US Russia Secret Trade Deal : भारत-अमेरिका ट्रेड डील के बाद अब वैश्विक राजनीति में एक और बड़ा उलटफेर होने जा रहा है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका और रूस के बीच एक सीक्रेट डील होने जा रही है। इस डील से चीन को जबरदस्त झटका लगेगा, ब्रिक्स की अपनी करेंसी लाने की मुहिम पूरी तरह खत्म हो जाएगी और अमेरिकी डॉलर की बादशाहत और मजबूत होगी। वहीं भारत के पुराने दोस्त रूस की अमेरिका से बढ़ती नजदीकियां भारत के लिए फायदे और चिंता दोनों लेकर आ रही हैं।
जो अमेरिका अब तक रूस पर एक के बाद एक प्रतिबंध लगा रहा था, उसकी तेल निर्यात पर निर्भर अर्थव्यवस्था को तोड़ने की कोशिश कर रहा था—वही अमेरिका अब रूस के साथ हाथ मिलाने की तैयारी कर रहा है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच रिश्तों में तेजी से सुधार हो रहा है।
चीन को सिर्फ झटका नहीं, 11,000 वोल्ट का करंट लगेगा
रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि अगर रूस और अमेरिका के बीच यह डील हो जाती है, तो चीन को 11,000 वोल्ट का झटका लगेगा। यह कोई सामान्य झटका नहीं होगा—चीन के लिए उबरना मुश्किल हो जाएगा।
अभी दुनिया दो खेमों में बंटी हुई है। एक तरफ अमेरिका और यूरोपीय देश हैं, दूसरी तरफ चीन और रूस। रूस और अमेरिका के बीच यूक्रेन को लेकर लड़ाई चल रही है जो सोवियत संघ के जमाने के शीत युद्ध से चली आ रही है। इसी बीच चीन ने ट्रेड के माध्यम से अपनी बादशाहत कायम कर ली है और लगभग 17-18 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाकर सीधे अमेरिका को चुनौती दे रहा है।
लेकिन अमेरिका के रणनीतिकार शुरू से कह रहे हैं कि रूस नहीं, बल्कि चीन उनके लिए ज्यादा बड़ा खतरा है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के माध्यम से जिस तरह चीन तमाम देशों में फैल रहा है, अफ्रीका में सैनिक अड्डे बना रहा है और ड्यूल-यूज़ पोर्ट्स बनाकर नौसैनिक ठिकाने तैयार कर रहा है—यह अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चिंता है।
चीन के लिए दोस्त ढूंढना हुआ मुश्किल
चीन की विस्तारवादी नीति को अब यूरोप भी समझ चुका है। यूरोप का भारत के साथ जो फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) हुआ है, उसकी भाषा अगर गौर से देखें तो निशाने पर चीन ही है। यूरोप साफ कह रहा है कि वे चीन पर भरोसा नहीं करते और भारत सप्लाई चेन में एक भरोसेमंद साथी हो सकता है। अमेरिका भी यही मान रहा है।
ऐसे में अगर रूस और अमेरिका एक साथ हो जाते हैं, तो चीन पूरी तरह अलग-थलग पड़ जाएगा। उसके पास कोई बड़ा रणनीतिक सहयोगी नहीं बचेगा।
ट्रंप की स्मार्ट प्ले या मजबूरी?
सवाल यह है कि क्या ट्रंप स्मार्ट प्ले कर रहे हैं? विशेषज्ञों का मानना है कि यह कोई अचानक जागी हुई नींद नहीं है, बल्कि बदलती हुई दुनिया की वास्तविकता के कारण ट्रंप को ये फैसले लेने पड़ रहे हैं।
यूरोप 22 साल से भारत के साथ ट्रेड डील पर बातचीत कर रहा था, लेकिन कभी फाइनल नहीं हो रहा था। जब ट्रंप ने ग्रीनलैंड की मांग की, सैन्य कार्रवाई की धमकी दी और यूरोप पर टैरिफ लगाने की बात कही, तब यूरोप दौड़कर भारत के पास आया और ट्रेड डील कर ली। जैसे ही यूरोप ने भारत से डील कर ली, अमेरिका के पास कोई विकल्प नहीं बचा और एक हफ्ते के अंदर भारत के साथ ट्रेड डील की घोषणा हो गई।
भारत के लिए क्या फायदा, क्या चिंता?
अगर रूस और अमेरिका के बीच डील हो जाती है, तो भारत के लिए कई फायदे होंगे। सबसे पहला और सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि रूस से तेल खरीदने पर जो अमेरिकी दबाव था, वह खत्म हो जाएगा। अगर अमेरिका खुद रूस के साथ व्यापार करेगा, तो भारत को कैसे रोक सकता है?
भारत और रूस के रिश्ते बहुत पुराने हैं। पिछले दिनों S-400 मिसाइल सिस्टम की बाकी दो बैटरीज लेने का समझौता हो गया है। S-500 पर भी बातचीत चल रही है। रक्षा समझौतों पर दोनों देश आगे बढ़ रहे हैं और भारत ने इसमें कोई समझौता नहीं किया है।
जो दोनों देश एक-दूसरे के दुश्मन थे—रूस और अमेरिका—अगर वे आपस में दोस्त हो जाते हैं, तो दोनों भारत के भी दोस्त हो जाएंगे। यह भारत की कूटनीतिक स्थिति को और मजबूत करेगा।
BRICS की करेंसी मुहिम पर लगेगा ब्रेक
ब्रिक्स में एक अल्टरनेटिव करेंसी लाने की बात चल रही थी, जिसे चीन और रूस आगे बढ़ा रहे थे। ब्राजील भी इसके पक्ष में था। दक्षिण अफ्रीका भी साथ था। लेकिन भारत अकेला ऐसा देश था जो अमेरिका के साथ अच्छे रिश्तों को देखते हुए इस मुहिम में ज्यादा आगे नहीं बढ़ रहा था।
ट्रंप ने पांच-छह महीने पहले धमकी दी थी कि अगर ब्रिक्स अपनी करेंसी लाने की कोशिश करेगा, तो 200% टैरिफ लगा देंगे। अब अगर रूस भी अमेरिका के साथ आ जाता है और भारत के साथ ट्रेड डील पहले ही हो चुकी है, तो ब्रिक्स की अपनी करेंसी लाने की बात पूरी तरह खत्म हो जाएगी। इससे अमेरिकी डॉलर और मजबूत होगा।
भारतीय रुपया कैसे होगा मजबूत?
भारत के लिए सबसे बड़ा फायदा यह है कि अगर अमेरिका के साथ रिश्ते अच्छे होते हैं और व्यापार बढ़ता है, तो भारत-अमेरिका ट्रेड डील लागू होने पर 60 से 70 बिलियन डॉलर का एक्स्ट्रा एक्सपोर्ट भारत से हो सकता है। नया बाजार मिलेगा, अमेरिकी कंपनियों का निवेश आएगा और विदेशी निवेश बढ़ने से भारतीय रुपया मजबूत होगा।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि डॉलर जैसी पूछ रुपये की पूरी दुनिया में हो—यह अभी बहुत दूर की बात है। फिलहाल द्विपक्षीय व्यापार में आपसी करेंसी में सौदा करने की बात चल रही है। यूएई के साथ यह चल रही है, रूस के साथ भी पेमेंट का रास्ता ढूंढ रहे हैं।
UPI (यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस) की बात करें तो एक दर्जन से अधिक देशों ने इसे मान्यता दे दी है। यूएई में जाकर आप UPI के जरिए पेमेंट कर सकते हैं। यह दोनों देशों की करेंसी में होता है, इसमें डॉलर है ही नहीं। अगर 100 से ज्यादा देशों में UPI की एक्सेप्टेंस हो गई, तो भारतीय रुपये की स्वीकार्यता काफी बढ़ जाएगी।
चीन का युआन भी होगा कमजोर
चीन की मुद्रा युआन में कई देशों के साथ लोकल करेंसी में डील हो रही है, खासकर रूस के साथ तेल से लेकर तमाम ट्रेड युआन में हो रहा है। लेकिन अगर रूस अमेरिका के साथ आ जाता है, तो रूस-चीन का यह लोकल करेंसी ट्रेड भी प्रभावित होगा। ब्राजील के राष्ट्रपति लूला भी भारत में बातचीत करने आ रहे हैं और वे भी FTA चाहते हैं। इसका मतलब है कि ब्रिक्स के भीतर भी चीन का प्रभाव कम होता जा रहा है।
मुख्य बातें (Key Points)
- ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक रूस और अमेरिका के बीच सीक्रेट डील होने जा रही है, जिससे चीन पूरी तरह अलग-थलग पड़ जाएगा।
- ब्रिक्स की अपनी करेंसी लाने की मुहिम खत्म हो जाएगी और अमेरिकी डॉलर और मजबूत होगा।
- भारत के लिए फायदा: रूस से तेल खरीदने पर अमेरिकी दबाव खत्म होगा, S-400 और S-500 डील आगे बढ़ेगी, और अमेरिका से 60-70 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त एक्सपोर्ट संभव।
- भारत-अमेरिका ट्रेड डील और विदेशी निवेश बढ़ने से भारतीय रुपया मजबूत होगा।








