US Supreme Court Trump Tariff Ruling — अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जोरदार झटका देते हुए उनके टैरिफ को अवैध करार दे दिया है। सीनेट की इमारत के ठीक सामने बने सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों ने इस मामले की सुनवाई की, जिसमें 6-3 के बहुमत से फैसला सुनाया गया कि 1977 के IEEPA (International Emergency Economic Powers Act) कानून का इस्तेमाल कर बिना कांग्रेस की मंजूरी के टैरिफ लगाना पूरी तरह अवैध है। चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स ने यह फैसला लिखा। इस एक फैसले ने ट्रंप की उस “टैरिफ दादागिरी” पर पूर्ण विराम लगा दिया है, जिसने भारत समेत पूरी दुनिया को महीनों तक परेशान रखा था।
‘कोर्ट ने साफ कहा — IEEPA से टैरिफ लगाने का हक नहीं’
जस्टिस रॉबर्ट्स ने अपने फैसले में स्पष्ट लिखा कि IEEPA कानून में टैरिफ और ड्यूटीज का कोई जिक्र ही नहीं है। ट्रंप प्रशासन कोर्ट में ऐसे किसी भी कानून का हवाला नहीं दे पाया जिसके आधार पर कांग्रेस ने राष्ट्रपति को टैक्सेशन की अनुमति दी हो। फैसले में लिखा गया कि ट्रंप ने इस कानून के एक सेक्शन में आए दो शब्दों — “रेगुलेट” और “इंपोर्टेशन” — का सहारा लेकर खुद को कभी भी, कितना भी टैरिफ लगाने की असीमित शक्ति दे ली थी। लेकिन इन दोनों शब्दों के बीच 16 और शब्द आते हैं, और सिर्फ दो शब्दों में इतनी शक्ति नहीं कि राष्ट्रपति उसका हवाला दे सकें। कोर्ट ने यह भी कहा कि आज तक किसी भी राष्ट्रपति ने इस कानून का इस्तेमाल खुद को इतनी शक्तियां देने के लिए नहीं किया था।
फैसले के समर्थन में रहे छह जजों में से दो की नियुक्ति खुद ट्रंप के पहले कार्यकाल में हुई थी और चार जज महिलाएं थीं। असहमति जताने वाले तीनों जज कंजर्वेटिव हैं और इनमें से एक जस्टिस ब्रेट कैवनो ने अपनी असहमति में रूस और भारत का जिक्र करते हुए लिखा कि भारत रूस से तेल खरीद रहा था। कैवनो ने यह भी लिखा कि टैरिफ रद्द करने के बाद वसूला गया पैसा लौटाना पड़ सकता है।
‘ट्रंप के पास अब क्या विकल्प बचे हैं?’
ट्रंप भले ही मीडिया के सामने यह जताने की कोशिश करें कि उन पर कोई असर नहीं पड़ा, लेकिन हकीकत यह है कि उनके हाथ से वह चाबुक छिन गया है जिससे वे पूरी दुनिया को हांक रहे थे। अब ट्रंप के पास कुछ सीमित विकल्प हैं, लेकिन उनमें से कोई भी पहले जैसा “इंस्टेंट” नहीं है।
पहला विकल्प है ट्रेड एक्ट ऑफ 1974 का सेक्शन 122, जिसके तहत ट्रंप 150 दिनों तक अधिकतम 15% टैरिफ लगा सकते हैं — वो भी तभी जब किसी देश के साथ व्यापारिक घाटा बहुत ज्यादा हो। लेकिन इसके लिए कांग्रेस से मंजूरी लेनी होगी और इसे भी कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। दूसरा विकल्प है सेक्शन 301, जिसमें 150 दिनों का नोटिस पीरियड है। इसके तहत जिस देश के खिलाफ “अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस” का आरोप लगाना हो, उसकी पहले जांच करनी होगी, रिपोर्ट सार्वजनिक करनी होगी, और तब जाकर टैरिफ लगाया जा सकेगा। यानी कम से कम 5 महीने का इंतजार। तीसरा विकल्प है स्मूट-हॉली टैरिफ एक्ट ऑफ 1930 का सेक्शन 338, जिसका आज तक किसी राष्ट्रपति ने इस्तेमाल नहीं किया।
अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ के खिलाफ फैसला नहीं दिया, सिर्फ यह कहा कि IEEPA का इस्तेमाल नहीं हो सकता। राष्ट्रपति के पास सेक्शन 232, 301 और 122 जैसे विकल्प हैं। ट्रंप ने भी कहा कि सेक्शन 122 का इस्तेमाल कर मौजूदा टैरिफ पर 10% और जोड़ देंगे। लेकिन सच यह है कि सेक्शन 122 में अधिकतम 15% की ही सीमा है। इसलिए ट्रंप का 90% या 70% टैरिफ बरकरार रखने का दावा खोखला नजर आता है।
‘भारतीय मूल के नील कात्याल — जिन्होंने ट्रंप के खिलाफ लड़ाई जीती’
इस ऐतिहासिक फैसले के पीछे एक नाम है जो हर भारतीय को गर्व से भर देगा — नील कात्याल। भारतीय मूल के माता-पिता की संतान, शिकागो में जन्मे नील पेशे से वकील हैं। वे जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी में कानून पढ़ाते हैं और बराक ओबामा प्रशासन के दौरान कार्यवाहक सॉलिसिटर जनरल रह चुके हैं। नील अमेरिका के छोटे व्यापारियों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में अपने ही राष्ट्रपति के खिलाफ मुकदमा लड़ रहे थे — उसी राष्ट्रपति के खिलाफ जो इमीग्रेंट्स को देश से निकालने की धमकी दिन-रात देते रहते हैं।
फैसले के बाद नील ने एक बयान जारी किया — “आज सुप्रीम कोर्ट कानून के शासन और हर जगह रहने वाले अमेरिकियों के लिए खड़ा हुआ है। कोर्ट का संदेश बहुत सिंपल है — राष्ट्रपति ताकतवर हैं, लेकिन हमारा संविधान और भी ज्यादा ताकतवर है।” नील ने उन पांच छोटे बिजनेस ओनर्स का भी शुक्रिया अदा किया जिन्होंने ट्रंप के टैरिफ का विरोध करने की हिम्मत दिखाई। उन्होंने कहा कि इन लोगों ने हजारों व्यापारियों और करोड़ों उपभोक्ताओं को राहत दिलवाई। एक इमीग्रेंट के बेटे का दुनिया के सबसे ताकतवर व्यक्ति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जाना और जीतना — यह अमेरिका की न्याय व्यवस्था की प्रतिष्ठा को पूरी दुनिया में कायम करता है।
‘कंपनियों और राज्यों ने भी खोला था मोर्चा’
अमेरिका में ट्रंप के टैरिफ के खिलाफ सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरा तंत्र खड़ा हो गया था। अप्रैल 2025 में टैरिफ लागू होने के बाद 12 राज्य सीधे सुप्रीम कोर्ट चले गए — ओरेगॉन, कोलरेडो, कनेक्टिकट, डेलावेयर, इलिनॉय, मेन, मिनेसोटा, नेवाडा, न्यू मेक्सिको, न्यूयॉर्क और वरमॉन्ट। इन सबका कहना था कि ट्रंप के फैसले ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल मचा दी है।
राज्यों के अलावा हजारों कंपनियों ने भी कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। CNN की रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 3 लाख कंपनियों ने 134 अरब डॉलर के रिफंड की मांग की है। इनमें चीन की BYD, फैशन कंपनी प्राडा, टॉम फोर्ड, ऑफिस सप्लाई की कंपनी स्टेपल्स, डोल फ्रेश फ्रूट, कैमरा कंपनी GP, किताबें बेचने वाली बार्न्स एंड नोबल, गुडईयर टायर एंड रबर, कॉस्टको होलसेल, मेकअप कंपनी रेवलॉन और टोयोटा की सब्सिडियरीज जैसी बड़ी कंपनियां शामिल हैं। इन सभी की जीत हुई है।
फैसला आने के कुछ ही घंटों बाद इलिनॉय के गवर्नर जेबी प्रिट्सकर ने ट्रंप प्रशासन को 9 अरब डॉलर का बिल भेज दिया। येल यूनिवर्सिटी के एक विश्लेषण के मुताबिक ट्रंप के टैरिफ की वजह से हर अमेरिकी परिवार को औसतन 700 डॉलर अतिरिक्त खर्च करने पड़े। अलग-अलग अनुमानों के मुताबिक अमेरिका को कुल 175 अरब डॉलर वापस करने पड़ सकते हैं। रिफंड को लेकर 1800 से अधिक मामले पहले ही दायर हो चुके हैं और अब इनमें भारी बढ़ोतरी होने की संभावना है।
‘भारत पर क्या पड़ेगा असर?’
भारत और अमेरिका के बीच अभी ट्रेड डील नहीं हुई है — सिर्फ एक फ्रेमवर्क तैयार हुआ है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का ताजा बयान है कि अप्रैल तक ही डील लागू हो पाएगी। वाइट हाउस ने कहा है कि जब तक कोई और आदेश नहीं आ जाता, भारत 10% टैरिफ देगा। ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी साफ कहा कि “कुछ नहीं बदलता — भारत टैरिफ देगा, अमेरिका नहीं।”
ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए कहा कि “मोदी ग्रेट जेंटलमैन हैं, लेकिन पहले वो हमें ‘रिप’ कर रहे थे। अब हमने डील पलट दी है — अब इंडिया टैरिफ देगा, हम नहीं।” यह बयान भारत के लिए चिंता का विषय है क्योंकि इससे यह संदेश जाता है कि भारत ने ट्रेड डील में अमेरिका के सामने समर्पण किया।
कांग्रेस के मीडिया प्रभारी पवन खेड़ा ने कहा कि अगर प्रधानमंत्री मोदी 18 दिन और इंतजार करते और दबाव में जल्दबाजी में डील नहीं करते, तो इस एकतरफा डील को साइन नहीं करना पड़ता। खेड़ा ने सवाल उठाया कि 2 फरवरी की देर रात को प्रधानमंत्री ने वाशिंगटन फोन क्यों किया और भारत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करने की अपनी रणनीति क्यों छोड़ दी। खेड़ा ने यह भी कहा कि 10% के ब्लैंकेट टैरिफ से भारत को अपने प्रतिस्पर्धी देशों से जो 1-2% का फायदा मिल रहा था, वह भी अब खत्म हो गया क्योंकि उन देशों ने न तो अमेरिकी सामानों पर जीरो टैरिफ किया, न रूस से सस्ता तेल खरीदने के मामले में पीछे हटे और न ही 5 साल में 500 बिलियन डॉलर का आयात करने का वादा किया।
राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा कि “प्रधानमंत्री मोदी ने समझौता कर लिया। उन्होंने जो धोखा दिया वो अब सबके सामने है। प्रधानमंत्री कोई मोलभाव नहीं कर सकते — उन्होंने फिर से सरेंडर कर दिया है।” फैसले के तुरंत बाद भारत की तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई।
‘भारत का सुप्रीम कोर्ट बनाम अमेरिका का सुप्रीम कोर्ट — एक जरूरी सवाल’
अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने महज 10 महीने में अपने ही राष्ट्रपति को संविधान के दायरे में जगह दिखा दी। इसकी तुलना भारत से करें तो तस्वीर बदल जाती है। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रोरल बॉन्ड के मामले में फैसला देने में पूरे 7 साल लगा दिए। एडीआर (Association for Democratic Reforms) ने सितंबर 2017 में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि कम से कम 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले बॉन्ड पर रोक लगा दी जाए, लेकिन 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा — रोक नहीं लगेगी। सुनवाई शुरू हुई अक्टूबर 2023 में और फैसला आया फरवरी 2024 में।
इलेक्ट्रोरल बॉन्ड को असंवैधानिक ठहराए जाने के बावजूद आज तक इस बात की जांच नहीं हुई कि बीजेपी को हजारों करोड़ का चंदा देने के बदले कंपनियों को क्या-क्या लाभ मिला। अमेरिका में सुप्रीम कोर्ट अवैध ठहराता है तो रिफंड की चर्चा शुरू हो जाती है — भारत में अवैध बॉन्ड के जरिए लिए गए चंदे को वापस करने की बात ही नहीं होती। क्या भारत में कोई कंपनी सरकार के खिलाफ इस तरह केस दायर कर सकती है? अमेरिका में 3 लाख कंपनियों ने अपने ही राष्ट्रपति को कोर्ट में खींच लिया — भारत में चुपचाप सब चंदा देते रहे और लाभ भी लेते रहे।
यह फैसला दुनिया भर के सुप्रीम कोर्ट्स को एक संदेश देता है — उनका काम नेताओं के प्रभाव में ढलना नहीं, बल्कि संविधान के प्रभाव को नेताओं पर बनाए रखना है। महान फैसले वही होते हैं जो करोड़ों लोगों में इंसाफ की उम्मीद जगा दें और उनमें यह साहस भर दें कि वे किसी भी ताकतवर के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
‘जानें पूरा मामला’
ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद 1977 के IEEPA कानून का सहारा लेकर दुनिया भर के देशों पर भारी-भरकम टैरिफ थोपने शुरू कर दिए थे। कभी भारत पर रूस से तेल खरीदने के लिए 25% टैरिफ लगाते, कभी कनाडा के खिलाफ 100% टैरिफ की धमकी देते और कभी ग्रीनलैंड के बहाने यूरोप को निशाने पर लेते। फैसले से एक दिन पहले तक वे भारत और पाकिस्तान पर 200% टैरिफ लगाने की शेखी बघार रहे थे। अप्रैल 2025 में टैरिफ लागू होने के बाद 12 अमेरिकी राज्यों, हजारों कंपनियों और छोटे व्यापारियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। करीब 10 महीने की सुनवाई के बाद कोर्ट ने 6-3 से फैसला सुनाया कि IEEPA के तहत टैरिफ लगाना अवैध है और राष्ट्रपति ने संविधान की मर्यादाओं का उल्लंघन किया है।
मुख्य बातें (Key Points)
- US Supreme Court ने 6-3 के बहुमत से ट्रंप के टैरिफ को अवैध ठहराया, कहा — IEEPA कानून से टैरिफ लगाने का अधिकार राष्ट्रपति के पास नहीं है।
- भारतीय मूल के वकील नील कात्याल ने छोटे व्यापारियों की तरफ से यह ऐतिहासिक मुकदमा जीता — एक इमीग्रेंट के बेटे ने दुनिया के सबसे ताकतवर शख्स को कोर्ट में हराया।
- भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर अनिश्चितता बनी हुई है — ट्रंप कहते हैं “कुछ नहीं बदलेगा, भारत टैरिफ देगा” जबकि विपक्ष इसे मोदी का “सरेंडर” बता रहा है।
- करीब 3 लाख कंपनियों ने 134 अरब डॉलर के रिफंड की मांग की है और इलिनॉय के गवर्नर ने ट्रंप को 9 अरब डॉलर का बिल भेज दिया है।








