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The News Air - Breaking News - Russia Iran War: मिडिल ईस्ट की जंग में रूस को कैसे मिल रहा बड़ा फायदा

Russia Iran War: मिडिल ईस्ट की जंग में रूस को कैसे मिल रहा बड़ा फायदा

अमेरिका-ईरान-इजराइल युद्ध के बीच Strait of Hormuz बंद होने से ग्लोबल एनर्जी संकट गहराया, रूस के लिए खुला कमाई का रास्ता

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
मंगलवार, 10 मार्च 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, अंतरराष्ट्रीय, बिज़नेस
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Russia Iran War
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Russia Iran War के बीच मिडिल ईस्ट से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध की वजह से दुनिया के सबसे अहम एनर्जी ट्रेड रूट Strait of Hormuz पर जहाजों की आवाजाही लगभग शून्य हो चुकी है। इसके कारण कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल को पार कर 115 डॉलर तक जा पहुंची हैं। दुनिया भर में सप्लाई चेन बिखर चुकी है और ग्लोबल रिसेशन का खतरा एक बार फिर मंडराने लगा है। लेकिन इस पूरे संकट में एक देश है जिसके लिए यह जंग वरदान बनकर आई है और वो देश है रूस।

Strait of Hormuz बंद होने से क्यों थम गया पूरी दुनिया का एनर्जी ट्रेड

Strait of Hormuz दुनिया की ग्लोबल एनर्जी सप्लाई चेन का सबसे महत्वपूर्ण चोक पॉइंट माना जाता है। इस जलमार्ग से रोजाना करोड़ों बैरल तेल और गैस का व्यापार होता है। लेकिन Russia Iran War की वजह से इस रूट पर वेसल्स (जहाजों) की ट्रांजिट लगभग शून्य पर आ चुकी है।

इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि जब भी कोई शिपिंग कंपनी अपना जहाज किसी शिपमेंट के साथ एक पॉइंट से दूसरे पॉइंट पर भेजती है, तो उसे इंश्योरेंस कराना जरूरी होता है। लेकिन अब इंश्योरेंस कंपनियों ने साफ कह दिया है कि वो इस रूट पर कोई रिस्क नहीं उठाएंगी। जब मिलियंस डॉलर्स का सामान लेकर जाना हो और कोई रिस्क लेने वाली पार्टी ही न रहे, तो शिपिंग कंपनियां भी अपने जहाजों को जहां हैं वहीं डॉक कर रही हैं। भारत ने भी अपने पोर्ट्स पर इन जहाजों को डॉक करने की अनुमति दी है।

कच्चे तेल के दाम 115 डॉलर पार, दुनिया भर के बाजारों में भूचाल

Strait of Hormuz बंद होने का सीधा असर क्रूड ऑयल की कीमतों पर पड़ा है। कच्चे तेल का दाम 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाकर 115 डॉलर तक पहुंच चुका है। इसकी वजह से भारत समेत दुनिया भर के स्टॉक मार्केट्स पर सीधा असर पड़ा है। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों में भारी गिरावट देखने को मिली है।

इसकी वजह साफ है कि जब क्रूड ऑयल महंगा होता है तो इस पर निर्भर तमाम इंडस्ट्रीज की प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ जाती है। प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ने से कंपनियों की प्रॉफिटेबिलिटी घटती है और यही बात मार्केट में गिरावट का कारण बनती है। यह सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, पूरी दुनिया में यही हाल है। G7 देश भी अब इमरजेंसी मीटिंग करने जा रहे हैं ताकि इस संकट पर चर्चा की जा सके और संभावित समाधान निकाले जा सकें।

कतर का सबसे बड़ा LNG प्लांट बंद, गैस सिलेंडर होगा और महंगा

Russia Iran War का असर सिर्फ कच्चे तेल तक सीमित नहीं है। नेचुरल गैस के मामले में कतर दुनिया के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है। लेकिन मिडिल ईस्ट में चल रहे इस युद्ध की वजह से कतर का दुनिया का सबसे बड़ा LNG प्लांट बंद कर दिया गया है।

इसका सीधा असर आम आदमी की रसोई तक पहुंचेगा। घरों में आने वाले गैस सिलेंडर की कीमतें बढ़ सकती हैं और यह इंपैक्ट सिर्फ भारत नहीं बल्कि पूरी दुनिया में देखने को मिलेगा। जब एनर्जी के दाम बढ़ते हैं तो हर देश में ओवरऑल इनफ्लेशन यानी महंगाई बढ़ती है, जिससे निपटने के लिए इंटरेस्ट रेट्स बढ़ाए जाते हैं और सरकारों को सख्त आर्थिक नीतियां अपनानी पड़ती हैं।

रूस की अर्थव्यवस्था ‘डेथ जोन’ में जा रही थी, अब मिली संजीवनी

इस पूरे Russia Iran War संकट को समझने के लिए रूस की आर्थिक स्थिति को समझना जरूरी है। 2025 के अंत तक रूस की अर्थव्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे थे। पश्चिमी देशों की सेंक्शंस (प्रतिबंधों) की वजह से रूस की इकॉनमी को “डेथ जोन” की तरफ जाती हुई बताया जा रहा था, जहां वह सर्वाइव तो कर सकती थी लेकिन साल दर साल सिकुड़ती जा रही थी।

2025 में रूस का बजट डेफिसिट 72 बिलियन डॉलर रहा, जो 2009 के बाद सबसे ज्यादा था। ऑयल रेवेन्यू में 21% की गिरावट आई और कुल ऑयल रेवेन्यू 9.5 ट्रिलियन रूबल से गिरकर 7.5 ट्रिलियन रूबल पर आ गया। अक्टूबर 2025 में अमेरिका ने रूस की दो सबसे बड़ी तेल कंपनियों Rosneft और Lukoil पर अतिरिक्त सेंक्शंस लगा दिए, जिससे उनके 3 मिलियन बैरल प्रतिदिन के ट्रेड पर सीधा असर पड़ा। इसका करीब आधा हिस्सा भारत और चीन की तरफ जाता था।

रूस के पास ऐसा क्या है जो बाजी पलट सकता है

Russia Iran War के बीच रूस की ताकत उसके प्राकृतिक संसाधनों में छिपी है। नेचुरल गैस के मामले में दुनिया के सबसे बड़े रिजर्व्स रूस के पास हैं। कच्चे तेल के मामले में वह दुनिया के सबसे बड़े उत्पादकों और निर्यातकों में से एक है। कोयले के मामले में भी रूस के पास दुनिया के दूसरे सबसे बड़े रिजर्व्स हैं।

एक और अहम बात यह है कि रूस के पास 140 मिलियन बैरल कच्चा तेल ऐसा है जो टैंकर्स पर लोड है लेकिन अभी तक डिस्चार्ज नहीं हुआ है। मतलब उनका प्रोडक्शन सेटअप पूरी तरह तैयार है, बस सेंक्शंस में थोड़ी ढील मिले और वो तुरंत एक्सपोर्ट शुरू करके भारी कमाई कर सकते हैं। इसके अलावा आर्कटिक के अनटैप्ड एनर्जी रिसोर्सेज भी रूस के लिए एक बड़ा पोटेंशियल हैं।

अमेरिका ने भारत को दिया 30 दिन का वेवर, रूसी तेल की डिमांड बढ़ी

Russia Iran War की वजह से बढ़ते एनर्जी संकट के बीच अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिन का वेवर जारी किया है। हालांकि इस पर तमाम सवाल उठ रहे हैं कि भारत को अपनी एनर्जी सिक्योरिटी के लिए अमेरिका की परमिशन की क्यों जरूरत है। रूस-यूक्रेन युद्ध के समय भी भारत ने अपनी पॉलिसी खुद डिजाइन की थी, लेकिन कहीं न कहीं अमेरिका का प्रभाव अभी भी बना हुआ है।

इस बीच भारत ने मार्च 2026 के लिए 33 मिलियन बैरल रूसी तेल का ऑर्डर पहले ही प्लेस कर दिया है, जो पिछले महीने के 29 मिलियन बैरल से ज्यादा है। अनुमान है कि अगर यही एनर्जी सप्लाई के कंसर्न्स बने रहे तो यह ऑर्डर 40 मिलियन बैरल तक भी पहुंच सकता है। यह स्पष्ट संकेत है कि दुनिया में जितना एनर्जी संकट गहराएगा, रूस की डिमांड उतनी ही बढ़ेगी।

रूस और अमेरिका के बीच भी बातचीत के संकेत

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि रूस और अमेरिका आपस में बातचीत भी कर रहे हैं। रूस को डॉलर पेमेंट सिस्टम में दोबारा लाने पर विचार किया जा रहा है। 30 दिन के वेवर से यह इंडिकेशन मिल रही है कि आने वाले समय में सेंक्शंस में और रिलैक्सेशन दिए जा सकते हैं।

यूरोपियन यूनियन ने 2027 तक रूसी गैस और LNG पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का फैसला किया था और 2021 से 2025 के बीच रूस से गैस आयात में भारी कटौती भी की है। लेकिन अब सवाल यह है कि अगर मिडिल ईस्ट का संकट लंबा चलता है और कोई और विकल्प नहीं बचता, तो EU को भी यह प्रतिबंध रद्द करना पड़ सकता है। हालांकि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पहले ही कह चुके हैं कि रूस अब EU को तेल नहीं बेचेगा बल्कि एशिया पैसिफिक क्षेत्र में अपना नेचुरल गैस एक्सपोर्ट करेगा।

ईरान को रूस दे रहा डिफेंस सपोर्ट, 500 मिलियन यूरो की डील

Russia Iran War में रूस का एक और बड़ा फायदा डिफेंस एक्सपोर्ट से जुड़ा है। ईरान और रूस के रिश्ते पहले से ही बहुत मजबूत माने जाते हैं। न्यूयॉर्क पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक ईरान ने खुद कन्फर्म किया है कि रूस उन्हें कई दिशाओं में मदद कर रहा है। ईरान जो ड्रोन इस जंग में इस्तेमाल कर रहा है, उनमें कई रूसी ड्रोन हैं।

2026 की शुरुआत में ही ईरान और रूस के बीच 500 मिलियन यूरो की एक बड़ी डिफेंस डील साइन हुई है, जिसके तहत रूस ईरान को शोल्डर-फायर्ड एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइल्स सप्लाई करेगा। रूस की कुल सरकारी खर्च का 40% से ज्यादा हिस्सा पहले से ही डिफेंस स्पेंडिंग पर जा रहा है। अगर एनर्जी एक्सपोर्ट से अतिरिक्त कमाई होती है तो वह इस डिफेंस स्पेंडिंग को और बढ़ा सकता है, जिससे नई नौकरियां भी पैदा होंगी।

यूक्रेन के लिए बढ़ सकती है मुसीबत

Russia Iran War का एक और खतरनाक पहलू यूक्रेन से जुड़ा है। पश्चिमी देश जो यूक्रेन को मिलिट्री और आर्थिक सहायता दे रहे हैं, अगर एनर्जी की बढ़ती कीमतों से उनकी खुद की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ता है तो शायद वो यूक्रेन को उतनी मदद न दे पाएं।

जब एनर्जी के दाम बढ़ते हैं तो हर देश में महंगाई बढ़ती है। उससे लड़ने के लिए इंटरेस्ट रेट बढ़ाने पड़ते हैं और सख्त आर्थिक नीतियां अपनानी पड़ती हैं। ऐसे में यूरोपीय देश अपनी अर्थव्यवस्था संभालने में व्यस्त हो जाएंगे। दूसरी तरफ अगर रूस को इस संकट से भारी कमाई होती है तो वह अपनी डिफेंस स्पेंडिंग और बढ़ाएगा, बजट डेफिसिट की समस्या दूर होगी और शायद रूस यूक्रेन के खिलाफ और ज्यादा आक्रामक रुख अपना सकता है।

ट्रंप की सख्त चेतावनी: पूर्ण समर्पण चाहिए

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मामले में बहुत सख्त बयान दिए हैं। उन्होंने कहा है कि ईरान से “कंप्लीट सरेंडर” चाहिए, अन्यथा अमेरिका रुकेगा नहीं। हालांकि ईरान ने भी कहा है कि अगर आसपास के देशों से कोई रिटालिएशन नहीं आता और उनके बेसिस को इस्तेमाल नहीं किया जाता, तो वह भी इस संघर्ष को और बढ़ाने के बजाय डी-एस्केलेट करने का हर संभव प्रयास करेगा।

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लेकिन हकीकत यह है कि इस पूरे युद्ध का अंतिम हल तभी निकलेगा जब तीनों मेजर प्लेयर्स ईरान, इजराइल और अमेरिका की सहमति बने। तब तक जो भी ह्यूमन लॉस हो रहा है, उसे रोकना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।

क्या है पूरी पृष्ठभूमि

मिडिल ईस्ट में ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच चल रहा यह युद्ध कई महीनों से तनाव बढ़ने का नतीजा है। Strait of Hormuz, जिससे दुनिया का बड़ा हिस्सा अपना एनर्जी इंपोर्ट करता है, इस जंग की वजह से ठप पड़ गया है। इधर रूस पहले से ही यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी सेंक्शंस की वजह से आर्थिक संकट में था। 2025 में उसकी तेल कंपनियों Rosneft और Lukoil पर अतिरिक्त सेंक्शंस लगे, बजट डेफिसिट 72 बिलियन डॉलर पहुंचा और इकॉनमी “डेथ जोन” की तरफ जा रही थी। लेकिन मिडिल ईस्ट के इस युद्ध ने अचानक रूस के लिए एक नई राह खोल दी है, जहां दुनिया में एनर्जी की कमी होने से रूस अपने विशाल तेल और गैस भंडार के जरिए बड़ी कमाई कर सकता है और अपनी डूबती अर्थव्यवस्था को बचा सकता है।


मुख्य बातें (Key Points)
  • Strait of Hormuz पर जहाजों की आवाजाही लगभग शून्य हो चुकी है, जिससे कच्चे तेल के दाम 115 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए हैं और दुनिया भर की सप्लाई चेन बिखर गई है।
  • रूस की अर्थव्यवस्था जो 72 बिलियन डॉलर बजट डेफिसिट और 21% ऑयल रेवेन्यू गिरावट के साथ “डेथ जोन” में जा रही थी, उसे मिडिल ईस्ट के इस युद्ध से संजीवनी मिल सकती है।
  • भारत ने मार्च 2026 के लिए 33 मिलियन बैरल रूसी तेल का ऑर्डर दिया है जो 40 मिलियन बैरल तक जा सकता है, जबकि अमेरिका ने भारत को 30 दिन का वेवर भी दिया है।
  • ईरान और रूस के बीच 500 मिलियन यूरो की डिफेंस डील साइन हुई है, जिससे रूस को एनर्जी के साथ-साथ हथियार निर्यात से भी फायदा होगा।

FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1. Strait of Hormuz क्या है और यह क्यों बंद हुआ?

Strait of Hormuz ईरान और ओमान के बीच स्थित एक संकरा जलमार्ग है जो ग्लोबल एनर्जी ट्रेड का सबसे अहम चोक पॉइंट है। अमेरिका-ईरान-इजराइल युद्ध की वजह से इंश्योरेंस कंपनियों ने इस रूट पर जहाजों का बीमा करने से मना कर दिया, जिससे ट्रेड लगभग ठप हो गया।

Q2. Russia Iran War से भारत पर क्या असर पड़ रहा है?

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा क्रूड ऑयल इंपोर्टर है। तेल के दाम 115 डॉलर पार होने से भारत में प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ रही है, स्टॉक मार्केट गिर रहे हैं और गैस सिलेंडर की कीमतें बढ़ने की आशंका है। हालांकि भारत ने रूसी तेल का ऑर्डर बढ़ाकर इस समस्या से निपटने की कोशिश की है।

Q3. रूस को इस युद्ध से कैसे फायदा हो रहा है?

एनर्जी संकट से कच्चे तेल और गैस के दाम बढ़ने पर रूस अपने विशाल तेल-गैस भंडार से भारी कमाई कर सकता है। इसके अलावा ईरान को हथियार बेचने से डिफेंस एक्सपोर्ट बढ़ रहा है, सेंक्शंस में ढील मिलने के संकेत हैं और डॉलर पेमेंट सिस्टम में वापसी पर बातचीत चल रही है।

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अभिनव कश्यप

अभिनव कश्यप

अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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