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The News Air - Breaking News - Punjab Cancer Train: रात 9 बजे बठिंडा से बीकानेर, 325 किमी का दर्द भरा सफर

Punjab Cancer Train: रात 9 बजे बठिंडा से बीकानेर, 325 किमी का दर्द भरा सफर

हर रात 300 कैंसर मरीज चढ़ते हैं इस ट्रेन में, ग्राउंड वाटर में यूरेनियम, पेस्टिसाइड का जहर - ग्रीन रिवोल्यूशन की कड़वी सच्चाई

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
बुधवार, 22 जुलाई 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, पंजाब, स्पेशल स्टोरी
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Punjab Cancer Train
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Punjab Cancer Train Groundwater Uranium : हर रात ठीक 9:00 बजे बठिंडा रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर एक ट्रेन आकर रुकती है। 12 डब्बे, मंद सी रोशनी और उस ट्रेन में करीब 300 लोग बैठते हैं – जिनमें से एक बड़ी तादाद उन लोगों की होती है जिनके शरीर में कैंसर पलता है। यह ट्रेन 325 किलोमीटर का सफर तय करके अगली सुबह करीब 6:00 बजे बीकानेर पहुंचती है। पूरे हिंदुस्तान में इसे एक नाम से जाना जाता है – द कैंसर ट्रेन। देखा जाए तो यह सिर्फ एक ट्रेन नहीं, बल्कि पंजाब की आत्मा का दर्दनाक प्रतीक है।

समझने वाली बात यह है कि जिस पंजाब को हम “देश का अन्नदाता” कहते हैं, वही पंजाब आज अपने ही पानी से, अपनी ही मिट्टी से, अपने ही लोगों को जहर क्यों दे रहा है? जिस ग्रीन रिवोल्यूशन पर हमें गर्व है, क्या वही इस ट्रेन की असली पटरी है?

🔍 यह भी पढ़ें- Punjab Cabinet के 5 बड़े फैसले: विधानसभा सत्र 3 अगस्त से, Police Recruitment में बड़ा बदलाव

चौंकाने वाले आंकड़े: पंजाब का जहरीला सच

अब कुछ आंकड़ों पर गौर कीजिए क्योंकि इन्हीं में इस ट्रेन का असली राज छुपा है।

पंजाब: भारत में पेस्टिसाइड का सबसे बड़ा उपभोक्ता

पैरामीटरआंकड़ाराष्ट्रीय स्थिति
वार्षिक पेस्टिसाइड उपयोग5,270 मेट्रिक टनदेश में सर्वाधिक (प्रति व्यक्ति)
ओवर-एक्सप्लॉइटेड ब्लॉक्स114 (कुल 150 में से)76% से अधिक
यूरेनियम युक्त भूजल62.5% सैंपल्सदेश में सर्वाधिक
कैंसर मरीज (दैनिक ट्रेन में)लगभग 300–

सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब के ग्राउंड वाटर के 62.5% सैंपल्स में यूरेनियम सुरक्षित सीमा से अधिक मिला है। जी हां, यूरेनियम – वही रेडियोएक्टिव धातु जो पूरे देश में सबसे ज्यादा पंजाब के पानी में है।

यूरेनियम का लंबे समय तक पानी में होना सीधा जुड़ा है कैंसर और किडनी की बीमारियों से। इसका मतलब है कि पंजाब के लोग अपनी प्यास बुझाने के लिए जो पानी पी रहे हैं, वही उन्हें धीरे-धीरे जहर दे रहा है।

अगर गौर करें तो यह 12 डब्बों की ट्रेन कोई एक ट्रेन नहीं है। यह एक पूरे राज्य की आत्मा का प्रतीक है – एक राज्य जो अपने ही लोगों को बचा नहीं पा रहा।

1960 का संकट: भुखमरी से जूझता भारत

इस कहानी को समझने के लिए हमें 60 साल पीछे जाना होगा। 1960 का दशक। नया-नया आजाद हुआ भारत एक गंभीर संकट में था। देश के पास अपनी आबादी का पेट भरने के लिए अनाज नहीं था।

1943 के बंगाल फेमिन की यादें अभी भी ताजा थीं, जिसमें लाखों लोगों को भूख से मरना पड़ा था। हम विदेशी अनाज पर, खासकर अमेरिका के गेहूं पर, इतने निर्भर थे कि लोगों ने उस दौर को “शिप टू माउथ” कहा – यानी जहाज से सीधा मुंह तक। अमेरिका से अनाज भरा जहाज आता था और तब हमारे लोग खाते थे।

यह एक शर्म की बात थी और एक खतरा भी। क्योंकि जो देश अपना पेट दूसरों के भरोसे भरता है, उसकी आजादी अधूरी होती है।

तभी आई ग्रीन रिवोल्यूशन।

🔍 यह भी पढ़ें- Operation Prahar 3.0: Punjab Police ने 16 दिन में 3,949 गिरफ्तारियां कीं

ग्रीन रिवोल्यूशन: चमत्कार जो अभिशाप बन गया

सरकार ने हाई यील्डिंग वैरायटी (HYV) सीड्स को बढ़ावा दिया। यह नए बीज थोड़ी सी ही जमीन पर कई गुना ज्यादा अनाज दे सकते थे। लेकिन एक शर्त पर – इन्हें चाहिए था:

• भारी मात्रा में केमिकल फर्टिलाइजर्स
• पेस्टिसाइड्स
• पानी – बहुत सारा पानी

और उस काम के लिए पंजाब से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती थी। आखिरकार पंजाब – पांच नदियों की धरती, जिसकी जमीन उपजाऊ थी और जिसके नीचे पानी का खजाना भरा पड़ा था।

पंजाब के किसान मेहनती थे, हिम्मती थे। उन्होंने इस चैलेंज को अपने सीने से लगाया। और नतीजा – एक चमत्कार। पंजाब और हरियाणा ने इतना अनाज उगाया कि भारत न सिर्फ आत्मनिर्भर हुआ बल्कि अपने गोदाम भरने लगा।

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पंजाब देश का अन्नदाता बन गया।

यह एक सच्ची, बड़ी और जरूरी कामयाबी थी। इससे इंकार करना इतिहास के साथ धोखा होगा।

लेकिन यहीं एक छोटी सी, छुपी हुई गलती छोड़ दी गई – जिसकी कीमत आज तीसरी पीढ़ी चुका रही है।

पहली बड़ी गलती: सेमी-एरिड जोन में धान की खेती

पंजाब की जमीन उपजाऊ जरूर थी, पर उसका एक मिजाज था। वहां कभी कई तरह की फसलें होती थीं, जिनमें से कई को कम पानी चाहिए था।

लेकिन HYV सीड्स के दौर में सब कुछ दो फसलों पर आकर टिक गया – गेहूं और धान (चावल)।

और यहां सबसे बड़ी भौगोलिक भूल हुई। चावल (धान) एक ऐसी फसल है जो सेमी-एरिड (कम पानी वाले) इलाके के लिए बनी ही नहीं थी।

धान को खड़े पानी में उगाया जाता है। खेतों को लगातार भरकर रखना पड़ता है। पंजाब जैसे इलाके में धान उगाना वैसा ही था जैसे रेगिस्तान में स्विमिंग पूल बनाना।

यहां ध्यान देने वाली बात है – यह केवल कृषि विज्ञान की गलती नहीं थी, यह एक राजनीतिक-आर्थिक षड्यंत्र की शुरुआत थी।

दूसरी गलती: मुफ्त बिजली और MSP का घातक कॉम्बिनेशन

तो फिर किसान धान की तरफ गया ही क्यों? यहीं सरकार की पहली बड़ी नाकामी सामने आती है।

सरकार ने किसान को धान उगाने के लिए दो चीजें दीं:

1. MSP (मिनिमम सपोर्ट प्राइस) की गारंटी

गेहूं और धान – सरकार खुद खरीदने का वादा करती थी। इसलिए किसान ने बाकी फसलें छोड़ दीं।

2. मुफ्त बिजली (सबसे खतरनाक)

मुफ्त बिजली का मतलब था कि किसान अपने ट्यूबवेल चलाकर जमीन से जितना पानी चाहे खींच सकता था – बिना एक पैसे दिए।

सोचकर देखिए। जब किसी चीज की कीमत ही शून्य हो जाए, तो इंसान उसे बचाता नहीं है। उसे लूटता है।

ट्यूबवेल्स की संख्या में विस्फोटक वृद्धि:

दशकट्यूबवेल्स की संख्या
19701,92,000
201914,80,000

हर ट्यूबवेल जमीन में एक सुराख, जिसमें से पानी लगातार बाहर खींचा जा रहा था।

नतीजा – जो पानी कभी 20 साल पहले सिर्फ 3 या 10 मीटर नीचे मिल जाता था, वो आज कई जगह 30 मीटर से भी नीचे चला गया है।

पंजाब की अपनी यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन के मुताबिक 1998 से 2018 के बीच 23 में से 18 जिलों में पानी का तल हर साल 1 मीटर से ज्यादा नीचे गिरा।

यह कोई धीमी रिसाव नहीं थी। यह पूरे राज्य के नीचे से पानी का खिसक जाना था।

तीसरी गलती: जहर की बोतल पर पंजाबी में चेतावनी नहीं

जैसे-जैसे ऊपर का पानी खत्म हुआ, किसानों के बोरवेल्स और गहरे जाते चले गए। और जितना गहरा पानी, उतना ही जहरीला पानी। क्योंकि जमीन की गहराई में वही यूरेनियम, आर्सेनिक और फ्लोराइड खुला होता है।

लेकिन सिर्फ पानी की गहराई ही विलेन नहीं थी। एक दूसरा जहर ऊपर से आ रहा था – पेस्टिसाइड्स।

और यहां सरकार और सिस्टम की एक और क्रूर नाकामी सामने आती है। इन खतरनाक जहरों की बोतलों पर वार्निंग अक्सर छोटे अक्षरों में या सिर्फ हिंदी या इंग्लिश में लिखी होती थी।

लेकिन मालवा के किसान पंजाबी गुरुमुखी लिपि पढ़ते थे।

इसका मतलब वो इंसान का जानलेवा जहर अपने हाथों में बिना दस्ताने, बिना मास्क, बिना समझे इस्तेमाल करते रहे। क्योंकि उस पर लिखी चेतावनी वो पढ़ ही नहीं सकते थे।

सोचिए – एक देश ने अपने अन्नदाता को सबसे ताकतवर जहर तो दे दिया, पर उस जहर की चेतावनी उस भाषा में देने की जहमत नहीं की जो वो समझता हो।

जहर कैसे पहुंचता है इंसान के शरीर तक?

इस क्राइसिस का ग्राउंड जीरो है – मालवा रीजन: भठिंडा, मनसा, संगरूर, फरीदकोट जैसे जिले।

यह इलाका अकेले पंजाब के पूरे पेस्टिसाइड का करीब 75% खा जाता है।

यहां किसान फ्लड इरीगेशन करते हैं – पूरे खेत को पानी से भर देते हैं। और जब यह पानी जमीन में उतरता है, तो अपने साथ उन सारे केमिकल्स को भी नीचे ले जाता है जो हर फसल पर छिड़के गए थे।

बायो-एक्यूमुलेशन का घातक चक्र:

पानी → सब्जियां → जानवर → दूध → मां का दूध → नवजात शिशु

लुधियाना में हुई एक स्टडी में गाय के दूध के करीब 6.9% सैंपल्स में DDT और एंडोसल्फान जैसे कार्सिनोजेनिक (कैंसर पैदा करने वाले) पेस्टिसाइड्स सुरक्षित सीमा के ऊपर मिले।

और सबसे ज्यादा सीने में उतरने वाली बात – कुछ स्टडीज में यह जहर उन मांओं के दूध में भी पाया गया जो अपने नए जन्मे बच्चों को दूध पिला रही थीं।

यानी जहर अब एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में मां के दूध के जरिए जा रहा था।

कर्ज और कैंसर: किसान के सामने दो राक्षस

ग्रीन रिवोल्यूशन ने खेती को महंगा बना दिया। महंगे बीज, महंगे केमिकल्स, महंगे मोटर। और जब फसल फेल होती है (खासकर कॉटन, जिसके किसानों ने सबसे ज्यादा जहर झेला), तो कर्ज और भी बढ़ जाता है।

आज पंजाब की ग्रामीण इंडेब्टेडनेस (गांव का कर्ज) करीब ₹80,000 करोड़ तक पहुंच चुका है।

इसी कर्ज ने किसान आत्महत्याओं की एक दर्दनाक लहर को जन्म दिया।

और जब बीमारी आती है तो दुख दोगुना हो जाता है। क्योंकि तब तक किसान पहले से ही कर्ज के नीचे दबा होता है।

जब उस इलाके के प्राइवेट हॉस्पिटल का खर्च उसकी पूरी जमीन बेच देने पर भी पूरा नहीं हो रहा, तब वही किसान उस 9:00 बजे वाली ट्रेन में बैठता है।

ट्रेन बीकानेर ही क्यों जाती है?

यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है। राजस्थान इतना दूर क्यों?

जवाब पूरी तरह आर्थिक है। बीकानेर के आचार्य तुलसी रीजनल कैंसर हॉस्पिटल में इलाज या तो मुफ्त है या बहुत ही सस्ता।

कैंसर ट्रेन की सुविधाएं:

यात्री प्रकारकिराया
कैंसर मरीजबिल्कुल मुफ्त
अटेंडेंट (साथी)75% छूट

यानी एक कर्ज में डूबा, कैंसर से लड़ता किसान इसलिए 325 किलोमीटर दूर जाता है क्योंकि अपने ही राज्य में इलाज उसकी पहुंच से बाहर है।

यह एक ट्रेन नहीं है। यह इस बात का सबूत है कि उस किसान के पास अपने घर के पास ही कोई सहारा नहीं बचा।

2024 का सच: संकट और गहरा हुआ है

यहां एक ईमानदारी जरूरी है। कैंसर ट्रेन एक बहुत ताकतवर, बहुत इमोशनल नाम है। लेकिन 2024 के कुछ आंकड़ों के मुताबिक बीकानेर के इस हॉस्पिटल के कुल मरीजों में पंजाब से आए लोग अब सिर्फ 2 से 6% तक रह गए हैं।

रुककर सोचिए – इसका मतलब क्या है?

क्या इसका मतलब यह है कि क्राइसिस खत्म हो गया? बिल्कुल नहीं।

इसका मतलब इससे भी डरावना है। इसका मतलब यह है कि पंजाब का हेल्थ क्राइसिस अब इतना फैल चुका है कि वो सिर्फ एक ट्रेन, एक हॉस्पिटल तक सीमित नहीं रहा।

अब मरीजों का बोझ इतना ज्यादा हो चुका है कि वो अलग-अलग राज्यों, अलग-अलग हॉस्पिटल्स में बंट गया है।

कैंसर के अलावा अब किडनी की बीमारियां, रिप्रोडक्टिव डिसऑर्डर्स और बच्चों में पैदाइशी विकार सब तेजी से बढ़ रहे हैं।

सरकार के प्रयास: देर से ही सही, शुरुआत हुई है

लेकिन इस कहानी को सिर्फ मातम के साथ खत्म करना गलत होगा। क्योंकि अब तस्वीर पूरी तरह काली नहीं, और बदलाव के कुछ अंकुर दिखने लगे हैं।

सरकारी पहल:

• क्रॉप डायवर्सिफिकेशन – धान छोड़कर मक्का, दाल और कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा
• डायरेक्ट सीडेड राइस – कम पानी में धान उगाने की तकनीक
• RO प्लांट्स – प्रभावित गांवों में साफ पानी के कम्युनिटी सिस्टम
• स्क्रीनिंग कैंप्स – बीमारी को शुरुआत में पकड़ने के लिए
• मुख्यमंत्री पंजाब कैंसर राहत कोष – मरीजों को आर्थिक सहायता

क्या यह काफी है? नहीं। अभी तक तो बिल्कुल नहीं। जो नुकसान 60 साल में हुआ है, वह 6 साल में ठीक नहीं हो सकता।

लेकिन यह एक शुरुआत है। एक स्वीकार है कि जो रास्ता था वो गलत था।

असली सबक: विकास की परिभाषा बदलनी होगी

यही इस पूरी कहानी का असली सबक है। ग्रीन रिवोल्यूशन ने हमें भुखमरी से बचाया – यह एक सत्य है जिसे हम कभी नहीं भुला सकते।

लेकिन उसने हमें एक दूसरा सत्य भी सिखाया:

विकास सिर्फ इस बात का नाम नहीं है कि हम कितना ज्यादा उगा सकते हैं। विकास इस बात का नाम है कि हम कितने लंबे समय तक, कितनी सेहतमंदी से इस धरती पर जी सकते हैं।

एक देश के गोदाम अनाज से भरे हों और उसी देश के एक कोने में हर रात एक कैंसर ट्रेन मरीजों को लेकर चले – यह दो चीजें एक साथ सच नहीं होनी चाहिए।

और अगर हैं, तो यह हमें रुकने, सोचने और रास्ता बदलने का इशारा है।

मुख्य बातें (Key Points)

• हर रात 9 बजे बठिंडा से 325 किमी का सफर तय कर बीकानेर पहुंचती है “कैंसर ट्रेन”, 300 मरीज सवार

• पंजाब ग्राउंड वाटर के 62.5% सैंपल्स में यूरेनियम सुरक्षित सीमा से अधिक – देश में सर्वाधिक

• पंजाब हर साल 5,270 मेट्रिक टन पेस्टिसाइड का इस्तेमाल करता है, प्रति व्यक्ति देश में सबसे ज्यादा

• 150 में से 114 ब्लॉक्स ओवर-एक्सप्लॉइटेड, पानी का स्तर हर साल 1 मीटर नीचे जा रहा

• 1970 में 1.92 लाख ट्यूबवेल्स, 2019 में 14.8 लाख – पानी की अंधाधुंध लूट

• मुफ्त बिजली और MSP ने किसानों को धान (पानी-खोर फसल) की ओर धकेला

• गाय के दूध में DDT और एंडोसल्फान, मां के दूध में भी जहर पाया गया

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• बीकानेर का इलाज मुफ्त/सस्ता, इसलिए किसान 325 किमी दूर जाता है

• पंजाब की ग्रामीण इंडेब्टेडनेस ₹80,000 करोड़, कर्ज और कैंसर दोनों


FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1: कैंसर ट्रेन क्या है और यह कहां जाती है?

कैंसर ट्रेन हर रात 9 बजे पंजाब के बठिंडा स्टेशन से राजस्थान के बीकानेर के लिए निकलती है। इसमें करीब 300 यात्री होते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में कैंसर मरीज होते हैं जो बीकानेर के आचार्य तुलसी रीजनल कैंसर हॉस्पिटल में मुफ्त/सस्ते इलाज के लिए जाते हैं। यह 325 किमी की यात्रा अगली सुबह 6 बजे पूरी होती है।

Q2: पंजाब में कैंसर के मामले इतने ज्यादा क्यों हैं?

पंजाब में कैंसर का मुख्य कारण भूजल में यूरेनियम, आर्सेनिक और अत्यधिक पेस्टिसाइड का उपयोग है। ग्रीन रिवोल्यूशन के बाद पानी-खोर धान की खेती ने भूजल स्तर को बहुत नीचे गिरा दिया। गहरे पानी में यूरेनियम अधिक होता है। साथ ही, पंजाब प्रति व्यक्ति सबसे ज्यादा पेस्टिसाइड इस्तेमाल करता है, जो पानी, दूध और खाने में मिल जाता है।

Q3: क्या सरकार इस समस्या का समाधान कर रही है?

सरकार ने कुछ कदम उठाए हैं: क्रॉप डायवर्सिफिकेशन (धान की जगह कम पानी वाली फसलें), RO प्लांट्स स्थापित करना, कैंसर स्क्रीनिंग कैंप और मुख्यमंत्री कैंसर राहत कोष। लेकिन 60 साल की समस्या को हल करने में समय लगेगा। असली चुनौती मुफ्त बिजली जैसी लोकलुभावन नीतियों को बदलना है, जो राजनीतिक रूप से मुश्किल है।

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अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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