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Iran Oil History: कैसे ब्रिटेन और अमेरिका ने ईरान का तेल लूटकर पूरे देश को तबाह किया

1901 की ऑयल डील से लेकर CIA के तख्तापलट तक, 150 सालों में पश्चिमी ताकतों ने कैसे ईरान को अपनी कठपुतली बनाए रखा

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
रविवार, 8 मार्च 2026
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Iran Oil History
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Iran Oil History: मिडिल ईस्ट की भू-राजनीति को समझना हो तो ईरान की कहानी जानना सबसे जरूरी है। एक ऐसा देश जिसके पास दुनिया के सबसे बड़े तेल और प्राकृतिक गैस के भंडार हैं, जिसकी भौगोलिक स्थिति इतनी रणनीतिक है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को ब्लॉक करके दुनिया के 20% ऑयल फ्लो को चंद घंटों में रोका जा सकता है, और फिर भी आज इस देश की 28% आबादी गरीबी में जी रही है और अगले 2 साल में 40% आबादी गरीबी रेखा से नीचे जाने वाली है। इसकी वजह पिछले 150 सालों में पश्चिमी ताकतों द्वारा ईरान के संसाधनों की व्यवस्थित लूट और उसकी संप्रभुता पर लगातार हमला है।


ईरान क्यों है हर महाशक्ति की नजर में?

Iran Oil History को समझने से पहले ईरान की भौगोलिक स्थिति समझना जरूरी है। भारत से पश्चिम की ओर जाएं तो मिडिल ईस्ट में अरब सुन्नी मुस्लिम बहुसंख्यक देशों के बीच ईरान स्थित है, जिसे पहले “पर्शिया” के नाम से जाना जाता था। ईरान की एक सीमा दक्षिण एशिया से लगती है, दूसरी अरब देशों से। नीचे पर्शियन गल्फ और अरेबियन सी है जहां से दुनियाभर का व्यापार होता है।

इस भौगोलिक स्थिति की वजह से ईरान पर नियंत्रण रखने वाले को पूरे क्षेत्र पर दबदबा मिल जाता है। तेल और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार इसे और भी मूल्यवान बनाते हैं। यही कारण है कि ब्रिटेन, रूस और बाद में अमेरिका ने हमेशा ईरान को अपने प्रभाव क्षेत्र में रखने की कोशिश की।


ब्रिटेन और रूस ने कैसे बांट लिया ईरान को?

Iran Oil History की शुरुआत 19वीं सदी के मध्य से होती है। अक्टूबर 1834 में फहाद अली शाह की मृत्यु के बाद मोहम्मद शाह राजा बने और उनकी मृत्यु के बाद 5 सितंबर 1848 को उनके बेटे नासिर अलदीन शाह ईरान के राजा बने। नासिर थोड़े आक्रामक स्वभाव के थे। 1856 में उन्होंने “हेरात” नामक एक क्षेत्र पर हमला किया जिसे वे ईरान का हिस्सा मानते थे।

इसी हमले ने ब्रिटिशर्स को मौका दे दिया। ब्रिटेन ने पलटवार करके ईरान को पीछे धकेला और “ट्रीटी ऑफ पेरिस” पर जबरन हस्ताक्षर करा लिए। जो फायदे रूस को ईरान के उत्तरी क्षेत्र में मिले थे, वही सब ब्रिटेन को दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में मिल गए। इस तरह रूस और ब्रिटेन ने बिना आपस में लड़े ईरान को अपने-अपने हिसाब से बांट लिया।

इसका सबसे बड़ा नुकसान ईरान के “बाज़ारी” यानी व्यापारियों को हुआ। पूरी टेक्सटाइल इंडस्ट्री उनके हाथ से निकल गई। आम जनता के लिए यह भारी झटका था और जगह-जगह विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। लोग कहने लगे कि राजा विदेशियों के हाथों बिक गया है।


उलेमा का उभार: जब धार्मिक नेताओं ने राजा को झुकाया

स्थिति इतनी बिगड़ी कि मुस्लिम उलेमा यानी धार्मिक विद्वानों को बीच में आना पड़ा। उलेमा के हस्तक्षेप से राजा पर जबरदस्त दबाव बना और 1892 में राजा नासिर को ब्रिटिश ट्रीटी रद्द करनी पड़ी। इस घटना ने ईरान की राजनीति में दो बड़े बदलाव किए। पहला, राजा को लोग हल्के में लेने लगे और दूसरा, उलेमा का कद ईरान में बहुत ऊंचा उठ गया।

चार साल बाद 1896 में “मिर्ज़ा रिज़ा खरमानी” नामक व्यक्ति ने राजा नासिर की हत्या कर दी। उसी दिन 1 मई 1896 को नासिर के बेटे मुज़फ्फर अलदीन को राजा बना दिया गया। लेकिन वे भी रूस और ब्रिटेन के बीच फंसे रहे और ज्यादा कुछ नहीं कर पाए।


विलियम डीआरकी और 1901 की ऐतिहासिक ऑयल डील

Iran Oil History में सबसे निर्णायक मोड़ 1896 में ही आया, जब ब्रिटेन का एक कारोबारी विलियम डीआरकी सामने आया। डीआरकी दुनियाभर में, खासकर ऑस्ट्रेलिया में तेल की माइनिंग करता था। उसके हाथ एक रिपोर्ट लगी जिसमें बताया गया था कि ईरान के अंदर तेल निकलने की भारी संभावना है।

मौके का फायदा उठाते हुए डीआरकी ने राजा मुज़फ्फर से मुलाकात की और 16 अप्रैल 1901 को एक ऐतिहासिक एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करा लिए। इस एग्रीमेंट की शर्तें ईरान के लिए बेहद नुकसानदेह थीं। अगले 60 साल तक डीआरकी ईरान में तेल खोजेगा, निकालेगा, बेचेगा और मुनाफा कमाएगा। बदले में ईरान को कुल मुनाफे का सिर्फ 16% मिलेगा और एक निश्चित सालाना रकम दी जाएगी। यह सारा काम ब्रिटिश प्रभाव वाले दक्षिणी क्षेत्र में होना था।


एंग्लो-पर्शियन ऑयल कंपनी: जो आगे चलकर BP बनी

डीआरकी ने ईरान सरकार के साथ मिलकर “एंग्लो-पर्शियन ऑयल कंपनी” बनाई। शुरुआत में तेल खोजने में भारी पैसा और समय लगा। जब डीआरकी का खुद का पैसा खत्म हो गया, तो ब्रिटिश सरकार ने उसे फंडिंग दी और बदले में कंपनी के शेयर ले लिए। धीरे-धीरे कंपनी के ज्यादातर शेयर ब्रिटिश सरकार के पास आ गए। आगे चलकर इसी कंपनी का नाम बदलकर ब्रिटिश पेट्रोलियम (BP) हो गया, जो आज दुनिया की सबसे बड़ी ऑयल कंपनियों में से एक है।

1908 में ईरान के अंदर बहुत बड़ी ऑयल फील्ड की खोज हुई। जैकपॉट तो लगा, लेकिन इसका मुनाफा ब्रिटेन के पास जा रहा था। ईरान को सिर्फ 16% हिस्सा मिल रहा था। यहीं से ईरान के अंदर वो दिक्कतें शुरू हुईं जिनका असर आज तक दिखता है। ईरान के लोगों ने समझ लिया कि उनका राजा विदेशी ताकतों के हाथों बिका हुआ है और उनके देश का तेल लूटा जा रहा है।


मजलिस का जन्म: जब ईरान में संसदीय व्यवस्था शुरू हुई

Iran Oil History में एक और महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब ईरान के धार्मिक विद्वानों (उलेमा) ने लोगों के समर्थन से राजशाही के समानांतर एक “इस्लामिक कॉन्स्टिट्यूशन” शुरू कर दिया। इसे “मजलिस” नाम दिया गया। यह कुछ-कुछ इंग्लैंड की संवैधानिक राजशाही जैसा था, जहां राजा अपना राज करता रहेगा लेकिन मजलिस के पास भी अधिकार होंगे। वोटिंग और इलेक्शन की व्यवस्था बनाई गई।

मजलिस ने शिया मुस्लिम धर्म को ईरान का आधिकारिक धर्म घोषित कर दिया। कागजों पर राजा और मजलिस मिलकर ईरान चला रहे थे, लेकिन असल में सारे फैसले मजलिस ले रही थी। राजा सिर्फ नाम का बचा था।

16 जुलाई 1909 को राजा मुज़फ्फर अलदीन की मृत्यु हुई और उनके बेटे मोहम्मद अली शाह राजा बने। मोहम्मद अली शाह मजलिस के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने सेना की मदद से मजलिस के नेताओं पर हमला कराया और उन्हें जेल में डलवा दिया। लेकिन मजलिस को जनता का समर्थन था। एक साल बाद 1909 में मजलिस ने अपने लड़ाके तैयार कर राजा पर पलटवार किया। हालात बेकाबू होते देख मोहम्मद अली शाह रूस भाग गए। मजलिस ने राजा के 11 साल के बेटे को कठपुतली राजा बना दिया और असली सत्ता अपने हाथ में रखी।


रेज़ा खान पहलवी: ब्रिटेन ने कैसे कराया तख्तापलट

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1917 में रूस में क्रांति हो गई और वह ईरान छोड़कर वापस चला गया। लेकिन ब्रिटेन के लिए ईरान छोड़ना असंभव था क्योंकि ईरान का तेल ब्रिटिश अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा बन चुका था और पूरी इंडस्ट्री इसी तेल पर निर्भर थी।

जब मजलिस ने ब्रिटेन को साफ कह दिया कि न उसकी आर्थिक मदद चाहिए, न सुरक्षा, वह ईरान छोड़कर चला जाए, तो अंतरराष्ट्रीय दबाव में ब्रिटेन को अपने अधिकारी वापस बुलाने पड़े। लेकिन इतना बड़ा नुकसान ब्रिटेन सहने को तैयार नहीं था। उसने ईरानी सेना के एक कमांडर रेज़ा खान पहलवी को पूरा समर्थन दिया।

ब्रिटिश समर्थन से रेज़ा खान ने ईरान में तख्तापलट कर दिया। राजा को यूरोप भिजवा दिया गया। रेज़ा खान ने मजलिस को खत्म नहीं किया क्योंकि उसे जनता का समर्थन था, बल्कि उसने मजलिस के नेताओं को अपने तरीके से काबू किया। कुछ को पैसे दिए, कुछ को अपने समर्थकों से बदल दिया और जो नहीं माने उनकी हत्या करवा दी। मजलिस का पूरा नियंत्रण अपने हाथ में लेकर उसे पूरी तरह कमजोर कर दिया। इसके साथ ही कज़र राजवंश का अंत हुआ और ईरान में पहलवी राजवंश की शुरुआत हो गई।


ईरान का “आधुनिकीकरण”: जब पश्चिमी रंग में रंगा गया पूरा देश

रेज़ा खान पर पश्चिमी ताकतों का पूरा प्रभाव था। उन्होंने खुद को एक सेक्युलर और आधुनिक नेता के रूप में पेश किया और ईरान को पूरी तरह मॉडर्नाइज करने का अभियान चलाया। 1928 में ईरान में पुरुषों के लिए यूरोपियन स्टाइल की ड्रेस और हैट पहनना अनिवार्य कर दिया गया। मस्जिदों में कुर्सियां लगा दी गईं। महिलाओं के लिए पर्दा और बुर्का पहनना बैन कर दिया गया।

महिलाओं को नौकरी करने के लिए प्रोत्साहित किया गया, उनके लिए सरकारी नौकरियां निकाली गईं। कैफे और सिनेमा हॉल में महिलाओं को जाने की अनुमति दी गई। आज जब ईरान में सख्त पर्दा प्रथा है, तो यह कल्पना करना मुश्किल लगता है कि उस दौर में ईरानी महिलाएं बिल्कुल पश्चिमी अंदाज में रहती थीं। यह ईरान के इतिहास का वह दौर था जब देश का बाहरी स्वरूप तो बदल गया, लेकिन अंदर से संसाधनों की लूट जारी रही।


द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका का प्रवेश: खेल और बड़ा हो गया

Iran Oil History में सबसे बड़ा मोड़ दूसरे विश्व युद्ध के बाद आया। युद्ध के बाद अमेरिका दुनिया की सबसे ताकतवर महाशक्ति बनकर उभरा। ब्रिटेन अमेरिका की “प्रॉक्सी” की तरह काम करने लगा। अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र (UN) में जाकर रूस पर दबाव बनाया कि वह ईरान से बाहर निकले। रूस को जाना पड़ा।

अब ईरान की ऑयल कंपनी में अमेरिकी कंपनियां भी शामिल हो गईं और 50-50% का हिस्सा बन गया। ईरान के तेल का मुख्य लाभार्थी अब अमेरिका बन चुका था। अमेरिका ने ईरान के आंतरिक मामलों से लेकर राजा की नीतियों तक हर चीज में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। ईरान की मजबूरी थी क्योंकि उसे अमेरिका से डॉलर मिल रहे थे जिनकी उसे जरूरत थी।

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मोहम्मद मुसादिक: वो नेता जिसने तेल राष्ट्रीयकरण कर दिया

1951 में ईरान की मजलिस से एक साहसी नेता उभरा, मोहम्मद मुसादिक। मुसादिक ने अमेरिका के ईरान में हस्तक्षेप के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई। उन्होंने कहा कि राजा ईरान का तेल बाहरियों को बेच रहा है, गरीब मर रहा है और तेल गोरों के हाथ में जा रहा है। सबसे बड़ी बात, मुसादिक ने कहा कि एंग्लो-ईरानियन ऑयल कंपनी के साथ जो एग्रीमेंट किया गया वह अवैध (इललीगल) है।

ईरान में पहले से भारी बेरोजगारी और गरीबी थी, इसलिए मुसादिक को जनता का जबरदस्त समर्थन मिला। एंग्लो-पर्शियन ऑयल कंपनी के कामगारों ने हड़ताल कर दी। मुसादिक ने ईरान के तेल का राष्ट्रीयकरण करवा दिया। इसका मतलब था कि अब ब्रिटेन और अमेरिका की कंपनियां ईरान का तेल नहीं बेचेंगी, बल्कि ईरान खुद अपना तेल निकालेगा और बेचेगा।

इसका इतना जबरदस्त प्रभाव पड़ा कि मुसादिक को ईरान का प्रधानमंत्री बना दिया गया। राजा बेबस हो गया क्योंकि जनता का भारी समर्थन प्रधानमंत्री के साथ था।


CIA और MI6 का तख्तापलट: लोकतंत्र की हत्या

मुसादिक के कदम से अमेरिका और ब्रिटेन को भारी झटका लगा। दोनों ने मिलकर ईरान पर कड़े प्रतिबंध (Sanctions) लगा दिए। दुनियाभर से ईरान का तेल खरीदने पर पाबंदी लगवा दी। तेल निकालने के लिए विदेशी कामगारों को ईरान आने से रोक दिया। अमेरिका से मिलने वाली आर्थिक मदद बंद कर दी गई। खाद्य सामग्री और चीनी की सप्लाई भी रोक दी गई।

ईरान भारी मुसीबत में फंस गया। बेरोजगारी आसमान छू गई। लेकिन मुसादिक ने हार नहीं मानी। तब अमेरिका और ब्रिटेन ने अपना सबसे खतरनाक हथियार इस्तेमाल किया। CIA और MI6 को ईरान में भेजा गया। उन्होंने राजा मोहम्मद रज़ा शाह को भारी सपोर्ट दिया और मुसादिक को प्रधानमंत्री पद से हटवा दिया। इसके बाद रज़ा शाह पूरी तरह अमेरिका के इशारों पर चलने लगा और तेल का सारा फायदा फिर से अमेरिकी और ब्रिटिश कंपनियों को मिलने लगा।


भारत और आम दुनिया के लिए क्यों मायने रखती है यह कहानी

Iran Oil History सिर्फ ईरान की कहानी नहीं है। यह उस पूरे सिस्टम की कहानी है जिसमें पश्चिमी ताकतें किसी संसाधन-संपन्न देश पर पहले व्यापारिक समझौतों के बहाने कब्जा करती हैं, फिर कठपुतली शासक बैठाती हैं और जब कोई लोकतांत्रिक नेता विरोध करता है तो प्रतिबंधों और तख्तापलट से उसे गिरा देती हैं। भारत जैसे देशों के लिए यह सबक है कि अपने प्राकृतिक संसाधनों पर संप्रभुता बनाए रखना कितना जरूरी है। आज जब ईरान पर भारी प्रतिबंध हैं और उसकी जनता गरीबी में जी रही है, तो इसकी जड़ें 150 साल पहले रखी गई उन्हीं नीतियों में हैं जिन्होंने ईरान के संसाधनों को व्यवस्थित तरीके से लूटा।


मुख्य बातें (Key Points)
  • 1901 की ऑयल डील ने ईरान की तकदीर बदली: विलियम डीआरकी ने 60 साल के एग्रीमेंट में ईरान का तेल खोजने, निकालने और बेचने का अधिकार हासिल किया, ईरान को सिर्फ 16% मुनाफा मिलता था। इसी कंपनी का नाम बाद में BP (ब्रिटिश पेट्रोलियम) हो गया।
  • ब्रिटेन ने रेज़ा खान पहलवी से तख्तापलट कराया: जब मजलिस ने ब्रिटेन को ईरान छोड़ने को कहा, तो ब्रिटेन ने सेना कमांडर रेज़ा खान को सत्ता दिलवाई और कज़र राजवंश का अंत करवाकर पहलवी राजवंश शुरू कराया।
  • 1951 में मुसादिक ने तेल का राष्ट्रीयकरण किया: प्रधानमंत्री मुसादिक ने ईरान के तेल पर ईरान का अधिकार जताया, लेकिन CIA और MI6 ने मिलकर उन्हें सत्ता से हटवा दिया और पश्चिम-समर्थक राजा को वापस बैठाया।
  • आज भी ईरान भुगत रहा है परिणाम: 28% आबादी गरीबी में है, 40% अगले दो साल में गरीबी रेखा से नीचे जा सकती है, और इसकी जड़ें 150 साल पुरानी पश्चिमी हस्तक्षेप की नीतियों में हैं।

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सवाल 1: ईरान में तेल की खोज कब और कैसे हुई?

1901 में ब्रिटिश कारोबारी विलियम डीआरकी ने ईरान के राजा से 60 साल का ऑयल एग्रीमेंट कराया। 1908 में ईरान में विशाल तेल भंडार मिले। इसी से “एंग्लो-पर्शियन ऑयल कंपनी” बनी जो बाद में BP (ब्रिटिश पेट्रोलियम) बन गई।

सवाल 2: मोहम्मद मुसादिक कौन थे और उन्हें क्यों हटाया गया?

मोहम्मद मुसादिक 1951 में ईरान के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने ईरान के तेल का राष्ट्रीयकरण किया जिससे ब्रिटेन-अमेरिका को भारी नुकसान हुआ। 1953 में CIA और MI6 ने मिलकर तख्तापलट कराया और मुसादिक को सत्ता से हटवा दिया।

सवाल 3: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज ईरान के तट पर स्थित एक संकरा जलमार्ग है जिससे दुनिया का लगभग 20% तेल गुजरता है। अगर इसे ब्लॉक कर दिया जाए तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हो सकती है, यही कारण है कि ईरान की भू-राजनीतिक स्थिति बेहद संवेदनशील है।

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अभिनव कश्यप

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अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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