Khawaja Asif Pakistan US: पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने संसद में एक ऐसा बयान दिया है जिसने पूरे देश की राजनीति में हड़कंप मचा दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने पाकिस्तान को ‘टॉयलेट पेपर’ की तरह इस्तेमाल किया और फिर फेंक दिया। यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि पाकिस्तान की विदेश नीति और अमेरिका से उसके रिश्तों पर एक कड़ा आत्मचिंतन माना जा रहा है।
ख्वाजा आसिफ ने कहा कि 1999 के बाद अफगानिस्तान के नाम पर अमेरिका के साथ दोबारा गठबंधन करना पाकिस्तान के लिए ऐतिहासिक भूल थी। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि लोगों को ‘जिहाद’ के नाम पर स्टेट पॉलिसी के तहत मोबिलाइज किया गया, जो भ्रामक और विनाशकारी नीति थी।
क्यों कहा पाकिस्तान को टॉयलेट पेपर?
ख्वाजा आसिफ ने पाकिस्तानी संसद में अपने संबोधन के दौरान यह बात कही। उन्होंने अमेरिका के साथ पाकिस्तान के रिश्तों की समीक्षा करते हुए कहा कि अमेरिका ने पाकिस्तान को अपने हितों के लिए इस्तेमाल किया और जब काम निकल गया तो उसे फेंक दिया। इस दौरान पाकिस्तानी सांसदों ने टेबल थपथपाकर उनका समर्थन किया।
ख्वाजा आसिफ ने एक और नैरेटिव तोड़ा, जो दशकों से बेचा जा रहा था कि पाकिस्तान अफगानिस्तान गया था इस्लाम के लिए, जिहाद के लिए। आसिफ ने साफ कहा कि ऐसा नहीं था। लोगों को जिहाद के नाम पर मोबिलाइज किया गया, लेकिन असल में यह स्टेट पॉलिसी थी और वह पॉलिसी भ्रामक और विनाशकारी थी।
उन्होंने यहां तक कहा कि पाकिस्तान का एजुकेशन सिस्टम तक रीराइट किया गया ताकि इन जंगों को जस्टिफाई किया जा सके। जो वैचारिक जहर उस वक्त भरा गया, वह आज भी पाकिस्तान की सोसायटी के ब्लड स्ट्रीम में घूम रहा है।
अमेरिका से गठबंधन की कीमत
ख्वाजा आसिफ ने उन कॉन्फ्लिक्ट्स का जिक्र किया जो पाकिस्तान के कभी थे ही नहीं, लेकिन उनमें घुसने का नतीजा पाकिस्तान को क्या मिला? इनस्टेबिलिटी, रेडिकलाइजेशन, सोशल ब्रेकडाउन। उन्होंने स्वीकार किया कि 2001 में पाकिस्तान ने अमेरिका की वॉर ऑन टेरर में ओवर एन्थूजियास्टिक इंटर्न की तरह पार्टिसिपेट किया।
1980 में सोवियत के खिलाफ और 2001 में तालिबान के खिलाफ, पाकिस्तान बना अमेरिका का स्टेजिंग ग्राउंड। वेपन स्मगल हुए, अफगान इंसर्जेंट्स ट्रेन हुए, वॉर लॉर्ड्स को पैसे दिए गए। पाकिस्तान सबसे ईगर पार्टनर था।
पाकिस्तान ने क्या भुगता?
आंकड़ों पर नजर डालें तो 2005 से 2013 के बीच 80,000 से ज्यादा पाकिस्तानी मारे गए। इनमें 48,000 के आसपास मासूम सिविलियंस थे। कोई क्रॉस फायर में मारा गया तो कोई यूएस ड्रोन के नीचे आ गया। और रिटर्न में पाकिस्तान को मिला क्या? डोनाल्ड ट्रंप ने पहले टर्म में मिलिट्री एड काट दी। जो बाइडन ने पाकिस्तानी लीडरशिप से मिलना तक जरूरी नहीं समझा। इस्लामाबाद सचमुच लेफ्ट आउट हो गया।
पाकिस्तान को शिकायत का मोरल राइट है?
लेकिन सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान को कंप्लेन करने का मोरल राइट है? विश्लेषकों का मानना है कि बिल्कुल नहीं। पहली वजह है पाकिस्तान का डबल गेम। पाकिस्तान तालिबान का सपोर्टर भी था और अमेरिका का अलाय भी। यूएस इंटेलिजेंस ने पाकिस्तान को अलकायदा और 9/11 के लिंक से जोड़ा।
इस्लामाबाद कोई बेचारा बायस्टैंडर नहीं था। वह एक्टिवली इस्लामिस्ट टेररिस्ट को सपोर्ट कर रहा था। वॉर के दौरान भी अमेरिका तालिबान से लड़ता रहा और पाकिस्तान चुपके से उसी तालिबान को ऑक्सीजन देता रहा। यही डबल गेम आज पाकिस्तान पर भारी पड़ा है।
क्या है पृष्ठभूमि?
पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्ते हमेशा उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। 1980 के दशक में सोवियत संघ के खिलाफ अफगान जिहाद में पाकिस्तान अमेरिका का करीबी सहयोगी बना। 2001 में 9/11 हमले के बाद पाकिस्तान फिर से अमेरिका की वॉर ऑन टेरर में शामिल हुआ। लेकिन दोनों ही मौकों पर पाकिस्तान को उम्मीद के मुताबिक फायदा नहीं मिला। इस बीच पाकिस्तान के अंदर कट्टरपंथ बढ़ा और आतंकवाद ने उसे अपनी चपेट में ले लिया। ख्वाजा आसिफ का यह बयान उसी कड़वी सच्चाई को बयां करता है।
मुख्य बातें (Key Points)
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने संसद में कहा- अमेरिका ने पाकिस्तान को टॉयलेट पेपर की तरह इस्तेमाल किया।
उन्होंने अफगानिस्तान में अमेरिका के साथ गठबंधन को ऐतिहासिक भूल और विनाशकारी नीति बताया।
2005-2013 के बीच 80,000 से ज्यादा पाकिस्तानी मारे गए, लेकिन अमेरिका ने मिलिट्री एड काट दी।
पाकिस्तान को शिकायत का मोरल राइट नहीं, क्योंकि वह तालिबान को सपोर्ट भी करता था और अमेरिका का अलाय भी था।








