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The News Air - NEWS-TICKER - शंकर और विष्णु को मानने वालों में क्यों होती थी खूनी जंग, शंकराचार्य ने बनाए चार धाम तब हुए एक, केदारनाथ मंदिर क्यों नहीं है धाम

शंकर और विष्णु को मानने वालों में क्यों होती थी खूनी जंग, शंकराचार्य ने बनाए चार धाम तब हुए एक, केदारनाथ मंदिर क्यों नहीं है धाम

The News Air Team by The News Air Team
बुधवार, 17 जुलाई 2024
in NEWS-TICKER, राष्ट्रीय
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शंकर और विष्णु
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नई दिल्ली: बात आज से करीब 2000 साल पहले की है, जब केरल के एक दूरदराज के गांव में 8 साल के बच्चे ने देखा कि उसकी मां का नहाने के लिए गांव से काफी दूरी पर स्थित पूर्णा नदी तक जाना पड़ता है। हर बच्चे की तरह वह बच्चा भी अपनी मां को बेइंतिहा प्यार करता था। उस बच्चे ने इतनी कम उम्र में गांव से दूर बहने वाली नदी को गांव के पास मोड़ दिया। वह बालक थे आदि शंकराचार्य, जिन्होंने पूरे भारत को एकसूत्र में बांटने के लिए चारों दिशाओं में चार धाम या चार पीठ और 12 ज्योतिर्लिंगों की स्थापना की। यह वह दौर था, जब पूरे भारत में वैष्णव (आलवार) और शैव (नयनार) में खूनी लड़ाइयां हुआ करती थीं।

दोनों संप्रदायों के लोग एक-दूसरे का फूटी आंख भी नहीं देखना चाहते थे। शंकराचार्य ने इन दोनों में सुलह कराई और भारतीय परंपरा और संस्कृति को फिर से स्थापित किया। शंकराचार्य ने गोवर्धन पुरी मठ (जगन्नाथ पुरी), श्रंगेरी पीठ (रामेश्वरम्), शारदा मठ (द्वारिका) और ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ धाम) की स्थापना की थी। हाल ही में दिल्ली में श्रीकेदारनाथ धाम मंदिर बनाया जा रहा है। मगर, मंदिर के भूमि पूजन के साथ ही इसके नाम को लेकर विवाद हो रहा है। बुराड़ी में बन रहे इस केदारनाथ मंदिर के निर्माण को लेकर विवाद गहराने के बाद श्री केदारनाथ धाम दिल्ली ट्रस्ट ने ट्रस्ट और मंदिर का नाम बदलने का फैसला लिया है। आइए-समझते हैं कि धाम और मंदिर में क्या फर्क है और केदारनाथ मंदिर इन चारों धामों से कितना अलग है?

देश में स्थापित किए चार पीठ, जहां से बनते शंकराचार्य

इतिहासकार डॉ. दानपाल सिंह के अनुसार, दक्षिण भारत में 8वीं और 9वीं सदी में आलवारों और नयनारों में अपने-अपने संप्रदायों को लेकर खूब लड़ाइयां लड़ी जाती थीं। यहां तक कि मशहूर चोल साम्राज्य के शासक शैव धर्म को मानने वाले थे। डॉ. दानपाल के अनुसार, शंकराचार्य के चार पीठों की स्थापना से ही यह संघर्ष रुका और भारत में बौद्ध धर्म का असर भी कम हुआ। 8 साल की उम्र में चारों वेदों का ज्ञान हासिल करने वाले शंकराचार्य 12 साल की उम्र में अपनी मां से वचन लेकर ओंकारेश्वर से वेदांत के प्रचार के लिए निकले थे, जहां से वह ज्ञान लेकर काशी की ओर आगे बढ़े। 32 वर्ष की छोटी से आयु में ही शंकराचार्य ने देश के चार कोनों में चार मठों ज्योतिष्पीठ बदरिकाश्रम, श्रृंगेरी पीठ, द्वारिका शारदा पीठ और पुरी गोवर्धन पीठ की स्थापना की थी। इन चार पीठों में आसीन संन्यासी ‘शंकराचार्य’ कहे जाते हैं।

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उत्तर भारत के मंदिरों में रखे दक्षिण भारत के पुजारी

आदि शंकराचार्य ने कम उम्र में ही भारत की यात्रा की और चारों दिशाओं में चार पीठों की स्थापना की थी, जो चार धाम कहे जाते हैं। उन्होंने उत्तर भारत के हिमालय में स्थित बदरीनाथ धाम में दक्षिण भारत के ब्राह्मण पुजारी और दक्षिण भारत के मंदिर में उत्तर भारत के पुजारी को रखा। वहीं पूर्वी भारत के मंदिर में पश्चिम के पुजारी और पश्चिम भारत के मंदिर में पूर्वी भारत के ब्राह्मण पुजारी को रखा था। जिससे भारत चारों दिशाओं में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से मजबूत हो रूप से एकता के सूत्र में बंध सके।

सप्तपुरियों की यात्रा करने से मिलता है मोक्ष

शक्ति मंदिर, गोरखपुर में आचार्य कृतेश्वर शास्त्री कहते हैं कि गरुड़ पुराण के एक श्लोक में सात तीर्थस्थानों का वर्णन किया गया है:
अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका ।
पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः॥
अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, काञ्चीपुरम, अवंतिक (उज्जैन), द्वारिकापुरी, ये सात मोक्षदायी (पुरियां) हैं।)
कृतेश्वर शास्त्री कहते हैं कि स्कंद पुराण के तीर्थ प्रकरण में चार धाम यात्रा को महत्वपूर्ण माना गया है। चार धामों के दर्शन करने से हर तरह के पाप खत्म हो जाते हैं और सकारात्मक ऊर्जा भी बढ़ती है। ये चार धाम चार दिशाओं यानी उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वर, पूर्व में पुरी और पश्चिम में द्वारका हैं।

क्यों बनाए गए चार धाम, यह समझिए

दुर्गा मंदिर, गाजियाबाद में आचार्य विनोद शर्मा के अनुसार, प्राचीन तीर्थ स्थलों पर जाने से पौराणिक ज्ञान बढ़ता है। देवी-देवताओं से जुड़ी कथाएं और परंपराएं मालूम होती हैं। प्राचीन संस्कृति को जानने का मौका मिलता है। मंदिर के पंडित और आसपास रहने वाले लोगों से संपर्क होता है, जिससे अलग-अलग रीति-रिवाजों को जानने का अवसर मिलता है। भगवान और भक्ति से जुड़ी मान्यताओं की जानकारी मिलती है। जिसका लाभ दैनिक जीवन की पूजा में मिलता है। इसलिए चार धामों को अलग-अलग दिशाओं में स्थापित किया गया है।

बदरीनाथ धाम: नर-नारायण की होती है पूजा

यह तीर्थ बदरीनाथ के रूप में भगवान विष्णु को समर्पित है। अलकनंदा नदी के किनारे बसे इस मंदिर की स्थापना श्रीराम ने की थी। इस मंदिर में नर-नारायण की पूजा होती है और अखंड दीप जलता है, जो कि अचल ज्ञान ज्योति का प्रतीक है। यहां पर श्रद्धालु तप्तकुंड में स्नान करते हैं। बदरीनाथ मंदिर के कपाट अप्रैल के आखिरी या मई के शुरुआती दिनों में दर्शन के लिए खोल दिए जाते हैं। लगभग 6 महीने तक पूजा के बाद नवंबर के दूसरे सप्ताह में मंदिर के पट फिर से बंद कर दिए जाते हैं। यहां हर साल करीब 6 लाख श्रद्धालु आते हैं।

रामेश्वर धाम: जब भगवान राम ने की शिव की पूजा

रामेश्वर तीर्थ तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में समुद्र के किनारे स्थित है, जो भगवान शिव को समर्पित है। यहां शिवजी की पूजा लिंग रूप में की जाती है। माना जाता है कि भगवान राम ने ही इस रामेश्वरम् शिवलिंग की स्थापना की थी। यह शंकराचार्य के 12 ज्योतिर्लिंगों में से भी एक है। यह हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी से चारों ओर से घिरा हुआ एक सुंदर शंख जैसा द्वीप है।

पुरी धाम: जब भात खाने निकल पड़ते हैं भगवान

यह वैष्णव संप्रदाय का मंदिर है, जो भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण को समर्पित है। इस मंदिर में तीन मुख्य देवता, भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा है। ये तीर्थ गरुण पुराणों में बताई गई 7 पवित्र पुरियों में एक है। यहां हर साल रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है। इस आयोजन में दुनियाभर से भगवान श्रीकृष्ण के भक्त आते हैं। यहां मुख्य रूप से भात का प्रसाद चढ़ाया जाता है।

द्वारका धाम: पानी में समा गई यह नगरी

गुजरात के पश्चिमी सिरे पर समुद्र के किनारे बसी द्वारिका पुरी को चार धामों में से एक माना गया है। ये भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित तीर्थ है। ये तीर्थ पुराणों में बताई गई मोक्ष देने वाली सात पुरियों में से एक है। माना जाता है कि इसे श्रीकृष्ण ने बसाया था। स्थानीय लोगों और कुछ ग्रंथों के अनुसार असली द्वारका तो पानी में समा गई, लेकिन कृष्ण की इस भूमि को आज भी पूज्य माना जाता है। इसलिए द्वारका धाम में श्रीकृष्ण स्वरूप का पूजन किया जाता है।

मंदिर और धाम में क्या अंतर होता है, समझिए

आचार्य कृतेश्वर शास्त्री कहते हैं कि मंदिर उसे माना जाता है जहां देवी-देवता की प्राण प्रतिष्ठा होती है। वहीं, धाम में देवी और देवता का निवास होता है। उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित में केदारनाथ भगवान शिव का धाम है।

मंदिर बनाने का केदारनाथ में विरोध क्यों

उत्तराखंड की 70 फीसदी आबादी चारधाम यात्रा पर आश्रित है। हर साल यहां पर दिल्ली समेत दूसरे प्रदेशों से लाखों यात्री आते हैं, जो राजस्व का प्रमुख सोर्स है। ऐसे में अगर दिल्ली में इस तरह के नाम का मंदिर बन गया तो केदारनाथ यात्रा पर असर पड़ने का का डर है।

तो केदारनाथ धाम फिर क्या है

पुराणों के अनुसार, केदारनाथ धाम छोटा चारधाम में से एक है। यह हिंदू धर्म के हिमालय पर्वतों में स्थित पवित्रतम तीर्थ परिक्रमा मार्गों में से एक है। यह उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और चमोली जिलों में स्थित है। इस परिपथ के चार धाम हैं- बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री। इनमें से बदरीनाथ धाम भारत के चार धामों का भी उत्तरी धाम है।

केदारनाथ का पता हिमालय है, दिल्ली नहीं: अविमुक्तेश्वरानंद

ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इसका खुलकर विरोध कर रहे हैं। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि दिल्ली में प्रतीकात्मक केदारनाथ नहीं हो सकता। केदारनाथ हिमालय में है। यह दिल्ली में नहीं हो सकता। शंकराचार्य ने कहा, ‘कोई प्रतीकात्मक केदारनाथ नहीं हो सकता… शिवपुराण में 12 ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख किया गया है। नाम और स्थान के साथ… जब केदारनाथ का पता हिमालय में है, तो यह दिल्ली में कैसे हो सकता है?

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