Russia India Oil Deal US Treasury Iran War 2026 : जब-जब अमेरिका किसी देश को ‘हमलावर’ कहता है और बंदिशें लगाता है, तब-तब वक्त आने पर उसे उन्हीं बंदिशों को खुद तोड़ना पड़ता है। यही हो रहा है आज रूस के साथ। अमेरिका ने अपनी ट्रेजरी के जरिए डेढ़ पन्ने का एक ऐतिहासिक दस्तावेज जारी किया है जिसमें भारत को 30 दिनों के लिए रूस से कच्चा तेल खरीदने की खुली इजाजत दे दी गई है। वह रूस जिसे कल तक ट्रंप प्रशासन ‘हमलावर देश’ कह रहा था, आज वही रूस यूरोप को ऊर्जा संकट से बचाने का एकमात्र रास्ता बन गया है और उस रास्ते पर खड़ा है भारत।
‘होर्मुज बंद, यूरोप प्यासा: असली संकट क्या है?’
असल में अमेरिका-इसराइल-ईरान युद्ध का सबसे बड़ा नुकसान किसी देश की सेना को नहीं बल्कि दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति को हुआ है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर ईरान ने प्रभावी नियंत्रण कर लिया है और एक भी तेल टैंकर वहाँ से नहीं गुज़र पा रहा। अमेरिका ने दुनिया के तमाम देशों को भरोसा दिलाया था कि यह रूट उसकी निगेहबानी में सुरक्षित रहेगा। लेकिन सब कुछ ठप पड़ा हुआ है।
इसी बीच व्लादिमीर पुतिन ने अपना सबसे बड़ा हथियार चला दिया। उन्होंने खुलकर एलान किया कि रूस अब यूरोप को कोई एनर्जी एक्सपोर्ट नहीं करेगा। पुतिन के इस बयान ने वाशिंगटन में भूचाल ला दिया। यूरोप में ऊर्जा का संकट गहराने लगा। अमेरिका के पास तेल तो है, लेकिन वो रूट और वो कीमत नहीं है जिससे वह यूरोप को सस्ती ऊर्जा दे सके।
’30 दिन की रियायत: अमेरिकी ट्रेजरी का ऐतिहासिक दस्तावेज’
इसी खलबली में अमेरिकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने पहली बार एक नए पैक्ट के तहत भारत को 30 दिनों के लिए रूस से तेल खरीदने की औपचारिक इजाजत दी। यह दस्तावेज महज डेढ़ पन्नों का है, लेकिन इसके पीछे की कहानी बेहद गहरी है। इस डील का मकसद सिर्फ भारत नहीं है, बल्कि पूरा यूरोपीय बाजार है।
यूक्रेन-रूस युद्ध के दौरान भी यही फॉर्मूला काम कर चुका था। रूस से सस्ते में कच्चा तेल खरीदकर भारत की रिफाइनरियाँ उसे रिफाइन करके यूरोप को बेचती थीं। रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर, वडिनार और मंगलोर जैसी बड़ी रिफाइनरियाँ इस प्रक्रिया का केंद्र रहीं। 2024 में भारत ने यूरोप को अधिकतम 19.2 अरब डॉलर का रिफाइंड तेल भेजा था।
‘आंकड़े बोलते हैं: रूसी तेल पर भारत की निर्भरता और बदलाव’
ट्रंप के सत्ता में आने के बाद भारत पर बंदिशें लगनी शुरू हुईं तो यह आंकड़े बदल गए। जून 2025 तक भारत रूस से 2.09 मिलियन बैरल प्रेतिदिन तेल ले रहा था, यानी भारत का 40% तेल रूस से आता था। दिसंबर तक यह घटकर 1.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन हो गया और जनवरी 2026 में 1.16 मिलियन बैरल पर आ गया। यानी लगभग आधा हो गया।
अब इस नई 30 दिन की रियायत के साथ वही सिलसिला फिर शुरू होने की राह खुल गई है। लेकिन इस बार रूस अपनी शर्तों पर तेल देगा। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की मौजूदा कीमत 84 डॉलर प्रति बैरल है, लेकिन रूस भारत को 4-5 डॉलर अधिक यानी 88-89 डॉलर प्रति बैरल पर तेल देगा। वो रियायत जो यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस दे रहा था, अब खत्म हो चुकी है।
‘रूस की चाल: यूरोप को दबाकर अमेरिका पर हावी’
पुतिन की रणनीति समझने वाली है। रूस एक झटके में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ाकर सबको घुटनों पर ला सकता था। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उसने भारत को तेल देने की सहमति जताई, लेकिन अपनी कीमत पर। इसका सीधा मतलब है कि रूस ने यूरोप पर अपनी ऊर्जा-निर्भरता को हथियार बनाते हुए अमेरिका को यह संदेश दे दिया कि बिना रूस के आगे बढ़ना मुश्किल है।
पुतिन ने खुलकर कहा कि अगर यूरोप 2027 में रूसी ऊर्जा छोड़ने की बात कर रहा था, तो हम अभी से उसे ‘स्वतंत्र’ कर देते हैं। इस बयान ने यूरो के बाजारों में भय का माहौल बना दिया और इटली की संसद में, कनाडा में, स्पेन में, ब्रिटेन और फ्रांस में ट्रंप के खिलाफ आवाजें उठने लगीं। इटली के ग्रीन और लेफ्ट एलायंस ने संसद के भीतर ही ट्रंप के खिलाफ नारे लगाए।
‘भारत की संप्रभुता या ट्रंप-मोदी ट्रेड डील का हिस्सा?’
इस पूरे घटनाक्रम ने भारत के भीतर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ट्रंप के बीच हुई ट्रेड डील का यह हिस्सा है जिसमें अमेरिका जो कहे, भारत उसी पर चले? या भारत अमेरिका और रूस के बीच एक स्वतंत्र खिलाड़ी की तरह अपना संतुलन बना रहा है?
दुनिया के कई देश अब यह कहने से नहीं हिचकते कि अमेरिका कह रहा है और भारत तय कर रहा है, यह स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। दूसरी तरफ भारत की रिफाइनरियों के लिए यह डील फायदेमंद ज़रूर है। चाबहार बंदरगाह से भारत पहले ही बाहर हो चुका है और ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों ने उस रिश्ते को और जटिल बना दिया है।
‘अमेरिका और ईरान: दोनों लंबी जंग की तैयारी में’
अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा: “ईरान सोचता है कि हम टिक नहीं पाएंगे, यह उसकी बड़ी गलतफहमी है। हमारी प्रतिबद्धता और हमारी क्षमता दोनों बढ़ रही हैं।” दूसरी तरफ ईरान के डिप्टी विदेश मंत्री सैयद खातिबज़ादेह ने कहा: “हम आखिरी गोली और आखिरी सैनिक तक यह जंग लड़ेंगे। जब तक अमेरिका पीछे नहीं हटता, जंग चलती रहेगी।”
दोनों के बयानों से एक बात साफ है: यह जंग जल्दी खत्म होने वाली नहीं है। और जंग जितनी लंबी खिंचेगी, तेल का संकट उतना गहरा होगा और भारत की भूमिका उतनी अहम होती जाएगी।
‘BRICS और भारत: सबसे बड़ा सवाल 2026 में’
इस पूरे खेल में सबसे उलझाने वाला सवाल यह है। 2026 में भारत की अगुवाई में BRICS की बैठक होनी है। ईरान, चीन और रूस — तीनों BRICS देश अमेरिका के खिलाफ एक ध्रुव बनाते दिख रहे हैं। लेकिन इसी दौर में भारत अमेरिकी ट्रेजरी के निर्देश पर रूस से तेल खरीदने की हरी झंडी दे रहा है। BRICS के दूसरे सदस्यों के लिए यह सबसे बड़ा सवाल बन चुका है कि भारत इस युद्धकाल में किसके लिए काम कर रहा है?
यह सवाल भारत की विदेश नीति की परीक्षा भी है और उसकी रणनीतिक स्वायत्तता का परीक्षण भी।
‘मुख्य बातें (Key Points)’
- अमेरिकी ट्रेजरी ने 30 दिनों के लिए भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदने की आधिकारिक इजाजत दी, जो होर्मुज बंद होने और यूरोपीय एनर्जी संकट के बीच एक बड़ी कूटनीतिक चाल है।
- Reliance जैसी भारतीय रिफाइनरियाँ रूसी कच्चे तेल को रिफाइन करके यूरोप को निर्यात करेंगी, यह 2024-25 से भी चलता आ रहा मॉडल है जिसमें भारत ने अधिकतम 19.2 अरब डॉलर का रिफाइंड तेल यूरोप भेजा था।
- पुतिन ने यूरोप को एनर्जी न देने की धमकी देकर अमेरिका को रूस पर निर्भर करने की नई नीति अपनाई, जो अमेरिका की कमज़ोरी की सबसे बड़ी स्वीकृति है।
- 2026 में BRICS की अध्यक्षता भारत के पास है, लेकिन अमेरिका के निर्देश पर काम करता भारत BRICS देशों में सबसे बड़ा सवाल बन चुका है।








