Savarkar Controversy: साल 2022, 18 दिसंबर। कर्नाटक विधानसभा विरोध प्रदर्शन की आवाजों से गूंज उठी। विपक्षी दल के सभी नेताओं ने सदन से वॉकआउट किया और सड़क पर धरना-प्रदर्शन की पुरानी परंपरा को बखूबी निभाया। वजह? बस एक नाम— विनायक दामोदर सावरकर।
इस विरोध का कारण था सावरकर का लाइफ साइज पोर्ट्रेट जिसे कर्नाटक असेंबली के मेन हॉल में इंस्टॉल किया गया था। इसके साथ सुभाष चंद्र बोस, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. बी आर अंबेडकर जैसे कई महान लोगों के चित्र भी थे। पर क्या वजह थी कि सिर्फ सावरकर के पोर्ट्रेट के विरोध में इतना बड़ा हंगामा हो गया कि कर्नाटक सदन की कार्यवाई रोकनी पड़ी?
देखा जाए तो ऐसी क्या बात है कि सावरकर की मृत्यु के 57 साल बाद भी उनके नाम के जिक्र मात्र से हमारे जेहन में सवालों की बाढ़ आ जाती है? क्या वह एक फ्रीडम फाइटर थे या देशद्रोही? अगर देशद्रोही थे, तो क्यों ब्रिटिश क्राउन ने उन्हें 50 साल की आजीवन कारावास दी? क्या वीर सावरकर सच में वीर थे? अगर वीर थे तो क्यों उन्होंने ब्रिटिश राज को अपना माफीनामा दिया?
फादर ऑफ हिंदुत्व कहलाने वाले सावरकर ने क्यों खुद को नास्तिक का दर्जा दिया? आइए जानते हैं पूरा सच।
🔍 यह भी पढ़ें- Dr BR Ambedkar Legacy: शून्य से शिखर: डॉ. अंबेडकर की वो कहानी जो रोंगटे खड़े कर दे!
प्रारंभिक जीवन: एक विद्रोही का जन्म
28 मई 1883 को सावरकर का जन्म महाराष्ट्र के भगूर नामक गांव में दामोदर और राधाबाई सावरकर के घर हुआ। अपने माता-पिता को काफी छोटी उम्र में खो देने के कारण विनायक बचपन में ही समझ गए थे कि उनका जीवन आसान नहीं रहने वाला है।
सावरकर ने अपनी प्राइमरी शिक्षा शिवाजी स्कूल नासिक से की। पढ़ाई में वह असाधारण थे। लेखन और राजनीति में उनका रुझान बचपन से ही था। अपनी पहली कविता सावरकर ने 10 साल की उम्र में लिखी जिसे पुणे के एक स्थानीय अखबार में प्रकाशित किया गया।
दिलचस्प बात यह है कि दुनिया को 12 साल की उम्र में सावरकर के विद्रोही स्वभाव की पहली झलक देखने को मिली। जब अपने ही गांव में हिंदू-मुस्लिम दंगों के दौरान घायल हुए हिंदुओं का नेतृत्व सावरकर ने किया। इसी घटना के बाद गांव के लोगों ने उन्हें “वीर सावरकर” के नाम से बुलाना शुरू कर दिया।
सावरकर अपने जीवन में सबसे ज्यादा प्रभावित बाल गंगाधर तिलक और अपने बड़े भाई गणेश दामोदर सावरकर से थे। सावरकर तिलक को अपना गुरु मानने लगे और उनके द्वारा शुरू किए गए गणेश उत्सव का आयोजन अपने स्कूल और गांव में करने लगे।
साल 1901 में सावरकर का विवाह यमुना बाई से हुआ। यमुना बाई ने सावरकर की आर्थिक मदद की और अपने पिता से कहकर सावरकर का दाखिला फर्ग्यूसन कॉलेज पुणे में कराया।
💡 यह भी पढ़ें- Rule Change From 1st March 2026: LPG, CNG, WhatsApp, UPI, Train Ticket – जानें क्या सस्ता क्या महंगा
राजनीति की ओर कदम: अभिनव भारत सोसायटी
कॉलेज में कदम रखते ही सावरकर राजनीति में सक्रिय हो गए। तिलक द्वारा लगाई गई आजादी की चिंगारी अब सावरकर के दिमाग में एक आग बन चुकी थी।
साल 1903 में अपने बड़े भाई गणेश के साथ मिलकर सावरकर ने मित्र मेला नामक एक गुप्त सोसायटी का गठन फर्ग्यूसन कॉलेज में किया। इसे ही आगे चलकर 1906 में अभिनव भारत सोसायटी के नाम से जाना जाने लगा।
वहीं 1905 में जब स्वदेशी आंदोलन का आगाज हुआ, सावरकर देश के उन चंद व्यक्तियों में शामिल हुए जिन्होंने विदेशी कपड़ों की होली जलाई। और देखते ही देखते यह होली देश के कोने-कोने में जलने लगी।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इसी विशाल विदेशी कपड़ों की होली में खुद बाल गंगाधर तिलक ने भाग लिया था। हालांकि इन सब गतिविधियों के चलते 1906 में फर्ग्यूसन कॉलेज से सावरकर को निष्कासित कर दिया गया।
लंदन यात्रा: इंडिया हाउस और क्रांति की शुरुआत
लेकिन किसे पता था कि सावरकर का जीवन अब एक नए और विवादास्पद रास्ते पर जाने वाला था। दरअसल स्वदेशी आंदोलन में सावरकर का योगदान देखते हुए उन्हें श्यामाजी कृष्ण वर्मा ने छात्रवृत्ति दी। जिसकी मदद से सावरकर का दाखिला ग्रेस इन लॉ यूनिवर्सिटी लंदन में हो गया।
3 जुलाई 1906 को सावरकर ने लंदन में कदम रखा। सावरकर ने लंदन आते ही इंडिया हाउस में शरण ले ली। यह श्यामाजी कृष्ण वर्मा द्वारा लंदन में स्थापित भारतीय छात्रों और स्वतंत्रता सेनानियों के लिए घर से दूर एक घर था।
देखते ही देखते सावरकर कृष्ण वर्मा के सबसे भरोसेमंद साथी बन गए। सावरकर ने देश से दूर लंदन में एक और सोसायटी का निर्माण किया जिसका नाम फ्री इंडिया सोसायटी रखा गया।
समझने वाली बात यह है कि धीरे-धीरे सावरकर की देशभक्ति में फिर से उबाल आने लगा। देश और उनके बीच की दूरी उन्हें रोकने में असमर्थ दिखाई दी, जब उन्होंने लंदन से भारत में बम मैनुअल्स सप्लाई करना शुरू किया।
मदन लाल ढींगरा हत्याकांड और गिरफ्तारी
इन्हीं सोसायटी की मीटिंग्स में सावरकर की मुलाकात मदन लाल ढींगरा से हुई। ढींगरा सावरकर के भाषणों से काफी प्रभावित थे। धीरे-धीरे आजादी के दो दीवानों में गहरी दोस्ती हो गई।
और इस दोस्ती का धमाका 1 जुलाई 1909 को पूरी दुनिया ने सुना, जब इंपीरियल इंस्टिट्यूट लंदन की सीढ़ियों पर ढींगरा ने सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया के सलाहकार कर्जन वायली को गोली मार दी।
दिलचस्प बात यह है कि इस हत्या के दौरान वैसे तो सावरकर ढींगरा के साथ नहीं थे, पर इंग्लैंड पुलिस को अपने सूत्रों से जानकारी मिली कि ढींगरा को रिवॉल्वर सावरकर द्वारा ही सप्लाई की गई थी।
इसके बाद कुछ समय के लिए सावरकर अंडरग्राउंड हो गए। वहीं दूसरी तरफ अंग्रेजी हुकूमत ने भारत में डिवाइड एंड रूल की नीति को लागू करने की तैयारी कर ली।
1909 में ब्रिटिशर्स ने भारत में मॉर्ली-मिंटो सुधार लागू किए। इन सुधारों के तहत एक प्रावधान भारत में धर्म के आधार पर अलग मतदाता प्रदान करना भी था। यानी अब प्रांतीय परिषद में मुस्लिम सदस्यों को मुस्लिम मतदाता ही चुनने का अधिकार रखेंगे।
इस नीति का विरोध वैसे तो लगभग हर राष्ट्रवादी नेता ने किया, पर इसके खिलाफ सशस्त्र क्रांति शुरू की सावरकर के बड़े भाई गणेश दामोदर और अभिनव भारत सोसायटी ने।
इसके बाद गणेश दामोदर पर राजद्रोह के आरोप लगाते हुए डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट एटीएम जैक्सन ने उन्हें कोर्ट के सामने पेश किया और 8 जून 1909 को गणेश दामोदर को आजीवन कारावास यानी काला पानी की सजा सुनाई गई।
सावरकर इस दौरान लंदन में थे और गणेश दामोदर जेल जा चुके थे। इस तरह अभिनव भारत सोसायटी अपने दोनों संस्थापकों के बिना अनाथ सी हो गई थी।
इसी बीच एक नाम ने ब्रिटिश हुकूमत को एक बार फिर हिलाकर रख दिया। वह नाम था अनंत कान्हेरे। अनंत भी अभिनव भारत के सदस्य थे और गणेश दामोदर की काला पानी की सजा से आहत थे। अनंत के गुस्से ने आग का रूप लिया और 21 दिसंबर 1909 को उन्होंने एटीएम जैक्सन को गोली मार दी।
क्योंकि अभिनव भारत सोसायटी के संस्थापक सावरकर थे, जैक्सन की हत्या की साजिश में सीधा शक सावरकर पर जाना भी स्वाभाविक था। ब्रिटिश फोर्सेज ने कान्हेरे के साथियों से कुछ पत्र बरामद किए जो सावरकर ने उन्हें भेजे थे।
जांच के बाद सामने आई रिपोर्ट से ब्रिटिशर्स के होश उड़ गए, क्योंकि खुलासा हुआ कि जिस पिस्टल से जैक्सन को हत्या की गई थी, वो विनायक दामोदर ने इंग्लैंड से भारत सप्लाई की थी। इसका नतीजा यह हुआ कि ब्रिटिश हुकूमत ने सावरकर के नाम पर तत्काल गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया।
वारंट के बावजूद ब्रिटिशर्स को करीब एक साल लगा सावरकर को गिरफ्तार करने में। दरअसल, वारंट की खबर मिलते ही रातोंरात सावरकर इंग्लैंड छोड़कर मैडम भीकाजी कामा के घर पेरिस के लिए निकल गए। हालांकि इसके कुछ दिनों बाद वह फिर इंग्लैंड लौटे और 13 मार्च 1910 को लंदन में कदम रखते ही पुलिस ने सावरकर को गिरफ्तार कर लिया।
💡 यह भी पढ़ें- Gold Price Today: सोने-चांदी की कीमतों में भारी गिरावट, जानें ताजा भाव Gold Price Today Forecast
प्रसिद्ध पलायन प्रयास: फ्रांस में शरण की मांग
ब्रिटिश अधिकारी सावरकर को लेकर भारत के लिए मौर्य नामक जहाज में लंदन से रवाना हुए। पर सावरकर इतनी आसानी से हार मानने वालों में से नहीं थे। जैसे ही ब्रिटिश शिप मार्से फ्रेंच पोर्ट पर पहुंचा, सावरकर जहाज से भाग गए।
सावरकर ने फ्रांस की धरती पर कदम रखते ही फ्रेंच सरकार से राजनीतिक शरण की मांग की। सावरकर को कानून का ज्ञान था। वह जानते थे कि किसी विदेशी देश में गिरफ्तारी को टालना उनके लिए आसान होगा।
अब सवाल यह खड़ा हुआ कि सावरकर का असली हकदार कौन? फ्रांस या ब्रिटिश? यह मामला Permanent Court of Arbitration तक पहुंच गया। हालांकि कुछ महीनों बाद कोर्ट का फैसला ब्रिटिशर्स के हक में आया और सावरकर को आखिरकार भारत लाया गया।
काला पानी: सेलुलर जेल की सजा
साल 1911, 4 जुलाई को ब्रिटिश इंडियन कोर्ट ने 28 साल के सावरकर को Section 121 IPC (ब्रिटिश क्राउन के खिलाफ साजिश) के तहत 50 साल आजीवन कारावास यानी काला पानी की सजा सुनाई और सेलुलर जेल अंडमान भेज दिया।
सावरकर 1924 में जेल से काफी संघर्ष के बाद रिहा हुए। फिर भी ब्रिटिश सरकार ने सावरकर को 1937 तक रत्नागिरी में नजरबंद रखा, जो ब्रिटिश हुकूमत में सावरकर के खौफ को साफ दर्शाता है।
लेखन: 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम
सावरकर ने राजनीति के साथ आजादी के लिए कलम का भी बखूबी इस्तेमाल किया। उन्होंने “द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस 1857” नामक किताब 1909 में लिखी, जिसने उस वक्त के क्रांतिकारियों के लिए एक ग्रंथ का रूप ले लिया था।
क्योंकि सावरकर पहले आदमी थे जिन्होंने 1857 के विद्रोह को भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम बताया। ब्रिटिश क्राउन ने तो दुनिया के सामने इसे बस एक विद्रोह (Mutiny) का नाम दे दिया था।
इसके अलावा सावरकर उस दौर में जेल गए जब कैदियों को किताबें और कलम की सुविधाएं जेल में नहीं मिलती थीं। इसके बावजूद सावरकर ने लगभग 7000 कविताएं भारत मां के लिए जेल में बनाईं और याद कीं। यह प्रमाण था उस शख्स की अटूट देशभक्ति का, उसकी हार न मानने वाली आत्मशक्ति का।
विवादास्पद माफीनामे: क्यों लिखे?
लेकिन सेलुलर जेल में सजा काटने के दौरान सावरकर द्वारा लिखे माफीनामे आज भी एक क्रांतिकारी के दामन पर दाग का काम कर रहे हैं।
सावरकर ने अंडमान जेल यानी काला पानी से ब्रिटिश सरकार को अपनी पहली क्षमा याचिका (Clemency Petition) यानी माफीनामा 3 सितंबर 1911 को भेजा, जो ब्रिटिशर्स ने खारिज कर दिया।
इसके बाद 14 नवंबर 1913 को जब इंडियन गवर्नर जनरल्स काउंसिल के सदस्य रेजिनल क्रैडॉक जेल के दौरे पर आए, तब सावरकर ने अपनी दूसरी याचिका सीधे उनको सौंपी। जिसमें सावरकर ने लिखा था कि वह अब हिंसा का समर्थन नहीं करते और ब्रिटिश सरकार को किसी भी क्षमता में सेवा करने के लिए तैयार हैं। बस उन्हें यहां से बाहर निकाला जाए।
सावरकर की इस याचिका को भी ब्रिटिश कोर्ट ने अस्वीकार कर दिया। सावरकर ने 1917 में तीसरी याचिका दायर की। इस बार उन्होंने अपने साथ-साथ जेल के सभी राजनीतिक कैदियों के लिए सामान्य माफी (General Amnesty) की मांग अंग्रेज सरकार से की। पर एक बार फिर याचिका को नकार दिया गया।
सावरकर ने हार न मानते हुए एक और याचिका साल 1920 में दायर की। जिसका आधार उन्होंने 1920 में आई ब्रिटिश क्राउन के Declaration of Clemency for Political Prisoners को बनाया। इसके बाद ब्रिटिश क्राउन ने अंततः 1921 में सावरकर को अंडमान जेल से रत्नागिरी जेल में शिफ्ट कर दिया।
माफीनामे के पीछे के कारण
सावरकर से ब्रिटिश सरकार ने एक घोषणापत्र (Declaration) साइन कराया जिसमें लिखा था कि सावरकर अपने दोषसिद्धि, ब्रिटिश कोर्ट के फैसले और भारत में ब्रिटिश शासन को अच्छा मानते हैं। और यही घोषणापत्र बना सावरकर और उनके भाई गणेश की आजादी और बदनामी दोनों का कारण।
अगर बात माफीनामे के पीछे के कारणों की करें, तो उसका एक कारण सेलुलर जेल या काला पानी का माहौल था। यहां सजा का इतिहास यातनापूर्ण और क्रूर रहा है:
- छह महीनों तक का एकांत कारावास
- तेल पीसने की मशीनों को हाथों से चलाना
- हफ्तों तक खाना न मिलना
ये सब सजाएं अमानवीय थीं।
2001 में द गार्डियन ने अपने लेख “Survivors of the Hell” में सेलुलर जेल के आखिरी जीवित कैदियों में से एक धीरेंद्र चौधरी का इंटरव्यू लिया। चौधरी साहब ने चार शब्दों में अपना गुस्सा जाहिर कर दिया। उन्होंने कहा, “We are forgotten victims.”
सावरकर कानून के जानकार थे। इसलिए उन्हें पता था कि राजनीतिक कैदियों के कुछ अधिकार होते हैं। सावरकर ने जेल में निरक्षर कैदियों को पढ़ाना शुरू किया और सेलुलर जेल में लाइब्रेरी भी बनवाई। जिसे आज लोग माफीनामा कहते हैं, वह उनका कानूनी अधिकार था। जिसमें उन्हें कुछ गलत नहीं लगा।
काला पानी के जीवन संघर्ष के साथ-साथ वह अपनी पत्नी यमुना देवी के लिए भी बहुत चिंतित थे। ब्रिटिशर्स ने उन्हें गिरफ्तार करने के बाद उनकी सारी संपत्ति जब्त कर ली। जिसका परिणाम उनकी पत्नी यमुना देवी को बाहर रहकर अकेले झेलना था।
काफी इतिहासकारों का यह भी कहना है कि सावरकर वह व्यक्ति थे जो अपने जीवन और समय के मूल्य को जानते थे। इसी के चलते उन्होंने यह घोषणापत्र और क्षमा याचिकाएं दायर कीं। उन्हें पता था कि वह देश और अपने समाज के लिए जेल में 50 साल गुजारकर कुछ हासिल नहीं कर पाएंगे। बस इसीलिए वह किसी भी तरह जेल से बाहर आना चाहते थे।
हिंदुत्व विचारधारा: फादर ऑफ हिंदुत्व
सावरकर चाहे लंदन में थे या काला पानी में, एक चीज जिसने उन्हें टूटने नहीं दिया, वो था हिंदुत्व और उनका हिंदू एकता के लिए काम करने का जोश।
हालांकि हिंदू धर्म में विश्वास रखते हुए भी सावरकर हिंदुओं की रूढ़िवादी धार्मिक प्रथाओं के बहुत बड़े आलोचक माने गए हैं। उनका मानना था कि हिंदुओं के कुछ धार्मिक अंधविश्वास ही हिंदुओं की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा हैं।
साथ ही सावरकर ने अपने पूरे जीवनकाल में भारत में जाति व्यवस्था का विरोध किया। 1931 के अपने लेख “Seven Shackles of the Hindu Society” में हिंदुओं के सारे अंधविश्वासों में उन्होंने सबसे खराब कठोर जाति व्यवस्था को माना।
इसके अलावा रत्नागिरी जेल में रहते हुए सावरकर ने एक पुस्तक लिखी जिसका नाम था “हिंदुत्व: हू इज ए हिंदू?” और इसी को आधार माना जाता है हिंदुत्व की थ्योरी का।
इस पुस्तक में सावरकर ने स्पष्ट शब्दों में हिंदू की परिभाषा लिखते हुए कहा कि हर वह इंसान जो हिंदुस्तान में पैदा हुआ है, वह हिंदू है। कहने का मतलब है कि हिंदू होना किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन जीने का सही तरीका है।
सावरकर ने अपनी हिंदुत्व की परिभाषा के तीन स्तंभ बताए हैं:
- एक देश (Rashtra)
- एक संस्कृति (Sanskriti)
- एक जाति (Jati)
सावरकर का मानना था कि जैन, बौद्ध और सिख भी हिंदुओं की शाखाएं हैं जो सामान्य रक्त साझा करती हैं और जिनका एकजुट होना हमारी पहचान और देश में फैलते पश्चिमीकरण को रोकने के लिए बहुत जरूरी है।
इच्छा मृत्यु: अंतिम निर्णय
अगर बात करें सावरकर की मृत्यु की, तो उन्होंने अपने लिए इच्छा मृत्यु चुनी। 1 फरवरी 1966 को अचानक सावरकर ने अपनी दवाइयां, भोजन, यहां तक कि पानी को भी त्याग दिया।
अपने मृत्यु शैय्या पर उन्होंने एक लेख लिखा “आत्महत्या नहीं आत्मार्पण” जिसमें सावरकर ने लिखा था कि जब आदमी का जीवन मिशन पूरा हो जाए और समाज को सेवा करने की इच्छा न रह जाए, तो उसे मृत्यु का इंतजार नहीं करना चाहिए, बल्कि खुद मृत्यु के पास चले जाना चाहिए।
अपनी मृत्यु से पहले उनके रिश्तेदारों से उनकी आखिरी इच्छा थी कि उनका बस हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार हो, लेकिन 13 दिन का शोक न रखा जाए।
इस तरह 26 फरवरी 1966 को विनायक दामोदर सावरकर ने अपनी इच्छा मृत्यु को स्वीकार किया।
विश्लेषण: फाइटर या कायर?
अब ऐसे इंसान को आप फाइटर कहेंगे या कायर? देखा जाए तो सावरकर एक बेहद जटिल व्यक्तित्व थे। उनके जीवन में:
- एक तरफ क्रांतिकारी गतिविधियां, ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या में भूमिका, 50 साल की सजा
- दूसरी तरफ माफीनामे, ब्रिटिश सरकार की सेवा करने की पेशकश
यह विरोधाभास ही उन्हें विवादास्पद बनाता है। कुछ लोग उन्हें वीर मानते हैं जिन्होंने रणनीतिक रूप से जेल से बाहर आकर समाज सेवा की। कुछ उन्हें देशद्रोही मानते हैं जिन्होंने ब्रिटिश सरकार से माफी मांगी।
सच शायद बीच में कहीं है। सावरकर ने अपने तरीके से देश की सेवा की, लेकिन उनके कुछ निर्णय आज भी बहस के विषय हैं।
मुख्य बातें (Key Points)
- विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई 1883, महाराष्ट्र में हुआ
- अभिनव भारत सोसायटी की स्थापना की, ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या में भूमिका
- 50 साल काला पानी की सजा, सेलुलर जेल अंडमान में कैद
- कई माफीनामे लिखे, जो आज भी विवादित हैं
- “हिंदुत्व: हू इज ए हिंदू?” पुस्तक लिखी, हिंदुत्व विचारधारा के जनक
- 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम पुस्तक लिखी
- 26 फरवरी 1966 को इच्छा मृत्यु स्वीकार की












