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The News Air - Breaking News - Indian Christmas Traditions : केक नहीं, झारखंड में अनरसा से मनता है क्रिसमस

Indian Christmas Traditions : केक नहीं, झारखंड में अनरसा से मनता है क्रिसमस

भारत में क्रिसमस की अनोखी परंपराएं - सहारनपुर में बाजरे की टिकिया, केरला में प्लम केक का जन्म, मेघालय में गांवों की सजावट प्रतियोगिता

The News Air Team by The News Air Team
बुधवार, 24 दिसम्बर 2025
in Breaking News, NEWS-TICKER, धर्म, स्पेशल स्टोरी
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Indian Christmas Traditions
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Indian Christmas Traditions: क्रिसमस का मतलब सिर्फ केक, वाइन और सांता क्लॉज नहीं है बल्कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में यह त्योहार बिल्कुल अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है जहां झारखंड में ढेंकी से कूटे चावल का अनरसा बनता है, सहारनपुर में बाजरे की टिकिया और गुजिया परोसी जाती है, शिलांग में क्रिसमस पर बूट का तोहफा देने की परंपरा है और सुदूर गांवों में सजावट की प्रतियोगिताएं होती हैं। स्पीकिंग टाइगर से प्रकाशित किताब “इंडियन क्रिसमस” जिसे मधुलिका लिडल और जेरी पिंटो ने संपादित किया है उसमें भारत के विभिन्न राज्यों से क्रिसमस की यादों का खूबसूरत संग्रह है जो बताता है कि हिंदुस्तान का क्रिसमस हॉलीवुड और बॉलीवुड वाले क्रिसमस से कितना अलग और कितना समृद्ध है।

झारखंड में ढेंकी से बनता है क्रिसमस का अनरसा

क्या आप सोच सकते हैं कि क्रिसमस के दृश्य में ढेंकी से चावल कूटा जा रहा है? झारखंड के खूंटी में आज भी यही होता है। अरसा या अनरसा जिसे क्रिसमस की मिठाई कहते हैं उसके लिए ढेंकी से चावल का पाउडर बनाया जाता है। इस पाउडर को गर्म पानी में मिलाया जाता है जिसमें पहले से गुड़ या चीनी घोली जा चुकी होती है। इससे आटे की मोटी लेई बन जाती है जिसे गोल-गोल बनाकर छाना जाता है।

अनरसा खाने में नरम होता है, मीठा भी होता है और एक महीने तक चल जाता है क्योंकि क्रिसमस के बाद भी क्रिसमस जारी रहता है इसलिए आने वाले मेहमानों के लिए टिकाऊ मिठाई बनाई जाती है। कुछ जगहों पर छठ में जैसे ठेकुआ बनता है उसी तरह अरसा को छानने से पहले लकड़ी के सांचे पर रखा जाता है ताकि उसमें एक डिजाइन आ जाए।

सहारनपुर में क्रिसमस पर बाजरे की टिकिया और गुजिया

मधुलिका लिडल के दादाजी का घर सहारनपुर में है और उनकी यादों से पता चलता है कि क्रिसमस केवल केक नहीं है। उनके परिवार का किस्सा तो 1924 के पेरिस ओलंपिक में 400 मीटर की रेस में गोल्ड मेडल जीतने तक जाता है। मधुलिका लिखती हैं कि जब वो क्रिसमस के मौके पर सहारनपुर जाती थीं तो बड़े चाय पीते थे और बच्चों को एक गिलास दूध मिलता था।

क्रिसमस पर घरों में बाजरे की टिकिया, शक्कर पारे, नमक पारे और गुजिया खाई जाती है। गुजिया तो होली में बनती है लेकिन सहारनपुर में क्रिसमस पर भी बनती है। क्रिसमस डिनर पर मसूर की दाल, रोटी, शामी कबाब और सलाद परोसा जाता है। यह सब पढ़कर लगता है कि क्रिसमस कितना ग्रामीण है, कितना कस्बाई है।

केरला के थालासेरी में बना भारत का पहला प्लम केक

क्या सचमुच भारत में केक सबसे पहले केरला के थालासेरी में बना? मैमले रॉयल बिस्किट फैक्ट्री बेकरी के मालिक मैमले बापू बर्मा से केक बनाने की ट्रेनिंग लेकर आए थे। ईस्ट इंडिया कंपनी ने कहा कि बेकरी की ट्रेनिंग है तो केक बना दीजिए। कंपनी ने उन्हें इंपोर्टेड केक का एक सैंपल भी दिया और कहा ऐसा वाला केक बना दीजिए। 1883 में मैमले बापू ने केक बनाया और यहीं से भारत में क्रिसमस केक की शुरुआत हुई। मैमले बापू को “फादर ऑफ इंडियन केक” कहा जा सकता है।

मेघालय में क्रिसमस पर बूट का तोहफा और गांवों की सजावट प्रतियोगिता

शिलांग में रहने वाली पत्रकार पेट्रिशिया मुखिम ने 1 दिसंबर से लेकर नए साल तक जारी रहने वाले क्रिसमस की बहुत सारी जानकारियां दी हैं। 1 दिसंबर से ही सूरज के निकलते ही क्रिसमस का स्वागत शुरू हो जाता है। 1980 के दशक तक जब मानसून में घरों की छतें और दीवारें खराब हो जाती थीं तो लोग पैसे बचाकर रखते थे कि क्रिसमस पर रंगाई-पुताई कराएंगे।

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पेट्रिशिया ने एक मजेदार बात लिखी है कि क्रिसमस के दूसरे सप्ताह में खरीदारी शुरू होती है और बचपन में उन्हें बूट मिलता था। शिलांग में क्रिसमस पर बूट खरीदने और पहनने का रिवाज है और इतना बूट बिकता है कि पेट्रिशिया लिखती हैं कि भारत में पर कैपिटा बूट्स सबसे अधिक शायद शिलांग में होगा।

दिसंबर के तीसरे सप्ताह से क्रिसमस ट्री की सजावट शुरू हो जाती है। एक समय था जब चीड़ के पेड़ों की टहनियों से क्रिसमस ट्री बनाते थे लेकिन अब पर्यावरण की चिंता में आर्टिफिशियल ट्री का चलन हो गया है। सुदूर गांवों में क्रिसमस के दौरान सजावट को लेकर प्रतियोगिता होती है और इनाम मिलते हैं। मुलामिलियंग गांव तो सजाने के मामले में अव्वल आता है और लोग देखने जाते हैं।

प्लम केक की तैयारी अक्टूबर से शुरू

दिसंबर के पहले सप्ताह से फ्रूट केक बनने लग जाता है लेकिन उसकी तैयारी अक्टूबर से शुरू हो जाती है जब ड्राई फ्रूट और खास तरह की किशमिश सुल्ताना को रम में डुबोकर रखा जाता है ताकि जब प्लम केक बनने का समय आए तो सब कुछ गुदगुदा और गदराया लगे। केक बनाकर लंबे समय तक संरक्षित रखने का भी तरीका विकसित हो गया है ताकि साल भर क्रिसमस का स्टॉक बना रहे।

मुंबई में क्रिसमस पर बजते थे जिम रिब्स के गाने

जेरी पिंटो ने अपने लेख में मुंबई में क्रिसमस की यादों का ब्यौरा दिया है। उन्होंने लिखा है कि क्रिसमस के मौके पर केवल जिंगल बेल ही नहीं बल्कि “एन इवनिंग इन पेरिस” जैसे गाने भी अगल-बगल के फ्लैट से सुनाई देते थे। जिम रिब्स का “वाइट क्रिसमस” क्लासिक माना जाता है। बॉम्बे में बर्फ तो पड़ती नहीं थी लेकिन जिम रिब्स के गाने बजने लगते थे और बर्फ गिरने की कल्पना उतरने लग जाती थी।

गोवा के रोमन कैथोलिक घरों में पंजाबी और उर्दू में भी क्रिसमस के गीत गाए जाते हैं। केरल में अयप्पा के भजनों की धुन पर क्रिसमस के गीत गाते हैं। झारखंड में मुंडारी, नागपुरी और हिंदी में कैरोल गाया जाता है।

रवींद्रनाथ टैगोर और ईसा मसीह

शांतिनिकेतन में रवींद्रनाथ टैगोर हर साल ईसा मसीह के जन्म पर लेक्चर दिया करते थे। 1910 में उन्होंने लिखा कि यीशु ने सारे दुखों को समेट लिया, अपने ऊपर ले लिया और ऐसा कर मानव प्रजाति की गरिमा को महान बना दिया। दिखा दिया कि एक इंसान का जीवन दुखों से ऊपर है, उसके पार है।

सरधना का ऐतिहासिक चर्च और बेगम समरू की कहानी

मेरठ के पास सरधना में एक ऐतिहासिक चर्च है जिसे बेगम समरू ने बनवाया। बेगम पहले फरजाना थीं और नर्तकी के रूप में मशहूर थीं। लक्जमबर्ग से आए भाड़े के सेनापति वाल्टर रेनहार्ड सोबर का उन पर दिल आ गया जो बंगाल के नवाबों से लेकर भरतपुर के राजा के लिए लड़ता था। फरजाना ईसाई हो गईं और सोबर के नाम से बेगम सोमरे फिर बेगम समरू कहलाने लगीं। इटली से वास्तुकार बुलाए गए और यह खूबसूरत चर्च बना।

बिजनौर के ताजपुर में प्रेम कहानियों से बना चर्च

बिजनौर के ताजपुर में एक ताजमहल सा खूबसूरत चर्च है जिसे देखकर लगता है कि इटली और इंग्लैंड के गिरजाघरों में आ गए हैं। इसका संबंध दो प्रेम कहानियों से है। ताजपुर रियासत के दो राजकुमार राजा एफएक्स श्याम रिक और उनके भाई कुमार शिवनाथ रिक इंग्लैंड पढ़ने गए। वहां दोनों भाइयों को इटली की लड़कियों मार्गेट लियाना और विलियम मैरी से प्यार हो गया।

शादी कर जब दोनों भाई बिजनौर आए तो अपनी ईसाई प्रेमिकाओं के लिए चर्च बनवा दिया। प्रेमिकाएं इटली की थीं इसलिए इटली से कारीगर बुलवाए गए। इसमें जो सामग्री लगी है वह भी इटली से लाई गई। 110 साल पुराना यह चर्च “सेक्रेड हार्ट चर्च” के नाम से जाना जाता है।

प्लम केक काटने का सही तरीका

मैमले बेकरी ने प्लम केक काटने का तरीका भी बताया है। काटने से पहले प्लम केक को फ्रिज में 20 मिनट रखें ताकि उसमें नमी आ जाए। सिरेटेड नाइफ यानी आरी की धार वाली चाकू को गर्म पानी में डालें, सुखाएं और हल्के से केक काटें। केक की स्लाइस थोड़ी मोटी रखें क्योंकि पतली होगी तो केक बिखर जाएगा।

क्रिसमस है विविधता का उत्सव

कोई सूरज को जल चढ़ाता है, कोई चांद को देख ईद मनाता है और उसी चांद को देख कोई करवा चौथ मनाती है। चांद तो वही है बस इतने का फर्क है। यह फर्क ना हो तो दुनिया इतनी सुंदर और रंगीन कहां होती। दुनिया में शांति और प्रेम का संदेश लेकर आने वाले एक प्यारे से बच्चे का जन्मदिन है क्रिसमस। हर साल यह बच्चा आता रहेगा याद दिलाने के लिए कि उसने दुनिया की तमाम यातनाओं को सहा लेकिन बदले का संदेश नहीं दिया।


मुख्य बातें (Key Points)

  • झारखंड में क्रिसमस पर ढेंकी से कूटे चावल का अनरसा बनता है जो एक महीने तक चलता है और मेहमानों के लिए टिकाऊ मिठाई है
  • केरला के थालासेरी में 1883 में मैमले बापू ने भारत का पहला प्लम केक बनाया जिसकी तैयारी अक्टूबर से शुरू होती है
  • शिलांग में क्रिसमस पर बूट का तोहफा देने की परंपरा है और सुदूर गांवों में सजावट की प्रतियोगिताएं होती हैं जिसमें इनाम मिलते हैं
  • बिजनौर के ताजपुर में दो राजकुमारों ने अपनी इटालियन प्रेमिकाओं के लिए 110 साल पुराना खूबसूरत चर्च बनवाया
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