Iran War End Scenarios को लेकर इस वक्त पूरी दुनिया एक ही सवाल पूछ रही है: यह युद्ध कब और कैसे खत्म होगा? ईरान और इजराइल–अमेरिका के बीच जारी इस जंग ने दुनिया में अस्थिरता पैदा कर दी है। तेल और गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं। कच्चे तेल की कीमतें सिर्फ एक हफ्ते में $77 से बढ़कर $115 प्रति बैरल तक पहुंच चुकी हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य में हमलों की वजह से तेल और गैस की वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हो रही है। अमेरिका का दावा है कि उसने ईरान के 50 से ज्यादा जहाजों को डुबो दिया है।
आसमान से लेकर समुद्र तक यह युद्ध जारी है। दोनों तरफ से बयानबाजी तेज होती जा रही है और हर पक्ष दूसरे को पूरी तरह तबाह करने की कसमें खा रहा है। नई दिल्ली से लेकर ब्रसेल्स तक हर सरकार एक ही सवाल पूछ रही है कि यह सब कैसे और कब खत्म होगा। ऐसे में उन संभावित तरीकों को समझना जरूरी है, जिनसे Iran War End हो सकता है।
पहला तरीका: कूटनीति का रास्ता अपनाना
Iran War End Scenarios में सबसे पहला और सबसे आदर्श तरीका कूटनीति यानी डिप्लोमेसी है। बातचीत की पहल करना, वार्ता की मेज पर बैठना और एक समझौते तक पहुंचना। यह वो रास्ता है जिसे हर कोई अपनाना चाहता है, लेकिन कोई भी वहां तक पहुंच नहीं पा रहा।
दरअसल, पहला बम गिरने से पहले ही ओमान परमाणु वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा था। बातचीत के तीन दौर पूरे हो चुके थे। ओमान के विदेश मंत्री ने 26 फरवरी को CBS News को बताया था कि दोनों पक्षों ने काफी प्रगति की है और समझौता पहुंच के भीतर है। लेकिन ठीक इसके 48 घंटे बाद, 28 फरवरी को “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” शुरू हो गया और सारी बातचीत धरी की धरी रह गई।
अब स्थिति यह है कि ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराक्षी ने साफ ऐलान कर दिया है कि अमेरिका के साथ बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद हो चुका है। ट्रंप प्रशासन ने भी कुछ इसी तरह का रुख अपनाया है। इसी बीच इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि युद्ध का मकसद ईरान की मौजूदा सरकार को हटाना है। यानी अभी कोई भी पक्ष बातचीत की मेज तक पहुंचने को तैयार नहीं दिख रहा।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सुझाव दिया था कि अगर जरूरी हो तो ईरान, इजराइल और अमेरिका के नेता आपस में बैठकर बातचीत करें और दूसरे देशों के नेताओं को भी शामिल करें। लेकिन फिलहाल यह सुझाव कागज पर ही है।
दूसरा तरीका: ईरान युद्ध को इतना महंगा बना दे कि अमेरिका रुक जाए
Iran War End Scenarios में दूसरा तरीका ईरान की रणनीति से जुड़ा है। तेहरान की सोच सीधी है: अगर वह सैनिक तौर पर अमेरिका-इजराइल को नहीं जीत सकता, तो वह इस युद्ध को इतना नुकसानदेह और महंगा बना सकता है कि वाशिंगटन अपने सहयोगियों के दबाव में आकर इसे रोकने का फैसला कर दे।
और इसका असर दिखने भी लगा है। जिस तरह से होर्मुज में ईरान ने गतिविधियां बढ़ाई हैं, उसके बाद से कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। दुनियाभर में महंगाई की मार पड़ रही है। ईरान पहले ही 14 पड़ोसी देशों पर हमला कर चुका है, जिनमें कतर, यूएई, सऊदी अरब, बहरीन और यहां तक कि ईरान का सहयोगी माना जाने वाला ओमान भी शामिल है।
आर्थिक मोर्चे पर आंकड़े और भी डरावने हैं। जेपी मॉर्गन की विश्लेषक नताशा कानोवा ने अपने क्लाइंट्स को भेजे एक नोट में चेतावनी दी है कि खाड़ी क्षेत्र की तेल भंडारण क्षमता तीन हफ्तों में खत्म हो सकती है, जिससे उत्पादन रुक जाएगा और तेल की कीमतें बढ़कर $120 प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।
कतर के ऊर्जा मंत्री अलकाऊबी ने कहा है कि अगर लड़ाई जारी रही तो तेल की कीमतें $150 प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं, जिसके नतीजों को उन्होंने दुनिया की अर्थव्यवस्था के ढहने की आशंका के तौर पर बताया है। इससे भी आगे बढ़कर IRGC (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) ने धमकी दी है कि अगर ईरान के ऊर्जा ढांचे पर हमले जारी रहे, तो तेल की कीमतें $200 प्रति बैरल से भी ऊपर जा सकती हैं।
ज्यादातर विश्लेषक इसे महज राजनीतिक बयानबाजी मानते हैं, लेकिन यही वो स्थिति है जिससे बाजार सबसे ज्यादा डरे हुए हैं। और ईरान के लिए यह एकमात्र ऐसा हथियार है जो उसके पास अब बचा है, जिसके जरिए वह अमेरिका-इजराइल पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।
तीसरा तरीका: दुनिया वाशिंगटन पर युद्ध रोकने का दबाव बनाए
Iran War End Scenarios में तीसरा तरीका अंतरराष्ट्रीय दबाव है। यूरोप शुरू से ही इस युद्ध के पक्ष में नहीं रहा है। युद्ध के जोर पकड़ने और बच्चों समेत आम नागरिकों के हताहत होने की बढ़ती संख्या के बीच यूरोपीय आयोग की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लाइन ने बयान दिया और कूटनीति के जरिए ही समाधान करने का सुझाव दिया।
होर्मुज जलडमरूमध्य के लगभग बंद हो जाने से आर्थिक नुकसान अब सिर्फ खाड़ी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक G7 देशों के वित्त मंत्री अब रणनीतिक तेल भंडारों से आपातकालीन स्थिति में तेल जारी करने पर चर्चा कर रहे हैं। कुछ अमेरिकी अधिकारी कथित तौर पर 300 से 400 मिलियन बैरल तेल जारी करने पर विचार कर रहे हैं, जो IEA प्रणाली के कुल सार्वजनिक आपातकालीन भंडारों का लगभग एक-चौथाई हिस्सा है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप के कुछ सलाहकारों ने उनसे ईरान युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता खोजने का आग्रह किया है, क्योंकि मध्यावधि चुनाव से पहले यह उनकी अप्रूवल रेटिंग पर गंभीर असर डाल रहा है। यानी अमेरिका की घरेलू राजनीति भी इस Iran War End की दिशा में एक बड़ा कारक बन सकती है।
चौथा तरीका: युद्ध चुपचाप एक स्थायी गतिरोध बन जाए
Iran War End Scenarios में चौथी संभावना शायद सबसे खतरनाक और दुखद है। अगर युद्ध रुका भी, सीजफायर हुआ भी, तो इसका मतलब यह नहीं कि युद्ध सच में खत्म हो जाएगा। ऐसी स्थिति में यह जंग चुपचाप एक स्थायी गतिरोध (Frozen Conflict) में बदल सकती है।
यानी न तो पूरी तरह युद्ध होगा, न पूरी तरह शांति। छिटपुट हमले, आर्थिक प्रतिबंध, साइबर हमले और प्रॉक्सी वॉर का सिलसिला जारी रह सकता है। यह वही स्थिति है जो दुनिया ने उत्तर कोरिया-दक्षिण कोरिया के बीच देखी है, जहां दशकों से न युद्ध है न शांति। अगर ईरान-इजराइल-अमेरिका का यह टकराव भी ऐसे ही स्थायी बन गया, तो इसका असर पूरे मिडिल ईस्ट और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर लंबे समय तक बना रहेगा।
पांचवां तरीका: एक पक्ष की निर्णायक सैन्य जीत
Iran War End Scenarios में पांचवीं संभावना यह है कि किसी एक पक्ष की निर्णायक सैन्य जीत हो जाए। अगर अमेरिका-इजराइल गठबंधन ईरान की सैन्य क्षमता को पूरी तरह नष्ट कर दे या ईरान की सरकार बदल जाए, जैसा कि नेतन्याहू ने संकेत दिया है, तो युद्ध खत्म हो सकता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि मिडिल ईस्ट में ऐसी निर्णायक सैन्य जीत अक्सर नए संकटों को जन्म देती है। इराक में सद्दाम हुसैन का अंत हुआ, लेकिन उसके बाद जो अस्थिरता पैदा हुई वह दशकों तक बनी रही।
भारत और दुनिया के लिए क्या मायने रखते हैं ये तरीके
Iran War End Scenarios पर नजर डालें तो एक बात साफ है कि इस युद्ध का खामियाजा वो देश ज्यादा भुगत रहे हैं जिन्होंने यह जंग शुरू ही नहीं की। भारत जैसा देश जो अपने कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट से आयात करता है, उसके लिए यह संकट सीधे पेट्रोल-डीजल की कीमतों, महंगाई और आर्थिक विकास दर से जुड़ा हुआ है।
हालांकि बाजार इस बात पर दांव लगा रहे हैं कि यह युद्ध छोटा होगा और लंबा नहीं चलेगा, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और कह रही है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद भी ईरान झुकने को तैयार नहीं दिख रहा। दूसरी तरफ अमेरिका और इजराइल भी पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। ऐसे में जब तक कोई ठोस कूटनीतिक पहल नहीं होती या आर्थिक दबाव इतना नहीं बढ़ता कि कोई पक्ष मजबूर हो जाए, तब तक यह जंग किसी न किसी रूप में जारी रहने की आशंका बनी रहेगी। और इसकी सबसे बड़ी कीमत आम लोग चुकाएंगे, चाहे वो तेहरान में हों, तेल अवीव में हों, या नई दिल्ली में।
मुख्य बातें (Key Points)
- कच्चे तेल की कीमतें एक हफ्ते में $77 से $115 प्रति बैरल तक पहुंची, विश्लेषकों ने $150 से $200 तक जाने की चेतावनी दी।
- ओमान की मध्यस्थता में बातचीत के 3 दौर पूरे होने के बाद ऑपरेशन एपिक फ्यूरी शुरू हो गया, अब दोनों पक्षों ने बातचीत का रास्ता बंद किया।
- G7 देश 300-400 मिलियन बैरल आपातकालीन तेल भंडार जारी करने पर विचार कर रहे हैं, ट्रंप के सलाहकारों ने भी युद्ध से बाहर निकलने का आग्रह किया।
- ईरान ने 14 पड़ोसी देशों पर हमला किया, जेपी मॉर्गन ने चेतावनी दी कि खाड़ी की तेल भंडारण क्षमता 3 हफ्तों में खत्म हो सकती है।








