UP SIR Voter List: उत्तर प्रदेश में 6 जनवरी को भारत निर्वाचन आयोग ने एसआईआर (Summary Intensive Revision) का पहला ड्राफ्ट जारी किया। इस एक ड्राफ्ट ने पूरे प्रदेश में हड़कंप मचा दिया है। एक झटके में 2 करोड़ 89 लाख वोटरों के नाम सूची से गायब हो गए। यह संख्या कुल मतदाताओं का 18.70 प्रतिशत है।
लेकिन असली चिंता की बात तो यह है कि अभी भी 2 करोड़ से अधिक वोटरों के नाम “संदिग्ध” की सूची में हैं। इनका भविष्य अधर में लटका हुआ है। कोई नहीं जानता कि 31 मार्च को जब अंतिम सूची आएगी तो कितने और नाम कटेंगे।
15 करोड़ से घटकर 12 करोड़ रह गए वोटर
एसआईआर शुरू होने से पहले उत्तर प्रदेश में कुल 15 करोड़ 44 लाख वोटर थे। पहले ड्राफ्ट के बाद यह संख्या घटकर 12 करोड़ 56 लाख रह गई है। इसमें 9 करोड़ 56 लाख ग्रामीण वोटर हैं और 2 करोड़ 99 लाख शहरी वोटर हैं।
सवाल यह है कि जब देश की आबादी बढ़ रही है तो वोटरों की संख्या कैसे घट सकती है। स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 1 जनवरी 2026 को उत्तर प्रदेश की वयस्क आबादी तकरीबन 16 करोड़ 6 लाख है। इसका मतलब साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा लोग वोटर लिस्ट से गायब हैं।
फॉर्म नहीं मिला तो सीधे नाम कट गया
यह समझना बहुत जरूरी है कि जिन 2.89 करोड़ लोगों के नाम कटे हैं उनका “डिलीशन” नहीं हुआ है। डिलीशन तब होता है जब आपने फॉर्म भरा हो और उसमें कोई गड़बड़ी पाई गई हो। डिलीशन में आपको सुनवाई का मौका मिलता है और अपील का अधिकार मिलता है।
लेकिन इन 2.89 करोड़ लोगों का तो फॉर्म ही किसी वजह से बीएलओ यानी बूथ लेवल ऑफिसर को नहीं मिला। बस इतने में उनके नाम सीधे सूची से बाहर कर दिए गए। इनके पास अब बस एक रास्ता है। वे फॉर्म-6 भरकर नए मतदाता के रूप में अपना नाम जुड़वा सकते हैं।
फॉर्म-6 की विडंबना समझिए
फॉर्म-6 असल में उन लोगों के लिए होता है जो पहली बार वोटर बन रहे हैं। लेकिन जो लोग पिछले कई सालों से विधानसभा और लोकसभा चुनावों में वोट डालते आए हैं उन्हें अब फॉर्म-6 भरना होगा। इसका मतलब है कि वोटर बनने के लिए उन्हें यह दिखाना होगा कि वे पहली बार वोटर बन रहे हैं जो कि सच नहीं है।
सरकार की तरफ से कहा जा रहा है कि जिनके नाम कटे हैं उनमें से कुछ मृतक हैं, कुछ ने अपना ठिकाना बदल लिया और कुछ पलायन कर गए। लेकिन क्या 2.89 करोड़ लोग पलायन कर सकते हैं। अगर इनमें से कुछ लाख भी सही वोटर हैं तो उनके लोकतांत्रिक अधिकार का क्या होगा।
दो वोटर लिस्ट में 3 करोड़ का अजीब फर्क
एक बहुत अजीब बात सामने आई है जो गंभीर सवाल खड़े करती है। पिछले साल यूपी में दो वोटर लिस्ट एक साथ अपडेट हो रही थीं। एक पंचायतों के चुनाव के लिए जिसे यूपी स्टेट इलेक्शन कमीशन बनाता है। दूसरी लोकसभा और विधानसभा के लिए जिसे भारत का निर्वाचन आयोग बनाता है।
पंचायत वाली लिस्ट में ग्रामीण वोटरों की संख्या 12 करोड़ 7 लाख है। जबकि भारत के निर्वाचन आयोग की ड्राफ्ट लिस्ट में ग्रामीण वोटर सिर्फ 9 करोड़ 56 लाख हैं। एक ही राज्य में एक ही श्रेणी के वोटरों की संख्या में 3 करोड़ का फर्क कैसे संभव है। शहर के वोटर कहां गए यह भी कोई नहीं बता रहा।
किन शहरों में सबसे ज्यादा नाम कटे
शहरी इलाकों में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। लखनऊ में 30 प्रतिशत नाम कट गए जो सबसे ज्यादा है। गाजियाबाद में 28.83 प्रतिशत नाम कटे हैं। कानपुर नगर में 25.50 प्रतिशत वोटर लिस्ट से बाहर हो गए। प्रयागराज में 24.64 प्रतिशत नाम गायब हैं। गौतम बुद्ध नगर में 23.98 प्रतिशत वोटर हटा दिए गए।
आगरा में 23.25 प्रतिशत नाम कटे हैं। हापुड़ में 22.30 प्रतिशत और शाहजहांपुर में 21.76 प्रतिशत मतदाता ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार सहारनपुर की नगर विधानसभा सीट पर तो 1 लाख 16 हजार लोगों के नाम एक साथ कट गए। देवबंद में 50 हजार और नकुड़ में 44 हजार मतदाता लिस्ट से हट चुके हैं।
2 करोड़ 22 लाख पर लॉजिकल फैलेसी की तलवार
जिनके नाम ड्राफ्ट में आ भी गए हैं वे भी सुरक्षित नहीं हैं। रिपोर्टर्स कलेक्टिव की रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयोग ने एक ऐसा सॉफ्टवेयर लगाया है जो वोटरों को संदिग्ध करार दे रहा है। यूपी में 2 करोड़ 22 लाख फॉर्म इस सॉफ्टवेयर ने पकड़े हैं।
यह सॉफ्टवेयर छह बिंदुओं के आधार पर किसी को संदिग्ध मानता है। जैसे अगर आपकी उम्र और पिता की उम्र में 15 साल से कम का अंतर है तो आप संदिग्ध हो गए। अगर आपकी उम्र और दादा की उम्र में 40 साल से कम का अंतर है तो भी नाम कट सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह सॉफ्टवेयर बिना किसी लिखित निर्देश या मैनुअल के लगाया गया है और इसके नतीजे भ्रामक हो सकते हैं।
1 करोड़ 4 लाख को मिलेगा नोटिस
जिनके नाम ड्राफ्ट लिस्ट में आ गए हैं उनमें से भी कई मुसीबत में हैं। 1 करोड़ 4 लाख वोटरों के फॉर्म अनमैप्ड पाए गए हैं। इसका मतलब है कि उन्होंने कोई जरूरी कॉलम नहीं भरा। जैसे यह नहीं बताया कि 2003 में वे वोटर थे या नहीं।
इन सभी को नोटिस जाएगा और उन्हें 11 दस्तावेजों में से कोई एक जमा करना होगा। महिलाओं के लिए तो मुश्किल और भी बड़ी है। उन्हें अपने मायके से प्रमाण पत्र लाना होगा। जिनके मायके में अब कोई नहीं बचा उनका नाम कैसे जुड़ेगा यह किसी को नहीं पता।
6 करोड़ वोटरों पर मंडरा रहा खतरा
योगेंद्र यादव का कहना है कि आज की तारीख में 6 करोड़ वोटरों की गर्दन पर तलवार लटकी हो सकती है। इसका हिसाब कुछ ऐसा है। 2 करोड़ 89 लाख वोटर तो ड्राफ्ट से ही बाहर हो गए। 1 करोड़ 4 लाख के फॉर्म अनमैप्ड हैं जिन्हें नोटिस जाएगा। 2 करोड़ 22 लाख वोटर लॉजिकल फैलेसी की सूची में हैं।
कुल मिलाकर 6 करोड़ से अधिक वोटरों को या तो दस्तावेज देने हैं या अपील करनी है या फिर नए सिरे से नाम जुड़वाना है। सवाल यह है कि इतने कम समय में इतने करोड़ लोग यह सब कैसे कर पाएंगे।
तारीखें बार-बार बढ़ीं फिर भी काम अधूरा
एसआईआर की तारीख कितनी बार बढ़ाई गई यह गिनना मुश्किल है। 6 जनवरी तक दावे और आपत्तियां जमा करनी थीं। अब यह बढ़ाकर 6 फरवरी कर दी गई है। नवंबर में एक बार डेडलाइन बढ़ी। दिसंबर में दो बार बढ़ाई गई। 31 दिसंबर तक काम पूरा नहीं हुआ तो 1 जनवरी तक विस्तार देना पड़ा।
आधार कार्ड को लेकर भी लंबी खींचतान चली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा आधार मान्य है लेकिन फिर भी चुनाव आयोग आनाकानी करता रहा। हर चीज के लिए कोर्ट का आदेश लाना पड़ रहा है। यह दिखाता है कि पूरी प्रक्रिया कितनी अव्यवस्थित तरीके से चल रही है।
10,000 करोड़ का फंड और राजनीतिक फायदा
इस पूरे मामले का एक राजनीतिक पहलू भी है जिसे समझना जरूरी है। भाजपा के पास 10,000 करोड़ रुपये का चंदा है। 2024-25 में बीजेपी ने चुनावों पर 3,335 करोड़ रुपये खर्च किए। 2023-24 में 1,754 करोड़ खर्च किए थे। यानी एक साल में ढाई गुना ज्यादा खर्च।
जिस पार्टी के पास इतना पैसा और संगठन है वह अपने वोटरों के नाम आसानी से जुड़वा सकती है। लेकिन विपक्ष के पास न इतने पैसे हैं न इतना संगठन। अगर एसआईआर में नाम जुड़वाने का संबंध राजनीतिक दलों की संगठन क्षमता से है तो नुकसान किसका होगा यह समझना मुश्किल नहीं है।
कन्नौज में उठी आवाजें
17 जनवरी को कन्नौज से खबर आई कि सैकड़ों वोटरों ने शिकायत की है। उनके नाम ड्राफ्ट में नहीं आए जबकि उन्होंने फॉर्म जमा किया था। इसके बावजूद उनके नाम को अनुपस्थित, शिफ्टेड और मृतक की सूची में डालकर मतदाता सूची से अलग कर दिया गया।
समाजवादी पार्टी ने चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई है। छिब्रामऊ के कलीम कुरैशी ने बताया कि उनकी मां रुसाना बेगम का नाम 2003 से वोटर लिस्ट में था लेकिन एसआईआर के बाद उनका नाम भी हटा दिया गया। ऐसे कितने केस होंगे जो सामने भी नहीं आ पाएंगे।
पश्चिम बंगाल ने क्या किया
पश्चिम बंगाल सरकार ने लॉजिकल फैलेसी के मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। कोर्ट ने स्क्रूटनी पर रोक लगाने से इनकार कर दिया लेकिन एक अहम बात कही। कोर्ट ने कहा कि सुधार पारदर्शी तरीके से होना चाहिए।
कोर्ट ने आदेश दिया कि लॉजिकल फैलेसी के सभी केसों के नाम बूथ से लेकर पंचायत स्तर पर सार्वजनिक रूप से लगाए जाएं। बंगाल सरकार को यह भी कहा गया कि वह चुनाव आयोग को और अधिक लोग उपलब्ध कराए। लेकिन यूपी में ऐसी कोई पारदर्शिता नहीं है।
बीएलओ पर दबाव और एफआईआर का डर
बीएलओ यानी बूथ लेवल ऑफिसर अक्सर स्कूल के टीचर होते हैं। इन पर पहले से ही काम का बोझ है। अब एसआईआर का भी जिम्मा इन्हीं के कंधों पर है। इनकी हालत खराब है लेकिन बोलने पर पाबंदी है।
इन पर एफआईआर की तलवार लटकी है। अगर यह डर न होता तो ये इतना कुछ बताते कि यकीन करना मुश्किल होता। एक साल का काम एक-दो महीने में करने का दबाव है। इसी वजह से काम में गड़बड़ियां हो रही हैं और आम वोटरों को नुकसान उठाना पड़ रहा है।
31 मार्च को आएगी अंतिम सूची
अंतिम रूप से कितने लोगों के नाम कटेंगे यह पता चलेगा 31 मार्च 2026 को जब फाइनल वोटर लिस्ट जारी होगी। तब तक करोड़ों लोगों को दस्तावेज जमा कराने हैं, अपील करनी है और अपना नाम बचाना है।
सवाल यह है कि क्या आप अपना नाम चेक कर रहे हैं। क्या आपको पता है कि आपको कौन सा फॉर्म भरना है। क्या आपके पास जरूरी दस्तावेज हैं। अगर नहीं तो अभी से तैयारी शुरू कीजिए क्योंकि वोट देने का अधिकार लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है और इसे खोना नहीं चाहिए।
मुख्य बातें (Key Points)
• 2 करोड़ 89 लाख वोटरों के नाम यूपी की ड्राफ्ट मतदाता सूची से बाहर हो गए क्योंकि उनके फॉर्म बीएलओ को नहीं मिले
• 2 करोड़ 22 लाख वोटर लॉजिकल फैलेसी की सूची में हैं और उनके नाम भी कट सकते हैं
• पंचायत और विधानसभा की वोटर लिस्ट में ग्रामीण वोटरों की संख्या में 3 करोड़ का अजीब फर्क है
• 31 मार्च 2026 को अंतिम सूची आएगी और तब तक करोड़ों वोटरों को दस्तावेज जमा कराने हैं
• विपक्षी दलों की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं जबकि बीजेपी के पास 10,000 करोड़ का फंड है













