Trump NATO Iran War: अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के बीच डोनाल्ड ट्रंप का गुस्सा अब अपने ही साथियों पर फूट पड़ा है। NATO के सहयोगी देशों पर बरसते हुए ट्रंप ने उन्हें “कायर” (Cowards) करार दिया और कहा कि अमेरिका यह सब याद रखेगा। Truth Social पर देर रात किए गए एक पोस्ट में ट्रंप ने लिखा कि बिना अमेरिका के NATO एक “पेपर टाइगर” से ज्यादा कुछ नहीं है। ट्रंप का यह गुस्सा Strait of Hormuz संकट को लेकर है, जहां ईरान ने तेल की आवाजाही को बाधित कर दिया है और NATO के सहयोगी देश इस संकट में अमेरिका की मदद करने से साफ इनकार कर रहे हैं।
ट्रंप ने Truth Social पर क्या लिखा
Trump NATO Iran War को लेकर ट्रंप का यह बयान किसी सामान्य नाराजगी से कहीं ज्यादा गंभीर माना जा रहा है। अपने पोस्ट में डोनाल्ड ट्रंप ने लिखा कि NATO के सहयोगी देशों को अमेरिकी सुरक्षा का लगातार फायदा मिलता रहा है, लेकिन जब किसी बड़े संकट में योगदान देने की बारी आती है तो ये देश पीछे हट जाते हैं।
ट्रंप ने आगे लिखा कि ये देश परमाणु शक्ति संपन्न ईरान को रोकने के लिए खड़े नहीं हुए। अब जबकि अमेरिका ने यह लड़ाई लगभग जीत ली है और इन देशों को कोई खतरा भी नहीं है, तब भी ये तेल की बढ़ती कीमतों की शिकायत कर रहे हैं लेकिन Strait of Hormuz खोलने में मदद नहीं करना चाहते। ट्रंप ने अपने पोस्ट का अंत “They are Cowards and We Will Remember” कहकर किया, जिसे पश्चिमी गठबंधन व्यवस्था में एक गंभीर दरार के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
Strait of Hormuz Crisis क्यों बना है सबसे बड़ा मुद्दा
Trump NATO Iran War के इस पूरे विवाद की जड़ में Strait of Hormuz का संकट है। दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है और ईरान ने यहां से तेल टैंकरों की आवाजाही को लगभग बंद कर दिया है। बहुत कम जहाज ही वहां से गुजर पा रहे हैं, जिनमें भारत के कुछ जहाज भी शामिल हैं। चीन को इस स्थिति से काफी फायदा मिल रहा है।
इसका सीधा असर तेल की कीमतों पर पड़ा है। जब यह युद्ध शुरू हुआ था तब कच्चे तेल की कीमत करीब 60 डॉलर प्रति बैरल थी, जो अब बढ़कर 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच चुकी है। यानी कीमतें लगभग दोगुनी हो गई हैं। इसी वजह से एक वैश्विक ऊर्जा संकट (Global Energy Crisis) भी खड़ा हो चुका है, जिसका असर भारत समेत पूरी दुनिया पर पड़ रहा है।
ट्रंप को NATO के सहयोगियों से क्या चाहिए
डोनाल्ड ट्रंप चाहते हैं कि NATO के सहयोगी देश अपने युद्धपोत Strait of Hormuz भेजें ताकि तेल टैंकरों को सुरक्षित रूप से वहां से गुजारा जा सके। ट्रंप की सोच है कि अगर ज्यादा देशों के युद्धपोत वहां मौजूद होंगे तो ईरान की हिम्मत नहीं होगी कि वो टैंकरों पर हमला करे, और अगर कोई खतरा बना भी तो मिसाइलों के जरिए उसे हवा में ही खत्म किया जा सकेगा।
ट्रंप की सबसे बड़ी मांग यह है कि Strait of Hormuz को फिर से खोला जाए, फ्री नेविगेशन सुनिश्चित की जाए और युद्ध का पूरा बोझ सिर्फ अमेरिका पर न पड़े बल्कि NATO के सभी साथी मिलकर इसे बांटें। इसी कड़ी में ट्रंप ने अमेरिकी कांग्रेस (US Congress) से 200 बिलियन डॉलर की मांग भी की है, यह तर्क देते हुए कि यह सिर्फ अमेरिका की समस्या नहीं बल्कि एक वैश्विक मुद्दा है।
NATO के देशों ने मदद से इनकार क्यों किया
Trump NATO Iran War को लेकर जो सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है वो यह है कि आखिर फ्रांस, जर्मनी जैसे शक्तिशाली NATO सदस्य देश अमेरिका की मदद से क्यों बच रहे हैं। इसकी कई वजहें सामने आई हैं।
सबसे पहली और सबसे बड़ी वजह यह है कि डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर हमला करने से पहले अपने किसी भी सहयोगी देश से सलाह-मशविरा नहीं किया। यह पूरी तरह से एकतरफा कार्रवाई (Unilateral Action) थी। NATO के सहयोगी देशों का कहना है कि अगर पहले बातचीत हुई होती तो शायद वो ईरान की ताकत और रणनीति के बारे में अपनी राय दे पाते और एक बेहतर योजना बनाई जा सकती थी।
दूसरी बड़ी वजह है स्थिति और बिगड़ने का डर। अगर NATO के देश भी सीधे तौर पर इस युद्ध में कूदते हैं तो ईरान उन देशों पर भी हमले शुरू कर सकता है। इसके अलावा रूस और चीन, जो फिलहाल अप्रत्यक्ष रूप से ईरान की मदद कर रहे हैं, वो खुलकर मैदान में आ सकते हैं, जिससे तीसरे विश्वयुद्ध जैसी भयावह स्थिति बन सकती है।
जापानी प्रधानमंत्री के सामने ट्रंप ने दिया पर्ल हार्बर का हवाला
Trump NATO Iran War के बीच व्हाइट हाउस में एक ऐसी घटना हुई जिसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया। जापान की प्रधानमंत्री व्हाइट हाउस में मौजूद थीं, तभी एक पत्रकार ने ट्रंप से पूछा कि उन्होंने ईरान पर हमले से पहले अपने सहयोगियों से चर्चा क्यों नहीं की।
इसके जवाब में ट्रंप ने 1941 के पर्ल हार्बर हमले का हवाला देते हुए कहा कि जब जापान ने पर्ल हार्बर पर हमला किया था तो क्या उसने अमेरिका से पूछा था? यह बयान जापानी प्रधानमंत्री की मौजूदगी में दिया गया, जिससे एक बेहद असहज माहौल बन गया। राजनयिक शिष्टाचार की दृष्टि से इसे अत्यंत अनुचित माना जा रहा है और इस घटना ने अमेरिका के सहयोगी देशों के बीच विश्वास की खाई को और गहरा कर दिया है।
ईरान युद्ध की जमीनी हकीकत: तीन हफ्तों में कितना नुकसान
यह युद्ध लगभग तीन हफ्ते पुराना हो चुका है और इसके नतीजे बेहद भयावह रहे हैं। अमेरिका और इजराइल ने ईरान की परमाणु सुविधाओं और सैन्य ठिकानों पर हमला किया था, जिसका जस्टिफिकेशन ईरानी खतरे को रोकना और वहां शासन परिवर्तन (Regime Change) लाना बताया गया था। शुरू में उम्मीद थी कि ईरान की जनता खुद विद्रोह कर देगी क्योंकि कुछ दिन पहले वहां लोग सड़कों पर उतरे भी थे।
लेकिन ईरान का जवाब उम्मीद से कहीं ज्यादा आक्रामक रहा। ईरान ने इजराइल पर मिसाइल हमले किए, खाड़ी देशों की तेल सुविधाओं पर ड्रोन हमले किए और दुबई जैसे शहर, जिसे दुनिया का सबसे सुरक्षित ठिकाना माना जाता था, वो भी अब बड़े खतरे में है। अब तक ईरान में 1300 से ज्यादा, लेबनान में 1000 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और अमेरिकी सेना में भी जनहानि हुई है।
यूरोप के सामने अपनी मजबूरियां भी हैं
NATO के यूरोपीय सदस्य देशों की अपनी गंभीर समस्याएं भी हैं। तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिसका सीधा असर इन देशों की जनता पर पड़ रहा है। इन देशों के नेताओं पर अपने ही देश की जनता का दबाव है कि वो युद्ध से दूर रहें। यूरोप में युद्ध-विरोधी भावना (Anti-War Sentiment) बहुत मजबूत है और बड़ी संख्या में लोगों की राय है कि ईरान पर हमला नहीं होना चाहिए था।
इसके अलावा, इराक युद्ध (2003) की कड़वी यादें भी ताजा हैं। उस समय भी अमेरिका ने एकतरफा कार्रवाई की थी और फ्रांस व जर्मनी ने विरोध किया था। ट्रंप की पिछली नीतियों और उनके अप्रत्याशित फैसलों ने भी सहयोगी देशों के बीच भरोसे की कमी पैदा की है। यूरोप संयुक्त राष्ट्र के ढांचे के तहत पहले युद्धविराम (Ceasefire) चाहता है और उसके बाद ही Strait of Hormuz को सुरक्षित करने में भागीदारी की बात करता है।
NATO फिर कर क्या रहा है: सीमित सहयोग, पूर्ण युद्ध नहीं
हालांकि NATO पूरी तरह तटस्थ भी नहीं है, लेकिन वो बेहद सावधान जरूर है। NATO के सहयोगी देशों ने कहा है कि अगर युद्ध खत्म होता है और सीजफायर होता है तो वो Strait of Hormuz में आकर सुरक्षा प्रदान करेंगे। भारत ने भी अपने युद्धपोत गल्फ ऑफ ओमान के पास भेजे हैं, हालांकि Strait of Hormuz के अंदर नहीं। इसी तरह फ्रांस और जर्मनी ने भी अपने युद्धपोत आसपास के इलाकों में तैनात किए हैं, लेकिन Strait of Hormuz के अंदर कोई नहीं जा रहा।
यानी सैनिकों की तैनाती और पुनर्स्थापन तो हो रही है, लेकिन यह सीमित सहयोग है, पूर्ण युद्ध में भागीदारी नहीं। और यही बात डोनाल्ड ट्रंप को सबसे ज्यादा नाराज कर रही है।
क्या NATO टूट जाएगा: 1949 से चला आ रहा गठबंधन कितना मजबूत
Trump NATO Iran War के इस विवाद ने सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा किया है कि क्या 1949 से चला आ रहा NATO अब टूटने की कगार पर है? फिलहाल इसका जवाब “नहीं” ही लगता है, और इसकी कई वजहें हैं।
पहली वजह यह है कि रूस का खतरा अभी भी यूरोप के देशों के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा मुद्दा बना हुआ है। NATO के बिना यूरोप की सैन्य शक्ति बेहद कमजोर है और रूस के सामने वो अकेले टिक नहीं सकते। दूसरा, अमेरिका NATO की कुल सैन्य शक्ति का 70 प्रतिशत हिस्सा अकेले वहन करता है। तीसरा, NATO की संस्थागत गहराई बहुत मजबूत है, जिसमें एकीकृत कमांड ढांचा और संयुक्त सैन्य अभ्यास शामिल हैं, जिन्हें तोड़ना इतना आसान नहीं। चौथा, NATO का कोई विकल्प भी नहीं है क्योंकि यूरोपीय संघ (European Union) की अपनी रक्षा क्षमता बेहद सीमित है।
इतिहास गवाह है कि NATO में पहले भी बड़े मतभेद हुए हैं। 2003 के इराक युद्ध में फ्रांस और जर्मनी ने अमेरिका का खुलकर विरोध किया, लीबिया हस्तक्षेप और अफगानिस्तान से वापसी पर भी गहरे मतभेद सामने आए, लेकिन NATO कभी टूटा नहीं।
आम आदमी पर इस संकट का सीधा असर
यह सिर्फ अमेरिका और NATO के बीच का विवाद नहीं है, इसका सीधा असर भारत समेत पूरी दुनिया के आम नागरिकों पर पड़ रहा है। Strait of Hormuz बंद होने से तेल की कीमतें लगभग दोगुनी हो चुकी हैं, जिसका मतलब है कि आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस और परिवहन की लागत में भारी बढ़ोतरी हो सकती है। महंगाई का दबाव बढ़ेगा और आम घरों का बजट बुरी तरह प्रभावित होगा। अगर यह संकट लंबा खिंचता है तो वैश्विक मंदी की आशंका भी बनी हुई है।
NATO का भविष्य: टूटेगा नहीं लेकिन बदलेगा जरूर
जानकारों का मानना है कि NATO पूरी तरह टूटने की बजाय खुद को बदलेगा। इसमें कुछ बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। NATO के अंदर अलग-अलग छोटे गठबंधन बन सकते हैं, जहां कुछ देश किसी युद्ध में शामिल होंगे और कुछ नहीं। यूरोप के देश रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) की तरफ बढ़ सकते हैं और अपनी रक्षा क्षमता को मजबूत करने की कोशिश करेंगे।
लेकिन एक बात तय है कि Trump NATO Iran War के इस विवाद ने पश्चिमी गठबंधन व्यवस्था में एक गहरी दरार डाल दी है। भले ही NATO औपचारिक रूप से बना रहे, लेकिन उसकी आंतरिक एकजुटता पहले जैसी शायद कभी नहीं रहेगी। यह एक ऐसा मोड़ है जहां से दुनिया की भू-राजनीतिक तस्वीर हमेशा के लिए बदल सकती है।
मुख्य बातें (Key Points)
- डोनाल्ड ट्रंप ने Truth Social पर NATO सहयोगियों को “कायर” बताया और कहा कि बिना अमेरिका के NATO एक “पेपर टाइगर” है, क्योंकि ईरान युद्ध और Strait of Hormuz संकट में कोई देश मदद के लिए आगे नहीं आ रहा।
- Strait of Hormuz बंद होने से तेल की कीमतें 60 डॉलर से बढ़कर 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा संकट गहरा गया है और भारत समेत पूरी दुनिया प्रभावित हो रही है।
- NATO के सहयोगी देशों ने कई कारणों से मदद से इनकार किया जिनमें ट्रंप द्वारा बिना सलाह-मशविरा किए एकतरफा हमला, स्थिति बिगड़ने का डर, रूस-चीन के खुलकर सामने आने की आशंका और घरेलू युद्ध-विरोधी दबाव शामिल हैं।
- NATO 1949 से चला आ रहा 32 देशों का सैन्य गठबंधन है जिसमें पहले भी बड़े मतभेद हुए हैं लेकिन वो कभी टूटा नहीं। हालांकि, इस संकट के बाद NATO के अंदर “चयनात्मक सहयोग” (Selective Cooperation) का रुझान बढ़ सकता है।







