Repo Rate Hike RBI ने आम आदमी और कारोबारियों दोनों को चौंका दिया है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने करीब 4 साल बाद पहली बार रेपो रेट में बढ़ोतरी का फैसला किया है। रेपो रेट को 25 बेसिस पॉइंट (0.25%) बढ़ाकर 5.25% से 5.5% कर दिया गया है। इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि RBI ने अपना पॉलिसी स्टैंस ‘न्यूट्रल’ से बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ कर दिया है, जिसका सीधा मतलब है कि आने वाले महीनों में ब्याज दरें और बढ़ सकती हैं।
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‘कोविड से अब तक: रेपो रेट का पूरा सफर’
देखा जाए तो रेपो रेट के उतार-चढ़ाव की कहानी काफी दिलचस्प है। 2020 में कोविड महामारी के दौरान जब अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई थी और ग्रोथ रेट नेगेटिव में चली गई थी, तब RBI ने रेपो रेट को घटाकर 4% के आसपास ला दिया था। मकसद साफ था: सस्ते लोन मिलेंगे तो लोग खर्च करेंगे, उधार लेंगे और अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटेगी।
जैसे-जैसे कोविड का असर कम हुआ, 2023 से महंगाई तेजी से बढ़ने लगी। RBI ने रेपो रेट बढ़ाते-बढ़ाते 6.5% तक पहुंचा दिया। इसके बाद धीरे-धीरे कटौती शुरू हुई और रेट 5.25% पर आकर अटक गया। अब जब पूरी दुनिया में रेट बढ़ रहे हैं, तो RBI ने भी 4 साल बाद पहली बार रेट बढ़ाने का फैसला किया।
‘दुनिया भर में ब्याज दरों का तूफान: भारत अकेला नहीं’
अगर गौर करें तो यह फैसला अकेले भारत तक सीमित नहीं है। रूस-यूक्रेन युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ, अमेरिका-ईरान तनाव जारी है, सऊदी अरब और यमन के बीच संघर्ष चल रहा है। इन सबके बीच दुनिया के केंद्रीय बैंक लगातार ब्याज दरें बढ़ा रहे हैं। अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने भी हाल ही में इंटरेस्ट रेट बढ़ाया है। ऐसे में भारत का इस ‘ग्लोबल रेट टाइटनिंग वेव’ में शामिल होना लगभग तय था।
‘RBI के फैसले के पीछे 4 बड़े कारण’
समझने वाली बात यह है कि RBI ने यह फैसला सिर्फ एक कारण से नहीं लिया है। इसके पीछे चार बड़े कारक काम कर रहे हैं:
पहला कारण: कच्चा तेल। पिछले एक साल से अमेरिका-ईरान संघर्ष और सऊदी-यमन तनाव की वजह से क्रूड ऑयल की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने से इंपोर्ट बिल बढ़ता है, डॉलर की मांग बढ़ती है, रुपये पर दबाव आता है और आयातित महंगाई बढ़ती है।
दूसरा कारण: कमजोर मानसून और एल नीनो का खतरा। भारत की कृषि काफी हद तक मौसम पर निर्भर है। कम बारिश का मतलब है कम फसल, कम सप्लाई और ज्यादा खाद्य कीमतें। अनाज, दालें, सब्जियां: सब महंगी होंगी तो कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स बढ़ेगा।
तीसरा कारण: कोर इंफ्लेशन का बढ़ना। अभी तक लग रहा था कि महंगाई सिर्फ खाने-पीने और ईंधन की वजह से बढ़ रही है। लेकिन कोर इंफ्लेशन (जिसमें खाद्य और ईंधन को हटा दिया जाता है) भी 4% के ऊपर चला गया है। इसका मतलब है कि महंगाई अब हर चीज पर असर डाल रही है।
चौथा कारण: बैंक क्रेडिट ग्रोथ। बैंकों से उधार लेने में 18.8% की तेज वृद्धि हुई है। यह सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन जब उधार एक सीमा से ज्यादा बढ़ जाता है तो मांग बढ़ती है, सप्लाई उतनी ही रहती है और महंगाई का खतरा पैदा होता है।
‘RBI के फैसले का आपकी जेब पर सीधा असर’
| फैसला | पहले | अब | असर |
|---|---|---|---|
| रेपो रेट | 5.25% | 5.50% | लोन महंगे होंगे |
| पॉलिसी स्टैंस | न्यूट्रल | कैलिब्रेटेड टाइटनिंग | आगे और बढ़ोतरी संभव |
| GDP फोरकास्ट | 6.7% | 7.1% | अर्थव्यवस्था मजबूत |
| महंगाई (CPI) | 4.82% (अगस्त) | निगरानी में | 4% के लक्ष्य से ऊपर |
| बैंक क्रेडिट ग्रोथ | – | 18.8% | मांग बढ़ी, महंगाई का खतरा |
‘EMI बढ़ेगी या टेन्योर? सावधान रहें’
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि अगर आपका होम लोन या कार लोन फ्लोटिंग रेट पर है, तो आपकी EMI बढ़ सकती है। मसलन, अगर आपका होम लोन 9% पर चल रहा था, तो अब वह 9.15% या 9.25% तक जा सकता है।
लेकिन सबसे बड़ा खतरा EMI नहीं, बल्कि टेन्योर बढ़ने का है। कई बार बैंक EMI उतनी ही रखते हैं लेकिन लोन की अवधि बढ़ा देते हैं। एक व्यक्ति ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि कोविड के दौरान जब RBI ने रेट बढ़ाना शुरू किया, तो उसकी EMI तो उतनी ही रही, लेकिन बैंक ने उसका 20 साल का लोन चुपचाप 45 साल कर दिया। इसलिए अपने बैंक से संपर्क करें और साफ कहें कि टेन्योर नहीं बढ़ाना है, EMI बढ़ा लो।
‘रुपये और शेयर बाजार पर क्या असर होगा?’
एक राहत की बात यह है कि रेपो रेट बढ़ने से रुपये को कुछ सहारा मिल सकता है। जब भारत में ब्याज दरें बढ़ती हैं तो विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बाजार में पैसा लगाना ज्यादा आकर्षक हो जाता है, जिससे रुपये की गिरावट पर रोक लग सकती है। हालांकि यह गारंटी नहीं है, क्योंकि अमेरिकी फेडरल रिजर्व भी अपने रेट बढ़ा रहा है और निवेशक अमेरिका को ज्यादा सुरक्षित मानते हैं।
रियल एस्टेट और ऑटोमोबाइल जैसे सेक्टर्स पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा, क्योंकि इनमें कर्ज का बोझ ज्यादा होता है। वहीं जिन कंपनियों के पास अच्छा कैश फ्लो है और कम कर्ज है, उनके लिए स्थिति बेहतर रहेगी।
‘जानें पूरा मामला’
RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) हर दो महीने में बैठक करती है और रेपो रेट तय करती है। इसमें RBI के तीन और सरकार द्वारा नामित तीन सदस्य होते हैं। रेपो रेट वह दर है जिस पर बैंक RBI से शॉर्ट-टर्म लोन लेते हैं। यह दर बढ़ने से बैंकों की उधार लागत बढ़ती है, जो अंततः आम आदमी के लोन पर असर डालती है।
‘मुख्य बातें (Key Points)’
- RBI ने 4 साल बाद पहली बार रेपो रेट 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.5% किया।
- पॉलिसी स्टैंस ‘न्यूट्रल’ से बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ किया गया, यानी आगे और बढ़ोतरी संभव।
- कच्चा तेल, कमजोर मानसून, कोर इंफ्लेशन और बैंक क्रेडिट ग्रोथ बढ़ोतरी के 4 बड़े कारण हैं।
- GDP फोरकास्ट 6.7% से बढ़ाकर 7.1% किया गया।
- फ्लोटिंग रेट लोन की EMI और टेन्योर दोनों पर असर पड़ सकता है।











