India Population Policy Change की दिशा में एक बड़ा सुझाव आया है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) ने एक महत्वपूर्ण कार्य पत्र जारी किया है जिसमें नसबंदी के लिए दिए जाने वाले नकद प्रोत्साहन को तुरंत बंद करने और राज्यों में लागू Two-Child Rule जैसे दंडात्मक कानूनों को वापस लेने की सिफारिश की गई है। देखा जाए तो यह दशकों की जनसंख्या नीति में एक बड़ा U-Turn है।
जिस देश में दशकों तक “हम दो, हमारे दो” और “छोटा परिवार, सुखी परिवार” का नारा हर सरकारी दीवार पर लिखा था, वहां अब चिंता यह है कि कहीं भारत बूढ़ा तो नहीं हो रहा? हैरान करने वाली बात यह है कि भारत का Total Fertility Rate (TFR) अब 1.9 तक आ गया है, जो रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से कम है।
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Total Fertility Rate 1.9: रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे
India Population Policy Change की पृष्ठभूमि में सबसे महत्वपूर्ण है Total Fertility Rate (TFR) का गिरना। TFR का मतलब है कि एक महिला अपने पूरे जीवनकाल में औसतन कितने बच्चों को जन्म देती है।
समझने वाली बात यह है कि किसी देश की आबादी को स्थिर रखने के लिए TFR 2.1 होना चाहिए। इसे Replacement Level Fertility कहा जाता है – दो माता-पिता की जगह लेने के लिए दो बच्चे, और थोड़ा मार्जिन बाल मृत्यु दर के लिए।
लेकिन Sample Registration System (SRS) के अनुसार भारत का TFR अब 1.9 आ गया है। National Family Health Survey-6 (NFHS-6) के अनुमान भी लगभग 2.0 के आसपास हैं। यानी राष्ट्रीय स्तर पर भारत का रिप्लेसमेंट लेवल पहले ही नीचे जा चुका है।
Population Momentum: वर्तमान भीड़ भविष्य की कहानी नहीं
यहां एक स्वाभाविक सवाल उठता है: जब TFR 1.9 है तो लोकल ट्रेनों, मेट्रो स्टेशनों और सरकारी दफ्तरों में इतनी भीड़ क्यों दिखती है?
दिलचस्प बात यह है कि इसे विज्ञान में Population Momentum कहते हैं। आज हमारे यहां युवाओं का एक बहुत बड़ा वर्ग 20 से 35 साल की उम्र में है। वे शादी कर रहे हैं, परिवार बसा रहे हैं। इसलिए कुल जनसंख्या की गिनती कुछ और साल बढ़ेगी।
लेकिन – और यह बहुत महत्वपूर्ण है – जन्म के नए चक्र पर अब ब्रेक लग चुकी है। वर्तमान भीड़ पिछले दशकों के फैसलों का नतीजा है। आंकड़े जो अभी आ रहे हैं, वे भविष्य की कहानी बता रहे हैं।
2001 में 2.93 करोड़, 2023 में 2.32 करोड़ जन्म
India Population Policy Change की जरूरत इस तुलना से साफ हो जाती है: वर्ष 2001 में भारत में करीब 2 करोड़ 93 लाख बच्चे पैदा होते थे। वर्ष 2023 में यह संख्या घटकर 2 करोड़ 32 लाख हो गई है।
यानी कुल आबादी बढ़ने के बावजूद सालाना पैदा होने वाले बच्चों की संख्या में 60 लाख से ज्यादा की कमी आ चुकी है। आज भारत में सालभर में लगभग उतने ही बच्चे पैदा हो रहे हैं जितने 1974 में होते थे, जब देश की आबादी आज की आधी भी नहीं थी।
चिंता का विषय यह है कि आज जो बच्चे पैदा नहीं हुए, वे 2045 की फैक्ट्री में मजदूर नहीं होंगे, IT सेक्टर के इंजीनियर नहीं होंगे, और न ही बुजुर्गों की पेंशन उठाने वाले टैक्सपेयर होंगे।
राज्यों में भारी असमानता: सिक्किम 1.0, बिहार अभी भी ऊपर
India Population Policy Change में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि भारत में कोई एक औसत लागू नहीं होता। यहां राज्यों के बीच भारी असमानता है।
एक तरफ हैं वे राज्य जहां TFR दुनिया के सबसे विकसित देशों से भी कम है:
- सिक्किम: 1.0
- दिल्ली: 1.2
- तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल: 1.3
- पंजाब, महाराष्ट्र: 1.4
दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य हैं जहां TFR अभी भी राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है।
समस्या यह है कि हमारी नीतियां पूरे देश को एक ही चश्मे से देखती हैं। जो उपाय बिहार के किसी पिछड़े ग्रामीण इलाके के लिए तर्कसंगत हो सकता है, वही नियम केरल या बंगाल के लिए लागू करना आने वाली workforce पर कुठाराघात करना है।
80% परिवार नियोजन बजट सिर्फ नसबंदी पर
India Population Policy Change की रिपोर्ट में सबसे गंभीर बिंदु वित्तीय आवंटन का है। भारत में परिवार नियोजन बजट का 80% सिर्फ स्थाई नसबंदी (Terminal Methods) पर खर्च होता है।
अस्थाई उपायों जैसे गोलियां, कंडोम या IUCD के मुकाबले नसबंदी पर 10 गुना अधिक इंसेंटिव दिया जाता है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह प्रोत्साहन संरचना दशकों पुरानी है जब भारत जनसंख्या विस्फोट से जूझ रहा था।
रिपोर्ट गुजरात का उदाहरण देती है। गुजरात लगभग एक दशक से रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे है। फिर भी 2026 के फ्रेमवर्क में करीब 1.2 लाख लोगों की नसबंदी होती है और उससे जुड़े इंसेंटिव के लिए करीब 12 करोड़ रुपये का बजट रखा जाता है।
पश्चिम बंगाल और पंजाब में भी यही ढांचा चल रहा है। जिस राज्य में पहले से ही TFR बहुत कम है, वहां भी नसबंदी के लिए भारी प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
Two-Child Policy: जब राष्ट्रीय औसत ही 2 से कम हो
India Population Policy Change में दूसरी बड़ी सिफारिश है Two-Child Policy को वापस लेना। कुछ राज्यों में अब भी यह कानून जिंदा है: दो से ज्यादा बच्चे हुए तो आप पंचायत चुनाव नहीं लड़ सकते और कुछ सरकारी नौकरियों और योजनाओं से बाहर हो जाते हैं।
सवाल उठता है: जिस देश में राष्ट्रीय औसत दो बच्चों का भी नहीं बचा, वहां तीसरे बच्चे पर सजा का कानून रखना क्या तर्कसंगत है?
यह नीतिगत जड़ता का प्रमाण है। परिस्थितियां पूरी तरह बदल गई हैं लेकिन कानून पुराने ही चल रहे हैं। EAC-PM की रिपोर्ट का शीर्षक बहुत सटीक है: “The Ghost of Population Past” – जनसंख्या विस्फोट का वह पुराना डर जो बदली हुई परिस्थितियों के बाद भी हमारी फाइलों से बाहर नहीं निकल पाया।
जापान, दक्षिण कोरिया, चीन का उदाहरण
India Population Policy Change की जरूरत को समझने के लिए अन्य देशों के उदाहरण देखने चाहिए। जापान और दक्षिण कोरिया Demographic Trap में फंसे हुए हैं। वहां बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है लेकिन युवा workforce घट रही है।
सबसे बड़ा उदाहरण चीन का है। चीन ने चार दशक तक One-Child Policy जबरन थोपी। लेकिन आज चीन हाथ जोड़कर युवाओं से शादी करने, बच्चे पैदा करने की अपील कर रहा है। सब्सिडी बांट रहा है। लेकिन जन्म दर बढ़ने का नाम नहीं ले रही।
कारण बहुत साफ है: बच्चे न पैदा करना जब मजबूरी से बढ़कर एक सामाजिक जीवनशैली बन जाता है, तो उसे सरकारी चेक देकर रातोंरात नहीं बदला जा सकता। महंगी हाउसिंग, बच्चों की पढ़ाई का बेतहाशा खर्च, और अनिश्चित नौकरियां – ये वे वजहें हैं जिनसे लोग परिवार छोटा रखते हैं, न कि सरकारी इंसेंटिव की वजह से।
मुआवजा vs इंसेंटिव: ग्रामीण भारत का यथार्थ
India Population Policy Change की सिफारिशों की व्यावहारिक समीक्षा भी जरूरी है। क्या कल सुबह सारे इंसेंटिव पूरी तरह खत्म हो जाने चाहिए?
यहां दो पहलुओं को समझना जरूरी है। ग्रामीण भारत में जब कोई खेतिहर या दिहाड़ी मजदूर नसबंदी कराता है, तो सरकारी सहायता मुनाफे की लालच नहीं होती, बल्कि उस हफ्ते की छूटी हुई मजदूरी और recovery के दिनों का खर्च होती है।
अगर वह आर्थिक मदद अचानक बंद कर दी तो गरीब परिवारों पर सीधा वित्तीय बोझ पड़ेगा। यह मुआवजा है, इंसेंटिव नहीं।
दूसरा पहलू है सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का। उत्तर प्रदेश और बिहार के कई हिस्सों में अनचाहे गर्भ, मातृ मृत्यु दर आज भी बड़ी चुनौतियां हैं। जहां सुरक्षित परिवार नियोजन की सुविधा बंद नहीं होनी चाहिए।
राज्य-विशिष्ट नीति की जरूरत
India Population Policy Change का समाधान किसी एक extreme पर जाकर नहीं है। समाधान यह है:
- कम फर्टिलिटी वाले राज्यों में: Target-based नसबंदी अभियान तुरंत बंद हो। Two-Child Policy जैसे दंडात्मक कानून वापस लिए जाएं। फोकस मातृ स्वास्थ्य और बच्चों के बीच सही अंतर (birth spacing) पर हो।
- उच्च फर्टिलिटी वाले राज्यों में: परिवार नियोजन सेवाएं जारी रहें लेकिन जबरन नसबंदी के बजाय स्वैच्छिक और अस्थाई उपायों पर जोर हो। शिक्षा, विशेषकर लड़कियों की शिक्षा पर ध्यान दिया जाए।
- राष्ट्रीय स्तर पर: बाल देखभाल (childcare) सुविधाएं, शिक्षा और स्वास्थ्य इतना महंगा न हो कि परिवार बच्चा पैदा करने से डरने लगें।
2047 की तैयारी: कल की workforce आज पैदा होगी
India Population Policy Change इसलिए तत्काल जरूरी है क्योंकि नीति आज की नहीं, आने वाले 30 सालों के लिए बनानी होती है।
आजादी के बाद भारत का सबसे बड़ा डर यह था कि इतने सारे मुंहों को खाना कैसे खिलाया जाएगा। 2047 की ओर बढ़ते हुए भारत का सवाल बिल्कुल U-turn ले चुका है: अगर पर्याप्त युवा पैदा नहीं हुए तो फैक्ट्रियों को चलाने वाले हाथ कहां से आएंगे? करोड़ों बुजुर्गों की सामाजिक सुरक्षा का खर्च कौन उठाएगा?
उम्मीद की किरण यह है कि EAC-PM ने समय रहते इस विरोधाभास को पहचान लिया है। अब सरकार को इन सिफारिशों पर तेजी से काम करना होगा।
मुख्य बातें (Key Points)
• India Population Policy Change में EAC-PM ने नसबंदी के नकद प्रोत्साहन बंद करने और Two-Child Policy वापस लेने की सिफारिश की
• भारत का Total Fertility Rate (TFR) 1.9 आ गया है जो रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से कम है
• 2001 में 2.93 करोड़ बच्चे पैदा होते थे, 2023 में यह घटकर 2.32 करोड़ रह गया – 60 लाख की कमी
• सिक्किम (1.0), दिल्ली (1.2), केरल-बंगाल (1.3) में TFR बहुत कम, लेकिन UP-बिहार में अभी भी ऊपर
• परिवार नियोजन बजट का 80% सिर्फ स्थाई नसबंदी पर खर्च, अस्थाई उपायों पर ध्यान कम
• गुजरात जैसे राज्य जहां एक दशक से TFR कम है, वहां भी 1.2 लाख नसबंदी और 12 करोड़ का बजट










