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The News Air - Breaking News - UPSC लेटरल एंट्री: UPA सरकार में क्या थीं सिफारिशें, अब किन बातों पर विपक्ष कर रहा मोदी सरकार का विरोध

UPSC लेटरल एंट्री: UPA सरकार में क्या थीं सिफारिशें, अब किन बातों पर विपक्ष कर रहा मोदी सरकार का विरोध

The News Air Team by The News Air Team
सोमवार, 19 अगस्त 2024
in Breaking News, NEWS-TICKER, राष्ट्रीय
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UPSC लेटरल एंट्री
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संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने हाल ही में लेटरल एंट्री के जरिए 45 पदों पर भर्ती के लिए एक अधिसूचना जारी की है. इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार विपक्ष के निशाने पर आ गई है. विपक्ष का दावा है कि लेटरल एंट्री के जरिए ओबीसी और एससी/एसटी के आरक्षण के अधिकारों को कमजोर किया जा रहा है.

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का आरोप है कि केंद्र सरकार आईएएस का निजीकरण कर आरक्षण खत्म कर रही है. हालांकि, लेटरल एंट्री की सिफारिशें कांग्रेस की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में ही की गई थी. फिर विपक्ष किन बातों को लेकर मोदी सरकार का विरोध कर रहा है, आइए जान लेते हैं.

मोरारजी देसाई आयोग ने की थी प्रशासनिक सुधार की सिफारिश

देश में सबसे पहले साल 1966 में मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन किया गया था. तब आयोग ने सिविल सेवाओं में विशेष कौशल की जरूरत पर जोर दिया था. हालांकि, इस आयोग की सिफारिशों में लेटरल एंट्री जैसी कोई बात नहीं कही गई थी. शुरुआत में केवल मुख्य आर्थिक सलाहकार का पद लेटरल एंट्री से भरा जाने लगा था. बाद में मोरारजी देसाई मार्च 1977 से जुलाई 1979 त प्रधानमंत्री रहे, तब भी लेटर एंट्री पर कोई खास कदम नहीं बढ़ाया गया.

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यूपीए सरकार लाई थी लेटरल एंट्री का प्रस्ताव

साल 2005 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार पहली बार लेटरल एंट्री के जरिए नौकरशाही में शीर्ष पदों पर निजी क्षेत्र के लोगों को बैठाने की योजना लाई थी. उस वक्त इस योजना के अगुवा थे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता वीरप्पा मोइली. दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने उनके इस प्रस्ताव का जोरदार समर्थन किया था.

वीरप्पा मोइली आयोग ने ये सिफारिशें की थीं

वीरप्पा मोइली की अगुवाई में बने दूसरे प्रशासनिक आयोग ने सिफारिश की थी कि वरिष्ठ सरकारी पदों पर विशेष कौशल वालों की सीधी भर्ती की जाए. इस आयोग ने सिविल सेवा में कार्मिक प्रबंधन में सुधार की जरूरत भी बताई थी. आयोग का कहना था कि 14 सालों की सिविल सर्विस के बाद समीक्षा की जाए और 20 साल के बाद भी अफसर अगर अयोग्य निकले तो उसे बर्खास्त किया जाए. इसमें सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों को तीन मौके मिलें. वहीं, ओबीसी को पांच और एससी/एसटी को छह बार परीक्षा में बैठने देने की सिफारिश की गई थी.

मुख्य आर्थिक सलाहकार की नियुक्ति तो मोरारजी देसाई कमीशन की सिफारिश के बाद से ही लेटरल एंट्री के जरिए की जाती रही है. पूर्व आर्थिक सलाहकार मोंटेक सिंह अहलूवालिया की नियुक्ति इसी के जरिए की गई थी. फिर यूपीए सरकार के कार्यकाल में आधार योजना की नींव रखने वाले नंदन नीलेकणि भी इसी के जरिए प्रशासन में शामिल हुए थे. यह व्यवस्था तदर्थ आधार पर थी, न की संस्थागत.

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में हुई औपचारिक शुरुआत

जो योजना यूपीए सरकार लेकर आई थी, उसकी औपचारिक शुरुआत साल 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बनी एनडीए सरकार ने की. यह साल 2018 की बात है, जब केंद्र सरकार ने पहली बार संयुक्त सचिवों और निदेशकों जैसे वरिष्ठ पदों के लिए निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के विशेषज्ञों से आवेदन मांगे थे. इसके तहत तब 37 लोगों की भर्ती की गई थी. साल 2019 में सात और 2021 में 30 लोगों की भर्ती इसके जरिए की गई थी.

तीन साल के लिए होता है अनुबंध

लेटरल एंट्री का आमतौर पर एक ही मतलब निकाला जाता है यानी निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों की सीधे सरकारी सेवाओं में भर्ती. इससे केंद्रीय मंत्रालयों में संयुक्त सचिवों, निदेशकों और उप सचिवों की भर्ती की जाती है. वैसे तो केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों, स्वायत्त एजेंसियों, शैक्षणिक संस्थानों और विश्वविद्यालयों में काम करने वालों को छोड़कर निजी क्षेत्र के व्यवसाय में कार्यरत समकक्ष स्तर के न्यूनतम 15 वर्ष के अनुभव वाले लोग लेटेरल एंट्री के जरिए अफसरशाही में शामिल हो सकते हैं. इनकी न्यूनतम उम्र 45 साल होनी चाहिए. किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय या संस्थान से कम से कम ग्रेजुएशन की डिग्री होनी चाहिए.

लेटरल एंट्री से चुने गए अधिकारियों को तीन साल के एक अनुबंध पर हस्ताक्षर करना होता है. उनके प्रदर्शन के आधार पर इस अनुबंध को दो साल के लिए बढ़ाया जा सकता है.

इन बातों पर विपक्ष कर रहा सरकार का विरोध

इस बार जब लेटरल एंट्री के जरिए अफसरों की भर्ती के लिए 17 अगस्त को नोटिफिकेशन जारी किया गया तो विपक्ष ने विरोध शुरू कर दिया. इस बार गृह मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और इस्पात मंत्रालय में ज्वाइंट सेक्रेटरी और डिप्टी सेक्रेटरी के 10 पदों, कृषि और किसान कल्याण, नागरिक उड्डयन और सूचना प्रसारण मंत्रालय के निदेशक और उप निदेशक के 35 पदों के लिए आवेदन मांगे गए हैं, जिसकी अंतिम तिथि 17 सितंबर है.

अब विपक्ष का कहना है कि इन भर्तियों के जरिए केंद्र सरकार वास्तव में वरिष्ठ सरकारी पदों पर भाजपा और आरएसएस के लोगों को बैठा रही है. इन लोगों की सीधी भर्ती संविधान पर सीधा हमला और आरक्षण छीनने की साजिश है. विपक्ष का कहना है कि सरकार एससी/एसटी और ओबीसी का हक छीन रही है और सीधी भर्ती के कारण निचले वर्ग को पदोन्नति नहीं मिलेगी.

केंद्र सरकार दे रही है सफाई

विपक्ष के हमले के जवाब में केंद्र सरकार का कहना है कि कांग्रेस वास्तव में पाखंड कर रही है, जबकि लेटरल एंट्री का प्रस्ताव यूपी सरकार के कार्यकाल में ही लाया गया था. वह यह भी दावा कर रही है कि यह भर्ती पूरी तरह से निष्पक्ष और पारदर्शी है. इसका उद्देश्य केवल प्रशासन में सुधार करना है.

15 मई 2018 को सीधी भर्ती के लिए जो सर्कुलर जारी किया गया था, उसमें डीओपीटी ने कहा था कि केंद्र सरकार के पदों और सेवाओं में नियुक्तियों के संबंध में यूपी द्वारा एससी/एसटी और ओबीसी उम्मीदवारों को अस्थायी नियुक्तियों में आरक्षण मिलेगा, जो 45 दिन या उससे अधिक समय तक चलने वाली हैं.

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