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The News Air - NEWS-TICKER - Modi’s Israel Visit: मोदी इज़रायल क्यों जा रहे हैं, नेतन्याहू क्यों गिड़गिड़ा रहे हैं?

Modi’s Israel Visit: मोदी इज़रायल क्यों जा रहे हैं, नेतन्याहू क्यों गिड़गिड़ा रहे हैं?

जब पूरी दुनिया इज़रायल के खिलाफ खड़ी है, तब भारत के प्रधानमंत्री तेल अवीव की राह पर — डिफेंस डील, अमेरिकी व्यापार और मध्यपूर्व की जटिल भू-राजनीति का महा-दांव

The News Air Team by The News Air Team
सोमवार, 23 फ़रवरी 2026
in NEWS-TICKER, अंतरराष्ट्रीय, सियासत
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Modi's Israel
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Modi Israel Visit Netanyahu Geopolitics : 25 फरवरी 2026 — जब मध्यपूर्व के देश, रूस, चीन, ब्रिटेन और यूरोप के कई राष्ट्र खुलकर इज़रायल के खिलाफ खड़े हैं, ठीक उसी वक्त भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इज़रायल की धरती पर कदम रख रहे हैं। यह महज एक राजनयिक दौरा नहीं — यह उस बड़े शतरंज की चाल है जिसमें ईरान, अमेरिका, रूस, चीन और फिलिस्तीन सब एक ही बिसात पर हैं और भारत को अपनी किंग को बचाना है।


नेतन्याहू आधे दर्जन बार क्यों बोले — “मोदी आ रहे हैं”?

बेंजामिन नेतन्याहू ने पिछले कुछ हफ्तों में छह से अधिक बार सार्वजनिक रूप से यह ऐलान किया कि भारत के प्रधानमंत्री इज़रायल आ रहे हैं। उन्होंने यह बात अपने सैनिकों के बीच कही, नागरिकों के बीच कही और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कही। भारत के विदेश मंत्रालय ने जब तक आधिकारिक पुष्टि नहीं की थी, तब भी नेतन्याहू यह बात बार-बार दोहराते रहे।

क्यों? क्योंकि इस वक्त इज़रायल को दुनिया की मान्यता चाहिए। गाजा नरसंहार के बाद जब अधिकांश देश इज़रायल से दूरी बना रहे हैं, तब भारत जैसे 1.4 अरब की आबादी वाले लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री का इज़रायल आना नेतन्याहू के लिए एक बड़ी राजनयिक जीत है। यह उनकी घरेलू राजनीति में भी ऑक्सीजन का काम करेगा जहाँ खुद नागरिक उनके खिलाफ सड़कों पर हैं।


तीन बार बनी, तीन बार टूटी — नेतन्याहू की भारत यात्रा का अधूरा सपना

2025 में तीन बार कार्यक्रम बना कि नेतन्याहू भारत आएंगे — तीनों बार टल गया। पहली बड़ी वजह थी उनकी अपनी सुरक्षा को लेकर अनिश्चितता। दूसरी वजह थी इज़रायल की घरेलू राजनीति — जहाँ विपक्ष नहीं, बल्कि आम नागरिक उनके निशाने पर थे। तीसरी वजह थी ईरान पर हमले को लेकर अमेरिका की उलझती सोच। तीन मौके हाथ से निकले तो अब नेतन्याहू ने रास्ता बदला — मोदी को इज़रायल बुलाया।


ऑपरेशन सिंदूर, G7 डिनर और ट्रंप कनेक्शन

ऑपरेशन सिंदूर के बाद की परिस्थिति हो, या G7 के बाद बुलाए गए डिनर में प्रधानमंत्री मोदी का न जाना हो — कई मौकों पर नेतन्याहू ने मोदी को संदेश दिया कि वे जानते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कैसे मनाया जाए। यानी भारत-अमेरिका ट्रेड डील में जहाँ तनातनी है, वहाँ नेतन्याहू खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहे हैं। भारत को ट्रंप से रियायत चाहिए — और नेतन्याहू के पास ट्रंप तक सीधी पहुंच है।


इज़रायल की ज़रूरत, भारत का हिसाब

यह यात्रा मुख्यतः तीन स्तंभों पर टिकी है। पहला है डिफेंस डील — मिसाइल डिफेंस सिस्टम, एडवांस ड्रोन और MOU जिसमें दोनों देश मिलकर रक्षा उत्पादन और प्रोग्रामिंग तय करेंगे। दूसरा है इज़रायल की साख — गाजा के दाग से लथपथ नेतन्याहू को एक हाई-प्रोफाइल डिप्लोमेटिक स्टेज चाहिए जो मोदी की मौजूदगी से मिलेगी। तीसरा है इकोनॉमिक कॉरिडोर — भारत से मध्यपूर्व होते हुए यूरोप तक का व्यापारिक रास्ता जिसमें इज़रायल की भूमिका अहम है। साथ ही अडानी पोर्ट्स और पोर्ट ऑफ मार्शलिस्ट के बीच MOU पर दस्तखत भी इसी यात्रा का हिस्सा है।


ईरान की ताकत और भारत की दुविधा

इस पूरी तस्वीर में ईरान की भूमिका समझना जरूरी है। ईरान ने रूस के साथ 50 बिलियन डॉलर की आर्म्स डील की है जिसमें 500 एडवांस Vorba मिसाइलें शामिल हैं। चीन उसे पूरा डिफेंस सिस्टम मुहैया करा रहा है। ईरान के पास हाइपरसोनिक मिसाइलें हैं जिनका जवाब अभी अमेरिका के पास भी नहीं है। ईरान की मिसाइल रेंज — फतेह 400 किमी, इमाद 700 किमी, खुर्रमशहर 2000 किमी तक — इज़रायल के लिए सीधा खतरा है।

दूसरी तरफ ईरान दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस भंडार है — 1134 ट्रिलियन क्यूबिक फीट। चाबहार पोर्ट पर भारत की पहुंच अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण रुकी हुई है। अगर ईरान-अमेरिका डील हो जाए और प्रतिबंध हटें तो भारत के लिए चाबहार का रास्ता खुल जाएगा — लेकिन इसके लिए भारत को इज़रायल के साथ बहुत सतर्कता से चलना होगा।


भारत का असली दांव — शांतिदूत या पक्षकार?

2017 में भी रूस के विरोध के बावजूद मोदी इज़रायल गए थे। अब 2026 में जब पूरी दुनिया इज़रायल के खिलाफ है, मोदी फिर वहाँ जा रहे हैं। 2017 की उस यात्रा के बाद पेगासस स्पाईवेयर का मामला भारत में सामने आया था — इज़रायली तकनीक से भारत में निगरानी का वह मामला आज भी विवादास्पद है।

लेकिन इस बार भारत एक नई भूमिका में आना चाहता है। जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध के वक्त मोदी मास्को गए और पुतिन से कहा — “यह युद्ध का काल नहीं है” — वैसे ही अब इज़रायल-ईरान टकराव में भारत मध्यस्थ की भूमिका निभाना चाहता है। ब्रिक्स की अध्यक्षता इस साल भारत के पास है — और इज़रायल की यात्रा से मिला विश्वास उन देशों को भी संदेश देगा जो युद्ध से डरे हुए हैं।

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गाजा का दाग और भारत की चुप्पी

Lancet की रिपोर्ट के अनुसार 7 अक्टूबर 2023 से 5 जनवरी 2025 के बीच गाजा में करीब 75,000 लोगों की मौत हुई — जिनमें लगभग 22,800 बच्चे और 16,600 महिलाएं शामिल हैं। गाजा के 50 देशों के शांति समझौते में भारत के प्रतिनिधि शामिल थे — और उसी समझौते की कार्यकारी संस्था में इज़रायल को भी रखा गया है। यानी भारत यरूशलम और तेहरान के बीच अपना संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है — लेकिन यह संतुलन अब पहले से कहीं ज्यादा कठिन है।


यह यात्रा क्या तय करेगी?

इस यात्रा से कई बड़े सवालों के जवाब तय होंगे — क्या भारत अमेरिकी ट्रेड डील में रियायत पाने के लिए इज़रायल को पुल की तरह इस्तेमाल करेगा? क्या डिफेंस में रूस पर निर्भरता कम करके इज़रायल और अमेरिका की तरफ झुकाव बढ़ेगा? क्या ब्रिक्स के एजेंडे पर इसका असर पड़ेगा? क्या चाबहार पोर्ट का रास्ता इस यात्रा से और लंबा हो जाएगा?

इन सब सवालों के जवाब 25 और 26 फरवरी की बातचीत के बाद स्पष्ट होंगे। लेकिन एक बात अभी साफ है — जिस वक्त नेतन्याहू अपने देश में और दुनिया में सबसे कमजोर हैं, उस वक्त मोदी का इज़रायल जाना नेतन्याहू को वह राजनयिक ऑक्सीजन देगा जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत है। बदले में भारत को मिलेगी — डिफेंस टेक्नोलॉजी, अमेरिका तक पहुंच और शायद ट्रेड डील में थोड़ी राहत।


मुख्य बातें (Key Points)
  • PM मोदी 25-26 फरवरी को इज़रायल दौरे पर हैं — 2017 के बाद यह दूसरी यात्रा, उस वक्त जब पूरी दुनिया इज़रायल के खिलाफ खड़ी है।
  • नेतन्याहू ने आधे दर्जन से अधिक बार मोदी की यात्रा का सार्वजनिक ऐलान किया — अपनी कमजोर होती साख को मजबूत करने की कोशिश में।
  • यात्रा का एजेंडा त्रिस्तरीय है — डिफेंस MOU, इकोनॉमिक कॉरिडोर और अमेरिका के साथ ट्रेड डील में नेतन्याहू की मध्यस्थता।
  • ईरान के पास रूस-चीन समर्थित मजबूत मिसाइल शक्ति है — भारत के लिए चाबहार पोर्ट का रास्ता इस समीकरण से सीधे जुड़ा है।
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