PSRLM Selection Process Stay: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब स्टेट रूरल लाइवलीहुड मिशन (PSRLM) के तहत चल रही भर्ती प्रक्रिया पर ब्रेक लगा दिया है। जस्टिस संदीप मौदगिल ने परीक्षा में शामिल उम्मीदवारों को अंक देने के तरीके में “प्राथमिक तौर पर कुछ बेनियमियां और अस्पष्टताएं” पाई हैं, जिसके बाद यह आदेश पारित किया गया।
यह फैसला उस समय आया है जब कोर्ट द्वारा नियुक्त जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में पेश की। देखा जाए तो, यह भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता पर एक बड़ा सवाल है। अगर गौर करें, तो कोर्ट ने महज दो हफ्ते पहले ही इस पूरी चयन प्रक्रिया की स्वतंत्र और अदालत-निगरानी के तहत जांच का आदेश दिया था। अब जांच रिपोर्ट में गंभीर खामियां सामने आई हैं, जिससे हजारों उम्मीदवारों का भविष्य अनिश्चितता में लटक गया है।
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क्या है पूरा मामला?
पंजाब स्टेट रूरल लाइवलीहुड मिशन ने 28 जनवरी को एक सार्वजनिक नोटिस जारी कर भर्ती प्रक्रिया की घोषणा की थी। इस भर्ती में लिखित परीक्षा, इंटरव्यू, शैक्षिक योग्यता और अनुभव के आधार पर कुल 100 अंकों का मूल्यांकन तय किया गया था। लिखित परीक्षा के लिए 70 अंक और शेष 30 अंक इंटरव्यू, शैक्षिक योग्यता व अनुभव के लिए निर्धारित किए गए थे।
लेकिन जब नतीजे घोषित हुए, तो उम्मीदवारों को सिर्फ कुल अंक बताए गए। शैक्षिक योग्यता और अनुभव के तहत मिले अंकों का कोई विवरण नहीं दिया गया। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि जब किसी भर्ती में पारदर्शिता का दावा किया जाता है, तो हर श्रेणी में मिले अंकों का खुलासा जरूरी होता है।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि प्रतिवादियों (PSRLM अधिकारियों) ने उक्त 30 अंकों के तहत उम्मीदवारों द्वारा प्राप्त किए गए अंकों को न तो प्रदान किया और न ही सार्वजनिक किया। समझने वाली बात है कि यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि उम्मीदवारों के साथ धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है।
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कोर्ट-नियुक्त जांच समिति का खुलासा
जस्टिस संदीप मौदगिल ने नोट किया, “पंजाब स्टेट रूरल लाइवलीहुड मिशन (PSRLM) के तहत जारी 28 जनवरी के सार्वजनिक नोटिस के मद्देनजर चयन प्रक्रिया से संबंधित आवेदन फार्मों और अन्य रिकॉर्डों की जांच के लिए इस अदालत द्वारा गठित समिति के मुखिया, वकील विशाल शर्मा ने जांच समिति की रिपोर्ट अदालत में एक सीलबंद लिफाफे में पेश कर दी है।”
रिपोर्ट का मुआयना करने के बाद जस्टिस मौदगिल ने आदेश दिया: “चयन प्रक्रिया में अगली कार्रवाई पर अगली सुनवाई की तारीख तक रोक रहेगी क्योंकि उक्त परीक्षा में शामिल होने वाले उम्मीदवारों को विभिन्न शीर्षकों के तहत अंक देने के तरीके में प्राथमिक तौर पर कुछ बेनियमियां और अस्पष्टताएं देखी गई हैं।”
दिलचस्प बात यह है कि कोर्ट ने इस मामले में कोई लीपापोती नहीं की। सीधे शब्दों में कहा कि जब तक पूरी सच्चाई सामने नहीं आती, भर्ती प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ेगी।
मूल्यांकन प्रणाली में गड़बड़ी के संकेत
जस्टिस मौदगिल ने पिछली सुनवाई में नोट किया था कि प्रतिवादी कोई भी समकालीन रिकॉर्ड पेश करने में विफल रहे हैं जो यह दर्शाता हो कि शैक्षिक योग्यता और अनुभव के शीर्षकों के तहत अंक—भर्ती के विज्ञापन में विशेष रूप से प्रदान किए गए हिस्से—वास्तव में दिए गए थे।
इसका मतलब साफ है कि कागजों पर तो 30 अंक दिखाए गए, लेकिन असलियत में यह अंक दिए ही नहीं गए। या फिर किसी मनमाने तरीके से बांटे गए। यह कहते हुए कि यह कमी “भर्ती प्रक्रिया की जड़ में ही वार करती है”, अदालत ने कहा कि इससे संपूर्ण चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता, पारदर्शिता और कानूनी मान्यता पर गंभीर चिंताएं पैदा होती हैं।
यहां समझने वाली बात यह भी है कि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता न सिर्फ कानूनी आवश्यकता है, बल्कि उम्मीदवारों का मौलिक अधिकार भी है।
रिकॉर्ड में पाई गई गंभीर खामियां
अदालत ने आगे दर्ज किया कि पेश किए गए असल भर्ती रिकॉर्ड की जांच करने पर पाया गया कि मूल्यांकन रिकॉर्ड सिर्फ लिखित परीक्षा के लिए 70 अंक और इंटरव्यू के लिए 10 अंकों के फॉर्मेट में रखा गया था। शैक्षिक योग्यता और अनुभव के तहत अंकों का कोई अलग मूल्यांकन या वितरण नहीं दिखाया गया था, भले ही विज्ञापन में खासतौर पर उन हिस्सों को 10-10 अंक दिए गए थे।
अगर गौर करें, तो यह सिर्फ प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि सुनियोजित धोखाधड़ी लगती है। विज्ञापन में कुछ और दिखाया गया, लेकिन असलियत में कुछ और ही किया गया।
जस्टिस मौदगिल ने जोर देकर कहा कि चयन नोटिस सिर्फ शीर्षक-वार वितरण को दर्शाए बिना कुल अंकों को दिखाता है, जिससे उम्मीदवारों को मूल्यांकन की शुद्धता की जांच करने का कोई मौका नहीं मिलता।
इससे साफ होता है कि यह पूरी व्यवस्था ही संदिग्ध है।
अधिकारिक प्रमाणीकरण का भी अभाव
जस्टिस मौदगिल ने यह भी जोर देकर कहा, “इस अदालत ने यह भी देखा था कि नतीजा/चयन नोटिस किसी सक्षम अधिकारी द्वारा हस्ताक्षर या अधिकारिक मोहर के माध्यम से सही तरीके से प्रमाणित नहीं किया गया था। परिणामस्वरूप, प्रतिवादियों को पूरा असल भर्ती रिकॉर्ड इस अदालत में पेश करने के निर्देश दिए गए थे।”
यानी जो नतीजा घोषित किया गया, वह भी आधिकारिक तौर पर सत्यापित नहीं था। न तो किसी अधिकारी के हस्ताक्षर थे, न ही कोई मोहर। चिंता का विषय यह है कि ऐसी लापरवाही कैसे हो सकती है?
अगली सुनवाई 2 सितंबर को
यह केस अब 2 सितंबर को अगली विचार के लिए आएगा, जब अदालत द्वारा जांच समिति की रिपोर्ट और अंकों के वितरण से पैदा होने वाले मुद्दों पर विस्तृत विचार करने की उम्मीद है।
यह निर्देश पेंडू विकास और पंचायत विभाग के प्रशासकीय सचिव के माध्यम से पंजाब राज्य और अन्य प्रतिवादियों के विरुद्ध याचिकाओं के एक समूह पर आए हैं।
समझने वाली बात यह है कि अब गेंद सरकार के पाले में है। या तो वे पूरी पारदर्शिता के साथ सभी रिकॉर्ड पेश करें, या फिर पूरी भर्ती प्रक्रिया निरस्त हो सकती है।
उम्मीदवारों की परेशानी बढ़ी
इस फैसले से हजारों उम्मीदवार प्रभावित हुए हैं जो PSRLM में नौकरी की उम्मीद लगाए बैठे थे। कई उम्मीदवारों ने सोशल मीडिया पर अपनी निराशा व्यक्त की है। एक उम्मीदवार ने कहा, “हमने ईमानदारी से परीक्षा दी, लेकिन अधिकारियों ने धोखा किया। अब न्याय की उम्मीद सिर्फ अदालत से है।”
दिलचस्प बात यह है कि जब सरकारी भर्तियों में ही इतनी अनियमितताएं हों, तो आम युवा का भरोसा कहां जाए? यह सिर्फ एक भर्ती का मामला नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ है।
पंजाब सरकार पर दबाव
अब पंजाब सरकार पर दबाव बढ़ गया है कि वे इस मामले में स्पष्टीकरण दें और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें। विपक्षी दलों ने भी इस मामले को उठाते हुए सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं।
यह दर्शाता है कि यह मामला अब सिर्फ अदालत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक रंग भी ले चुका है।
मुख्य बातें (Key Points)
- पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने PSRLM भर्ती प्रक्रिया पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी
- जस्टिस संदीप मौदगिल ने अंकों के वितरण में बेनियमी और अस्पष्टता पाई
- शैक्षिक योग्यता और अनुभव के 30 अंकों का विवरण उम्मीदवारों को नहीं दिया गया
- चयन नोटिस किसी सक्षम अधिकारी द्वारा हस्ताक्षर या मोहर से प्रमाणित नहीं था
- अदालत-नियुक्त जांच समिति ने सीलबंद रिपोर्ट पेश की, अगली सुनवाई 2 सितंबर को













