8th Pay Commission Railway Employees: रेलवे कर्मचारियों के लिए आठवें वेतन आयोग की चर्चा सिर्फ बेसिक सैलरी बढ़ने तक सीमित नहीं है। कर्मचारियों के TA, OT, एरियर, प्रमोशन, खाली पद, काम के घंटे, आवास, मेडिकल सुविधाएं और सुरक्षित वर्किंग कंडीशन जैसे मुद्दे भी उतने ही अहम हैं। नेशनल काउंसिल (NC-JCM) के जनरल सेक्रेटरी शिव गोपाल मिश्रा के मुताबिक, रेलवे बोर्ड के साथ हुई बैठक में करीब 140 मुद्दों में से लगभग 125 पर चर्चा हुई। इनमें कई मुद्दों पर आगे कार्रवाई का भरोसा मिला है।
देखा जाए तो यह बैठक रेलवे कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव थी। लेकिन सवाल यह है कि चर्चा होना और फैसला लागू होना—दोनों में कितना अंतर है? और आठवें वेतन आयोग के दौर में रेलवे कर्मचारियों की असली मांगें क्या हैं? उनका असर उनकी जेब और नौकरी दोनों पर कैसे पड़ सकता है?
पहला मुद्दा: 125 मुद्दों पर चर्चा हुई, लेकिन कितनों पर फैसला हुआ?
शिव गोपाल मिश्रा कहते हैं कि रेलवे बोर्ड के चेयरमैन और पूरे फुल बोर्ड के साथ हुई बैठक में कर्मचारियों से जुड़े करीब 140 मुद्दे रखे गए। इनमें लगभग 125 मुद्दों पर चर्चा हुई।
समझने वाली बात यह है कि सभी मुद्दे फाइनल नहीं हुए हैं, लेकिन कई मामलों में आगे बढ़ने की प्रक्रिया शुरू हुई है।
आठवें वेतन आयोग के संदर्भ में यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वेतन में बदलाव सिर्फ बेसिक पे तक सीमित नहीं होता। TA, OT, एरियर और दूसरे भत्ते भी कर्मचारियों की वास्तविक कमाई को प्रभावित करते हैं।
मिश्रा ने इन्हीं भुगतान से जुड़े मुद्दों को बोर्ड के सामने प्रमुखता से रखा।
दूसरा मुद्दा: रेलवे का बजट खर्च हो रहा है, फिर TA-OT क्यों अटका है?
इस पर शिव गोपाल मिश्रा ने कहा कि रेलवे बोर्ड की तरफ से बताया गया कि रेलवे के करीब 2.90 लाख करोड़ के बजट में से लगभग 95% खर्च किया जा चुका है। उनका कहना था कि यह रेलवे के कामकाज की गति को दिखाता है।
लेकिन दूसरी तरफ कर्मचारियों का TA और OT भुगतान अटका हुआ है। मिश्रा ने सवाल उठाया कि अगर रेलवे के पास बजट खर्च करने की क्षमता है और कर्मचारी लगातार काम कर रहे हैं, तो उनके वैध भुगतान में देरी क्यों होनी चाहिए?
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि आठवें वेतन आयोग के समय कर्मचारियों के लिए यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि बढ़ी हुई सैलरी के साथ समय पर भत्तों और बकाए का भुगतान भी उनकी वास्तविक आय का हिस्सा है।
तीसरा मुद्दा: खाली पद नहीं भरे गए तो 8वें वेतन आयोग का फायदा कैसे मिलेगा?
शिव गोपाल मिश्रा ने कहा कि मीटिंग में हमने रेलवे में बड़ी संख्या में खाली पदों को भरने की मांग उठाई। डिवीजन, वर्कशॉप और जोन स्तर पर वैकेंसी मौजूद है। लेकिन कई मामलों में भर्ती के लिए भेजे गए इंडेंट को रेलवे बोर्ड स्तर पर कम किया जा रहा है।
अगर गौर करें, तो रेलवे के सुचारू संचालन के लिए पर्याप्त कर्मचारी जरूरी हैं। अगर कर्मचारियों की संख्या कम रहेगी, तो मौजूदा कर्मचारियों पर काम का दबाव बढ़ेगा।
ऐसे में आठवें वेतन आयोग से वेतन में बदलाव होने के बावजूद, काम के घंटे और वर्क लोड का सवाल बना रहेगा।
चौथा मुद्दा: कैडर रिस्ट्रक्चरिंग क्यों एक बड़ा मुद्दा बना है?
शिव गोपाल मिश्रा ने कहा कि हमने कैडर रिस्ट्रक्चरिंग का मुद्दा भी रेलवे बोर्ड के सामने रखा। करीब 4 साल बाद बड़ी मुश्किल से एक सर्वसम्मत समझौता हुआ था। लेकिन उसे लागू करने की प्रक्रिया अभी पूरी तरह आगे नहीं बढ़ी है।
कैडर स्ट्रक्चर कर्मचारियों के प्रमोशन और करियर प्रोग्रेशन से सीधा जुड़ा है।
दिलचस्प बात यह है कि आठवें वेतन आयोग के दौर में सिर्फ वेतन संशोधन ही नहीं, बल्कि कर्मचारियों के पद, जिम्मेदारी और प्रमोशन की संभावनाएं भी महत्वपूर्ण होंगी। इसलिए यूनियन की तरफ से इसे अलग मुद्दे के रूप में उठाया गया है।
पांचवा मुद्दा: ट्रैकमैन से 20 KM की जगह 12 KM काम कराने की मांग क्यों?
शिव गोपाल मिश्रा ने कहा कि ट्रैकमैन की वर्किंग कंडीशन को लेकर PW मैनुअल में अधिकतम 20 किलोमीटर की सीमा का प्रावधान है। लेकिन यूनियन की मांग है कि ट्रैकमैन से 12 किलोमीटर से ज्यादा काम नहीं लिया जाना चाहिए।
रेलवे बोर्ड के सामने यह बात रखी गई है और इसे लागू करने की कोशिश की जाएगी। कुछ जगहों पर कर्मचारियों के संघर्ष के बाद यह व्यवस्था लागू भी हुई।
आठवें वेतन आयोग के संदर्भ में यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कर्मचारी की आय बढ़ने के साथ, काम का बोझ और वर्किंग कंडीशन भी चर्चा का हिस्सा बनते हैं।
छठा मुद्दा: रनिंग स्टाफ से 11-12 घंटे काम, कहीं 17 घंटे तक ड्यूटी क्यों?
शिव गोपाल मिश्रा ने कहा कि हमने रनिंग स्टाफ के काम के घंटे को लेकर भी बात रखी है। रेलवे में एक आदेश के तहत जरूरत पड़ने पर कर्मचारियों से 11 घंटे तक लगातार काम लेने और कुछ परिस्थितियों में 12 घंटे तक काम लेने की बात है।
उन्होंने दावा किया कि कुछ जगहों पर कर्मचारियों से 17-17 घंटे तक लगातार काम लिया जा रहा है। मिश्रा ने इसे सुरक्षा के लिहाज से भी उचित नहीं बताया।
उन्होंने रनिंग स्टाफ की प्रमोशन में देरी का मुद्दा भी उठाया। उनके मुताबिक पहले 36 घंटे के अंदर कर्मचारियों को वापस लाने का भरोसा दिया गया था। लेकिन कई बार 72 घंटे में भी ऐसा नहीं हो पाता।
सातवां मुद्दा: आउटसोर्सिंग पर रेलवे कर्मचारियों की आपत्ति क्यों है?
शिव गोपाल मिश्रा ने कहा कि हमने रेलवे में आउटसोर्सिंग का विरोध किया है। उनका तर्क है कि रेलवे में कई ऐसे काम हैं जिनका सीधा संबंध सुरक्षा से है। ऐसे कामों में प्रशिक्षित और कुशल रेलवे कर्मचारियों की भूमिका जरूरी है।
उन्होंने रेलवे बोर्ड के सामने मांग रखी कि सुरक्षा और संरक्षित प्रकृति वाले कामों में आउटसोर्सिंग कम की जाए और प्रशिक्षित कर्मचारियों की भर्ती की जाए।
आठवां मुद्दा: रनिंग स्टाफ के 70% TA हिस्से पर टैक्स का क्या मामला है?
शिव गोपाल मिश्रा कहते हैं कि रनिंग कर्मचारियों के ALK और किलोमीटर माइलेज को लेकर भी हमने बड़ी मांग रखी। उन्होंने बताया कि माइलेज में करीब 70% हिस्सा TA से और 30% हिस्सा खाने-रहने से जुड़ा माना जाता है।
मिश्रा के मुताबिक रेलवे बोर्ड इस सिद्धांत को स्वीकार करता है। उनकी मांग है कि स्लिप पर 70% और 30% हिस्से को अलग-अलग दिखाया जाए।
उनका कहना है कि अगर 70% हिस्से को TA के रूप में अलग दिखाया जाता है, तो उस हिस्से पर आयकर छूट का रास्ता स्पष्ट हो सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि अगर रेलवे को इस मामले में कोई दिक्कत है, तो CBDT के साथ बैठक कराई जाए। रेलवे बोर्ड ने इस पर विचार करने और CBDT के साथ बातचीत की कोशिश का भरोसा दिया है।
नौवां मुद्दा: रिटायरमेंट से पहले रिकवरी और पुराने भुगतान का क्या होगा?
शिव गोपाल मिश्रा ने कहा कि रिटायरमेंट के समय कर्मचारियों से पुराने भुगतान की रिकवरी का मुद्दा भी बैठक में उठाया गया। मिश्रा ने सवाल किया कि अगर कर्मचारी ने 36 से 40 साल नौकरी की है और रिटायरमेंट से एक-दो महीने पहले बताया जाता है कि कई साल पहले उसकी पे फिक्सेशन गलत थी, तो यह स्थिति क्यों बनती है?
उनके मुताबिक नियमों के तहत रिटायरमेंट से पहले सर्विस रिकॉर्ड की जांच होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी कर्मचारी को गलती से ज्यादा भुगतान हुआ है, तो सुप्रीम कोर्ट के रफीक मसीह फैसले और संबंधित सरकारी निर्देशों के तहत कई परिस्थितियों में ऐसी रिकवरी पर रोक का प्रावधान है।
इसके अलावा चाइल्ड केयर लीव से जुड़ी पुरानी रिकवरी का मुद्दा भी उठाया गया। मिश्रा के मुताबिक रेलवे ने पहले भुगतान किया और बाद में वर्षों बाद उसकी रिकवरी की बात सामने आई। उन्होंने इसे दोबारा समीक्षा करने और जरूरत पड़ने पर वेवर देने की मांग की है।
आठवें वेतन आयोग में रेलवे कर्मचारियों के लिए असली सवाल क्या है?
शिव गोपाल मिश्रा के बयान से साफ है कि रेलवे कर्मचारियों की मांगें केवल बेसिक पे बढ़ाने तक सीमित नहीं हैं। TA, OT का समय पर भुगतान, पुराने एरियर, खाली पदों पर भर्ती, कैडर रिस्ट्रक्चरिंग, प्रमोशन, काम के घंटे, ट्रैकमैन की सुरक्षा, रिटायरमेंट के समय रिकवरी जैसे मुद्दे भी उनकी आर्थिक स्थिति को प्रभावित करते हैं।
अब बड़ा सवाल यह है कि बैठक में उठाए गए मुद्दों में से कितनों पर वास्तव में फैसला होता है और उनका लाभ रेलवे कर्मचारियों तक कब पहुंचता है।
मुख्य बातें (Key Points)
- 140 मुद्दे रखे गए, 125 पर चर्चा हुई: लेकिन फाइनल फैसले अभी बाकी
- TA-OT भुगतान अटका: बजट का 95% खर्च होने के बावजूद कर्मचारियों का भुगतान लंबित
- खाली पद भरने की मांग: इंडेंट को बोर्ड स्तर पर कम किया जा रहा
- कैडर रिस्ट्रक्चरिंग: 4 साल बाद समझौता हुआ, लेकिन लागू नहीं
- ट्रैकमैन के काम की सीमा: 12 KM तक सीमित करने की मांग
- रनिंग स्टाफ: 17 घंटे तक ड्यूटी की शिकायत, सुरक्षा का सवाल
- आउटसोर्सिंग का विरोध: सुरक्षा से जुड़े कामों में प्रशिक्षित कर्मचारी जरूरी
- TA पर टैक्स छूट: 70% हिस्से को अलग दिखाने की मांग
- रिटायरमेंट से पहले रिकवरी: पुराने भुगतान की रिकवरी पर आपत्ति












