Mobile Phone Addiction: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में 12 से 15 साल की उम्र की तीन बहनों ने आधी रात छत से कूद कर जान दे दी। घर वालों ने मोबाइल फोन छीन लिए थे, यही वजह बताई जा रही है। यह कोई अकेला मामला नहीं है। तमिलनाडु में 16 साल की एक लड़की को भाई ज्यादा फोन इस्तेमाल करने के लिए डांटता है तो वह मौत को गले लगा लेती है। बहन को बचाने की कोशिश में भाई की भी जान चली जाती है। मुंबई के ठाणे में 16 साल का एक लड़का पढ़ाई पर ध्यान देने की जगह फोन पर गेम खेलता रहता है तो घर वाले झल्लाकर उसका फोन ले लेते हैं। 10वीं में पढ़ने वाला यह लड़का भी जान दे देता है।
ब्राजील के साऊ पोलो में तो एक लड़के का फोन ले लिया जाता है तो वह इतना फ्रस्ट्रेट हो जाता है कि अपने माता-पिता और बहन को गोली मार देता है। गाजियाबाद की हालिया घटना के बाद ढेरों सवाल ज़हन में उठते हैं। आखिर हम क्या गलत कर रहे हैं? ख्वाब देखने की उम्र में ये बच्चे हमेशा के लिए आंखें ही बंद कर ले रहे हैं। मोबाइल का काम दूरियों को कम करने का था। टेक्नोलॉजी को इंसान का साथी होना चाहिए था। लेकिन यह हमारे बच्चों को ही हमसे दूर करती जा रही है।
बच्चों का दिमाग कैसे सीखता है नकल से
चाइल्ड और एडिक्शन साइकेट्री एक्सपर्ट डॉक्टर इफ्तकार हुसैन बताते हैं कि बच्चों का दिमाग इमिटेशन यानी नकल के जरिए नई चीजें जल्दी और गहराई से सीखता है। जब बच्चे अपने आसपास परिवार में लंबे वक्त तक फोन का इस्तेमाल देखते हैं तो वह भी इसे ही सामान्य समझते हैं। यहां एक गलती परिवार वालों से भी होती है। जब वह खुद बराबर फोन पर लगे रहेंगे तो वह पहचान नहीं पाते कि बच्चे जितना वक्त स्क्रीन पर गुजार रहे हैं वह असल में हेल्दी नहीं है।
क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट रागिनी सिंह भी बताती हैं कि कैसे मोबाइल गेम्स का नेगेटिव असर बच्चों के दिमाग और बिहेवियर पर पड़ता है। जो एक्सेसिव यूज़ है इंटरनेट का उसमें बच्चे, युवा, एडोलसेंट कुछ इस तरह के गेम्स भी खेलते हैं जो अक्सर वीडियो गेम होते हैं, इंटरनेट गेम्स होते हैं। इनमें वो एक किसी ग्रुप के साथ कनेक्टेड रहते हैं और बड़ा नेगेटिव कंपटीशन उनका होता है।
ऐसी स्पर्धा में बच्चे उनके साथ एक दुश्मनी की हद तक उतर आते हैं और उनके अंदर कुछ ना कुछ ऐसे मेंटल डिसऑर्डर उसकी वजह से डेवलप हो जाते हैं कि वह पूरे समाज से, अपनी एकेडमिक जिंदगी से अलग होने लगते हैं और उसके अक्सर बड़े खराब और भारी परिणाम आते हैं।
मोबाइल और इंटरनेट बढ़ाते हैं एक्सपोजर
मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया बच्चों का एक्सपोज़र बढ़ा देते हैं। यानी ऐसी चीजों को उनकी उंगलियों पर ला देते हैं जो बड़े आराम से उनके नाजुक दिमाग पर अपना जादू चला देती है। यही वजह है कि बच्चों को गीली मिट्टी कहा जाता है जो किसी भी आकार में आसानी से ढल सकते हैं।
डॉक्टर इफ्तकार बताते हैं कि अलग-अलग उम्र के लोगों में दिमाग का विकास अलग-अलग समय पर होता है। दिमाग की प्रोसेसिंग भी अलग-अलग होती है। हमारे दिमाग का एक हिस्सा फ्रंटल लोब जो जजमेंट लॉजिक के लिए जिम्मेदार होता है वो बच्चों में देर से डेवेलप होता है। इसलिए उन्हें आसानी से इन्फ्लुएंस किया जा सकता है। यहां असर पता चलता है इमोशनल कंटेंट या कलरफुल तस्वीरों, वीडियो वाले कंटेंट का।
गाजियाबाद मामले में कोरियन कल्चर का असर
गाजियाबाद वाले मामले में अभी तक जो बातें पता चली हैं उनके मुताबिक ये तीनों बच्चियां कोरियन कल्चर की फैन थीं। उन्होंने अपने आखिरी खत में लिखा भी है कि वो कोरियन गानों, फिल्मों, फैशन वगैरह के बिना नहीं रह सकती हैं। उनका पढ़ाई लिखाई में मन नहीं लग रहा था। शायद इसीलिए जब घर वालों ने उनके फोन ले लिए तो वह बर्दाश्त नहीं कर पाईं।
यह आपने गौर किया होगा कि पिछले कुछ साल में कोरियन कल्चर भारत में बहुत ज्यादा पॉपुलर हो गया है। पहले वहां के पॉप बैंड्स फेमस हुए। फिर उनकी तस्वीरों वाले सामान का क्रेज बढ़ता गया। खासकर बच्चों और अडोलेसेंट्स में इनका फैन बेस देखा जा सकता है। सिर्फ यही नहीं, कोरियन स्किन केयर, वहां के टीवी शोज़ में एक अलग ही दीवानगी रहती है।
न्यूरो मार्केटिंग का जादू
लेकिन यह कोई इत्तेफाक नहीं है कि एक पर्टिकुलर कल्चर इस कदर घर-घर में पहुंच गया है। इसके लिए एक टर्म इस्तेमाल किया जाता है – न्यूरो मार्केटिंग। जी हां, मार्केटिंग। कोई भी कंपनी अपने प्रोडक्ट्स की मार्केटिंग, ऐड वगैरह करती ही है। लेकिन न्यूरो मार्केटिंग में उस प्रोडक्ट के साथ कंज्यूमर का एक इमोशनल अटैचमेंट बनाया जाता है।
हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू की एक रिपोर्ट बताती है कि साल 2000 के दशक में बिजनेस स्कूल रिसर्चर्स ने बाजार की एक नब्ज़ पकड़ ली। इन लोगों ने पाया कि कैसे एडवरटाइजिंग, ब्रांडिंग वगैरह का असर दिमाग पर पड़ता है। इसे बाकायदा स्टडी भी किया जा सकता है। किसी एक ब्रांड को देखकर अगर हम उससे रिलेट करते हैं तो हमारे ब्रेन में अलग एक्टिविटी होती है। और अगर नहीं रिलेट करते तो अलग। यही इमोशनल अटैचमेंट धीरे-धीरे लत यानी एडिक्शन में तब्दील हो जाता है।
मोबाइल बना है ब्रिज
और यहां एंट्री होती है मोबाइल फोन, इंटरनेट, सोशल मीडिया की जो बेसिकली किसी ब्रिज की तरह काम करते हैं। इटालियन पीडिएट्रिक सोसाइटी के सर्वे को देखिए। इसमें 10,000 बच्चों को स्टडी किया गया। तो क्या पता चला? कम से कम 14% बच्चों को मोबाइल की लत लग चुकी थी और करीब 45% बच्चों के दिमाग पर अलग-अलग असर देखे गए। किसी का कंसंट्रेशन खराब हो रहा था, किसी को नींद नहीं आ रही थी तो कई मूड स्विंग्स जैसा बिहेवियर दिखा रहे थे।
डॉक्टर रागिनी बताती हैं कि ऐसी लत लगने पर बच्चों के मन और उनके बिहेवियर में क्या देखने को मिलता है। एडिक्शन की स्थिति में बच्चे के दिमाग में जो विचार चलते हैं वो दिन और रात एक करके वह अपनी कोई सीरीज है या कोई उसका सीरियल है या जो भी उसका मोटिव है इंटरनेट के साथ उसको पूरा करना चाहता है।
कहीं ना कहीं उसको ओवरटायरिंग होती है। वह स्लीपलेसनेस को फेस करता है। यानी कि उसकी नींद पूरी नहीं होती। तो जाहिर है कि उसको कितना गुस्सा, उसको कितनी थकान, उसका जो व्यवहार है वह सामान्य नहीं हो सकता। साथ में जो इसका एक्सटर्नल बिहेवियर है यानी कि जो व्यवहारिक जो दुनिया के साथ उसका व्यवहार है अपनी फैमिली के साथ या फ्रेंड्स के साथ वो तो बिल्कुल कुछ इस तरह का होता है कि नॉर्मल सी उसमें बहुत कम रह जाती है।
बच्चा हर टाइम गुस्से में रहता है और उसके कुछ इस तरह के भी सिम्टम्स होते हैं जो मेंटल डिसऑर्डर की तरफ इशारा करते हैं।
नशा ही नहीं, हर चीज की लत लग सकती है
अब जरूरी नहीं है कि किसी चीज का नशा किया जाए तो ही लत लगे। माने मोबाइल, इंटरनेट, किसी गेम से लेकर शॉपिंग या खाने तक की लत भी लग जाती है। अमेरिका के वंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के क्रिस्टोफर ऑलन की एक रिसर्च रिपोर्ट में बताया गया है कि ऐसी कोई लत लगने पर क्या होता है। यहां भी मन यही करता है कि जिस चीज की लत है वो बस मिल जाए। अपने बिहेवियर पर कोई कंट्रोल नहीं रह जाता और अगर इससे दूर करने की कोशिश की जाती है तो विदड्रॉल के सिम्टम्स होते हैं।
डोपामिन का खेल
मगर किसी चीज की लत लगती कैसे है? हमारे दिमाग का एक हिस्सा होता है मेजोकॉर्टिक कोलंबिक सिस्टम। ये ऐसा सर्किट होता है जो तब एकदम एक्टिव हो जाता है जब इसे लगता है कि कोई काम करने से बदले में कुछ रिवॉर्ड मिलेगा। बेसिकली डोपामिन जैसे हार्मोंस रिलीज होंगे जो हमें अच्छा महसूस कराते हैं। तो अब जिस चीज से अच्छा महसूस होगा उसकी इच्छा धीरे-धीरे बढ़ने लगती है।
जैसे डॉक्टर इफ्तकार बताते हैं कि रील्स वगैरह में तेजी से बदलती हुई तस्वीरें, आवाजें, कलरफुल सींस होते हैं। जिनसे यह डोपामिन स्पाइक्स तेजी से आते हैं। ऐसे में क्या होता है? हमारे दिमाग का स्ट्रक्चर और फंक्शन इस तरह चेंज होता है कि इच्छा कंट्रोल करना मुश्किल हो जाता है।
बच्चों पर ज्यादा गहरा असर
बच्चों या अडोलेसेंट्स में इसका असर कहीं ज्यादा गहरा होता है। एक टर्म होता है न्यूरोप्लास्टिसिटी यानी दिमाग का किसी बिहेवियर या किसी फंक्शन के रिस्पांस में खुद को तैयार करना। नए न्यूरल कनेक्शन बनाना। जितनी कम उम्र होती है न्यूरोप्लास्टिसिटी उतनी ही ज्यादा होती है। इसीलिए कहते हैं कि बचपन की आदतें बड़े होने के बाद भी नहीं जाती हैं।
कम उम्र में किसी की लत पड़ जाने से इंपल्स कंट्रोल कमजोर हो ही चुका होता है। मूड भी उसी पर डिपेंड हो चुका होता है। ऐसे में जब उस चीज को दूर कर दिया जाए तो ऐसे हादसों का खतरा होता है जो गाजियाबाद में देखा गया।
पेरेंट्स की भूमिका सबसे अहम
हमने तो यह समझ लिया कि पर्दे के पीछे क्या चल रहा है। बात तब तक पूरी नहीं होती जब तक हम यह ना समझ लें कि इस संकट से बचना कैसे है। यहां भूमिका आती है पेरेंट्स की, परिवार की। बच्चों की मेंटल हेल्थ अच्छी रहे, उनको एडिक्शन ना हो, यहां पेरेंट्स का बहुत बड़ा रोल है।
यानी कि लाइफस्टाइल इज इंपोर्टेंट। बच्चे अपने पेरेंट्स के लाइफस्टाइल को भी कॉपी करते हैं। तो अगर पेरेंट्स थोड़ी सूझबूझ के साथ अपने बिहेवियर को रखते हैं, अपने आचरण को रखते हैं, तो डेफिनेटली बच्चा एक हेल्दी माइंड के साथ डेवलप करेगा।
चेतावनी के संकेत पहचानें
डॉक्टर इफ्तकार का कहना है कि सबसे पहले तो परिवार को यह सीखना होगा कि कैसे प्रॉब्लम के साइंस यानी चेतावनी को पहचाने। ऐसा नहीं है कि उनका बिहेवियर अचानक से एकदम खतरनाक हो जाएगा। गुस्सा धीरे-धीरे बढ़ता है। डॉक्टर साहब इसे कुछ स्टेजेस में समझाते हैं।
पहले सेल्फ केयर के एक्ट कम होते हैं। जैसे नहाना धोना छूट जाना, खेल कूद में कमी वगैरह। फिर आती है स्टेज सेल्फ नेगलेक्ट की। जैसे नींद पूरी ना होना, स्कूल ना जाना, खाना पीना बंद पड़ना। इसके बाद जब पहली बार ज्यादातर पेरेंट्स नोटिस लेने शुरू करते हैं, वो स्टेज है सेल्फ हार्म की। यहां बच्चे खुद को चोट पहुंचाते हैं। और जब इन सब स्टेजेस पर उन्हें कोई सपोर्ट नहीं मिलता, हालत बिगड़ती जाती है तब कोई एक्सट्रीम कदम उठा लेते हैं।
समाधान क्या है?
अब पेरेंट्स को करना क्या चाहिए? डॉक्टर इफ्तार का कहना है कि अगर घरवाले सिर्फ बिहेवियर में बदलाव को समय पर पकड़ लें तो आधी समस्या तो यहीं हल हो जाएगी। खासकर अडोलेसेंट बच्चों की बात करें तो सबसे पहले तो उन पर विश्वास दिखाएं। अग्रेसिव तो बिल्कुल नहीं होना चाहिए।
बच्चों को पहले इन आदतों के नुकसान समझाइए। फिर उनके साथ मिलकर तय करें कि उन्हें क्या समाधान सही लगता है। उन्हें एक सेंस ऑफ रिस्पांसिबिलिटी दें। इसके अलावा स्क्रीन टाइम को पहले फिक्स करें। फिर आजादी दें कि इस वक्त को कैसे इस्तेमाल करना है। लेकिन साथ में सुपरवाइज करते रहें कि बच्चे ऑनलाइन क्या कर रहे हैं।
एक गलती पेरेंट्स और भी करते हैं कि मोबाइल से हटाने के लिए बच्चे को किताब पकड़ा देते हैं। यानी एक काम जिसमें उन्हें मजा आ रहा था उसकी जगह ऐसी एक्टिविटी जो उन्हें सजा लग रही है। ऑनलाइन गेम की जगह ऑफलाइन खिलाएं लेकिन बच्चे के साथ बॉन्ड करें। वक्त बिताएं। उनकी रुचि को समझें, थोपें नहीं।
गहरी समस्याओं को समझें
कई बार ऐसा भी होता है कि ऐसी लत किसी और वजह की ओर इशारा करती है। जैसे किसी बच्चे को सोशल एंजायटी है इसलिए उसने ऑनलाइन रास्ता चुना है। ऐसी बुनियादी परेशानियों को समझना चाहिए। ये मासूम बच्चे समाज, देश, दुनिया का भविष्य हैं। हमें पहले इनके ज़हन में उतरना पड़ेगा। तभी इनकी जिंदगी को बचाया जा सकेगा।
मुख्य बातें (Key Points)
- गाजियाबाद में 12 से 15 साल की तीन बहनों ने मोबाइल छीने जाने पर आत्महत्या कर ली
- बच्चों का दिमाग नकल से सीखता है और फ्रंटल लोब देर से विकसित होने के कारण वे आसानी से प्रभावित होते हैं
- डोपामिन हार्मोन की वजह से रील्स और गेम्स की लत लगती है, जो दिमाग के स्ट्रक्चर को बदल देती है
- इटालियन सर्वे के अनुसार 14% बच्चों को मोबाइल की लत लग चुकी है और 45% पर नकारात्मक प्रभाव देखे गए
- पेरेंट्स को चेतावनी के संकेत पहचानने चाहिए और बच्चों के साथ विश्वास और समझ के साथ पेश आना चाहिए








