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The News Air - Breaking News - Iran War का असर: Paracetamol Shortage का खतरा, 200 फार्मा कंपनियां बंद होने के कगार पर

Iran War का असर: Paracetamol Shortage का खतरा, 200 फार्मा कंपनियां बंद होने के कगार पर

स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से LNG सप्लाई चोक होने से भारत की दवा, खाद और स्टील इंडस्ट्री पर गहरा संकट, खरीफ सीजन से पहले यूरिया की किल्लत का डर

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
बुधवार, 18 मार्च 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, अंतरराष्ट्रीय, बिज़नेस, राष्ट्रीय
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Paracetamol Shortage
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Iran War का असर अब सीधे भारत के हर घर तक पहुंचने लगा है। बेंगलुरु में एक शिकंजी के बिल में “एक्स्ट्रा गैस क्राइसिस चार्ज” लगना इस बात का सबूत है कि हजारों किलोमीटर दूर चल रही जंग आपकी रोजमर्रा की जिंदगी को कैसे प्रभावित कर रही है। मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव की वजह से स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से LNG (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) और प्रोपेन की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे LPG की भारी कमी हो गई है। इसका सबसे खतरनाक असर भारत के तीन सबसे जरूरी सेक्टर्स पर पड़ रहा है: दवाइयां, खाद और स्टील। गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे बड़े फार्मा हब्स में कई दवा फैक्ट्रियां या तो आंशिक रूप से बंद हो चुकी हैं या पूरी तरह बंद होने के कगार पर हैं। अगर हालात जल्दी नहीं सुधरे तो पैरासिटामॉल जैसी जरूरी दवाइयों की कमी एक हकीकत बन सकती है।

क्यों बनी LPG की कमी: स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से चोक हुई सप्लाई

Iran War के चलते दुनिया का सबसे बड़ा ऑयल और गैस ट्रांजिट रूट स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इसी रास्ते से LNG और प्रोपेन जैसी गैसें दुनिया भर में पहुंचती हैं। जब यह सप्लाई चोक हुई तो प्रोपेन की भारी कमी हो गई। प्रोपेन वही गैस है जिससे LPG बनती है।

अब यहां यह समझना जरूरी है कि LPG सिर्फ आपके घर के सिलेंडर में इस्तेमाल नहीं होती। बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों में, खासकर दवा बनाने वाली कंपनियों के लिए, LPG एक अनिवार्य ईंधन है। बिना LPG के दवा बनाने की पूरी प्रक्रिया ठप हो सकती है। इसी वजह से अब भारत के सबसे जरूरी सेक्टर्स में हलचल मच गई है और आम आदमी की जेब से लेकर सेहत तक, सब पर असर पड़ने की आशंका है।

200 दवा कंपनियां 7-10 दिन में बंद हो सकती हैं: Paracetamol Shortage का खतरा

Iran War की वजह से पैदा हुई LPG Shortage का सबसे भयावह असर भारत की फार्मा इंडस्ट्री पर पड़ रहा है। गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे बड़े फार्मा हब्स में कई दवा फैक्ट्रियां या तो आंशिक रूप से बंद हो चुकी हैं या अपने ऑपरेशंस रोकने पर गंभीरता से विचार कर रही हैं।

इंडस्ट्री के लोगों ने बताया कि सबसे ज्यादा असर बॉयलर ऑपरेशंस पर पड़ा है। बॉयलर वो सिस्टम है जिससे भाप (स्टीम) बनती है और उसी से दवा बनाने की मशीनें चलती हैं। इसके अलावा LPG का इस्तेमाल स्टेरलाइजेशन (दवाइयों को कीटाणु मुक्त रखने) और ग्रैनुलेशन (दवा के कण तैयार करने) के लिए भी होता है। यानी LPG नहीं तो दवा बनाने की पूरी प्रक्रिया ठप।

फार्मेक्सिल (Pharmexcil) के पूर्व चेयरमैन दिनेश दुआ ने इकोनॉमिक टाइम्स से बातचीत में चेतावनी दी कि अगर हालात ऐसे ही रहे तो करीब 200 दवा कंपनियां अगले 7 से 10 दिनों में अपना प्रोडक्शन रोक सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इससे जरूरी दवाइयों की कमी हो सकती है।

किन दवाइयों पर पड़ रहा असर: पैरासिटामॉल से लेकर एंटीबायोटिक तक

भारत दुनिया के सबसे बड़े API (Active Pharmaceutical Ingredient) मैन्युफैक्चरिंग हब्स में से एक है। API का मतलब है दवा का वो असली एक्टिव केमिकल हिस्सा जो बीमारी ठीक करता है। Iran War से पैदा हुई LPG Shortage से जिन दवाइयों के उत्पादन पर खतरा मंडरा रहा है, उनकी सूची चिंताजनक है:

पैरासिटामॉल जो बुखार और दर्द की सबसे आम दवा है, मेटफॉर्मिन जो डायबिटीज की दवा है, मेट्रोनिडाजोल जो एंटीबायोटिक है, डाइक्लोफेनाक और निमेसुलाइड जो दर्द निवारक हैं, सिप्रोफ्लॉक्सासिन जो एक प्रमुख एंटीबायोटिक है, और फोलिक एसिड व विटामिन सी जैसे जरूरी पोषक तत्व, इन सबके उत्पादन पर असर पड़ सकता है।

यानी बात सिर्फ एक दवा की नहीं है। अगर LPG की कमी लंबी खिंची तो पूरे हेल्थ सिस्टम पर असर पड़ सकता है। एक अन्य इंडस्ट्री एक्सपर्ट ने बताया कि LPG की कमी का सबसे बड़ा असर लाइफ सेविंग मेडिसिंस, खासकर इंजेक्टेबल ड्रग्स पर पड़ सकता है। क्योंकि इन दवाइयों के लिए स्टेरलाइजेशन और कंट्रोल्ड एनवायरनमेंट बहुत जरूरी होता है, जो LPG के बिना संभव ही नहीं है। यही वजह है कि पैरासिटामॉल, सिरिंजेस और ग्लव्स जैसी जरूरी चीजों की भी कमी होने की आशंका जताई जा रही है।

‘फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड’ पर 2-3 हजार करोड़ के नुकसान का खतरा

Iran War से पैदा हुई Paracetamol Shortage जैसी स्थिति सिर्फ भारत के मरीजों को ही प्रभावित नहीं करेगी। भारत को “फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड” कहा जाता है क्योंकि यह दुनिया को बड़े पैमाने पर API सप्लाई करता है। अगर भारत की फैक्ट्रियां बंद हुईं तो पूरी ग्लोबल सप्लाई चेन पर असर पड़ेगा।

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की फार्मा कंपनियां 2,000 से 3,000 करोड़ रुपये का नुकसान देख सकती हैं क्योंकि भारतीय एक्सपोर्ट्स पर सीधा खतरा है। फार्मा इंडस्ट्री पहले से ही कम मार्जिन पर काम करती है। अब जब गैस महंगी हो गई है और उपलब्धता में भी दिक्कत आ रही है तो कंपनियों की लागत बढ़ेगी, डिलीवरी में देरी होगी और दवाइयों की कीमतें भी बढ़ सकती हैं।

इंडस्ट्री एक्सपर्ट ने बताया कि शॉर्ट टर्म में भारत के पास दवाइयों का 3 से 6 महीने का स्टॉक है, इसलिए तुरंत कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए। लेकिन अगर यह युद्ध लंबा खिंचा तो गंभीर समस्या हो सकती है क्योंकि बहुत सी दवाइयां पेट्रोलियम बेस्ड प्रोडक्ट्स से बनती हैं। फार्मा कंपनियां सरकार से मांग कर रही हैं कि उन्हें कोविड के समय की तरह एसेंशियल कमोडिटीज के तहत छूट दी जाए ताकि उनकी फैक्ट्रियां चालू रह सकें और हॉर्मुज से उनकी सप्लाई को इम्युनिटी दी जाए।

खाद पर संकट: खरीफ सीजन से पहले यूरिया और DAP की किल्लत का डर

Iran War का दूसरा बड़ा असर भारत के फर्टिलाइजर सेक्टर पर पड़ रहा है। नेचुरल गैस फर्टिलाइजर इंडस्ट्री के लिए बेहद जरूरी रॉ मटेरियल है क्योंकि यूरिया जैसे फर्टिलाइजर बनाने में नेचुरल गैस को फीडस्टॉक के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। अब जब LNG की सप्लाई ही चोक हो गई है तो पूरी फर्टिलाइजर सप्लाई चेन में हलचल मच गई है।

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जंग शुरू होने के बाद इंपोर्टेड स्पेशलिटी फर्टिलाइजर्स के दाम 10 से 20% तक बढ़ चुके हैं। इसका सीधा मतलब है कि जो खाद भारत बाहर से मंगाता है, वो अब काफी महंगी हो गई है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि खरीफ सीजन से ठीक पहले यूरिया और DAP (डाई अमोनियम फास्फेट) जैसे सबसे जरूरी फर्टिलाइजर्स की सप्लाई पर असर पड़ सकता है।

इंडियन माइक्रो फर्टिलाइजर्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष राहुल मीरचंदानी ने इकोनॉमिक टाइम्स से बातचीत में बताया कि कंपनियां बहुत सावधानी के साथ अपनी इन्वेंटरी बढ़ा रही हैं और रॉ मटेरियल्स को सुरक्षित करने की कोशिश कर रही हैं ताकि आगे सप्लाई में दिक्कत आए तो निपटा जा सके। उनके अनुसार सप्लाई में समस्या की वजह से बाजार में बदलाव दिखने लगा है। माइक्रोन्यूट्रिएंट्स और स्पेशलिटी फर्टिलाइजर्स जैसे वैकल्पिक विकल्पों की पूछताछ बढ़ गई है।

मोनो अमोनियम फॉस्फेट (MAP), मोनो पोटैशियम फॉस्फेट (MKP), सल्फेट ऑफ पोटाश (SOP), कैल्शियम नाइट्रेट और वाटर सॉल्युबल न्यूट्रिएंट्स जैसे स्पेशलिटी फर्टिलाइजर्स के दाम भी 20% तक बढ़ चुके हैं। हालांकि ग्राउंड लेवल पर अभी किसानों की वास्तविक मांग में कोई बदलाव नहीं आया है, लेकिन कंपनियां और डीलर दूसरे विकल्प तलाश रहे हैं।

यूरिया प्लांट बंद होने का खतरा: दोबारा शुरू होने में लग सकते हैं महीनों

Iran War के चलते LNG सप्लाई में कमी का एक और गंभीर पहलू यह है कि भारत की कुछ यूरिया उत्पादन करने वाली कंपनियों को अपने प्लांट बंद करने पड़ सकते हैं या उन्हें मेंटेनेंस पर डालना पड़ सकता है। इसके बारे में सबसे चिंताजनक बात यह है कि अगर एक बार प्लांट बंद हो गया तो उसे उसी दक्षता (Efficiency) से दोबारा चालू होने में महीनों तक का समय लग सकता है।

ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि सरकार ने फिलहाल गैस एलोकेशन में बदलाव किए हैं और घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता दी है। इसी वजह से फर्टिलाइजर प्लांट्स को उनकी जरूरत की लगभग 70% गैस ही मिल रही है, बाकी 30% की कमी उनके ऑपरेशंस को प्रभावित कर रही है।

हालांकि फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के डायरेक्टर जनरल सुरेश कुमार ने थोड़ी राहत देते हुए कहा कि फिलहाल देश में फर्टिलाइजर का स्टॉक काफी है और खरीफ सीजन को मैनेज किया जा सकता है। लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इंपोर्टेड फर्टिलाइजर्स की उपलब्धता में कुछ कमी आ सकती है। इसके दाम बढ़ने से भारतीय कंपनियां इनका घरेलू उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं ताकि आयात पर निर्भरता कम की जा सके। लेकिन यह एक लंबी प्रक्रिया है और जंग अगर खिंची तो किसानों पर सीधा बोझ पड़ेगा।

स्टील सेक्टर पर भी गहरा असर: JSW Steel को Force Majeure नोटिस

Iran War का तीसरा बड़ा शिकार भारत का स्टील सेक्टर बन रहा है। स्टील मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की रीढ़ होता है और LNG स्टील बनाने की प्रक्रिया के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि इसमें लगातार हाई हीट और एनर्जी की आवश्यकता होती है।

CNBC की रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ती गैस की कमी की वजह से देश में कई स्टील प्लांट्स का दैनिक ऑपरेशन प्रभावित हुआ है। JSW स्टील ने अपनी इंटरनल कम्युनिकेशन में बताया कि ईंधन सप्लाई की दिक्कत और समुद्री रास्तों में बाधा के कारण उनके ऑपरेशंस और सप्लाई चेन दोनों पर असर पड़ा है।

सबसे बड़ी बात यह है कि JSW स्टील के एक प्रमुख सप्लायर पेट्रोनेट LNG ने उन्हें Force Majeure नोटिस दे दिया है। Force Majeure का मतलब होता है कि जंग जैसी असाधारण और अनियंत्रणीय स्थिति की वजह से कंपनी अपने कॉन्ट्रैक्ट के अनुसार गैस सप्लाई करने में असमर्थ है। यह नोटिस इस बात का संकेत है कि समस्या कितनी गंभीर है।

इंडियन स्टील एसोसिएशन ने भी सरकार को चेतावनी दी है कि गैस की कमी, खासकर LPG और प्रोपेन की कमी, पूरी स्टील बनाने वाली वैल्यू चेन को प्रभावित कर सकती है। और इसका सबसे ज्यादा असर छोटे उद्योगों यानी MSMEs पर पड़ रहा है, जिनके पास बड़ी कंपनियों की तरह वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत या बफर स्टॉक रखने की क्षमता नहीं है।

सरकार ने उठाए कदम: घरेलू LPG को प्राथमिकता, होर्डिंग पर सख्ती

Iran War के असर से निपटने के लिए भारत सरकार ने कुछ कदम जरूर उठाए हैं। सबसे पहले, घरेलू LPG सप्लाई को प्राथमिकता दी गई है ताकि आम लोगों के रसोईघर पर असर न पड़े। साथ ही होर्डिंग (जमाखोरी) और ब्लैक मार्केटिंग रोकने के लिए सख्त नियम लागू किए गए हैं।

लेकिन इंडस्ट्री की मांग यह है कि सिर्फ घरेलू सिलेंडर को प्राथमिकता देने से काम नहीं चलेगा। फार्मा कंपनियां चाहती हैं कि उन्हें कोविड काल की तरह एसेंशियल कमोडिटीज के तहत छूट दी जाए। उनकी मांग है कि दवाइयों को एसेंशियल मेडिसिन का दर्जा दिया जाए, एनर्जी सप्लाई का प्राथमिकता पर आश्वासन दिया जाए और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से दवा संबंधित सप्लाई को युद्ध से अलग रखकर इम्युनिटी दी जाए।

यह मांग इसलिए भी जायज है क्योंकि भारत सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए दवाइयां बनाता है। अगर भारत की फार्मा फैक्ट्रियां बंद हुईं तो इसका असर अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और कई विकासशील देशों पर पड़ेगा जो सस्ती भारतीय दवाइयों पर निर्भर हैं।

जंग कहीं और, असर आपकी दवा, खाने और जेब पर

Iran War से पैदा हुआ यह संकट इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में कोई भी देश किसी युद्ध से अछूता नहीं रह सकता। एक शिकंजी के बिल में “गैस क्राइसिस चार्ज” लगना बताता है कि सप्लाई चेन का संकट कितनी गहराई तक पहुंच चुका है। आज LPG की कमी है, कल पैरासिटामॉल की कमी हो सकती है, परसों खाद महंगी होगी और उसके बाद खाने की थाली महंगी होगी।

3 से 6 महीने का दवाइयों का स्टॉक एक अस्थायी राहत जरूर है, लेकिन अगर यह युद्ध लंबा खिंचा तो भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा, सप्लाई चेन डाइवर्सिफिकेशन और घरेलू उत्पादन क्षमता पर गंभीरता से विचार करना होगा। किसान को खाद चाहिए, मरीज को दवा चाहिए, इंडस्ट्री को स्टील चाहिए और इन सबके लिए एक स्थिर ऊर्जा सप्लाई चाहिए। यह वो कड़ी है जो टूट रही है और इसे जोड़ने की जिम्मेदारी सरकार, इंडस्ट्री और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति तीनों पर है। जब तक हॉर्मुज से सप्लाई सामान्य नहीं होती, भारत को हर संभव वैकल्पिक व्यवस्था पर काम करना होगा। आने वाले हफ्ते बताएंगे कि यह संकट कितना गहरा होता है या सरकार की कोशिशें कितना असर दिखाती हैं।

मुख्य बातें (Key Points)
  • Iran War के कारण स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से LNG और प्रोपेन सप्लाई चोक होने से भारत में LPG की भारी कमी हो गई है, जिससे गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के फार्मा हब्स में दवा फैक्ट्रियां बंद होने के कगार पर हैं।
  • फार्मेक्सिल के पूर्व चेयरमैन दिनेश दुआ के अनुसार 200 दवा कंपनियां अगले 7-10 दिनों में प्रोडक्शन रोक सकती हैं, जिससे पैरासिटामॉल, मेटफॉर्मिन, एंटीबायोटिक्स और इंजेक्टेबल ड्रग्स जैसी जरूरी दवाइयों की कमी हो सकती है। भारतीय फार्मा कंपनियों को 2,000-3,000 करोड़ का नुकसान होने की आशंका है।
  • इंपोर्टेड स्पेशलिटी फर्टिलाइजर्स के दाम 10-20% बढ़े हैं और खरीफ सीजन से पहले यूरिया और DAP की सप्लाई पर खतरा है। फर्टिलाइजर प्लांट्स को उनकी जरूरत की सिर्फ 70% गैस मिल रही है।
  • JSW स्टील को पेट्रोनेट LNG ने Force Majeure नोटिस दिया है। इंडियन स्टील एसोसिएशन ने चेतावनी दी कि LPG-प्रोपेन की कमी से पूरी स्टील वैल्यू चेन और खासकर MSMEs बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं।

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1: Iran War से भारत में Paracetamol Shortage क्यों हो सकती है?

स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से LNG और प्रोपेन की सप्लाई बाधित होने से LPG की भारी कमी हो गई है। पैरासिटामॉल बनाने वाली फैक्ट्रियों में बॉयलर ऑपरेशंस, स्टेरलाइजेशन और ग्रैनुलेशन के लिए LPG जरूरी ईंधन है। बिना LPG के दवा बनाने की पूरी प्रक्रिया ठप हो सकती है, जिससे पैरासिटामॉल सहित कई जरूरी दवाइयों की कमी हो सकती है।

Q2: भारत में दवाइयों का कितने दिन का स्टॉक बचा है?

इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स के अनुसार भारत के पास फिलहाल 3 से 6 महीने का दवाइयों का स्टॉक उपलब्ध है। शॉर्ट टर्म में कोई तत्काल समस्या नहीं होनी चाहिए, लेकिन अगर Iran War लंबा खिंचा तो पेट्रोलियम बेस्ड प्रोडक्ट्स से बनने वाली दवाइयों की कमी गंभीर रूप ले सकती है।

Q3: Iran War से भारत के किसानों पर क्या असर पड़ेगा?

खरीफ सीजन से पहले यूरिया और DAP जैसे जरूरी फर्टिलाइजर्स की सप्लाई प्रभावित हो सकती है। इंपोर्टेड स्पेशलिटी फर्टिलाइजर्स के दाम 10-20% बढ़ चुके हैं। फर्टिलाइजर प्लांट्स को सिर्फ 70% गैस मिल रही है और अगर प्लांट बंद हुए तो दोबारा शुरू होने में महीनों लग सकते हैं, जिससे खाद की कीमतें बढ़ेंगी और किसानों की लागत बढ़ेगी।

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अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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