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The News Air - NEWS-TICKER - ब्रिक्स देश किसके दम पर डॉलर को मार-मारकर भुर्ता बनाएंगे…ट्रंप की एक कसम अमेरिका को डुबो देगी!

ब्रिक्स देश किसके दम पर डॉलर को मार-मारकर भुर्ता बनाएंगे…ट्रंप की एक कसम अमेरिका को डुबो देगी!

The News Air Team by The News Air Team
बुधवार, 23 अक्टूबर 2024
in NEWS-TICKER, अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय, सियासत
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ब्रिक्स देश
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नई दिल्ली, 23 अक्टूबर (The News Air): रूस के कजान में चल रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस संगठन के देशों को अपनी-अपनी करेंसी में कारोबार पर जोर दिया है। माना जा रहा है कि यह इशारा ब्रिक्स की अपनी करेंसी कायम करने की है। दरअसल, पूरी दुनिया के कारोबार पर इस वक्त अमेरिकी डॉलर का दबदबा है।

इससे पहले 2023 में यह उम्मीद जताई जा रही थी कि ब्रिक्स राष्ट्र अमेरिकी डॉलर के विकल्प के रूप में संभावित स्वर्ण समर्थित मुद्रा बनाने पर चर्चा को आगे बढ़ाएंगे। हालांकि, यह अनुमान लगाना अभी जल्दबाजी होगी कि ब्रिक्स मुद्रा कब जारी की जाएगी, लेकिन ब्रिक्स मुद्रा की संभावना और निवेशकों के लिए इसके संभावित प्रभावों को देखने के लिए यह अच्छा वक्त माना जा रहा है। आइए-समझते हैं कि ब्रिक्स देश कैसे डॉलर के दबदबे को खत्म कर सकते हैं और ब्रिक्स की मुद्रा का वजन कितना होगा।

दुनिया के 90% मुद्रा कारोबार पर डॉलर का कब्जा, बीते साल बदली तस्वीर

अभी दुनिया में अमेरिकी डॉलर का प्रभुत्व है, जो सभी मुद्रा व्यापार का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा है। 2023 से पहले तक करीब 100 फीसदी पेट्रोलियम का कारोबार अमेरिकी डॉलर में किया जाता था। हालांकि, 2023 में यह तस्वीर थोड़ी बदल गई। तेल व्यापार का करीब पांचवां हिस्सा यानी 20 फीसदी गैर अमेरिकी मुद्राओं से किया गया था। यही बात अब अमेरिका को सता रही है। माना जा रहा है कि मौलिक रूप से ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका से बने ब्रिक्स देश नई करेंसी की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे अमेरिका चिंता में हैं, क्योंकि इससे उसका वर्चस्व टूट सकता है।

क्यों उठ रही हैं यह मांग, क्या है इसके पीछे वजह

ब्रिक्स की अपनी करेंसी की बात तब उठी है, जब चीन और रूस पर अमेरिकी प्रतिबंध लगाए गए हैं। ऐसे में ये सवाल उठ रहे हैं कि ब्रिक्स देशों को एक नई आरक्षित मुद्रा स्थापित करनी चाहिए। इससे अमेरिकी डॉलर पर काफी असर पड़ सकता है। उसकी मांग में गिरावट आएगी। इसी को डी-डॉलराइजेशन कहा जाता है।

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ट्रंप की प्रतिज्ञा भी बन रही है ब्रिक्स करेंसी की वजह

10 सितंबर को पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहली अमेरिकी राष्ट्रपति पद की बहस के दौरान वैश्विक मुद्रा के रूप में अमेरिकी डॉलर को न मानने वाले देशों पर ज्यादा टैरिफ लगाने की प्रतिज्ञा की थी। ट्रंप पहले से ही चीन के खिलाफ कड़ा रुख अपना रहे हैं। उन्होंने धमकी दी है कि अगर वह अमेरिका के राष्ट्रपति चुने जाते हैं तो वह चीनी आयात पर 60 प्रतिशत से 100 प्रतिशत टैरिफ लगाएंगे।

ब्रिक्स देश नई करेंसी क्यों बनाना चाहते हैं?

रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व में जंग समेत हाल की वैश्विक वित्तीय चुनौतियों और आक्रामक अमेरिकी विदेश नीतियों ने ब्रिक्स देशों को संभावना तलाशने के लिए प्रेरित किया है। वे अमेरिकी डॉलर और यूरो पर वैश्विक निर्भरता को कम करते हुए अपने आर्थिक हितों को बेहतर ढंग से पूरा करना चाहते हैं। ब्रिक्स मुद्रा कब जारी की जाएगी? इकसी अभी तक लॉन्च की कोई निश्चित तारीख नहीं है, लेकिन इन देशों ने इस संभावना पर विस्तार से चर्चा की है। 2022 में 14वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान भी पुतिन ने नई वैश्विक आरक्षित मुद्रा की वकालत की थी। अप्रैल, 2023 में ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला डिसिल्वा ने ब्रिक्स मुद्रा का समर्थन किया।

40 देशों ने ब्रिक्स में शामिल होने की इच्छा जताई

दक्षिण अफ्रीका के ब्रिक्स राजदूत अनिल सूकलाल ने कहा है कि लगभग 40 देशों ने ब्रिक्स में शामिल होने की इच्छा जताई है। पुतिन ने खुद भी इस बार कहा है कि 30 देश इसके लिए तैयार हैं। व्यक्त की है। 2023 ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में छह देशों को ब्रिक्स सदस्य बनने के लिए आमंत्रित किया गया था। अर्जेंटीना, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात। जनवरी 2024 में अर्जेंटीना को छोड़कर सभी आधिकारिक तौर पर गठबंधन में शामिल हो गए।

डॉलर नहीं तो फिर ये चीन की चिंता

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिक्स मुद्रा एक जटिल विचार है, क्योंकि यह बहुत अलग अर्थव्यवस्था वाले देशों को एकजुट करेगा। ऐसी भी चिंताएं हैं कि डॉलर के नहीं होने पर चीन के युआन पर निर्भरता बढ़ सकती है। जब अक्टूबर 2023 में रूस ने मांग की कि भारत तेल के लिए युआन में भुगतान करे, तो भारत ने अमेरिकी डॉलर या रुपए के अलावा किसी और मुद्रा के इस्तेमाल से इनकार कर दिया।

ब्रिक्स मुद्रा के क्या फायदे हो सकते हैं

नई मुद्रा से ब्रिक्स देशों को कई लाभ हो सकते हैं, जिनमें अधिक कुशल सीमा पार लेनदेन और वित्तीय समावेशन में बढ़ोतरी शामिल है। ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी, डिजिटल करेंसी और स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट्स का लाभ उठाकर ब्रिक्स मुद्रा वैश्विक वित्तीय प्रणाली में क्रांति ला सकती है। निर्बाध सीमा पार भुगतान के लिए यह ब्रिक्स देशों और उससे परे व्यापार और आर्थिक एकीकरण को भी बढ़ावा दे सकता है।

दशकों से डॉलर का रहा है राज, जान लें आंकड़ें

दशकों से अमेरिकी डॉलर ने दुनिया की अग्रणी आरक्षित मुद्रा के रूप में राज किया है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व के अनुसार, 1999 से 2019 के बीच अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय व्यापार में 96 प्रतिशत, एशिया-प्रशांत क्षेत्र में 74 प्रतिशत और बाकी दुनिया में 79 प्रतिशत डॉलर का उपयोग किया गया था। अटलांटिक काउंसिल के अनुसार, अमेरिकी डॉलर का उपयोग लगभग 88 प्रतिशत मुद्रा विनिमय में किया जाता है और केंद्रीय बैंकों के रखे गए सभी विदेशी मुद्रा भंडार का 59 प्रतिशत उपयोग डॉलर में किया जाता है।

डॉलर के मुकाबले यूरो, येन और युआन की बढ़त

यूरो और येन की लोकप्रियता बढ़ने के कारण डॉलर की आरक्षित मुद्रा हिस्सेदारी में कमी आई है। फिर भी डॉलर सबसे व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली आरक्षित मुद्रा है। इसके बाद यूरो, येन, पाउंड और युआन का स्थान आता है।

क्या ब्रिक्स मुद्रा संभव है, क्या हैं अड़चनें

कुछ वित्तीय विश्लेषक इस बात के प्रमाण के रूप में 1999 में यूरो के निर्माण की ओर इशारा करते हैं कि ब्रिक्स मुद्रा संभव हो सकती है। हालांकि, इसके लिए वर्षों की तैयारी, एक नए केंद्रीय बैंक की स्थापना और 5 देशों के बीच अपनी संप्रभु मुद्राओं को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए एक समझौते की जरूरत होगी। इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफल होने के लिए संभवतः अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के समर्थन की भी जरूरत होगी।

क्या नई ब्रिक्स मुद्रा को सोने का समर्थन प्राप्त होगा?

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सोने या तेल को नई ब्रिक्स मुद्रा को मजबूत बनाने में अहम माना है। जाने-माने लेखक जिम रिकार्ड्स ने बताया है कि स्वर्ण समर्थित ब्रिक्स मुद्रा कैसे काम कर सकती है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि ब्रिक्स मुद्रा की 1 यूनिट की कीमत 1 औंस सोने के बराबर है और सोने की कीमत 3,000 अमेरिकी डॉलर प्रति औंस हो जाती है, तो ब्रिक्स मुद्रा की एक यूनिट की कीमत 3,000 अमेरिकी डॉलर होगी। इससे ब्रिक्स मुद्रा की तुलना में डॉलर का मूल्य कम हो जाएगा। हालांकि, वह इस करेंसी को नए स्वर्ण मानक या अमेरिकी डॉलर या यूरो के अंत के रूप में नहीं देखते हैं।

तो फिर ब्रिक्स देशों के पास कितना सोना है?

2024 की दूसरी तिमाही तक मूल ब्रिक्स देशों और मिस्र (केंद्रीय बैंक स्वर्ण भंडार वाले पांच नए अतिरिक्त देशों में से एकमात्र देश) की संयुक्त केंद्रीय बैंक सोने की हिस्सेदारी दुनिया के केंद्रीय बैंकों में रखे गए सभी सोने का 20 प्रतिशत से अधिक थी। सेंट्रल बैंक गोल्ड होल्डिंग्स के मामले में रूस, भारत और चीन शीर्ष 10 में हैं।

किसके पास कितना सोना, जान लीजिए

रूस के पास 2,335.85 मीट्रिक टन (एमटी) सोना है, जो इसे केंद्रीय बैंक के सोने के भंडार के मामले में पांचवां सबसे बड़ा बनाता है। चीन 2,264.32 मीट्रिक टन सोने के साथ छठे स्थान पर है और भारत 840.76 मीट्रिक टन के साथ आठवें स्थान पर है। ब्राजील और दक्षिण अफ़्रीका के केंद्रीय बैंक में सोने की हिस्सेदारी बहुत कम है, जो क्रमशः 129.65 मीट्रिक टन और 125.44 मीट्रिक टन है। नए ब्रिक्स सदस्य मिस्र की सोने की हिस्सेदारी भी उतनी ही कम, 126.57 मीट्रिक टन है।

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