Ramadan 2026: रमज़ान का महीना इस्लाम में रहमत, बरकत और इबादत का सबसे खास समय माना गया है। यह केवल भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं, बल्कि अपने नफ्स पर काबू पाने, सब्र सीखने और खुद को अंदर से बेहतर बनाने का मौका होता है। इस पाक महीने में हर मुसलमान कोशिश करता है कि वह अपने हर काम को अल्लाह की रज़ा के मुताबिक करे। ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि रोज़े के दौरान किन बातों का खास ख्याल रखा जाए और किन चीज़ों से परहेज़ किया जाए।
रोज़े की शुरुआत: सहरी और नियत की अहमियत
रोज़ा रखने की शुरुआत सुबह सूरज निकलने से पहले सहरी के साथ होती है। सहरी में संतुलित और ताकत देने वाला खाना खाना चाहिए ताकि दिनभर कमजोरी महसूस न हो। लेकिन सबसे अहम बात नियत की होती है। नियत का मतलब है दिल से यह पक्का इरादा करना कि हम अल्लाह की खुशी के लिए रोज़ा रख रहे हैं। बिना नियत के रोज़ा अधूरा माना जाता है। यह इरादा दिल से होता है, जुबान से कहना जरूरी नहीं, लेकिन मुसलमान अक्सर ‘औ बिसौमी गद्दिन नवैतु’ कहकर नियत करते हैं।
इफ्तार: रोजा खोलने की सुन्नत और अदब
शाम को सूरज ढलने के बाद रोज़ा खोला जाता है, जिसे इफ्तार कहा जाता है। खजूर और पानी से इफ्तार करना सुन्नत है और सेहत के लिए भी फायदेमंद माना जाता है। खजूर से तुरंत एनर्जी मिलती है और पानी शरीर को हाइड्रेट करता है। इसके बाद मगरिब की नमाज अदा की जाती है और अल्लाह का शुक्र अदा किया जाता है। इफ्तार में दूसरों को शामिल करना बहुत सवाब का काम माना गया है।
नमाज, कुरान और इबादत का खास मौका
रमज़ान के महीने में पांच वक्त की नमाज की पाबंदी बहुत जरूरी मानी जाती है। नमाज इंसान को अनुशासन सिखाती है और दिल को सुकून देती है। खासतौर पर रात की नमाज ‘तरावीह’ इसी महीने की खासियत है, जिसमें कुरान पूरा सुना या पढ़ा जाता है। इसी तरह कुरान शरीफ की तिलावत करना और उसके मायने समझने की कोशिश करना भी इस महीने की सबसे बड़ी इबादतों में शामिल है। कहा जाता है कि रमज़ान में एक नेक काम का सवाब कई गुना बढ़ा दिया जाता है, इसलिए लोग ज्यादा से ज्यादा वक्त इबादत में बिताने की कोशिश करते हैं।
गरीबों की मदद: जकात और सदका
रमज़ान हमें दूसरों के दर्द को महसूस करना भी सिखाता है। इसलिए जकात और सदका देना बहुत अहम माना गया है। जकात इस्लाम का एक स्तंभ है और हर साल अपनी बचत का ढाई फीसदी जरूरतमंदों को देना अनिवार्य है। गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करना, उन्हें खाना खिलाना और उनके साथ सहानुभूति रखना इस महीने की रूह है। यह हमें एहसास दिलाता है कि जिनके पास कम है, वो कैसे गुजर-बसर करते हैं।
रोजे के दौरान इन बातों से बचना है जरूरी
रोज़े का असली मकसद अपने गुस्से पर काबू करना, बुरी बातों से बचना और हर हाल में सब्र करना होता है। कुछ ऐसी चीजें हैं जिनसे रोज़े के दौरान खासतौर पर बचना चाहिए:
झूठ और चुगली: झूठ बोलना, चुगली करना, किसी की बुराई करना या दिल दुखाना रोज़े की रूह को कमजोर कर देता है। पैगंबर मोहम्मद (सल्ल.) ने फरमाया कि अगर कोई झूठ बोलना और उस पर अमल करना नहीं छोड़ता, तो अल्लाह को इसकी जरूरत नहीं कि वो खाना-पीना छोड़े।
लड़ाई-झगड़ा और गाली-गलौज: गुस्से से दूर रहना चाहिए। अगर कोई तंग करे या लड़ने आए, तो कह देना चाहिए कि ‘मैं रोज़े से हूं’।
बुरी निगाह और सुनना: रोज़ा सिर्फ पेट का नहीं, बल्कि आंखों, कानों और जुबान का भी होता है। गलत चीजें देखना, बुरी बातें सुनना और फिजूल बातों में समय बर्बाद करने से बचना चाहिए।
जानबूझकर खाना-पीना: जानबूझकर कुछ खाना या पीना रोज़ा तोड़ देता है। लेकिन अगर भूलवश ऐसा हो जाए तो रोज़ा कायम रहता है, बस याद आते ही उसे रोक लेना चाहिए।
किन्हें रोजा न रखने की इजाजत है?
इस्लाम में सहूलियत भी दी गई है। जो लोग बीमार हों, बहुत ज्यादा बुजुर्ग हों, सफर में हों या गर्भवती महिलाएं हों, उन्हें रोज़ा न रखने की इजाजत होती है। बाद में वे अपनी सुविधा के अनुसार कज़ा (छूटे हुए) रोज़े रख सकते हैं। अगर कोई बीमारी ऐसी हो कि रोज़ा रखना जानलेवा हो सकता है, तो उसके लिए रोज़ा छोड़ना जरूरी तक हो जाता है।
रमज़ान दरअसल इंसान को बेहतर इंसान बनाने का महीना है। यह हमें सिखाता है कि भूख और प्यास को सहकर भी हम अपने व्यवहार में मिठास रख सकते हैं, जरूरतमंदों की मदद कर सकते हैं और अल्लाह के करीब हो सकते हैं।
मुख्य बातें (Key Points)
रोज़े की शुरुआत सहरी और नियत (इरादे) से होती है, बिना नियत के रोज़ा अधूरा है।
इफ्तार खजूर और पानी से करना सुन्नत है, मगरिब की नमाज के बाद अल्लाह का शुक्र अदा करें।
रमज़ान में पांच वक्त की नमाज, तरावीह और कुरान पढ़ने का खास सवाब है।
झूठ, चुगली, गाली-गलौज और बुरी निगाह से बचना चाहिए, ये रोजे का सवाब कम करते हैं।
बीमार, बुजुर्ग, गर्भवती और यात्रियों को रोजा न रखने की इजाजत है, वे बाद में कजा रोजे रख सकते हैं।








