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The News Air - NEWS-TICKER - गांजा, भांंग, चरस… एक ही पौधे से कैसे निकलते हैं तीन ‘नशे’, क्या है इनमें फर्क?

गांजा, भांंग, चरस… एक ही पौधे से कैसे निकलते हैं तीन ‘नशे’, क्या है इनमें फर्क?

The News Air Team by The News Air Team
शुक्रवार, 10 मई 2024
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गांजा, भांंग, चरस
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एक पौधा और कई तरह के नशे का साधन. कुछ एकदम सस्ता तो किसी की कीमत करोड़ों में. इस पौधे को हम सामान्य तौर पर भांग का पौधा या गांजा का पौधा यानी कैनबिस के नाम से जानते हैं. पाकिस्तान में चिकित्सा से जुड़ी जरूरतों के लिए इसे लीगल यानी कानूनी करार दिया गया है. इसी भांग के पौधे से खाने के लिए भांग, पीने के लिए गांजा और ज्यादा नशे के लिए चरस बनाई जाती है.

ऐसे में सवाल है कि आखिर एक पौधे से कैसे तीन तरह के नशे तैयार होते हैं. क्या होता है भांग, गांजा और चरस में अंतर?

भारत में पाई जाती है भांग की यह प्रजाति

भांग, गांजा और चरस जैसे तीन ड्रग्स देने वाले पौधे की भारत में पाई जाने वाली प्रजाति का साइंटिफिक नाम कैनबिस इंडिका है. इससे बनाए जाने वाले गांजे को ही मैरुआना या मर्जुआना, वीड, पॉट और हशीश के नाम से भी जाना जाता है. भांग बनाने के लिए आमतौर पर इसकी मादा प्रजाति के पौधे का इस्तेमाल किया जाता है. इसकी पत्तियों और बीजों को पीस लिया जाता है और इससे बने पेस्ट को भांग कहते हैं.

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इसे लोग सीधे खाते हैं या फिर ठंडई में डाल कर पीते हैं. भांग के पकौड़े भी बनाए जाते हैं. कहते हैं कि भांग जितनी ज्यादा पीसी जाती है, उतनी ही नशा करती है.

कैनबिस यानी भांग के पौधों की कलियों को संस्कृत में गांजा कहा गया है. इसके फूलों और पत्तियों को सुखा लिया जाता है. फिर बारीक कर तंबाकू की तरह चिलम या फिर सिगरेट में भरकर उसका धुआं पीया जाता है.

फूलों को रगड़-रगड़कर बनाई जाती है चरस

भांग के पौधे में पाए जाने वाले चिपचिपे पदार्थ को (resin) या राल कहते हैं. इसी से चरस तैयार की जाती है. इसके लिए भांग के फूलों को हाथ पर रगड़ा जाता है, जिससे काली परत जमती है. इस काली परत का इस्तेमाल चरस के रूप में किया जाता है. भारत, नेपाल, पाकिस्तान और लेबनान जैसे कई देशों में चरस को हाथों से रगड़ने का बाकायदा ढका-छिपा उद्योग चलता है.

भांग फूलों को तोड़कर घंटों रगड़ा जाता है. कहते हैं कि इसे रगड़ने की गति जितनी कम होती है, चरस की गुणवत्ता उतनी ही बेहतर होती है. भांग की कीमत सबसे कम होती है, जबकि चरस की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में लाखों रुपए तक पहुंच जाती है.

भांग की बिक्री के लिए लाइसेंस भी मिलता है

भारत के कई राज्यों में भी भांग की खेती को कानूनी रूप देने की मांग उठती रहती है. सामान्यतौर पर एनडीपीएस अधिनियम 1985 के अंतर्गत प्रतिबंधित माना जाता है पर औद्योगिक, शोध और चिकित्सीय इस्तेमाल के लिए इसकी छूट है. वहीं, उत्तर प्रदेश में लाइसेंस के जरिए भांग की बिक्री होती है. इसके लिए बाकायदा ठेके उठते हैं. कई राज्यों में कोई भी भांग खरीद सकता है और खुलेआम भांग की लस्सी बिकती है.

बिहार और पश्चिम बंगाल में भांग के उत्पादन की अनुमति है. वहीं, राजस्थान जैसे राज्य में भांग के उत्पादन की अनुमति नहीं है. उत्तराखंड में तो भांग की बाकायदा खेती की जाती है तो कुछ स्थानों पर यह बिना खेती के भी उगता है. हिमालय की तहलटी में जम्मू कश्मीर और पूर्व में असम में पाए जाने वाले भांग के पौधों से अच्छी गुणवत्ता की चरस बनती है.

अमेरिका में होता है कैंसर का इलाज

भले ही भांग, गांजा और चरस को हम ड्रग्स यानी नशे के साधन के रूप में जानते हैं पर इसका चिकित्सीय इस्तेमाल भी होता है. भांग के बीजों में भरपूर फाइबर, ओमेगा-3 फैटी एसिड, अमीनो एसिड भी होता है. अमेरिका तक में हुए शोधों में यह सिद्ध हो चुका है कि इसके औषधीय गुण ब्लड शुगर कंट्रोल करने से लेकर अग्नाशय के कैंसर और आर्थराइटिस से लेकर दिल की बीमारी को ठीक करने में सक्षम हैं. हालांकि, इसके लिए भांग का इस्तेमाल नियंत्रित तरीके से दवा के रूप में चिकित्सक की सलाह पर ही होना चाहिए.

कीमोथैरेपी के साइडइफेक्ट यानी भूख न लगना, उल्टी या नाक बहने की शिकायत को दूर करने के लिए भांग का इस्तेमाल किया जा सकता है. अमेरिका में कैंसर का इलाज कर रहे मरीजों को ऐसी दवा देने की मंजूरी है.

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