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The News Air - Breaking News - SC Menstrual Leave Petition Rejected: सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की मेंस्ट्रुअल लीव की मांग, कहा महिलाओं को नुकसान होगा

SC Menstrual Leave Petition Rejected: सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की मेंस्ट्रुअल लीव की मांग, कहा महिलाओं को नुकसान होगा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा मैंडेटरी मेंस्ट्रुअल लीव लागू हुई तो कंपनियां महिलाओं को नौकरी देना बंद कर देंगी, पॉलिसी बनाना सरकार का काम

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
सोमवार, 16 मार्च 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, लाइफस्टाइल, स्पेशल स्टोरी
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SC Menstrual Leave Petition Rejected
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SC Menstrual Leave Petition Rejected की खबर ने पूरे देश में बड़ी बहस छेड़ दी है। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज करते हुए मेंस्ट्रुअल लीव (पीरियड्स की छुट्टी) को सभी कार्यस्थलों और शैक्षणिक संस्थानों में अनिवार्य करने से मना कर दिया है। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह की दो जजों की बेंच ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि मैंडेटरी मेंस्ट्रुअल लीव महिलाओं के “बेस्ट इंटरेस्ट” में नहीं है, क्योंकि इससे एंप्लॉयर्स (नियोक्ता) महिलाओं को नौकरी देना ही बंद कर देंगे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह पॉलिसी का मामला है और इस पर फैसला सरकार और संसद को लेना चाहिए, न्यायपालिका को नहीं।

क्या थी PIL की मांग: हर महीने 2-3 दिन की पेड लीव

SC Menstrual Leave Petition Rejected से पहले यह समझना जरूरी है कि आखिर इस पिटीशन में क्या मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई जनहित याचिका में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को निर्देश देने की मांग की गई थी कि मेंस्ट्रुअल लीव को पूरे भारत में अनिवार्य (मैंडेटरी) किया जाए।

पिटीशन की प्रमुख मांगें इस प्रकार थीं: हर महीने 2 से 3 दिन की पेड मेंस्ट्रुअल लीव दी जाए, एक यूनिफॉर्म नेशनल पॉलिसी बनाई जाए जो सभी कार्यस्थलों पर लागू हो, यह सरकारी (पब्लिक) और निजी (प्राइवेट) दोनों सेक्टर की कर्मचारियों (एंप्लाइज) पर लागू हो, और स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों (एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस) में भी छात्राओं को यह छुट्टी मिले।

पिटीशनर का मुख्य तर्क यह था कि मेंस्ट्रुअल पेन (मासिक धर्म का दर्द) महिलाओं की उत्पादकता (प्रोडक्टिविटी) को काफी कम कर देता है और उन्हें शारीरिक तकलीफ (फिजिकल डिसकंफर्ट) से गुजरना पड़ता है। इसलिए यह एक पब्लिक हेल्थ इश्यू है, जेंडर जस्टिस का मामला है और संवैधानिक अधिकारों (कॉन्स्टिट्यूशनल राइट्स) का सवाल है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों खारिज की: ‘कोई महिलाओं को नौकरी नहीं देगा’

SC Menstrual Leave Petition Rejected में सुप्रीम कोर्ट का सबसे अहम तर्क यह रहा कि अगर मेंस्ट्रुअल लीव को अनिवार्य कर दिया गया तो इसका सबसे बुरा असर खुद महिलाओं पर ही पड़ेगा। कोर्ट ने कहा कि अगर यह मैंडेटरी किया गया तो:

नियोक्ताओं (एंप्लॉयर्स) को लगेगा कि महिलाओं को नौकरी देने से लागत (कॉस्ट) बढ़ जाएगी, क्योंकि हर महीने 2-3 दिन की अतिरिक्त पेड लीव देनी होगी। महिलाओं की कार्य समय में उपलब्धता (अवेलेबिलिटी) कम हो जाएगी। जो हाई प्रेशर रोल्स और क्रिटिकल पोजीशंस होती हैं, उनमें महिलाओं को नौकरी देने से कंपनियां बचने लगेंगी। कंपनियां सोचेंगी कि “इससे अच्छा पुरुषों को ही हायर कर लो।”

कोर्ट ने साफ कहा: “इफ मैंडेटरी लीव इज इंपोज्ड, नोबडी विल हायर वुमेन” (अगर अनिवार्य छुट्टी लागू की गई, तो कोई महिलाओं को नौकरी नहीं देगा)। यह सबसे बड़ी चिंता थी जिसके आधार पर कोर्ट ने पिटीशन खारिज की।

जेंडर स्टीरियोटाइप्स फिर से मजबूत होंगे: कोर्ट की चिंता

SC Menstrual Leave Petition Rejected में सुप्रीम कोर्ट ने एक और गहरी चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि अगर मेंस्ट्रुअल लीव अनिवार्य की गई तो जो जेंडर स्टीरियोटाइप्स (लैंगिक रूढ़ियां) हैं, वे फिर से मजबूत (रीइंफोर्स) हो जाएंगी। महिलाओं को फिर से इस नजरिए से देखा जाएगा कि वे शारीरिक रूप से कमजोर (फिजिकली वीकर) हैं और कम सक्षम (लेस कैपेबल) हैं।

पिछले कई वर्षों में महिला सशक्तिकरण और कार्यस्थल पर समानता के लिए जो मेहनत की गई है, वह सब पीछे चली जाएगी। एंप्लॉयर्स महिलाओं को “स्पेशल ट्रीटमेंट” वाली श्रेणी में देखेंगे और हमेशा एक अलग नजरिए से उनकी तरफ देखा जाएगा। कोर्ट ने कहा कि जो लैंगिक भेदभाव (जेंडर बायस) को खत्म करने की दिशा में प्रगति हुई है, वह इस एक फैसले से उलट सकती है।

कोर्ट ने कहा: यह सरकार और संसद का काम है

SC Menstrual Leave Petition Rejected में सुप्रीम कोर्ट ने “शक्तियों के पृथक्करण” (सेपरेशन ऑफ पावर्स) के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि यह पॉलिसी डिसीजन (नीतिगत फैसला) है और यह सरकार (एग्जीक्यूटिव) और संसद (लेजिस्लेचर) के कार्यक्षेत्र में आता है। न्यायपालिका (जुडिशरी) की भूमिका सरकार को ऐसे निर्देश देने की नहीं है।

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कोर्ट ने कहा कि इस तरह की पॉलिसी बनाने से पहले कई चीजों पर गहन विचार-विमर्श होना चाहिए: आर्थिक आकलन (इकोनॉमिक असेसमेंट), श्रम बाजार का विश्लेषण (लेबर मार्केट एनालिसिस), नियोक्ताओं से परामर्श (एंप्लॉयर कंसल्टेशन), महिला संगठनों से बातचीत (वुमन ऑर्गेनाइजेशन कंसल्टेशन) और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय (हेल्थकेयर इनपुट)। कोर्ट ने कहा कि यह सब काम संसद या सरकार का है, कोर्ट का नहीं।

संवैधानिक तर्क: दोनों पक्षों ने क्या कहा

SC Menstrual Leave Petition Rejected में कई संवैधानिक प्रावधानों का हवाला दिया गया। अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) के तहत समर्थकों ने तर्क दिया कि महिलाओं की बायोलॉजिकल रियलिटी (जैविक वास्तविकता) को देखते हुए “सब्सटेंटिव इक्वलिटी” (वास्तविक समानता) के लिए अलग व्यवहार (डिफरेंशियल ट्रीटमेंट) जरूरी है। विरोधियों ने कहा कि स्पेशल लीव देने से उल्टा असमानता (इनइक्वलिटी) बढ़ेगी।

अनुच्छेद 15(3) के तहत संविधान महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान (प्रोटेक्टिव लॉज) की अनुमति देता है, जैसे मैटरनिटी बेनिफिट्स, कार्यस्थल सुरक्षा कानून आदि। पिटीशनर्स ने तर्क दिया कि मेंस्ट्रुअल लीव भी इसी के तहत आनी चाहिए। अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) के तहत तर्क दिया गया कि मेंस्ट्रुअल हेल्थ शारीरिक गरिमा (बॉडीली डिग्निटी), स्वास्थ्य अधिकार और कार्यस्थल गरिमा (वर्कप्लेस डिग्निटी) से जुड़ा मामला है।

भारत और दुनिया में कहां क्या है कानून

SC Menstrual Leave Petition Rejected के संदर्भ में यह जानना दिलचस्प है कि भारत और दुनिया में इस मुद्दे पर कहां क्या स्थिति है। भारत में बिहार ने 1992 में ही महिला सरकारी कर्मचारियों को हर महीने 2 दिन की स्पेशल लीव देने की पॉलिसी बना दी थी, जो भारत की सबसे पुरानी मेंस्ट्रुअल लीव नीतियों में से एक है। केरल की यूनिवर्सिटीज में छात्राओं को मेंस्ट्रुअल लीव और अटेंडेंस में छूट दी जाती है। कॉर्पोरेट सेक्टर में Zomato, Swiggy जैसी कुछ कंपनियां स्वैच्छिक (वॉलंटरी) रूप से यह सुविधा दे रही हैं, लेकिन यह कंपनी-दर-कंपनी अलग है।

दुनिया में जापान ने 1947 में मेंस्ट्रुअल लीव शुरू की, लेकिन वहां महिलाएं खुद कार्यस्थल में स्टिग्मा (कलंक) के डर से लीव नहीं लेतीं। साउथ कोरिया में हर महीने एक दिन की लीव मिलती है और न लेने पर एक्स्ट्रा पे भी दिया जाता है। स्पेन 2023 में पहला यूरोपीय देश बना जिसने मेडिकल सर्टिफिकेट के आधार पर मेंस्ट्रुअल लीव दी। जांबिया में हर महीने एक दिन की “मदर्स डे लीव” बिना किसी मेडिकल सर्टिफिकेट के मिलती है।

विशेषज्ञों का सुझाव: वैकल्पिक समाधान अपनाएं

SC Menstrual Leave Petition Rejected के बाद कई विशेषज्ञों ने वैकल्पिक समाधान (अल्टरनेटिव सॉल्यूशंस) सुझाए हैं। इनमें फ्लेक्सिबल वर्क आवर्स (लचीला कार्य समय), वर्क फ्रॉम होम का विकल्प, मौजूदा पेड सिक लीव को मेंस्ट्रुअल पेन के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति, और कार्यस्थल पर बेहतर सैनिटेशन और हाइजीन सुविधाएं शामिल हैं। भारत में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी (फीमेल लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन) पहले से ही 37 से 40 प्रतिशत के बीच है, जो वैश्विक मानकों से काफी कम है। कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अनिवार्य मेंस्ट्रुअल लीव से यह दर और गिर सकती है।


मुख्य बातें (Key Points)
  • SC Menstrual Leave Petition Rejected: जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस कोटेश्वर सिंह की बेंच ने PIL खारिज की, कहा मैंडेटरी मेंस्ट्रुअल लीव से कंपनियां महिलाओं को हायर करना बंद कर देंगी।
  • कोर्ट ने कहा यह जेंडर स्टीरियोटाइप्स को फिर से मजबूत करेगा, महिलाओं को “कमजोर” और “कम सक्षम” के नजरिए से देखा जाएगा।
  • पॉलिसी बनाना सरकार और संसद का काम है, कोर्ट ने शक्तियों के पृथक्करण का हवाला दिया, इकोनॉमिक असेसमेंट और लेबर मार्केट एनालिसिस की जरूरत बताई।
  • बिहार में 1992 से महिला सरकारी कर्मचारियों को 2 दिन की स्पेशल लीव, जापान (1947), साउथ कोरिया, स्पेन (2023) और जांबिया में भी मेंस्ट्रुअल लीव के अलग-अलग प्रावधान।

FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1: सुप्रीम कोर्ट ने मेंस्ट्रुअल लीव की मांग क्यों खारिज की?

कोर्ट ने कहा कि मैंडेटरी मेंस्ट्रुअल लीव लागू करने से एंप्लॉयर्स महिलाओं को नौकरी देना बंद कर देंगे, जेंडर स्टीरियोटाइप्स मजबूत होंगे और यह महिलाओं के “बेस्ट इंटरेस्ट” में नहीं होगा। कोर्ट ने कहा यह पॉलिसी का मामला है जो सरकार और संसद तय करेगी।

Q2: भारत में कहीं मेंस्ट्रुअल लीव मिलती है?

हां, बिहार में 1992 से महिला सरकारी कर्मचारियों को हर महीने 2 दिन की स्पेशल लीव मिलती है। केरल की यूनिवर्सिटीज में छात्राओं को मेंस्ट्रुअल लीव और अटेंडेंस में छूट दी जाती है। Zomato जैसी कुछ कंपनियां स्वैच्छिक रूप से यह सुविधा देती हैं।

Q3: दुनिया में किन देशों में मेंस्ट्रुअल लीव का कानून है?

जापान (1947 से), साउथ कोरिया (हर महीने 1 दिन), स्पेन (2023 से मेडिकल सर्टिफिकेट पर) और जांबिया (हर महीने 1 दिन बिना सर्टिफिकेट) में मेंस्ट्रुअल लीव के कानून या प्रावधान हैं।

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अभिनव कश्यप

अभिनव कश्यप

अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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