियों की नजर इस विज्ञापन पर पड़ी तो डीक्लासिफाइड दस्तावेजों और रिपोर्ट्स से यह सामने आया कि इस फुल पेज विज्ञापन के पीछे फंडिंग पाकिस्तानी इस्टैब्लिशमेंट और ISI की थी।
पाकिस्तान के लिए यह एक बड़ा डिप्लोमेटिक मास्टरस्ट्रोक था क्योंकि इसके जरिए Khalistan Project को सीधे ग्लोबल स्टेज पर लॉन्च कर दिया गया। इसके बाद 1970 के दशक के आखिरी सालों में खालिस्तान की मांग पंजाब से बाहर निकलकर कनाडा, यूके, अमेरिका और इटली में बसे सिख डायस्पोरा के बीच भी फैलने लगी। फंड्स आने लगे, पॉलिटिकल लॉबिंग शुरू हो गई और पश्चिमी देशों में व्यवस्थित तरीके से एक अलगाववादी नैरेटिव सेट किया जाने लगा।
ISI ने बनाया कुख्यात K2 डेस्क: कश्मीर और खालिस्तान
Khalistan Project को सबसे खतरनाक मोड़ तब मिला जब ISI ने एक डेडिकेटेड K2 डेस्क बनाया। इसमें K का मतलब था कश्मीर और दूसरे K का मतलब था खालिस्तान। इस K2 डेस्क की कमान रिटायर्ड ब्रिगेडियर इम्तियाज को सौंपी गई। इम्तियाज जैसे पाकिस्तान आर्मी के ऑफिसर्स ने कश्मीर और सिख मिलिटेंसी को एक साथ हवा देना शुरू किया।
K2 डेस्क का मकसद था कि भारतीय सुरक्षा बलों को दो अलग-अलग फ्रंट पर उलझा दिया जाए। कैसे मिलिटेंट्स तक हथियार पहुंचेंगे, कैसे घुसपैठ होगी, कैसे भारत के अलग-अलग शहरों और राज्यों में हमले किए जाएंगे, इन सबका सेंट्रल प्लानिंग ब्रिगेडियर इम्तियाज के जिम्मे था।
अफगान जिहाद की आड़ में सिख मिलिटेंट्स को मिले अमेरिकी हथियार
1979 में जब सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर हमला किया तो पाकिस्तान CIA और सऊदी अरब का फ्रंटलाइन पार्टनर बन गया। ISI को अफगान मुजाहिदीनों को ट्रेन करने के लिए भारी मात्रा में अमेरिकी फंडिंग, AK-47, रॉकेट लॉन्चर्स और एक्सप्लोसिव्स मिले। ट्रेनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया गया और पेशावर जैसे शहरों में हथियारों की खुली बिक्री का कल्चर पनप गया।
लेकिन ISI ने इन हथियारों का एक बड़ा हिस्सा चोरी-छिपे खालिस्तान मिलिटेंट्स तक पहुंचाना शुरू कर दिया। रिपोर्ट्स बताती हैं कि अफगानिस्तान फ्रंट से लाए गए कई हथियारों को ISI “लॉस इन ट्रांजिट” दिखा देती थी, कभी “बैटलफील्ड पर कैप्चर” बता देती थी या फिर मिस-रिपोर्टिंग कर देती थी। इन AK-47 और एक्सप्लोसिव्स को रिकॉर्ड से गायब करके पंजाब के मिलिटेंट्स तक पहुंचाया जाने लगा। यहीं से Khalistan Project एक सशस्त्र संघर्ष में तब्दील हो गया।
पाकिस्तान में चलते थे सिख मिलिटेंट्स के ट्रेनिंग कैंप
RAW के वरिष्ठ अधिकारी रहे बी. रमन ने अपनी रिपोर्ट्स में लिखा है कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत और खैबर पख्तूनख्वा में ISI से जुड़े ट्रेनिंग कैंप लगातार चलते थे। सियालकोट, लाहौर, सरगोधा, मुरी, चकवाल, गुजरांवाला, मियांवाली, पेशावर और लाहौर के गुलबर्ग एरिया में सिख मिलिटेंट्स को गोरिल्ला वॉरफेयर, IED बनाना, ग्रेनेड हैंडलिंग, ब्रिज और बिल्डिंग ध्वस्त करना, अर्बन टेररिज्म और काउंटर इंटेलिजेंस जैसे मॉड्यूल्स पढ़ाए जाते थे।
कई बार रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया कि इन कैंप्स में पाकिस्तान आर्मी के स्पेशल फोर्सेज के इंस्ट्रक्टर आकर ट्रेनिंग देते थे। सिर्फ फिजिकल स्किल्स ही नहीं सिखाई जाती थीं, बल्कि नौजवान रिक्रूट्स का व्यवस्थित ब्रेनवॉश भी किया जाता था। उन्हें बताया जाता था कि भारत एक हिंदू डोमिनेटेड स्टेट है जो सिख पहचान को व्यवस्थित तरीके से कुचलना चाहता है।
1978 का सिख-निरंकारी क्लैश और भिंडरांवाले का उदय
1978 में अमृतसर के पास सिख-निरंकारी क्लैश हुआ जिसमें कई लोग मारे गए। इस हिंसक घटना ने समुदाय के अंदर धार्मिक ध्रुवीकरण और राजनीतिक तनाव का माहौल बना दिया। इसी दौर में जरनैल सिंह भिंडरांवाले जैसे नेताओं का उदय हुआ जो युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय होते गए।
ISI ने कनाडा, यूके और इटली में बनाए गए सिख डायस्पोरा नेटवर्क से डिमांड करनी शुरू की कि भिंडरांवाले जैसे नेताओं के समर्थन में पैसे भेजो, फंडिंग दो। जब भिंडरांवाले ने स्वर्ण मंदिर के अंदर शरण ली तो पाकिस्तान की तरफ से उनके समर्थकों को लॉजिस्टिकल सपोर्ट, हथियार और टैक्टिकल इनपुट्स भेजे जाने लगे।
ऑपरेशन ब्लू स्टार में मिले पाकिस्तानी मार्किंग वाले हथियार
जून 1984 में भारतीय सेना ने ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया। जब कॉम्प्लेक्स की सर्च की गई तो सुरक्षा बलों को जो मॉडर्न हथियारों के बड़े स्टॉक मिले, उन सब पर पाकिस्तानी मार्किंग्स थीं। कई हथियारों पर चाइनीज मार्किंग भी देखी गई। यह साफ तौर पर दिख रहा था कि इन सब हथियारों के पीछे ISI का हाथ है।
रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया कि कई मिलिटेंट्स ने पाकिस्तान बेस्ड कैंप्स में ट्रेनिंग ली थी जहां उन्हें अर्बन टेररिज्म, सैबोटाज और काउंटर इंटेलिजेंस के बारे में पढ़ाया गया था। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद पाकिस्तान ने तुरंत प्रोपेगेंडा शुरू किया और इसे “अटैक ऑन फेथ” (धर्म पर हमला) करार दिया।
इंदिरा गांधी की हत्या और 1984 के दंगे: ISI ने ट्रॉमा को भुनाया
अक्टूबर 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उन्हीं के सिख बॉडीगार्ड्स ने हत्या कर दी। इसके बाद दिल्ली और कई शहरों में सिख विरोधी दंगे हुए जिनमें हजारों बेगुनाह सिखों की जान गई। इस दंगे ने सिख समुदाय पर गहरा जख्म छोड़ा।
ISI ने इस ट्रॉमा को भी एक्सप्लॉइट करना शुरू किया। उन्होंने 1984 के दंगों को “स्टेट स्पॉन्सर्ड जेनोसाइड” करार दिया और भारत के खिलाफ एक भावनात्मक नैरेटिव बनाया। नतीजा यह हुआ कि नई पीढ़ी के कई गुस्साए सिख युवाओं को ISI ने मिलिटेंसी की तरफ धकेल दिया।
खतरनाक मिलिटेंट आउटफिट्स: ISI ने बनाए कई संगठन
1980 के दशक में Khalistan Project के तहत कई खालिस्तानी आउटफिट्स बनाए गए। बब्बर खालसा इंटरनेशनल (BKI), खालिस्तान कमांडो फोर्स (KCF), इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन (ISYF), दल खालसा इंटरनेशनल और खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स (KZF) जैसे संगठन खड़े किए गए। इनके कई प्रमुखों को पाकिस्तान ने स्थायी रूप से शरण दी।
बब्बर खालसा इंटरनेशनल का वधावा सिंह, ISYF का लखबीर सिंह रोड़े और KCF का परमजीत सिंह पंजवार, इन सभी को लाहौर, सियालकोट और अन्य सुरक्षित ठिकानों पर ISI ने गेस्ट की तरह रखा। ठीक उसी तरह जैसे दाऊद इब्राहिम को आज भी पाकिस्तान में शरण दी जा रही है।
कनिष्का बॉम्बिंग: इतिहास का सबसे बड़ा एविएशन आतंकी हमला
23 जून 1985 को खालिस्तानी मिलिटेंट्स ने इतिहास के सबसे बड़े बम हमले को अंजाम दिया। एयर इंडिया फ्लाइट 182 जिसे कनिष्का बॉम्बिंग के नाम से जाना जाता है, उसे बम से उड़ा दिया गया। इस हमले में 329 लोग मारे गए जिनमें ज्यादातर भारतीय मूल के कनाडियन नागरिक थे।
इस हमले का मास्टरमाइंड तलविंदर सिंह परमार था जो बब्बर खालसा इंटरनेशनल का संस्थापक था। कनाडा की RCMP और CSIS की इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट्स में यह सामने आया कि परमार के पाकिस्तान में लगातार दौरे होते थे, ISI के साथ उसके गहरे संबंध थे, उसे पाकिस्तान में स्टेट गेस्ट की तरह रखा जाता था और ISI उसकी सिक्योरिटी प्रोवाइड करती थी। बम बनाने की ट्रेनिंग और टेस्टिंग भी पाकिस्तान में ही हुई थी।
ISI का नार्को-टेररिज्म: ड्रग्स से चलती थी आतंक की फंडिंग
Khalistan Project की फंडिंग का एक और खतरनाक पहलू था नार्को-टेररिज्म। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने 1991 में खुद यह आरोप लगाया था कि आर्मी चीफ जनरल असलम बेग और ISI चीफ जनरल असद दुर्रानी दोनों एक “हेरोइन प्लान” लेकर उनके पास आए थे। इस प्लान में बड़े पैमाने पर ड्रग स्मगलिंग रैकेट से कोवर्ट ऑपरेशंस की फंडिंग करने का ब्लूप्रिंट था। शरीफ का दावा है कि उन्होंने इस प्लान को रिजेक्ट कर दिया, लेकिन इंटेलिजेंस स्टडीज और NATO लिंक रिसर्च में यह कन्फर्म होता है कि ISI नार्को-टेररिज्म में गहराई तक शामिल थी।
पंजाब को ISI ने नार्को कॉरिडोर बना दिया था। पाकिस्तान-अफगानिस्तान बेल्ट से हेरोइन पंजाब बॉर्डर्स के रास्ते भारत में भेजी जाती थी और फिर भारत से ग्लोबल मार्केट तक पहुंचाई जाती थी।
खालिस्तानी मिलिटेंट्स की फंडिंग का ग्लोबल नेटवर्क
ऑपरेशन ब्लू स्टार और 1984 के दंगों के बाद यूके, कनाडा और अमेरिका में बसे सिख डायस्पोरा से पंजाब के मिलिटेंट्स के लिए हजारों डॉलर की फंडिंग भेजी जाने लगी। एक मिलिटेंट कमांडर मनवीर सिंह चहेरू ने यह स्वीकार किया था कि खालिस्तान कमांडो फोर्स को कनाडा और ब्रिटेन की सिख ऑर्गेनाइजेशंस से $100,000 से ज्यादा की रकम मिली जिसे हथियारों और लॉजिस्टिक्स पर खर्च किया गया।
क्रिस्टीन फेयर और हीन जे. किसलिंग जैसे प्रमुख स्कॉलर्स ने अपनी रिसर्च में लिखा है कि यह डायस्पोरा फंडिंग पाकिस्तान को एक पूरा इकोसिस्टम बनाने में मदद कर रही थी। किसलिंग की किताब “Faith, Unity, Discipline: The ISI of Pakistan” में विस्तार से बताया गया है कि 1970 से ही ISI खालिस्तान मूवमेंट को चुपचाप ईंधन दे रही थी।
जनरल अरुण वैद्य और बेअंत सिंह की हत्या: ISI का संदेश
Khalistan Project के तहत मिलिटेंट्स ने कई बड़ी हत्याओं को अंजाम दिया। 1986 में जनरल अरुण वैद्य, जो ऑपरेशन ब्लू स्टार के समय भारतीय सेना के प्रमुख थे, उनकी हत्या खालिस्तान कमांडो फोर्स ने कर दी। 1995 में पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की बब्बर खालसा इंटरनेशनल ने हत्या कर दी। इसके अलावा पत्रकार लाला जगत नारायण की हत्या और अनगिनत हिंदू नागरिकों, सरकारी अधिकारियों, दुकानदारों की टारगेट किलिंग हुई। बसें, बाजार, ट्रेनें और राजनीतिक रैलियां, सब निशाने पर थीं।
केपीएस गिल का ऑपरेशन और खालिस्तान मूवमेंट का अंत
1990 के मध्य तक जब हमले अपने चरम पर पहुंच चुके थे, भारत की सुरक्षा एजेंसियों ने समझ लिया कि अगर इसे रोका नहीं गया तो यह बहुत बड़ी मुसीबत बन सकता है। पंजाब पुलिस के तत्कालीन डीजीपी केपीएस गिल ने “ऑपरेशन नाइट डोमिनेंस” जैसे ऑपरेशंस शुरू किए।
संवेदनशील गांवों और लोकेशंस पर सर्च की गई, मिलिटेंट ठिकानों को चिह्नित किया गया, इंटेलिजेंस नेटवर्क मजबूत किया गया और लगातार दबाव बनाया गया। कई मिलिटेंट्स ने सरेंडर करना शुरू किया और उनसे पूछताछ करके मिलिटेंट ग्रुप्स की लीडरशिप तक पहुंचा जाने लगा। वधावा सिंह और परमजीत सिंह पंजवार जैसे नेता भारत से भाग गए।
पंजाब की जनता ने भी अब मिलिटेंट्स के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी। लोग रोज-रोज की हिंसा और खूनखराबे से परेशान हो चुके थे। सुरक्षा बलों और जनता के सहयोग से 1990 के मध्य तक यह सशस्त्र आंदोलन लगभग पूरी तरह खत्म कर दिया गया।
ISI ने खत्म नहीं की अपनी गतिविधियां
भारत में क्रैकडाउन के बाद ISI ने अपनी गतिविधियां खत्म नहीं कीं बल्कि अपनी रणनीति बदल ली। अप्रैल 1999 में ISI के पूर्व चीफ लेफ्टिनेंट जनरल जावेद नासिर, जो तालिबान के निर्माण में अहम भूमिका रखते थे, को अचानक पाकिस्तान गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (PGPC) का हेड बना दिया गया। भारतीय इंटेलिजेंस ने इसे पाकिस्तान की उस नीति का हिस्सा माना जिसके तहत सिख सेपरेटिज्म को फिर से जिंदा करने की कोशिश की जा रही थी।
1990 के अंत में ISI ने नेपाल रूट का इस्तेमाल करके भारत में हथियारों की स्मगलिंग तेज कर दी। 1997 में खालिस्तान कमांडो फोर्स के भूपेंद्र सिंह बड्डा को काठमांडू से गिरफ्तार किया गया, जिसके बाद इस नेटवर्क का खुलासा हुआ। SATP के स्रोतों के अनुसार 2001 तक लगभग 200 सिख युवा पाकिस्तान के कैंप्स में ट्रेनिंग ले रहे थे।
ड्रोन से हथियार और नशा: ISI का आधुनिक Khalistan Project
2019 से 2021 के बीच Khalistan Project का एक नया और खतरनाक चेहरा सामने आया। पाकिस्तान की ISI ने पंजाब बॉर्डर के पास कमर्शियल ड्रोन्स का इस्तेमाल करके AK-47, पिस्टल, ग्रेनेड, RDX और हेरोइन के पैकेट्स भारतीय क्षेत्र में गिराने शुरू किए। ये ड्रोन बॉर्डर फेंसिंग से 2 से 5 किलोमीटर अंदर आकर सामान गिराते थे और भारत में ISI के सपोर्टर्स इन्हें पिक करके स्मगल कर देते थे। पाकिस्तान बेस्ड हरविंदर सिंह रिंदा को इस ड्रोन मॉड्यूल का हैंडलर माना जाता है।
2020 में शौर्य चक्र अवॉर्डी बलविंदर सिंह संधू, जिन्होंने 1980-90 में पंजाब में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, उनकी उनके घर के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई। जांच में चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि इसमें पाकिस्तान बेस्ड प्लानर्स, कनाडा के खालिस्तानी तत्व और पाकिस्तान के लोकल शूटर्स शामिल थे। एक क्रॉस बॉर्डर नेक्सस सामने आया जिसने साबित किया कि ISI अभी भी पूरी तरह सक्रिय है।
विदेशी डायस्पोरा में ISI का इकोसिस्टम आज भी सक्रिय
कनाडा की सुरक्षा एजेंसी CSIS की कई रिपोर्ट्स में भी पाकिस्तान समर्थित खालिस्तानी नेटवर्क के सक्रिय होने की बात सामने आई है। फंडिंग रूट्स लगातार चल रहे हैं, टेरर प्लॉट्स प्लान किए जा रहे हैं। विदेशों में जो सिख डायस्पोरा की खालिस्तानी ऑर्गेनाइजेशंस ISI ने दशकों पहले डेवलप की थीं, वो अब पाकिस्तान की फॉरेन टूलकिट का अहम हिस्सा बन चुकी हैं।
रिपोर्ट्स में सिखस फॉर जस्टिस (SFJ) जैसे आउटफिट का नाम बार-बार सामने आता है, जो चरमपंथी प्रोपेगेंडा फैलाने, रेफरेंडम के जरिए अलगाववादी मांग उठाने और कभी-कभी हिंसक प्लॉट्स रचने में शामिल रहा है। इनके ऑनलाइन कंटेंट की तुलना करने पर कई बार कराची बेस्ड या पाकिस्तान होस्टेड वेबसाइट्स से मिलते-जुलते कंटेंट पाए गए हैं। 2020 में कनाडा में कई ऐसे प्रोटेस्ट हुए जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मारने की धमकियां दी गईं और भारत के तिरंगे को पैरों से रौंदा गया। कई ऑब्जर्वर्स मानते हैं कि इस पूरे इकोसिस्टम के पीछे ISI की फंडिंग और सपोर्ट काम कर रही है।
एक प्रोजेक्ट जो नाकाम हुआ, लेकिन खतरा अभी टला नहीं
Khalistan Project को समग्र रूप से देखें तो यह पाकिस्तान की ISI द्वारा 1940 से शुरू होकर आज तक चलाया गया एक सुनियोजित षड्यंत्र रहा है। 1940 में एक पैम्फलेट से शुरू हुई इस कहानी ने न्यूयॉर्क टाइम्स का विज्ञापन, K2 डेस्क, ट्रेनिंग कैंप, कनिष्का बॉम्बिंग, नार्को-टेररिज्म और ड्रोन वॉरफेयर तक का सफर तय किया। भारत की सुरक्षा एजेंसियों, पंजाब पुलिस और आम जनता के सहयोग से इस सशस्त्र आंदोलन को पंजाब में कुचल दिया गया, लेकिन विदेशी डायस्पोरा के जरिए ISI का नेटवर्क अभी भी सक्रिय बना हुआ है। भारत के लिए यह जरूरी है कि वह इस खतरे को लगातार मॉनिटर करता रहे और अपने सुरक्षा तंत्र को हमेशा चौकन्ना रखे।
मुख्य बातें (Key Points)
- पाकिस्तान की ISI ने 1970 के दशक में K2 डेस्क (कश्मीर + खालिस्तान) बनाकर भारत को तोड़ने की व्यवस्थित साजिश रची, जिसमें ट्रेनिंग कैंप, हथियार सप्लाई और आइडियोलॉजिकल ब्रेनवॉश शामिल था।
- 1971 में न्यूयॉर्क टाइम्स में ISI की फंडिंग से छपा फुल पेज विज्ञापन Khalistan Project को ग्लोबल स्टेज पर लॉन्च करने का मास्टरस्ट्रोक था, जबकि अफगान जिहाद के लिए मिले अमेरिकी हथियार चोरी-छिपे सिख मिलिटेंट्स तक पहुंचाए गए।
- केपीएस गिल के नेतृत्व में पंजाब पुलिस ने 1990 के मध्य तक सशस्त्र खालिस्तान मूवमेंट को लगभग खत्म कर दिया, लेकिन ISI ने ड्रोन वॉरफेयर, नार्को-टेररिज्म और विदेशी डायस्पोरा के जरिए अपनी गतिविधियां जारी रखी हैं।
- कनिष्का बॉम्बिंग (329 मृत) से लेकर जनरल अरुण वैद्य, बेअंत सिंह की हत्या और 2020 में बलविंदर सिंह संधू की हत्या तक, हर बड़ी घटना में ISI का क्रॉस बॉर्डर नेक्सस उजागर हुआ है।








