Under 18 Social Media Ban India – भारत में 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल अब पहले जैसा आसान नहीं रहने वाला। सुप्रीम कोर्ट के सख्त सवालों के बाद केंद्र सरकार ने माना है कि 2021 के IT Rules में बदलाव किया जाएगा। अब बच्चों को Facebook, Instagram, Snapchat जैसे प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाने के लिए माता-पिता की सहमति और उम्र का सख्त सत्यापन जरूरी हो सकता है।
सवाल यह है कि जब Indian Contract Act के तहत 18 साल से कम उम्र का कोई भी बच्चा कानूनी समझौता नहीं कर सकता, तो ये विदेशी सोशल मीडिया कंपनियां 13 साल के बच्चों के साथ Terms & Conditions पर क्लिक करवाकर अकाउंट कैसे खोल रही हैं?
देखा जाए तो यह सिर्फ एक कानूनी सवाल नहीं है। यह हमारे बच्चों की सुरक्षा, उनकी मानसिक सेहत और Online Safety से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा है।
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सुप्रीम कोर्ट में PIL से शुरू हुई कहानी
दरअसल यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट तक एक Public Interest Litigation (PIL) के जरिए पहुंचा। यह याचिका दाखिल की थी Just Rights for Children Alliance (JRCA) नामक संगठन ने।
याचिका में तर्क दिया गया था कि भारत में अगर किसी की उम्र 18 साल से कम है तो हम उसे माइनर (नाबालिग) घोषित करते हैं। लेकिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स—चाहे वह Meta हो, Twitter (X) हो या कोई अन्य—वे 13 साल से ऊपर के बच्चों को सिर्फ उम्र लिखकर अकाउंट बनाने की अनुमति दे देते हैं।
अगर गौर करें तो यहां एक गंभीर कानूनी विरोधाभास है। Indian Majority Act 1875 के अनुसार व्यक्ति 18 साल की उम्र में वयस्कता प्राप्त करता है। इसके अलावा Indian Contract Act 1872 की धारा 11 के तहत कोई भी व्यक्ति तभी कानूनी समझौता (Contract) कर सकता है जब वह वयस्क हो।
कोर्ट ने पूछा—समझौता कैसे कर रहे हैं 13 साल के बच्चे?
28 सितंबर को Chief Justice Suryakant, Justice Joy Malya Bakshi और Justice V Mohana की तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले की सुनवाई की।
याचिकाकर्ता के वकील सीनियर एडवोकेट HS Phoolka ने अदालत के सामने एक बेहद मजबूत तर्क रखा। उन्होंने कहा: “साहब, Indian Contract Act के तहत 18 साल से कम उम्र का बच्चा कोई कानूनी समझौता कर ही नहीं सकता। जब वह समझौता कर ही नहीं सकता, तो ये टेक कंपनियां नियम-शर्तों वाले बॉक्स पर टिक करवाकर 13 साल के बच्चे का अकाउंट कैसे खोल रही हैं? यह पूरी तरह से void है।”
यानी कानून की नजर में अमान्य है, गैरकानूनी है। समझने वाली बात यह है कि जब बच्चा कानूनी रूप से ही समझौता नहीं कर सकता, तो सोशल मीडिया का पूरा Terms & Conditions Agreement ही अवैध हो जाता है।
अदालत ने सरकार से मांगा जवाब
इस पर Justice Joy Malya Bakshi ने केंद्र सरकार के Solicitor General Tushar Mehta से सीधे-सीधे कहा: “सिर्फ खोखली गाइडलाइन से काम नहीं चलेगा। दिशा-निर्देश तो सिर्फ कागज का टुकड़ा बनकर रह जाते हैं। अब वक्त आ गया है कि इसे IT नियमों के तहत एक बाध्यकारी कानूनी प्रावधान बनाया जाए।”
अदालत का सीधा आदेश था: “अपनी टेक्नोलॉजी और सॉफ्टवेयर को भारतीय कानून के मुताबिक ढालिए। सॉफ्टवेयर भारत के संविधान और कानून से ऊपर नहीं हो सकता।”
यह दर्शाता है कि सुप्रीम कोर्ट अब बड़ी टेक कंपनियों की मनमानी बर्दाश्त नहीं करने वाला।
सरकार ने माना—IT Rules 2021 में होगा बदलाव
10 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस मुद्दे पर स्पष्ट जवाब मांगा। और अब सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि सरकार इस मुद्दे को बेहद गंभीरता से ले रही है।
सरकार ने कहा कि अगर बदलाव करना है तो Information Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules 2021 में संशोधन करना होगा।
दिलचस्प बात यह है कि दुनिया भर में ऐसे कानून बन रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर सख्त कानून बना है। कुछ यूरोपीय देशों में भी इसी तरह के प्रावधान हैं। भारत भी अब उसी दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
क्या-क्या बदलाव हो सकते हैं?
सरकार जो बदलाव लाने की योजना बना रही है, उसमें तीन मुख्य बातें शामिल हो सकती हैं:
1. Age Verification (उम्र का सत्यापन)
अब 18 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया अकाउंट खोलने से रोकने के लिए सख्त उम्र सत्यापन प्रणाली लाई जाएगी। लेकिन असली सवाल है—कैसे?
2. Parental Consent (माता-पिता की सहमति)
18 साल से कम उम्र का कोई भी बच्चा बिना माता-पिता की लिखित या डिजिटल सहमति के सोशल मीडिया अकाउंट नहीं बना पाएगा। यह सुप्रीम कोर्ट का भी सुझाव था।
3. eKYC Mandatory (इलेक्ट्रॉनिक केवाईसी अनिवार्य)
सिर्फ एक क्लिक से काम नहीं चलेगा। बच्चे के अकाउंट के लिए माता-पिता का eKYC यानी Aadhaar या सरकारी पहचान पत्र से सत्यापन अनिवार्य हो सकता है।
Age Verification कैसे होगा—यही सबसे बड़ी चुनौती
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि Age Verification करना तकनीकी रूप से बेहद मुश्किल काम है। ऐसा तो है नहीं कि पुलिस आपके कमरे में जाकर देखेगी कि आप 18 साल से कम हैं या ज्यादा।
तो कैसे होगा यह सत्यापन? विशेषज्ञों ने कुछ तरीके सुझाए हैं:
सरकारी ID का सत्यापन:
Driving License, Voter ID जैसे सरकारी दस्तावेजों से उम्र की पुष्टि। लेकिन इसमें सबसे बड़ी समस्या है—Privacy का हनन। आपकी सारी निजी जानकारी सोशल मीडिया कंपनियों के पास चली जाएगी।
Aadhaar-based Verification:
आजकल हर जगह Aadhaar-based OTP का इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन फिर से प्राइवेसी और डेटा सुरक्षा का सवाल उठता है।
Digital Age Token:
यह सबसे आशाजनक तरीका हो सकता है। सरकारी वेबसाइट पर एक टोकन जनरेट करें जो सिर्फ यह बताए कि आप 18 साल से ऊपर हैं, बाकी कोई निजी जानकारी शेयर न हो। इससे प्राइवेसी भी बची रहेगी और सत्यापन भी हो जाएगा।
बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा—क्यों इतनी जरूरी है?
चिंता का विषय यह है कि सोशल मीडिया पर बच्चों के साथ कई तरह के खतरे जुड़े हैं:
Online Grooming:
वयस्क लोग ऑनलाइन रिश्ते बनाकर बच्चों का शोषण करते हैं।
Sexual Exploitation और Sextortion:
अश्लील सामग्री के जरिए बच्चों को ब्लैकमेल किया जाता है। उनसे पैसे मांगे जाते हैं।
Cyberbullying:
स्कूल में बुलिंग हो और घर पर भी ऑनलाइन बुलिंग हो—यह बच्चों की मानसिक सेहत पर बेहद बुरा असर डालता है। कई बार तो Depression और आत्महत्या के मामले भी सामने आते हैं।
Trafficking और Enticement:
ऑनलाइन बातचीत के जरिए बच्चों को लालच देकर गलत कामों में फंसाया जाता है।
Age-inappropriate Content:
बच्चे ऐसी सामग्री देख लेते हैं जो उनकी उम्र के लिए उपयुक्त नहीं है।
Data Exploitation:
सोशल मीडिया कंपनियां बच्चों का डेटा इकट्ठा करती हैं, उनकी Behavioral Profiling करती हैं और फिर targeted advertisements दिखाती हैं।
हैरान करने वाली बात यह है कि 2023 का Digital Personal Data Protection Act में भी यह प्रावधान है कि कंपनियां 18 साल से कम उम्र के बच्चों का डेटा संभालकर रखें। लेकिन यहां सवाल यह है कि बच्चों को पहली जगह अकाउंट ही क्यों खोलने दिया जाए?
क्या अन्य विकल्प हो सकते हैं?
विशेषज्ञों ने कुछ और Model भी सुझाए हैं:
Complete Prohibition:
कुछ लोग कहते हैं कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पूरी तरह से बैन होना चाहिए।
Parental Control Accounts:
माता-पिता का अकाउंट बच्चों के अकाउंट से लिंक हो। माता-पिता देख सकें कि उनका बच्चा क्या कर रहा है।
Restricted Access:
बच्चों को सिर्फ शैक्षणिक और फायदेमंद Content तक ही पहुंच मिले। बाकी सब ब्लॉक रहे।
समझने वाली बात यह है कि आज के डिजिटल और AI के युग में बच्चों को पूरी तरह से इंटरनेट से अलग नहीं किया जा सकता। उन्हें Educational Websites, Government Portals, School Systems तक पहुंच चाहिए। लेकिन मुख्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कड़े नियम होने चाहिए।
वोट देने का अधिकार 18 पर, तो सोशल मीडिया क्यों 13 पर?
सीनियर एडवोकेट HS Phoolka ने कोर्ट में बहुत सटीक बात कही: “जब कानून उन्हें वोट देने का अधिकार 18 साल से पहले नहीं देता, जब कानून उन्हें गाड़ी चलाने का लाइसेंस 18 साल से पहले नहीं देता, तो फिर सोशल मीडिया के इस खतरनाक जाल में उन्हें अकेले बिना पहरेदार के कैसे छोड़ा जा सकता है?”
यह दर्शाता है कि यह मामला सिर्फ टेक्नोलॉजी का नहीं, बल्कि बच्चों के अधिकार और सुरक्षा का है।
अब आगे क्या होगा?
राहत की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद अब सरकार जल्द ही IT Rules में संशोधन का प्रस्ताव लाएगी। आगे की सुनवाई में यह साफ होगा कि कौन सा Model अपनाया जाएगा।
उम्मीद की किरण यह है कि भारत में भी जल्द ही बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए मजबूत कानूनी ढांचा तैयार होगा।
मुख्य बातें (Key Points)
- Just Rights for Children Alliance ने सुप्रीम कोर्ट में PIL दायर की
- कोर्ट ने पूछा—18 साल से कम उम्र के बच्चे कानूनी समझौता नहीं कर सकते, तो सोशल मीडिया अकाउंट कैसे बना रहे हैं?
- सरकार ने माना कि IT Rules 2021 में बदलाव किया जाएगा
- Age Verification, Parental Consent और eKYC अनिवार्य हो सकता है
- Cyberbullying, Sexual Exploitation, Data Misuse जैसे खतरों से बचाना जरूरी












