Silent Sugar: भारत को डायबिटीज कैपिटल ऑफ द वर्ल्ड कहा जाता है। देश में 10 करोड़ से ज्यादा लोग डायबिटीज से जूझ रहे हैं और इससे कई गुना ज्यादा लोग प्री डायबिटिक हैं। प्री डायबिटीज, डायबिटीज से ठीक पहले की एक साइलेंट स्टेज है। अगर इस स्टेज के दौरान बीमारी पकड़ में आ जाए तो उसे डायबिटीज में बदलने से रोका जा सकता है। लेकिन एक दिक्कत है – इस स्टेज में इंसान को एकदम नॉर्मल महसूस होता है और जब नॉर्मल महसूस होता है तो कोई खास ध्यान भी नहीं देता। पर शरीर चुप नहीं रहता, इशारे देता है। लेकिन हम इन इशारों को समझ नहीं पाते और यही मात खा जाते हैं।
यशोदा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल गाजियाबाद की कंसल्टेंट फिजिशियन डॉ. दिव्य प्रकाश, सिटी नर्सिंग होम अलवर के डायबिटोलॉजिस्ट डॉ. कौशल सिंह और डॉ. ललित मेमोरियल हॉस्पिटल हरियाणा की डायबिटोलॉजिस्ट डॉ. नवजोत कौर ने बताया कि कैसे प्री डायबिटीज के संकेतों को पहचानकर इस बीमारी को रोका जा सकता है।
हर वक्त थकान महसूस होना है पहला संकेत
डॉ. दिव्य प्रकाश बताती हैं कि आजकल की लाइफस्टाइल में थकान होना बहुत आम समस्या है, लेकिन अगर बिना किसी कारण के लगातार थकान महसूस हो रही है तो यह डायबिटीज का शुरुआती लक्षण हो सकता है। उन्होंने समझाया कि जो हमारी ब्लड की शुगर है, वह हमें खाने से मिलती है और यह हमारी बॉडी के लिए पेट्रोल की तरह काम करती है। जैसे गाड़ी को पेट्रोल की जरूरत होती है, वैसे ही हमारी बॉडी के ऑर्गन्स को ब्लड शुगर की जरूरत होती है।
डायबिटीज में यही होता है कि ब्लड का शुगर बढ़ने लगता है और जहां इसे जाना चाहिए यानी हमारे ऑर्गन्स में, वहां यह जा नहीं पाता। जब भी ब्लड की शुगर 180 से ऊपर होगी या नॉर्मल लेवल से ऊपर जाएगी तो वो यूरिन के रास्ते बाहर निकलने लगेगी। इसीलिए बार-बार पेशाब भी आता है शुगर के पेशेंट्स में। जब हमारी एनर्जी दूसरे रास्ते से बाहर निकल जाएगी तो ऑर्गन्स को मिल नहीं पाएगी और बॉडी फटीग महसूस करेगी।
फास्टिंग शुगर नॉर्मल है तो क्या डायबिटीज नहीं?
डॉ. कौशल सिंह ने एक बहुत महत्वपूर्ण बात बताई कि अगर फास्टिंग शुगर नॉर्मल आती है तो यह मान लेना कि डायबिटीज नहीं है, यह गलत है। उन्होंने कहा कि फास्टिंग शुगर हमें उस समय की शुगर बताती है जब आपने 8 से 10 घंटे तक कुछ नहीं खाया है। लेकिन कई पेशेंट्स में सारे इशूज खाना खाने के बाद आते हैं जिसको हम पोस्टप्रांडियल ब्लड शुगर कहते हैं।
कई लोगों को डिस्ग्लाइसीमिया होता है यानी खाने के बाद शुगर बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। ऐसे ही कई लोगों में एचबीए1सी बॉर्डरलाइन बढ़ा हुआ आने लग जाता है जबकि फास्टिंग ब्लड शुगर नॉर्मल आ रही है। डॉ. कौशल ने जोर देकर कहा कि डायबिटीज एक साइलेंट डिजीज है – साइलेंट बट प्रोग्रेसिव। यह बीमारी धीरे-धीरे होती रहेगी, सिम्टम्स आते रहेंगे, इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ती रहेगी और अंततः एक स्टेज आएगी जहां मेडिकेशन की जरूरत पड़ेगी।
तीन पी – पॉलीयूरिया, पॉलीडिप्सिया और पॉलीफेजिया
डॉ. नवजोत कौर ने बताया कि डायबिटीज के तीन सबसे मेन हॉलमार्क साइन हैं – पॉलीयूरिया यानी ज्यादा पेशाब आना, पॉलीडिप्सिया यानी ज्यादा प्यास लगना और पॉलीफेजिया यानी ज्यादा भूख लगना। जब शुगर बहुत ज्यादा शरीर में बनने लगती है तो खून से उसको फ्लश आउट करने के लिए किडनी उसको यूरिन के रास्ते निकालने की कोशिश करती है।
जब आप ज्यादा यूरिन करेंगे तो डेफिनेटली आप डिहाइड्रेट फील करेंगे और फिर आपको प्यास ज्यादा लगेगी। अगर बिना किसी स्पष्ट कारण के आपको बार-बार यह परसिस्टेंटली महसूस हो रहा है कि आप बार-बार पेशाब जा रहे हैं, भूख ज्यादा लग रही है या प्यास ज्यादा लग रही है तो डेफिनेटली एक सिंपल ब्लड शुगर टेस्ट जरूर करवाएं।
तोंद निकलना है खतरे की घंटी
डॉ. दिव्य प्रकाश ने बताया कि भारत में बहुत कॉमन है कि पैर और हाथ तो पतले हैं लेकिन पेट निकला हुआ है। इसको मेडिकल टर्म्स में एब्डोमिनल या विसरल फैट डिपॉजिशन बोलते हैं। यह सिर्फ डायबिटीज का ही नहीं बल्कि कार्डियोवस्कुलर प्रॉब्लम्स, ब्रेन स्ट्रोक और कुछ कैंसर्स का भी कारण बन सकता है।
यह विसरल फैट हमारे इंसुलिन रेजिस्टेंस को डेवलप करता है बॉडी में। इंसुलिन रेजिस्टेंस का मतलब है कि इंसुलिन तो बन रहा है जो शुगर को नॉर्मल लेवल पर ले आएगा, लेकिन उसकी कार्य क्षमता कम हो जा रही है। जब इंसुलिन रेजिस्टेंस ज्यादा हो जाता है तो इंसुलिन बॉडी में बनता रहता है और एक समय पर पैनक्रियाज थक जाता है, फिर ब्लड शुगर भी बढ़ने लगता है।
मीठा नहीं खाते तो डायबिटीज नहीं होगी? यह मिथक है
डॉ. कौशल सिंह ने एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही कि डायबिटीज मीठे की बीमारी नहीं है, यह लाइफस्टाइल मेटाबॉलिक डिसऑर्डर है। कार्बोहाइड्रेट जैसे कि चावल, मैदा, आलू, पोटैटो चिप्स, फ्रेंच फ्राइज और हमारे ज्यादातर फास्ट फूड्स भी शरीर में जाकर वही काम करते हैं जो शुगर करती है और कई बार मिठाई से भी ज्यादा काम करते हैं।
सिर्फ मीठा न खाना काफी नहीं है। अगर आपकी सेडेंटरी लाइफस्टाइल है, आप बहुत ज्यादा एक्सरसाइज नहीं करते, आपका स्ट्रेस लेवल ज्यादा है और फिजिकल एक्टिविटी बहुत कम है तो ये सारे फैक्टर्स भी डायबिटीज कॉज करते हैं। डॉ. कौशल ने कहा कि हमें सिर्फ 20 मिनट रोज देने हैं अपने शरीर को और यह बहुत है।
स्ट्रेस और नींद की कमी बढ़ाती है शुगर
डॉ. नवजोत कौर ने बताया कि स्ट्रेस और नींद की कमी का डायबिटीज पर बहुत ज्यादा इंपैक्ट है। बहुत बार लोग एक्सट्रीम डाइटिंग करते हैं, लेस कार्ब्स लेते हैं फिर भी शुगर कंट्रोल नहीं होती। जब हम क्रॉनिक स्ट्रेस में रहते हैं तो हमारी बॉडी स्ट्रेस हार्मोन्स जैसे कॉर्टिसोल रिलीज करने लग जाती है। यह स्ट्रेस हार्मोन्स हमारी बॉडी को अलर्ट मोड पर डालते हैं और साथ ही इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ा देते हैं।
डॉ. नवजोत ने कहा कि हाफ ट्रीटमेंट आपकी डाइट है पर हाफ आपका स्ट्रेस लेवल और लाइफस्टाइल मैनेजमेंट भी बहुत जरूरी है जो हम अक्सर इग्नोर कर देते हैं। कॉर्टिसोल बढ़ने से इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ जाती है और पैनक्रियाज थक जाता है, जिससे शुगर लेवल बढ़ने लगता है।
किन लोगों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए?
डॉ. दिव्य प्रकाश ने बताया कि कुछ लोगों को अपने शुगर लेवल्स पर ज्यादा ध्यान रखना चाहिए। जिनकी उम्र 35 साल से ज्यादा है, जो ओवरवेट हैं, जिनकी सेडेंटरी लाइफस्टाइल है, जिनकी फैमिली हिस्ट्री है यानी माता-पिता को शुगर रही है, उन्हें फ्रीक्वेंटली टेस्ट कराते रहना चाहिए।
महिलाओं में अगर प्रेगनेंसी में शुगर डिटेक्ट हो गई जिसे जेस्टेशनल डायबिटीज बोलते हैं, तो उन्हें भविष्य में भी चांस रहते हैं। जिन महिलाओं को पीसीओएस यानी पॉलीसिस्टिक ओवेरियन डिजीज है और जिनको पीरियड्स नॉर्मल नहीं आते, उन्हें भी रेगुलरली चेकअप कराना चाहिए।
कौन से टेस्ट कराने चाहिए?
डॉ. कौशल सिंह ने स्पष्ट किया कि कोई भी एक टेस्ट डायबिटीज को रूल इन या रूल आउट नहीं करता। डायबिटीज को तीन टेस्ट के माध्यम से देखना चाहिए – फास्टिंग ब्लड शुगर, पोस्टप्रांडियल शुगर या ओजीटीटी टेस्ट और एचबीए1सी। जब इन तीनों चीजों को साथ में कंसीडर करते हैं तब एक बेटर इंटरप्रिटेशन बन पाती है।
डॉ. कौशल ने कहा कि डायबिटीज का ट्रीटमेंट एक कॉम्पोजिट ट्रीटमेंट है और डायग्नोस्टिक अप्रोच लॉन्जिट्यूडनल होनी चाहिए। हर किसी की डायबिटीज सेम नहीं है – टाइप 1, टाइप 2, टाइप 1.5, मोडी, लाडा जैसे अलग-अलग टाइप होते हैं। इसलिए डायबिटीज को अपने डॉक्टर के साथ पार्टनरशिप में देखना जरूरी है।
बॉर्डरलाइन डायबिटीज में क्या गलतियां नहीं करनी चाहिए?
डॉ. नवजोत कौर ने बताया कि प्री डायबिटीज या बॉर्डरलाइन डायबिटीज बॉडी का एक वार्निंग साइन है। लेकिन ज्यादातर लोग दो तरीके से रिएक्ट करते हैं – या तो बिल्कुल डर जाते हैं और सब खाना पीना छोड़ देते हैं, या फिर बिल्कुल इग्नोर कर देते हैं। दोनों अप्रोचेस गलत हैं।
दूसरी गलती यह है कि लोग सिर्फ मीठा छोड़ देते हैं पर रिफाइंड कार्ब्स, प्रोसेस्ड फूड, लेट नाइट खाना, बिस्किट्स, मैदा नहीं छोड़ते। तीसरी गलती – फिजिकल एक्टिविटी नहीं बढ़ाते। चौथी गलती – स्ट्रेस मैनेज नहीं करते और नींद पूरी नहीं लेते। पांचवी और सबसे बड़ी गलती – दोबारा कभी रेगुलर टेस्टिंग नहीं करवाते।
डॉ. नवजोत ने कहा कि स्टडीज ने शो किया है कि अगर आप खाना खाने के बाद 10 से 20 मिनट वॉक भी कर लेंगे डेली तो ग्लूकोज स्पाइक के लेवल धीरे-धीरे घटने लग जाते हैं और शुगर काफी हद तक कंट्रोल होने लग जाती है।
क्या फैमिली हिस्ट्री होने पर डायबिटीज जरूर होगी?
डॉ. दिव्य प्रकाश ने कहा कि डायबिटीज एक मिक्स अप डिजीज है – कुछ जेनेटिक फैक्टर हैं, कुछ लाइफस्टाइल फैक्टर हैं। कुछ फैक्टर्स को हम मॉडिफाई कर सकते हैं, कुछ को नहीं। हम अपने माता-पिता को नहीं बदल सकते लेकिन जो मॉडिफायबल रिस्क फैक्टर्स हैं उनको डाइट और एक्सरसाइज से कंट्रोल कर सकते हैं।
डायबिटीज एक प्रोग्रेसिव डिसऑर्डर है जो समय के साथ बढ़ता है। अगर हम उस चीज को डिले भी कर दें या उसकी प्रोग्रेशन को रोक दें तो यह भी बहुत बड़ी उपलब्धि है। अगर किसी की एक गोली शुगर की चल रही है और अगले 10 साल बाद भी एक ही गोली चल रही है तो इसको भी बहुत अच्छा कंट्रोल मानेंगे।
विशेषज्ञों की सलाह – कम खाएं, ज्यादा चलें
डॉ. कौशल सिंह ने सबसे सिंपल सलाह दी – हम जरूरत से ज्यादा खा रहे हैं। हमारी कैलोरी इंटेक अभी भी वैसी ही है जैसे हमारे दादाओं की थी जो खेत में जाते थे। हम ऑफिस में बैठे रहते हैं, फिजिकल एक्टिविटी ऑलमोस्ट निल है। कम खाना बेहतर है, थोड़ा सा बॉडी का मूवमेंट जरूरी है। भूख से आधा खाओ और जरूरत से ज्यादा चलो।
डॉ. कौशल ने यह भी कहा कि भारत में रोटी-ब्रेड ज्यादा खाते हैं, सब्जी कम खाते हैं। सब्जी डबल कर दो और रोटियां कम कर दो। खाने से पहले दो कटोरी दाल और एक प्लेट सलाद खाओ, फिर रोटी खाओ तो भूख कम हो जाती है। सीजनल वेजिटेबल्स ज्यादा खाएं, आलू कम खाएं।
डॉ. नवजोत कौर ने अंत में कहा कि डायबिटीज एक एपिडेमिक बन चुका है लेकिन यह एक मेटाबॉलिक डिजीज है। इससे भागना नहीं है, इग्नोर भी नहीं करना। वेल इनफॉर्म्ड और वेल अवेयर रहिए। थोड़ी सी एक्सरसाइज, अच्छा खाना, कम स्ट्रेस, लाइफस्टाइल मैनेजमेंट और अच्छी नींद लीजिए। सिम्टम्स या बीमारी होने का वेट मत कीजिए, रेगुलर टेस्टिंग कराइए क्योंकि प्रिवेंशन इज ऑलवेज बेटर देन क्योर।
मुख्य बातें (Key Points)
- हर वक्त थकान, बार-बार पेशाब आना और ज्यादा प्यास लगना डायबिटीज के शुरुआती लक्षण हो सकते हैं
- फास्टिंग शुगर नॉर्मल होने का मतलब यह नहीं कि डायबिटीज नहीं है, पोस्टप्रांडियल और एचबीए1सी टेस्ट भी जरूरी हैं
- पेट पर चर्बी जमा होना (विसरल फैट) इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ाता है और डायबिटीज का कारण बनता है
- सिर्फ मीठा छोड़ना काफी नहीं, रिफाइंड कार्ब्स, प्रोसेस्ड फूड और सेडेंटरी लाइफस्टाइल भी डायबिटीज का कारण हैं
- स्ट्रेस और नींद की कमी कॉर्टिसोल हार्मोन बढ़ाकर शुगर लेवल बढ़ाते हैं
- 35 साल से ऊपर, ओवरवेट, फैमिली हिस्ट्री वाले लोगों को रेगुलर टेस्टिंग करानी चाहिए
- प्री डायबिटीज को डाइट, एक्सरसाइज और लाइफस्टाइल चेंज से डायबिटीज में बदलने से रोका जा सकता है
- खाने के बाद 10-20 मिनट वॉक करने से ग्लूकोज स्पाइक कंट्रोल होता है








