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The News Air - Breaking News - Modi के भाषण में 121 बार Vande Mataram, लेकिन RSS का जिक्र शून्य!

Modi के भाषण में 121 बार Vande Mataram, लेकिन RSS का जिक्र शून्य!

एक घंटे के भाषण का विश्लेषण: नेहरू 7 बार, गांधी 6 बार, जिन्ना 3 बार आया लेकिन जनसंघ और संघ एक बार भी नहीं

The News Air Team by The News Air Team
सोमवार, 8 दिसम्बर 2025
in Breaking News, NEWS-TICKER, राष्ट्रीय, सियासत
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Vande Mataram
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PM Modi Vande Mataram Speech Analysis: संसद में वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने करीब एक घंटे का भाषण दिया। इस भाषण का जब शब्द-दर-शब्द विश्लेषण किया गया तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। 121 बार वंदे मातरम कहा गया, 7 बार नेहरू का जिक्र हुआ, 13 बार कांग्रेस बोला गया, लेकिन एक बार भी जनसंघ या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम नहीं आया। यह वही प्रधानमंत्री हैं जो खुद संघ के स्वयंसेवक और प्रचारक रह चुके हैं।


भाषण का पूरा विश्लेषण: कौन सा शब्द कितनी बार?

एक घंटे के इस भाषण में शब्दों का इस्तेमाल देखिए। वंदे मातरम 121 बार कहा गया। कंट्री यानी देश शब्द 50 बार निकलकर आया। भारत शब्द 35 बार आया। अंग्रेज शब्द 34 बार बोला गया। बंगाल का जिक्र 17 बार हुआ। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का जिक्र 10 बार आया।

जवाहरलाल नेहरू का जिक्र 7 बार हुआ। महात्मा गांधी शब्द 6 बार बोला गया। मुस्लिम लीग शब्द 5 बार कहा गया। जिन्ना का प्रयोग 3 बार किया गया। संविधान शब्द भी 3 बार आया। मुसलमान 2 बार और तुष्टीकरण भी 3 बार बोला गया। कांग्रेस 13 बार आया।

लेकिन एक बार भी जनसंघ शब्द नहीं आया। एक बार भी संघ यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम नहीं आया। और यह भाषण देने वाले देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं जो खुद स्वयंसेवक रह चुके हैं, प्रचारक रह चुके हैं और संघ के साथ उनका जुड़ाव अब भी है।


वंदे मातरम का असली अर्थ क्या है?

वंदे मातरम 1875 में लिखा गया। इसके बाद 1882 में आनंदमठ उपन्यास आया जिसमें बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की इस रचना को डाला गया। आनंदमठ एक कालजयी उपन्यास के तौर पर भारत के मानस पटल पर छा गया और वंदे मातरम भी लोगों के जेहन में आ गया।

14 अगस्त 1947 की संविधान सभा की बैठक में शुरुआती गीत यही था। 1950 में इसे राष्ट्रीय गीत बनाया गया। उससे पहले 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में पहली बार इसे गाया था।


श्री अरविंद घोष का हिंदी भावानुवाद

श्री अरविंद घोष जो योगी और दार्शनिक के तौर पर जाने जाते हैं, उन्होंने वंदे मातरम का जो हिंदी भावानुवाद लिखा है वह इस प्रकार है:

“हे मां तेरी धरती जल से भरपूर है। फल-फूल से लदी हुई है। मलय पर्वत की ठंडी सुगंध से शीतल है। खेतों में लहलहाती फसल से आच्छादित है।”

“तेरी रातें चांदनी से नहाकर पुलकित हो उठती हैं और वृक्ष खिले फूलों और पत्तों से सजे रहते हैं। तू मुस्कान बिखेरने वाली, मधुर वाणी बोलने वाली, सुख देने वाली है।”

“तेरे करोड़ों पुत्रों के गले से उठी आवाज गगन में गूंजती है और करोड़ों भुजाओं में तलवारें और अस्त्र-शस्त्र चमकते हैं। कौन कहता है कि तू निर्बल है मां? तू अपार शक्ति है। संकट से पार लगाने वाली है और शत्रुओं का नाश करने वाली है।”

“तू ही ज्ञान है, धर्म है, हृदय है और तू ही जीवन का सार है, तू प्राण है। भुजाओं की शक्ति है और हृदय की भक्ति है। हम तुझे ही पूजते हैं।”


वंदे मातरम के शब्द और देश की हकीकत

सवाल यह है कि वंदे मातरम में जो लिखा गया है, क्या इस देश की सरकारें उसके एक शब्द पर भी टिकती हैं? इस दौर में सब कुछ खत्म कर दिया गया, ध्वस्त कर दिया गया।

ना आप शुद्ध पानी दे पा रहे हैं, ना वायु बच पा रही है, ना ही जमीन की उर्वरा आप दे पाने की स्थिति में हैं, ना ही किसानों को आप साथ खड़ा कर पा रहे हैं। और ना ही संघर्ष के आश्रय इस देश के भीतर से उठते हुए सवाल संसद के गलियारे में पहुंच पाते हैं।


17,000 चार्टर्ड प्लेन और आम जनता की परेशानी

जिस वक्त इस देश का एक आम नागरिक हवाई यात्रा को लेकर परेशान था, उस वक्त यह जानना जरूरी है कि इस देश में कितने चार्टर्ड प्लेन हैं जो पार्लियामेंट्रियंस, नेताओं और सत्ता के लिए 24×7 मौजूद रहते हैं।

अलग-अलग हवाई अड्डों पर, जिसमें सबसे ज्यादा दिल्ली और मुंबई में मौजूद हैं, उसके बाद हैदराबाद और विशाखापट्नम आता है। कुल 17,000 चार्टर्ड प्लेन भारत के भीतर मौजूद हैं। राजनीति को और क्या चाहिए? जो उड़ान भर सकता है, उसके कोई सरोकार जनता से कैसे होंगे?

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प्रधानमंत्री का दावा: वंदे मातरम सिर्फ राजनीतिक आजादी का मंत्र नहीं था

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में कहा कि वंदे मातरम यह सिर्फ केवल राजनीतिक आजादी की लड़ाई का मंत्र नहीं था। सिर्फ अंग्रेज जाए और हम खड़े हो जाएं, अपने राह पर चलें – इतने मात्र तक वंदे मातरम प्रेरित नहीं करता था। उससे कहीं आगे था। कैसा है यह देश और कैसे बनेगा यह देश, इसकी चर्चा थी।

लेकिन सवाल यह है कि 2025 में खड़े होकर अगर उस दौर के नायकों को खलनायक बताया जा रहा है तो इससे ज्यादा विभत्स स्थिति कुछ हो नहीं सकती।


इतिहास के पन्ने पलटें तो क्या दिखता है?

जब 100 बरस वंदे मातरम के हुए, उसी वक्त इमरजेंसी लगी थी। जब 109 बरस हुए तब सिखों का नरसंहार हुआ था। जब 127 बरस हुए तो गुजरात में नरसंहार हुआ था।

किस-किस पत्थर को उठाकर उसके नीचे झांककर और वंदे मातरम को याद करते हुए मौजूदा देश की त्रासदी या उसके घाव में रिसते हुए उस खून और पस को देखकर आप शांति महसूस कर सकते हैं?


ममता बनर्जी ने क्या कहा?

बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि वंदे मातरम बंगाल से है। यह सॉन्ग नेशनल सॉन्ग है और जन गण मन नेशनल एंथम है। लेकिन वंदे मातरम का पूरा गाना कभी नहीं लिया गया था। ओनली रवींद्रनाथ टैगोर ने कुछ लाइन, सिलेक्टेड लाइन तैयार किया था। उसी के ऊपर में वंदे मातरम नेशनल सॉन्ग एक्सेप्टेड हुआ था।


महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने क्या कहा?

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने कहा कि यह भारत की स्वतंत्रता का मंत्र है, यह राष्ट्रवाद का मंत्र है। जिस वंदे मातरम को गाते हुए भारत के कई स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी फांसी पर झूल गए लेकिन उफ तक नहीं कहा। यह वह महामंत्र है।


संसद में वंदे मातरम नारे में तब्दील हो गया

वंदे मातरम का गान जब-जब हुआ, तब-तब खामोशी के साथ लोग खड़े हो गए, मौन हो गए, सुनने लगे। वो चाहे रवींद्रनाथ टैगोर ने 1896 में कांग्रेस के अधिवेशन में गीत गाया हो या फिर संविधान सभा की शुरुआत में जब वंदे मातरम गाया गया तब का दृश्य हो।

लेकिन नया नजारा कुछ और था। प्रधानमंत्री पार्लियामेंट की सीढ़ियां चढ़ते हुए आ रहे थे और वंदे मातरम नारे में तब्दील हो गया। “वंदे मातरम, वंदे मातरम” के नारे लग रहे थे।


भारत की आय का सच

दुनिया के भीतर सबसे कम जिन लोगों की आय है, उस कतार में भारत के 82% लोग खड़े हैं। दुनिया के सबसे रईस लोगों की कतार में जो भारत के 50 लोग खड़े हैं, उनकी तुलना में भारत के यह 82% लोग जो संख्या के लिहाज से तकरीबन 100 करोड़ से ज्यादा हैं।

कॉर्पोरेट का नेटवर्थ बढ़ता चला जाता है, जीडीपी से ज्यादा बड़ी रफ्तार उसकी है। जो ग्रोथ है वो कॉर्पोरेट का हो रहा है। लेकिन सांसदों की रफ्तार भी कॉर्पोरेट से कम नहीं है।


लोकतंत्र के चारों स्तंभ का हाल

वो न्यायपालिका हो, विधायिका हो, कार्यपालिका हो, मीडिया ही क्यों ना हो – हर स्तंभ अगर धराशाई है तो फिर वंदे मातरम संसद के भीतर गाने से क्या होगा?

उस दौर में करप्शन अंडर टेबल था, इस दौर में करप्शन सिस्टम का हिस्सा है। उस दौर में जांच एजेंसियां प्रीमियर कहलाती थीं, लेकिन अब प्रीमियर जांच एजेंसियां सरकार बनी रहे इसके लिए काम करती हैं।


क्या है पृष्ठभूमि?

वंदे मातरम 1875 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखा गया था। 1882 में यह आनंदमठ उपन्यास में प्रकाशित हुआ। 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में पहली बार गाया। 14 अगस्त 1947 को संविधान सभा की बैठक इसी गीत से शुरू हुई और 1950 में इसे राष्ट्रीय गीत घोषित किया गया। लेकिन पूरा वंदे मातरम कभी नहीं लिया गया, रवींद्रनाथ टैगोर ने जो कुछ चुनी हुई पंक्तियां तैयार की थीं, वही राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार हुईं।


मुख्य बातें (Key Points)
  • भाषण का विश्लेषण: एक घंटे के भाषण में 121 बार वंदे मातरम, 13 बार कांग्रेस, 7 बार नेहरू लेकिन एक बार भी RSS या जनसंघ का नाम नहीं।
  • 17,000 चार्टर्ड प्लेन: जब आम जनता हवाई यात्रा में परेशान है, नेताओं के लिए 17,000 चार्टर्ड प्लेन 24×7 उपलब्ध हैं।
  • आय का अंतर: भारत के 82% लोग (100 करोड़ से ज्यादा) दुनिया की सबसे कम आय वाली कतार में हैं जबकि टॉप 50 भारतीय दुनिया के सबसे अमीरों में हैं।
  • वंदे मातरम का सच: पूरा गीत कभी राष्ट्रगीत नहीं बना, रवींद्रनाथ टैगोर की चुनी हुई पंक्तियां ही स्वीकार हुईं।

 

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