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The News Air - Breaking News - Taliban Action on Iran-America: US-ईरान टेंशन में कूदा तालिबान, अफगानिस्तान देगा ईरान का साथ

Taliban Action on Iran-America: US-ईरान टेंशन में कूदा तालिबान, अफगानिस्तान देगा ईरान का साथ

तालिबान ने दी अमेरिका को चेतावनी, कहा- ईरान पर हमला हुआ तो हम देंगे पूरा सहयोग; पाकिस्तान की खामोशी पर सवाल

The News Air Team by The News Air Team
सोमवार, 16 फ़रवरी 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, अंतरराष्ट्रीय
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Taliban Action on Iran-America
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Taliban Supports Iran-US Tensions: US-ईरान तनाव में अब तालिबान की एंट्री हो गई है। तालिबान प्रवक्ता जबीउल्ला मुजाहिद ने एक इंटरव्यू में बड़ा बयान देते हुए कहा है कि अगर अमेरिका ईरान पर मिलिट्री हमला करता है तो अफगानिस्तान ईरानी लोगों के साथ खड़ा रहेगा। तालिबान ने साफ कर दिया है कि अगर ईरान ने अमेरिकी हमले की स्थिति में अफगानिस्तान से मदद मांगी तो वे उनका पूरा सहयोग करेंगे। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर जिनेवा में दूसरे राउंड की बातचीत चल रही है।

तालिबान का यह समर्थन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ईरान और अफगानिस्तान के बीच रिश्ते हमेशा से तनावपूर्ण रहे हैं। ईरान एक शिया देश है जबकि तालिबान सुन्नी विचारधारा को मानता है। इसके बावजूद तालिबान ने खुलकर ईरान का समर्थन किया है, जो मिडिल ईस्ट में युद्ध जैसी स्थिति के बीच एक बड़ा राजनीतिक संदेश है।

तालिबान प्रवक्ता का बड़ा बयान: ईरान के साथ खड़े हैं

तालिबान प्रवक्ता जबीउल्ला मुजाहिद ने इंटरव्यू में कहा, “अगर अमेरिका ईरान पर मिलिट्री हमला करता है तो अफगानिस्तान ईरान के लोगों के साथ सहयोग करने और सहानुभूति दिखाने के लिए तैयार है। ईरान ने अमेरिकी हमले की हालत में अफगानिस्तान से मदद मांगी तो हम उनका साथ देंगे। अफगानिस्तान पूरी तरह से ईरान के साथ सहयोग करेगा।”

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उन्होंने आगे कहा, “बीते साल जून में इजराइल के साथ 12 दिन की लड़ाई में ईरान विजेता बना था। अमेरिका के हमले का भी ईरान जवाब देगा और जीतेगा।” यह बयान सीधे तौर पर ट्रंप प्रशासन की धमकियों का जवाब है।

अफगानिस्तान युद्ध नहीं, बातचीत चाहता है

तालिबान ने यह भी स्पष्ट किया कि अफगानिस्तान, अमेरिका और ईरान के बीच लड़ाई नहीं चाहता। ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम पर बातचीत के लिए बैठना चाहिए और बातचीत के जरिए ही इस मामले को हल किया जाना चाहिए।

तालिबान प्रवक्ता ने कहा, “हम बातचीत के पक्ष में हैं। लेकिन ईरान को किसी हमले के खिलाफ अपनी रक्षा का पूरा-पूरा अधिकार है।” यह बयान दर्शाता है कि तालिबान शांति चाहता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर ईरान का साथ देने को तैयार है।

ईरान-तालिबान के रिश्ते: तनावपूर्ण लेकिन समर्थन

ईरान और अफगानिस्तान एक लंबा बॉर्डर साझा करते हैं। ईरान शिया देश है और अफगान तालिबान सुन्नी विचारधारा को मानता है। ईरान में अफगान शरणार्थियों के मुद्दे पर भी दोनों के बीच रिश्ते तनावपूर्ण बने हुए हैं।

इसके बावजूद तालिबान ने अब ईरान का समर्थन दिया है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एक मुस्लिम देश दूसरे मुस्लिम देश के समर्थन में खुलकर सामने आया है और अमेरिका को कड़ी चेतावनी दी है।

पाकिस्तान की खामोशी पर सवाल

जब मिडिल ईस्ट में युद्ध जैसे हालात बन रहे हैं, तो सवाल उठ रहे हैं कि पाकिस्तान क्यों खामोश है। पाकिस्तान जो खुद को मुस्लिम देशों का नेता मानता है और तुर्की के साथ मिलकर मुस्लिम देशों का नेतृत्व करने की ख्वाहिश रखता था, वह इस मामले में चुप क्यों है?

विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की खामोशी के पीछे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सबसे बड़ा कारण हैं। पाकिस्तान ट्रंप प्रशासन के साथ कई तरह की डील्स कर रहा है। IMF जैसे संस्थानों से पाकिस्तान को मदद मिल रही है, इसलिए पाकिस्तान को अमेरिका की जरूरत है।

गाजा मुद्दे पर भी पाकिस्तान ने ट्रंप के पीस प्लान पर साइन किया था। अगर पाकिस्तान ईरान को समर्थन देता है तो अमेरिका के साथ उसके रिश्ते तनावपूर्ण हो सकते हैं। इसीलिए पाकिस्तान ईरान के साथ आने से डरता हुआ दिख रहा है।

ईरान ने रखी शर्त: पहले सैंक्शन हटाओ, फिर बात करेंगे

ईरान के उप विदेश मंत्री माजिद तख्त रवांची ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि तेहरान परमाणु समझौते के लिए तैयार हो जाएगा, अगर वाशिंगटन ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाने की चर्चा करने के लिए तैयार हो।

रवांची ने सीधे तौर पर कहा, “अब गेंद अमेरिका के पाले में है, यानी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पाले में है। अब ट्रंप को यह साबित करना होगा कि उन्हें यह डील करनी है या नहीं करनी।”

उन्होंने यह भी दोहराया कि ईरान अपने बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर चर्चा नहीं करेगा। ईरान का कहना है कि जब अमेरिका और इजराइल ने हमला किया था तो उनकी मिसाइलों ने ही उनकी रक्षा की थी।

अमेरिका का जवाब: कट्टर मौलवियों से निपटना मुश्किल

US सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्को रुबियो ने भी एक बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा, “हम कट्टर शिया मौलवियों से निपट रहे हैं। हम ऐसे लोगों से निपट रहे हैं जो सिर्फ थियोलॉजी के आधार पर जियोपॉलिटिकल फैसले लेते हैं। और यह एक बहुत मुश्किल बात है। ईरान के साथ कोई भी सफल डील नहीं कर पाया है। लेकिन हम कोशिश करेंगे।”

यह बयान सीधे तौर पर ट्रंप प्रशासन की तरफ से आया है और यह दर्शाता है कि अमेरिका को ईरान के साथ डील करना कितना मुश्किल लग रहा है।

जिनेवा में दूसरे राउंड की बातचीत

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची जिनेवा में दूसरे राउंड की बातचीत के लिए पहुंच चुके हैं। अमेरिका और ईरान के बीच न्यूक्लियर डील को लेकर बातचीत चल रही है।

ईरान ने साफ कर दिया है कि वे बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन पहले अमेरिका को ईरान पर लगे सैंक्शन हटाने पर चर्चा करनी होगी। तभी वे आगे चलकर न्यूक्लियर डील पर बातचीत करेंगे।

इजराइल की भूमिका: मिसाइल प्रोग्राम पर हमले की धमकी

दिसंबर में ट्रंप ने साफ कहा था कि इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने यह कहा था कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच कोई समझौता नहीं होता है तो वे ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर इजराइली हमले का समर्थन करेंगे।

इजराइल हमेशा से यही कहता आया है कि मिसाइल प्रोग्राम पर बातचीत होनी चाहिए। लेकिन ईरान ने साफ मना कर दिया है। ईरान का कहना है कि उनकी डिफेंस क्षमताओं को छोड़ना उनके लिए स्वीकार नहीं है।

अमेरिका की सैन्य तैयारी: इजराइल की मदद का प्लान

ABC न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी सेना और खुफिया एजेंसियों के भीतर इस पर चर्चा शुरू हो चुकी है कि अगर इजराइल ईरान पर हमला करता है तो अमेरिका उसकी किस प्रकार मदद कर सकता है।

इस बात पर ज्यादा चर्चा है कि अमेरिका सीधा हमला करेगा या नहीं, बल्कि इस पर है कि इजराइल को वे कैसे सहयोग दे सकते हैं। मतलब अमेरिका इस युद्ध में सीधे नहीं कूदेगा, लेकिन इजराइल की मदद जरूर करेगा, जैसा 2025 के उस छोटे से युद्ध के दौरान हुआ था।

मिडिल ईस्ट में युद्ध की आशंका

मिडिल ईस्ट में युद्ध जैसे हालात बनते जा रहे हैं। एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत चल रही है, तो दूसरी तरफ सैन्य तैयारियां भी हो रही हैं। तालिबान की एंट्री ने इस पूरे मामले को और जटिल बना दिया है।

अगर अमेरिका या इजराइल ईरान पर हमला करते हैं तो अब तालिबान भी इस युद्ध में कूद सकता है। यह पूरे क्षेत्र के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।

आम लोगों पर क्या होगा असर?

अगर मिडिल ईस्ट में युद्ध होता है तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे भारत जैसे देशों में महंगाई बढ़ेगी। साथ ही युद्ध की स्थिति में लाखों लोगों की जान खतरे में पड़ सकती है।

भारत के लिए भी यह चिंता का विषय है क्योंकि मिडिल ईस्ट में बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं। युद्ध की स्थिति में उनकी सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बन सकती है।


मुख्य बातें (Key Points)
  • तालिबान प्रवक्ता जबीउल्ला मुजाहिद ने कहा कि अगर अमेरिका ईरान पर हमला करता है तो अफगानिस्तान ईरान का साथ देगा
  • ईरान ने शर्त रखी है कि पहले अमेरिका सैंक्शन हटाए, फिर न्यूक्लियर डील पर बात होगी
  • पाकिस्तान की खामोशी पर सवाल, ट्रंप के डर से ईरान का समर्थन नहीं कर रहा
  • ईरान ने साफ किया कि बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम पर कोई बातचीत नहीं होगी
  • अमेरिकी सेना इजराइल को मदद देने का प्लान बना रही है
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