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The News Air - Breaking News - वक्त आ गया है, अब बीजेपी को पार्टी विद डिफरेंस बनना होगा,

वक्त आ गया है, अब बीजेपी को पार्टी विद डिफरेंस बनना होगा,

जानिए भगवा दल कहां कर रहा है चूक

The News Air Team by The News Air Team
सोमवार, 15 जुलाई 2024
in Breaking News, NEWS-TICKER, राष्ट्रीय, सियासत
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बीजेपी
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नई दिल्ली : लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद भारत की राजनीति करवट लेने लगी है। एनडीए के 293 सांसदों के साथ तीसरी बार सरकार बनाने के बाद भी बीजेपी कॉन्फिडेंट नजर नहीं आ रही है, जबकि 234 सीटें जीतने वाले विपक्ष के हौसले बुलंद हैं। विधानसभा उपचुनाव के परिणाम ने भी बीजेपी की टेंशन बढ़ा दी है।

13 विधानसभा सीटों के लिए हुए उपचुनाव में बीजेपी को सिर्फ दो सीटें मिलीं। कहीं न कहीं देश में माहौल मनमोहन सिंह के यूपीए-2 जैसा होने लगा है। नीट एग्जाम (NEET) और यूजीसी जैसे एग्जाम में धांधली के आरोप इसकी शुरुआत हो चुकी है। मोदी सरकार के कार्यकाल में कराए गए काम में नुस्ख निकाले जा रहे हैं और यह लोगों को पसंद भी आ रहा है। 10 साल सत्ता में रहने के बाद पीएम नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की छवि करप्शन के मामले बेदाग रही।

अब पेपर लीक, ढहते पुल, दरकती सड़कें और बारिश में टपकते एयरपोर्ट पर सवाल खड़े हो रहे हैं। सरकार और पार्टी की ओर से किए जा रहे दावों को पब्लिक दरकिनार कर रही है। अगर बीजेपी छवि बदलने में सफल नहीं हुई तो इसका परिणाम बीजेपी को राज्यों के चुनावों में भुगतना पड़ेगा। अब बीजेपी को बूस्टर डोज तभी मिलेगा, जब वह नवंबर में होने वाले चुनाव में झारखंड, हरियाणा और महाराष्ट्र में बड़ी जीत हासिल करे।

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2014 में करप्शन से बने माहौल से बीजेपी को मिला था फायदा

फ्लैश बैक में जाकर 2014 के दौर को याद कीजिए। जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने थे, तब देश की जनता करप्शन और घोटालों की खबरों से परेशान थी। मनमोहन सिंह ऐसे प्रधानमंत्री के तौर प्रचारित हुए, जो कांग्रेस अध्यक्ष के मातहत के तौर पर काम करते हैं। विपक्ष ने बड़े घोटालों पर उनकी चुप्पी पर भी सवाल उठाए। कांग्रेस भी आरोपों का सटीक जवाब देने में सक्षम नहीं दिख रही थी। गुजरात में ब्रांड बन चुके नरेंद्र मोदी ने इस माहौल को भुनाया। बदलाव की इंतजार कर रही जनता ने समर्थन दिया और बीजेपी ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। फिर 10 साल तक राष्ट्रवाद की बयार बही और नरेंद्र मोदी इसके सबसे बड़े आइकॉन के तौर पर उभरे। बीजेपी हिंदी पट्टी में पंचायत से संसद तक काबिज होती गई। नगर निगम में मिलने वाली जीत का सेहरा भी पीएम मोदी के सिर मढ़ा गया। झारखंड, बिहार, कर्नाटक में हार का ठीकरा स्थानीय नेताओं ने ले लिया। 2019 में बालाकोट एयर स्ट्राइक और सर्जिकल स्ट्राइक ने पीएम मोदी की साख बढ़ाई। जनता ने उन्हें दूसरी बार सरकार बनाने का मौका दिया। मोदी 2.0 में धारा-370 हटाने और सीएए लागू करने जैसे बुलंद फैसले भी लिए। कोरोना के दौर में भी जनता नरेंद्र मोदी के साथ खड़ी रही। उन्होंने जैसा कहा, लोगों ने वैसा ही किया। यह उनकी लोकप्रियता का चरम था, जिसे देखकर विपक्ष समेत पूरी दुनिया दंग रह गई। किसान आंदोलन और कोरोना से हुई मौतों के बाद भी यूपी में बीजेपी की वापसी हुई। पिछले साल राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी भारतीय जनता पार्टी की बनी, तो नरेंद्र मोदी को अजेय मान लिया गया।

2024 में बीजेपी अपनी ही ‘मुफ्त’ और ‘कैश’ वाली चाल में फंसी

2024 के लोकसभा चुनाव में हालात बदल गए। बेहतर चुनाव प्रबंधन और अग्रेसिव कैंपेन के बाद भी बीजेपी पूर्ण बहुमत के 273 के आंकड़े तक नहीं पहुंच सकी। राष्ट्रवाद, मुफ्त राशन और मोदी मैजिक के सहारे चुनाव में उतरी बीजेपी के 240 पर अटकने से विपक्ष का मनोबल बढ़ा। बीजेपी के नेताओं का कहना है कि वह आरक्षण खत्म करने, 10 किलो मुफ्त राशन और खटाखट 8500 रुपये देने को लेकर फैलाए गए विपक्ष के भ्रम का काट नहीं ढूंढ सके। एक्सपर्ट मानते हैं कि नरेंद्र मोदी खुद अपनी ही स्कीम की जाल में फंस गए। बीजेपी ने राम मंदिर, पांच किलो मुफ्त राशन और कैश डिलिवरी सिस्टम को जीत का रामबाण मान लिया। कोरोना के बाद वोटरों का एक ऐसा वर्ग तैयार कर दिया, जो मुफ्त की स्कीमों पर बंपर वोट करती है। लोकसभा चुनाव में विपक्ष ने मुफ्त वाली स्कीम और कैश की रकम बढ़ा दी। संगठन के स्तर पर मोदी-शाह की जोड़ी ने करीब उम्र और परफॉर्मेंस के नाम पर 100 सांसदों के टिकट काटे और दूसरे दलों के आए चेहरों को टिकट दिया। मगर इस स्क्रीनिंग में बीजेपी से बड़ी चूक हुई। वह ऐसे सांसदों को टिकट दिया, जो क्षेत्र में नजर नहीं आए। उन नेताओं को भी मैदान में उतारा, जिन्हें जनता पहचानती भी नहीं थी। बीजेपी के अधिकतर उम्मीदवार पीएम नरेंद्र मोदी को चेहरे पर जीतने को लेकर आश्वस्त रहे और नतीजा अब सामने है।

समय बाकी है…इन सवालों का जवाब तलाश ले बीजेपी

बड़ा सवाल, मोदी के बाद कौन? : केंद्र सरकार के बेहतर काम का श्रेय पीएम नरेंद्र मोदी के सिर गया। राज्यों में हो रहे डेवलेपमेंट के लिए क्रेडिट पीएम मोदी के खाते में जाता रहा। मोदी-शाह के युग में बीजेपी एक ऐसा चेहरा नहीं पेश नहीं कर सकी, जो पीएम नरेंद्र मोदी का विकल्प बन सके। कुछ ऐसा ही हाल 2004 में था, जब अटल बिहारी वाजपेयी की छवि के सामने बड़े नेताओं का कद छोटा पड़ने लगा। लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में एक चुनाव हारने के बाद दूसरा नेता बनाने में संगठन को 10 साल लग गए। पॉलिटिकल एक्सपर्ट के साथ अधिकतर लोग मान चुके हैं 2024 पीएम नरेंद्र मोदी का आखिरी चुनाव है, क्योंकि वह 2029 में 78 साल के हो जाएंगे। यह नैरेटिव बड़े ही तेज गति से जनमानस के बीच अपनी जगह बना रहा है। अगले दो साल में इसका असर भी नजर आने लगेगा। बीजेपी इसे विपक्ष की चाल कह सकती है, मगर अभी तक पार्टी की ओर से इस नैरेटिव के खिलाफ कोई तैयारी नजर नहीं आ रही है। पार्टी न ही किसी नेता को विकल्प के तौर पेश कर रही है और न ही इसका खंडन कर रही है।

मिडिल क्लास के हाथ खाली : शहरी मध्यम वर्ग बीजेपी का कोर वोटर रहा है, मगर पिछले 10 साल में राष्ट्रवाद की घुट्टी के अलावा मिडिल क्लास के हाथ कुछ नहीं लगा। हर खरीदारी पर टैक्स भरने वालों को इनकम टैक्स में छूट नहीं मिली। सरकारी नौकरियों में कमी की गई। ऐसा ही हाल अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में था, जब एनडीए सरकार ने सरकार के आकार छोटा किया और सरकार के खजाने को भर दिया। 2004 में सेंसेक्स उफान मार रहा था और भारत का विदेशी मुद्रा भंडार पहली बार 100 बिलियन डॉलर के पार गया था। जब सरकार बदली तो कांग्रेस ने इस खजाने से नौकरियां बांटी। आज सरकार के स्तर पर बीजेपी इसी गलती को रिपीट कर रही है। विपक्ष के हाथ बेरोजगारी और महंगाई का बड़ा मुद्दा लग चुका है। अब यह मुद्दा आम लोगों को रास भी आ रहा है।

सिर्फ पीएम मोदी की ब्रांडिंग: पिछले 10 साल में बीजेपी कांग्रेस के तर्ज पर आगे बढ़ी। जैसे कांग्रेस में जीत गांधी परिवार की होती है और हार का ठीकरा स्थानीय नेताओं पर फोड़ा जाता है, वैसे ही प्रथा बीजेपी में विकसित हुई। ब्रैंड मोदी के साथ बीजेपी आगे बढ़ रही है। चुनावों में जीत का एकतरफा श्रेय पीएम मोदी को दिया जाता रहा, जबकि मध्य प्रदेश जैसे राज्य में शिवराज सिंह चौहान जैसे स्थानीय नेताओं ने बड़ी भूमिका निभाई। यूपी में योगी आदित्यनाथ भी जनता के बीच काफी लोकप्रिय हैं। जहां-जहां बीजेपी जीती, वहां मोदी के चेहरे के साथ चुनावी प्रबंधन संभालने वाले संगठन के नेताओं को क्रेडिट नहीं मिला। सरकार और संगठन चलाना टीम वर्क है, मगर इसे ब्रांड मोदी से जोड़ दिया गया।

बीजेपी के कांग्रेसीकरण का आरोप : कांग्रेस और दूसरे दलों से आयातित नेताओं को पार्टी, सरकार और संगठन में जगह दी गई, जबकि संगठन के लिए वर्षों तक मेहनत करते वाले कार्यकर्ता ही बने रहे। दूसरी पार्टियों से आने वाले अधिकतर ऐसे नेता हैं, जिन्हें बीजेपी के नेताओं ने चुनाव में पटखनी दी थी और वह अपना राजनीतिक भविष्य तलाश रहे थे। इन नेताओं को केंद्र और राज्यों में मंत्री पद भी नवाजा गया। पार्टी का यह रुख सीनियर कार्यकर्ताओं के मनोबल तोड़ने के लिए काफी था। अब दबी जुबान में नेता बीजेपी के कांग्रेसीकरण की बात कर रहे हैं।

एक साल से घिस रहे पुराना रेकॉर्ड: बीजेपी के कोर समर्थक पार्टी विद डिफरेंस वाले टैगलाइन को आदर्श मानते रहे हैं। नरेंद्र मोदी सरकार को दूसरी और तीसरी इसलिए मौका मिला कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा के अलावा बीजेपी के कोर मुद्दों पर लीक से हटकर फैसले लिए। पिछले एक साल से पार्टी शौचालय, मुफ्त राशन, पांचवें नंबर की आर्थिक शक्ति जैसे चंद मुद्दों को अलाप रही है, जिसे नरेंद्र मोदी लालकिला, संसद, चुनाव प्रचार अभियान और विदेशों में भी कई दफा दोहरा चुके हैं। पार्टी के प्रवक्ता भी टीवी डिबेट में उन्हीं मुद्दों को बार-बार दोहराते हैं। इनमें में अधिकतर मुद्दे आर्थिक और मुफ्त वाले मुद्दे हैं, जो निम्न और मिडिल क्लास के पल्ले नहीं पड़ते हैं। यह सर्वविदित है कि सरकार चाहे किसी की भी हो, आर्थिक उदारीकरण का दौर जारी रहेगा। इस सरकार को नए तेवर के साथ कलेवर भी बदलना होगा।

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