Iran Iraq War की कहानी आज इसलिए और प्रासंगिक हो गई है क्योंकि मिडिल ईस्ट में एक बार फिर ईरान और अमेरिका आमने-सामने खड़े हैं। लेकिन यह दुश्मनी कोई नई नहीं है। इसकी जड़ें दशकों पुरानी हैं। 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई, अमेरिका समर्थित शाह की सत्ता पलटी और अयातुल्लाह खुमैनी सत्ता में आए। इसके ठीक एक साल बाद इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला कर दिया और अमेरिका ने खुलकर सद्दाम का साथ दिया। हथियार दिए, अरबों डॉलर का कर्ज दिया, सैटेलाइट इमेज शेयर कीं और CIA के अधिकारियों को बगदाद भेजकर रियल टाइम में युद्ध की रणनीति बनवाई। लेकिन सवाल यह है कि अमेरिका ने ऐसा क्यों किया? इसकी पूरी कहानी बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाली है।
1979 की इस्लामिक क्रांति: जब ईरान ने अमेरिका को धक्का दिया
Iran Iraq War की कहानी समझने के लिए सबसे पहले 1979 में जाना होगा। उस समय ईरान में अमेरिका समर्थित शाह ऑफ ईरान का शासन था। शाह अमेरिका का करीबी सहयोगी था और मिडिल ईस्ट में अमेरिकी हितों का रखवाला। लेकिन 1979 में ईरान की जनता ने एकजुट होकर शाह को उखाड़ फेंका और एक धार्मिक नेता अयातुल्लाह खुमैनी को सत्ता में ला दिया।
यह अमेरिका के लिए जबरदस्त झटका था। उसका सबसे भरोसेमंद सहयोगी रातोंरात दुश्मन बन गया। लेकिन इस क्रांति का असर सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहा। इसने पूरे मिडिल ईस्ट में भूचाल ला दिया, खासकर ईरान के पड़ोसी देश इराक में।
सद्दाम हुसैन क्यों घबरा गया: शिया क्रांति का डर
Iran Iraq War का सबसे बड़ा कारण सद्दाम हुसैन का वह डर था जो ईरान की इस्लामिक क्रांति ने पैदा किया। इराक एक ऐसा देश था जहां आबादी में शिया मुसलमान बहुसंख्यक थे, लेकिन सत्ता पर एक सुन्नी तानाशाह सद्दाम हुसैन का कब्जा था। ठीक उसके बगल में ईरान में शिया बहुसंख्यक जनता ने अपने सेकुलर तानाशाह को हटाकर एक धार्मिक नेता को सत्ता सौंप दी थी।
सद्दाम को सबसे बड़ा डर यही था कि कहीं ईरान जैसा “मॉडल” इराक में भी दोहराया न जाए। अगर इराक की शिया आबादी भी ईरान से प्रेरित होकर विद्रोह कर देती, तो सद्दाम की सत्ता का अंत तय था।
अयातुल्लाह खुमैनी की खुली धमकी: “क्रांति सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं”
सद्दाम का डर और गहरा तब हो गया जब अयातुल्लाह खुमैनी ने सत्ता में आते ही खुलेआम धमकी देना शुरू कर दिया। खुमैनी ने कहा कि “हमारी जिम्मेदारी सिर्फ ईरान की सीमा तक सीमित नहीं है। हमारी जिम्मेदारी है कि हम ईरान की इस्लामिक क्रांति को पूरी दुनिया के मजलूम लोगों तक पहुंचाएं।”
यह लाइन भले ही सुनने में सामान्य लगे, लेकिन यह मिडिल ईस्ट के हर तानाशाह के लिए सीधी चेतावनी थी। सत्ता में आने के बाद खुमैनी की हर स्पिच में “सुदूर-ए-इंकलाब” यानी “क्रांति का निर्यात” का नारा बुलंद होता था। इसका साफ मतलब था कि ईरान अपनी क्रांति को दूसरे देशों में भी फैलाना चाहता था।
इनफैक्ट, खुमैनी ने एक कदम और आगे बढ़ते हुए इराक की शिया मुस्लिम आबादी से सीधी अपील कर डाली। उन्होंने कहा कि “तुम सब एक होकर इस सुन्नी एलीट डॉमिनेटेड बाथ पार्टी की सरकार को हटाकर सत्ता अपने हाथ में ले लो।” यह सद्दाम के लिए किसी घोषित युद्ध से कम नहीं था।
शत अल-अरब नदी: जिसने आग में घी का काम किया
Iran Iraq War की एक और बड़ी वजह थी शत अल-अरब नदी का विवाद। यह लगभग 200 किलोमीटर लंबी नदी ईरान और इराक की सीमा पर बहती थी और दोनों देशों के लिए बेहद महत्वपूर्ण थी।
अगर मानचित्र पर देखें तो ईरान के पास तो कई समुद्री रास्ते थे, लेकिन इराक के लिए यह नदी ही एकमात्र समुद्री मार्ग थी। इराक का सारा तेल निर्यात इसी नदी के रास्ते पर्शियन गल्फ तक पहुंचता था। अगर ईरान इस नदी पर कब्जा कर लेता, तो जब चाहे तब इराक का गला घोंट सकता था।
पहले जब ईरान में अमेरिका समर्थित शाह की सरकार थी, तब अमेरिका ने दोनों देशों के बीच अल्जीयर्स समझौता करवा दिया था, जिसमें तय हुआ कि दोनों देश इस नदी को आधा-आधा इस्तेमाल करेंगे। लेकिन अब सब कुछ बदल चुका था। ईरान में शाह हट चुका था और खुमैनी आ चुके थे। सद्दाम की नजर इस नदी पर पहले से थी, लेकिन जब तक अमेरिका ईरान के साथ था, वह कुछ नहीं कर सकता था। अब स्थिति उलट चुकी थी: अमेरिका खुद ईरान का दुश्मन बन चुका था और इराक की तरफ आ गया था।
22 सितंबर 1980: जब सद्दाम ने ईरान पर हमला कर दिया
Iran Iraq War की शुरुआत का पल आखिरकार आ गया। सद्दाम को लगा कि यह ईरान पर हमला करने का सबसे सही समय है। उसकी गणना थी कि ईरान में अभी-अभी तख्तापलट हुआ है, नई सरकार कमजोर है, सेना अस्त-व्यस्त है और ऊपर से अमेरिका का भी पूरा सपोर्ट मिलेगा क्योंकि अमेरिका भी खुमैनी को हटाना चाहता था।
17 सितंबर 1980 को सद्दाम ने पहला कदम उठाते हुए अल्जीयर्स समझौते को रद्द करने की घोषणा कर दी। उसने कहा कि पूरी शत अल-अरब नदी अब इराक की है। और फिर 22 सितंबर 1980 को इराक ने पूरी ताकत से ईरान पर हमला कर दिया।
सद्दाम को भरोसा था कि कुछ ही दिनों में ईरान घुटने टेक देगा। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ। ईरान ने जबरदस्त प्रतिरोध किया। धीरे-धीरे स्थिति इराक के लिए मुश्किल होती गई और जो जंग कुछ हफ्तों में खत्म होनी थी, वह सालों तक खिंचती चली गई।
जब अमेरिका ने खुलकर सद्दाम का साथ दिया
Iran Iraq War में जब सद्दाम ईरान को हरा नहीं पा रहा था और एक गतिरोध (स्टेलमेट) जैसी स्थिति बन गई, तब अमेरिका ने खुलकर सद्दाम के सपोर्ट में आने का फैसला किया। अमेरिका ने जो मदद दी, वह किसी भी मायने में मामूली नहीं थी।
सबसे पहले, अमेरिका ने सद्दाम को भारी मात्रा में हथियारों की आपूर्ति की। हेलीकॉप्टर और लड़ाकू जेट विमान उपलब्ध कराए गए। इसके अलावा 5 बिलियन डॉलर (लगभग 5 अरब डॉलर) का अलग से कर्ज दिया गया ताकि सद्दाम युद्ध जारी रख सके।
लेकिन अमेरिका की सबसे बड़ी मदद खुफिया जानकारी के रूप में थी। अमेरिका ने अपनी सैटेलाइट इमेज सीधे सद्दाम के साथ शेयर कीं। इसका मतलब यह था कि सद्दाम के पास ईरानी सेना की एक-एक हरकत, हर मूवमेंट की पूरी जानकारी रियल टाइम में उपलब्ध थी।
CIA के अधिकारी बगदाद में बैठकर बना रहे थे रणनीति
Iran Iraq War में अमेरिकी मदद का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह था कि CIA के अधिकारी खुद बगदाद में पहुंचकर रियल टाइम में सद्दाम को टैक्टिकल एडवाइस दे रहे थे। यानी अमेरिका सिर्फ हथियार और पैसे नहीं दे रहा था, बल्कि युद्ध की रणनीति भी वहीं बैठकर बनवा रहा था।
इस पूरे ऑपरेशन की जिम्मेदारी CIA के तत्कालीन डायरेक्टर विलियम केसी और डिप्टी डायरेक्टर रॉबर्ट गेट्स को सौंपी गई थी। ये दोनों सुनिश्चित कर रहे थे कि इराक किसी भी हालत में ईरान से यह जंग जीत जाए।
यह बात कोई अफवाह नहीं है। 2013 में जो CIA के डीक्लासिफाइड दस्तावेज और फॉरेन पॉलिसी रिपोर्ट सामने आई, उनमें यह सारी जानकारी विस्तार से दर्ज है कि अमेरिका ने किस हद तक सद्दाम की मदद की थी।
फिर भी ईरान नहीं झुका: अमेरिका और सद्दाम की गलत गणना
Iran Iraq War में अमेरिका और सद्दाम दोनों की सबसे बड़ी गलतफहमी यह थी कि ईरान जल्दी हार मान लेगा। लेकिन इतनी भारी-भरकम मदद के बावजूद ईरान ने घुटने नहीं टेके। युद्ध एक गतिरोध में बदल गया, जहां कोई भी पक्ष निर्णायक जीत हासिल नहीं कर पा रहा था।
इसके साथ ही इराक के अंदर भी मुश्किलें बढ़ने लगीं। इराक में कई ऐसे शिया बहुसंख्यक इलाके थे जहां ईरान जाकर स्थानीय लोगों का सपोर्ट ले रहा था। इन इलाकों में सद्दाम के खिलाफ बातें होने लगीं, जो सद्दाम के लिए एक नया खतरा बन गया। वही डर जिसकी वजह से सद्दाम ने ईरान पर हमला किया था, वह अब हकीकत बनने लगा था।
यह जंग आठ साल तक चली और अनुमानित 10 लाख से ज्यादा लोगों की जान गई। आखिरकार 1988 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से युद्धविराम हुआ, लेकिन किसी को भी कोई निर्णायक जीत नहीं मिली।
आज भी क्यों मायने रखती है यह कहानी
Iran Iraq War की यह कहानी आज इसलिए बेहद प्रासंगिक है क्योंकि मिडिल ईस्ट में एक बार फिर वही तनाव दिख रहा है। अमेरिका और ईरान आज भी आमने-सामने हैं। इज़राइल ने ईरान के साउथ पार्स गैस फील्ड पर हमला किया है, ईरान ने जवाबी कार्रवाई की है और ट्रंप धमकियां दे रहे हैं। इतिहास गवाह है कि जब भी अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में किसी की तरफदारी करके हस्तक्षेप किया, नतीजे विनाशकारी रहे। ईरान-इराक युद्ध में अमेरिका ने सद्दाम को ताकतवर बनाया, और बाद में उसी सद्दाम को हटाने के लिए 2003 में इराक पर हमला करना पड़ा। यह दिखाता है कि अल्पकालिक भू-राजनीतिक स्वार्थ कैसे दीर्घकालिक तबाही का कारण बनते हैं। भारत के लिए भी यह एक बड़ा सबक है कि ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन दोनों को साधना कितना जरूरी है।
मुख्य बातें (Key Points)
- 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई, अमेरिका समर्थित शाह को हटाकर अयातुल्लाह खुमैनी सत्ता में आए, जिसने पूरे मिडिल ईस्ट की राजनीति बदल दी।
- सद्दाम हुसैन को डर था कि ईरान की शिया क्रांति इराक में भी फैल सकती है, इसलिए उसने 22 सितंबर 1980 को ईरान पर हमला कर दिया।
- अमेरिका ने सद्दाम को हथियार, हेलीकॉप्टर, लड़ाकू जेट, 5 बिलियन डॉलर का कर्ज, सैटेलाइट इमेज और CIA की रियल टाइम टैक्टिकल एडवाइस देकर पूरी ताकत से सपोर्ट किया।
- ईरान इतनी भारी मदद के बावजूद नहीं झुका, युद्ध 8 साल तक चला और 10 लाख से ज्यादा लोगों की जान गई, लेकिन किसी को निर्णायक जीत नहीं मिली।








