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The News Air - Breaking News - NCERT Textbook में Judiciary Corruption का जिक्र, Supreme Court में मचा भूचाल

NCERT Textbook में Judiciary Corruption का जिक्र, Supreme Court में मचा भूचाल

8वीं कक्षा की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और लंबित मुकदमों के आंकड़े देखकर सुप्रीम कोर्ट ने लिया सुमोटो संज्ञान, किताब पर लगा प्रतिबंध

The News Air Team by The News Air Team
गुरूवार, 26 फ़रवरी 2026
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NCERT Textbook
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Supreme Court NCERT Textbook Controversy: सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी (NCERT) की 8वीं कक्षा की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और जजों के खिलाफ शिकायतों के जिक्र पर सुमोटो संज्ञान लेते हुए इसे न्यायपालिका की गरिमा पर सीधा हमला करार दिया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने किताब पर तत्काल प्रतिबंध लगाते हुए एनसीईआरटी डायरेक्टर दिनेश प्रसाद सकलानी और स्कूल शिक्षा विभाग को नोटिस जारी किया। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने खेद जताते हुए संबंधित लोगों पर कार्रवाई का भरोसा दिया, जबकि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में माफी मांगी।


किताब में आखिर क्या लिखा गया था?

एनसीईआरटी की इस किताब में पहले “हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका” और “अदालतों का ढांचा” जैसे शीर्षकों से पाठ पढ़ाया जाता था। लेकिन नए संस्करण में चैप्टर बदलकर एक धमाकेदार हिस्सा जोड़ दिया गया — “क्या आप न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार का अनुभव करते हैं?” (Do you experience corruption at various levels of Judiciary?)

इस चैप्टर में देश भर में लंबित मुकदमों के चौंकाने वाले आंकड़े दिए गए थे। सुप्रीम कोर्ट में 81,000, हाई कोर्ट में 62 लाख और जिला एवं अधीनस्थ अदालतों में लगभग 4 करोड़ 70 लाख मुकदमे पेंडिंग बताए गए। साथ ही 2017 से 2021 के बीच न्यायपालिका के खिलाफ आई लगभग 16,600 शिकायतों का भी जिक्र किया गया, जिनमें भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप शामिल थे।

बस यही वो दो पन्ने थे जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में भूचाल ला दिया।


सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी — “गोली चला दी गई”

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने जस्टिस जयमाला बागचीत और जस्टिस विपुल पंचोली के साथ इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की सामग्री से न्यायपालिका का मनोबल गिरता है और आम लोगों में गलत संदेश जाता है।

अदालत ने यहां तक कह दिया कि “गोली चला दी गई और आज न्यायपालिका आहत है।” कोर्ट का मानना था कि किताब में न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों और कथित निष्क्रियता को प्रमुखता दी गई, जबकि संवैधानिक नैतिकता की रक्षा, मूल अधिकारों की सुरक्षा और न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने में न्यायपालिका की भूमिका को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ माफी मांगने से काम नहीं चलेगा। कोर्ट की चिंता थी कि अगर शिक्षक इसे पढ़ाएंगे तो बच्चों के मन में बैठ जाएगा कि पूरी न्यायपालिका भ्रष्ट है, फिर यही बात अभिभावकों तक पहुंचेगी और समाज में न्याय व्यवस्था पर भरोसा ही खत्म हो जाएगा।


सरकार ने तुरंत झुकाई गर्दन

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में माफी मांगते हुए कहा कि यह गलत है और किताब वापस ले ली जानी चाहिए। उन्होंने कोर्ट की बात से पूरी तरह सहमति जताई।

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी बयान दिया — “हमारे संज्ञान में जैसे ही यह मामला आया, हमने तुरंत एनसीईआरटी से सारी किताबें वापस करवाईं। सर्वोच्च न्यायपालिका ने जो टिप्पणी की है, वह हमारे लिए मान्य है। सरकार उसके प्रति दायित्ववान है। मैं इसके लिए खेद प्रकट करता हूं और संबंधित व्यक्तियों पर कार्रवाई भी होगी।”

जिन दो व्यक्तियों ने यह चैप्टर लिखा था, उन्हें मंत्रालय से अलग करने की बात सामने आई। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ दो लोगों को हटाने भर से यह मामला खत्म नहीं होगा।


एनसीईआरटी के पूर्व डायरेक्टर ने किया पुरजोर बचाव

जहां सरकार ने तुरंत घुटने टेक दिए, वहीं एनसीईआरटी के पूर्व डायरेक्टर ने इस चैप्टर का मजबूती से बचाव किया। उन्होंने कहा कि एनसीईआरटी और सुप्रीम कोर्ट दोनों को एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए।

उनका कहना था — “एनसीईआरटी देश के भविष्य का निर्माण कर रही है। ऐसा कोई व्यक्ति आपको नहीं मिलेगा जो किसी उच्च पद पर हो और उसने एनसीईआरटी की किताबें न पढ़ी हों। एनसीईआरटी का उत्तरदायित्व सुप्रीम कोर्ट के उत्तरदायित्व से कम नहीं है।”

उन्होंने इसे संस्था पर चोट बताया और कहा कि भविष्य निर्माण की प्रक्रिया में एनसीईआरटी को जो सहज, स्वाभाविक और आवश्यक लगता है, उसके आधार पर यह पाठ लिखा गया। उन्होंने गुरु की परंपरा का हवाला देते हुए कहा — “गुरु गोविंद दो खड़े, तो गुरु ही आगे है। सुप्रीम कोर्ट को भी यह मानना चाहिए।”


बीजेपी से जुड़े वकीलों ने भी रखी अपनी राय

इस विवाद पर कुछ ऐसे वकीलों ने भी बात रखी जिनका जुड़ाव खुले तौर पर बीजेपी से रहा है। एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय, सीनियर एडवोकेट पिंकी आनंद और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन आदीश अग्रवाल ने अपना पक्ष रखा।

उनका तर्क था कि अगर भ्रष्टाचार की चर्चा करनी है तो सिर्फ न्यायपालिका की नहीं, विधायिका, कार्यपालिका — सब की होनी चाहिए। साथ ही बच्चों को समस्या नहीं, समाधान सिखाना चाहिए। एक वकील ने तो यहां तक कहा कि “भ्रष्टाचार है ही नहीं, और अगर कहीं है तो उसे सिलेबस में डालना एनसीईआरटी के सीनियर अधिकारियों की गंभीर चूक है।”

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हालांकि यहां सवाल यह भी उठता है कि आठवीं कक्षा का बच्चा भला भ्रष्टाचार का समाधान कैसे पढ़ेगा, जबकि पूरा राजनीतिक तंत्र ही इसकी शुरुआत से जुड़ा हुआ है — चाहे वह पॉलिटिकल इकोनॉमी हो, चुनाव प्रचार हो या इलेक्शन कमीशन और राजनीतिक दलों के बीच की खींचतान।


जब इतिहास बदला तो कोर्ट खामोश रहा

यह मामला इसलिए और गहरा हो जाता है क्योंकि एनसीईआरटी की किताबों में इससे पहले भी बड़े-बड़े बदलाव हुए हैं। भारत के इतिहास को संशोधित किया गया। मुगल सल्तनत के दौर को धीरे-धीरे हाशिये पर ले जाया गया। आजादी के संघर्ष से जुड़े अध्यायों में बदलाव हुए। इमरजेंसी, बाबरी मस्जिद विध्वंस और 2002 के गुजरात दंगों जैसे संवेदनशील विषयों पर सामग्री बदली गई।

कुछ मामले सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचे, लेकिन उस वक्त कोर्ट ने संकेत दिया कि एनसीईआरटी की किताब में क्या पढ़ाया जाए, यह तय करना कोर्ट का काम नहीं है। यानी जब राजनीतिक रूप से इतिहास बदला जा रहा था, तब कोर्ट ने हस्तक्षेप नहीं किया। लेकिन जैसे ही बात खुद न्यायपालिका तक पहुंची, सुमोटो संज्ञान तुरंत ले लिया गया।


न्याय की कीमत — आम आदमी कहां जाए?

इस बहस का एक ऐसा पहलू भी है जो सीधे आम आदमी से जुड़ता है। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में किसी वकील की एक पेशी की न्यूनतम फीस लगभग 10 से 12 लाख रुपये है, जबकि अधिकतम 50 से 75 लाख रुपये तक जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में कोई वकील स्कूटर से आता नजर नहीं आता, लेकिन जिला अदालतों में जहां साढ़े चार करोड़ से ज्यादा मुकदमे लंबित हैं, वहां वकील साइकिलों पर भी दिख जाते हैं। यह असमानता बताती है कि इस देश में न्याय की पहुंच कितनी महंगी है और आम आदमी के लिए यह सपना बनती जा रही है।


संस्थाओं पर सवाल — कॉलेजियम से इलेक्टोरल बॉन्ड तक

पिछले कुछ वर्षों में कई संवैधानिक संस्थानों पर गंभीर सवाल उठे हैं। कॉलेजियम सिस्टम को लेकर खुद सत्ताधारी बीजेपी ने “चाचा-भतीजे” वाली नियुक्तियों का आरोप लगाया और जुडिशियल अपॉइंटमेंट कमेटी की मांग की, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया।

इलेक्टोरल बॉन्ड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने खुद माना कि यह गलत तरीका है। महाराष्ट्र में राज्यपाल की भूमिका पर कोर्ट ने कहा कि उन्होंने “असंवैधानिक तरीके से” काम किया। ईडी के मामले में कोर्ट ने कहा कि एजेंसी “पॉलिटिकल कार्रवाई” करती है। चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में चीफ जस्टिस की भूमिका हटाई गई। ईडी चेयरमैन को तीन-तीन बार एक्सटेंशन मिले।

पूर्व चीफ जस्टिस टी.एस. ठाकुर मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में जजों की कमी पर रो पड़े थे। पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई रिटायरमेंट के चंद दिनों बाद राज्यसभा सांसद बन गए, लेकिन छह साल में न कोई सवाल उठाया, न कोई जुडिशियल रिफॉर्म करवाया। 2018 में चार वरिष्ठ जजों ने “डेमोक्रेसी इन डेंजर” कहा। पूर्व चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड के घर पूजा के दिन प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी ने सवाल खड़े किए। चीफ जस्टिस बी.आर. गवई पर जूता फेंका गया तो उन्होंने खामोशी बरती, जिसकी प्रधानमंत्री ने “संयम” कहकर तारीफ की।

2014 के बाद से शिक्षा मंत्रालय में कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर लगभग 21% नियुक्तियां हुई हैं, जिनका जुड़ाव बीजेपी और संघ से रहा है। ऐसे में किताबों में क्या लिखा जाएगा और क्या हटाया जाएगा — यह फैसला कौन करता है, यह सवाल अहम हो जाता है।


सच लिखने और सच सुनने के बीच बढ़ता फासला

एनसीईआरटी का अपना तर्क भी गौर करने लायक है। उनका कहना है कि अभी तो सिर्फ चैप्टर लिखा गया था — बच्चों ने न पढ़ा, न कोई असर हुआ। लेकिन जिनके बारे में लिखा गया, उन्हीं पर असर पड़ गया। जिस बात से खुद सुप्रीम कोर्ट प्रभावित हो गया, उसे बच्चों तक पहुंचने से पहले ही रोक दिया गया।

यह पूरा प्रकरण एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है — इस देश में सच लिखने की भी क्या कोई सीमा है? और वह सीमा कौन तय करेगा? जब तक वही तथ्य किसी और संस्थान के बारे में लिखे जा रहे थे, कोई आपत्ति नहीं थी। लेकिन जैसे ही न्यायपालिका की बारी आई, पूरा सिस्टम हरकत में आ गया।

यह भी सच है कि इस देश में न्यायपालिका ही एकमात्र ऐसी संस्था बची है जहां आम आदमी अंतिम उम्मीद लेकर जाता है। लेकिन उम्मीद तभी बनी रहती है जब पारदर्शिता हो। और पारदर्शिता का पाठ तभी संभव है जब अपने ऊपर उठने वाले सवालों का जवाब खुलकर दिया जाए — न कि उन सवालों को ही प्रतिबंधित कर दिया जाए।


जानें पूरा मामला

एनसीईआरटी की 8वीं कक्षा की किताब में “हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका” शीर्षक के तहत पहले अदालतों का ढांचा और न्यायपालिका की भूमिका पढ़ाई जाती थी। नए संस्करण में इस चैप्टर में भ्रष्टाचार, लंबित मुकदमों के आंकड़े और जजों के खिलाफ हजारों शिकायतों का विवरण जोड़ा गया। दो वकीलों ने इस पर सुप्रीम कोर्ट का ध्यान आकृष्ट किया, जिसके बाद चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने सुमोटो संज्ञान लिया। कोर्ट ने इसे न्यायपालिका की गरिमा पर हमला बताया, किताब वापस मंगवाई और एनसीईआरटी तथा शिक्षा विभाग को नोटिस जारी किया। सरकार ने माफी मांगी, किताबें वापस करवाईं और कार्रवाई का भरोसा दिया, जबकि एनसीईआरटी के पूर्व डायरेक्टर ने चैप्टर का बचाव किया।


मुख्य बातें (Key Points)
  • एनसीईआरटी की 8वीं कक्षा की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार, लगभग 16,600 शिकायतों और करोड़ों लंबित मुकदमों का जिक्र किया गया था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सुमोटो संज्ञान लिया।
  • चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इसे न्यायपालिका पर “गोली चलाने” जैसा बताया और कहा कि सिर्फ माफी से काम नहीं चलेगा — गंभीर कार्रवाई जरूरी है।
  • शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने खेद जताया और किताबें वापस करवाईं, जबकि एनसीईआरटी के पूर्व डायरेक्टर ने इसे शिक्षा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला बताते हुए चैप्टर का बचाव किया।
  • जब इतिहास से जुड़े चैप्टर बदले गए — मुगल दौर, आजादी का संघर्ष, इमरजेंसी जैसे विषयों में — तब सुप्रीम कोर्ट ने कोई आपत्ति नहीं जताई, जो सवाल खड़ा करता है कि शिक्षा में सच लिखने की सीमा कौन तय करेगा।
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