India Oil Reserve को लेकर देश की ऊर्जा सुरक्षा पर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय से जुड़ी स्थाई संसदीय समिति ने अपनी ताजा रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा किया है कि भारत के पास मात्र 74 दिनों का तेल भंडार है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार किसी भी देश के पास कम से कम 90 दिनों का भंडार होना अनिवार्य है। मिडिल ईस्ट में लगातार बढ़ते तनाव और Strait of Hormuz बंद होने के बीच यह रिपोर्ट भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
74 दिन का भंडार: कहां-कितना तेल मौजूद है?
India Oil Reserve की स्थिति को समझने के लिए सरकार के आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर साफ हो जाती है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने संसद को बताया कि देश के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserve – SPR) के तहत मात्र 9.5 दिनों का कच्चा तेल रखा हुआ है। यह वह भंडार है जिसे खासतौर पर आपातकाल के लिए सुरक्षित रखा जाता है।
इसके अलावा सरकारी तेल कंपनियों के पास करीब 64.5 दिनों का स्टॉक मौजूद है। दोनों को मिलाकर कुल 74 दिनों का तेल भंडार बनता है। यानी अगर किसी वजह से दुनिया से तेल की सप्लाई पूरी तरह रुक जाए, तो भारत के पास अपनी जरूरतें पूरा करने के लिए सिर्फ ढाई महीने से भी कम का समय बचेगा।
90 दिन का लक्ष्य अभी भी दूर, संसदीय समिति ने जताई चिंता
संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि वैश्विक हालात को देखते हुए देश में कम से कम 90 दिनों की खपत के बराबर पेट्रोलियम उत्पादों का भंडार होना ही चाहिए। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के मानक भी यही कहते हैं कि हर देश के पास 90 दिन का तेल रिजर्व होना जरूरी है।
समिति ने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार यानी SPR परियोजना की धीमी प्रगति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। समिति का कहना है कि इन प्रोजेक्ट्स पर काम बेहद धीमी गति से चल रहा है और आवंटित बजट का भी पूरी तरह उपयोग नहीं हो पा रहा है। यही वजह है कि इतने सालों बाद भी भारत 90 दिन के लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाया है।
भारत 85% तेल के लिए विदेशों पर निर्भर: कितना बड़ा खतरा?
India Oil Reserve की चिंता को और गहरा बनाती है भारत की तेल आयात पर भारी निर्भरता। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है और अपनी कुल जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से मंगाता है। इसका सीधा मतलब यह है कि तेल के मामले में हम बहुत बड़ी हद तक दूसरे देशों पर निर्भर हैं।
यह निर्भरता तब सबसे खतरनाक हो जाती है जब दुनिया में कोई बड़ा संकट आता है। आज मिडिल ईस्ट में हमले हो रहे हैं, मिसाइलें गिराई जा रही हैं। दुनिया को सबसे ज्यादा तेल सप्लाई करने वाला यही क्षेत्र है। अगर यहां कोई बड़ा संकट लंबा खिंचता है तो तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं और सप्लाई भी बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।
तीन जगहों पर बनाए गए हैं तेल भंडार, लेकिन काफी नहीं
भारत में फिलहाल तीन बड़ी जगहों पर रणनीतिक तेल भंडार बनाए गए हैं: विशाखापट्टनम (आंध्र प्रदेश), मंगलुरु (कर्नाटक) और पादुर (कर्नाटक)। इन तीनों की कुल मिलाकर क्षमता लगभग 53 लाख मीट्रिक टन है।
सुनने में यह आंकड़ा बड़ा लगता है, लेकिन भारत जैसे विशाल देश की रोजाना की तेल खपत को देखते हुए यह मात्र 9.5 दिन की जरूरत ही पूरी कर सकता है। संसदीय समिति ने इन प्रोजेक्ट्स पर धीमे काम और बजट के अधूरे उपयोग पर नाराजगी जताई है। समिति के मुताबिक अगर इन पर तेजी से काम हुआ होता तो आज भारत 90 दिन के लक्ष्य के करीब पहुंच चुका होता।
मिडिल ईस्ट का तनाव: भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती
India Oil Reserve पर सबसे बड़ा खतरा इस समय मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध से है। अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच तनाव चरम पर है। ईरान ने Strait of Hormuz को बंद कर दिया है, जो दुनिया के तेल व्यापार का सबसे महत्वपूर्ण जलमार्ग है।
भारत का बड़ा हिस्सा तेल आयात इसी रास्ते से होता है। ऐसे में अगर यह संकट लंबा चलता है तो भारत के 74 दिन के भंडार पर दबाव और बढ़ेगा। पहले से ही LPG संकट देश को हिला रहा है, और अगर कच्चे तेल की सप्लाई भी लंबे समय तक बाधित रहती है तो पेट्रोल-डीजल की कीमतें बेकाबू हो सकती हैं और महंगाई और बढ़ सकती है।
पड़ोसी देशों की मांग का दबाव भी बढ़ा
सरकार ने यह भी स्वीकार किया है कि पड़ोसी देशों से ईंधन की मांग आ रही है। हालांकि भारत ने साफ कह दिया है कि पहले अपनी जरूरतों को ध्यान में रखा जाएगा। अगर अतिरिक्त तेल उपलब्ध होगा, तभी दूसरे देशों को सप्लाई दी जाएगी।
यह बयान खुद इस बात का सबूत है कि सरकार भी इस स्थिति को गंभीरता से देख रही है। जब किसी देश को अपने पड़ोसियों को तेल देने से मना करना पड़े, तो समझ लीजिए कि हालात कितने तंग हैं।
कोविड और रूस-यूक्रेन युद्ध से मिला था सबक, फिर भी तैयारी अधूरी
अगर पिछले कुछ सालों पर नजर डालें तो कोविड महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला था। भारत ने उस समय सस्ते दामों पर रूस से तेल खरीदकर अपने भंडार को थोड़ा मजबूत जरूर किया, लेकिन उससे मिले सबक का पूरा फायदा नहीं उठाया गया।
वह दौर था जब भारत को अपने स्ट्रैटेजिक रिजर्व को 90 दिन तक पहुंचाने के लिए आक्रामक तरीके से काम करना चाहिए था। सस्ता तेल मिल रहा था, भंडारण का विस्तार किया जा सकता था। लेकिन वह मौका हाथ से निकल गया और आज जब सबसे ज्यादा जरूरत है, तब देश सिर्फ 74 दिन के भंडार पर टिका हुआ है।
आम आदमी की जेब पर सीधा असर
India Oil Reserve का यह संकट सिर्फ सरकारी फाइलों और संसदीय रिपोर्टों तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर हर भारतीय की जेब पर पड़ता है। अगर तेल की सप्लाई में कमी आती है तो सबसे पहले पेट्रोल और डीजल महंगा होगा। इसके बाद ट्रांसपोर्ट का खर्चा बढ़ेगा, जिससे सब्जी, दूध, अनाज से लेकर हर रोजमर्रा की चीज की कीमत बढ़ जाएगी।
जो मध्यम वर्गीय परिवार पहले से ही महंगाई की मार झेल रहा है, उसके लिए यह और बड़ा झटका होगा। LPG संकट तो पहले ही जनता को परेशान कर रहा है, अगर कच्चे तेल का संकट भी गहराया तो आम आदमी का जीवन और मुश्किल हो जाएगा।
विशेषज्ञों की राय: अब देर करने का वक्त नहीं
ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अब तेजी से कई कदम उठाने होंगे। सबसे पहले तो रणनीतिक तेल भंडार को जल्द से जल्द 90 दिन तक पहुंचाना होगा। नए भंडारण केंद्र बनाने होंगे और मौजूदा प्रोजेक्ट्स पर काम की रफ्तार बढ़ानी होगी।
इसके साथ ही भारत को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर भी गंभीरता से ध्यान देना होगा। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन और हाइड्रोजन ईंधन जैसे विकल्पों को तेजी से अपनाना होगा ताकि तेल पर निर्भरता कम हो सके। जब तक भारत 85 प्रतिशत तेल आयात पर निर्भर रहेगा, तब तक ऐसे हर वैश्विक संकट में देश को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
क्या भारत किसी बड़े तेल संकट के लिए तैयार है?
सबसे बड़ा और सबसे जरूरी सवाल यही है कि क्या भारत किसी बड़े तेल संकट का सामना करने के लिए तैयार है? फिलहाल जवाब चिंताजनक है। 74 दिन का भंडार ढाई महीने से भी कम है। 85 प्रतिशत आयात निर्भरता बेहद खतरनाक है। SPR प्रोजेक्ट्स पर काम धीमा है। मिडिल ईस्ट में युद्ध जारी है। ये सारे कारक मिलकर एक ऐसी स्थिति बना रहे हैं जो किसी भी समय बड़े संकट में ब��ल सकती है।
हालांकि यह भी सच है कि भारत ने पहले भी कई वैश्विक संकटों का सामना किया है। सरकार और तेल कंपनियां स्थिति पर निगरानी रखे हुए हैं। लेकिन निगरानी रखना और तैयार रहना दो अलग-अलग बातें हैं। India Oil Reserve को लेकर जो 16 दिनों का अंतर है, वह सिर्फ एक संख्या नहीं है, वह करोड़ों लोगों की ऊर्जा सुरक्षा और रोजमर्रा की जिंदगी का सवाल है। अगर सही समय पर ठोस कदम उठाए जाएं तो इस स्थिति को बेहतर किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए तत्काल कार्रवाई जरूरी है।
मुख्य बातें (Key Points)
- भारत के पास मात्र 74 दिनों का तेल भंडार है, जिसमें 9.5 दिन का SPR और 64.5 दिन का सरकारी कंपनियों का स्टॉक शामिल है। अंतरराष्ट्रीय मानक 90 दिन का है।
- भारत अपनी तेल जरूरत का 85% विदेशों से आयात करता है, जो मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और Strait of Hormuz बंद होने के बीच बेहद खतरनाक स्थिति है।
- संसदीय समिति ने SPR प्रोजेक्ट्स की धीमी प्रगति और बजट के अधूरे उपयोग पर गंभीर सवाल उठाए हैं, विशाखापट्टनम, मंगलुरु और पादुर में भंडारण केंद्रों की क्षमता सिर्फ 53 लाख मीट्रिक टन है।
- अगर तेल सप्लाई लंबे समय तक बाधित रहती है तो पेट्रोल-डीजल महंगा होगा, महंगाई बढ़ेगी और आम आदमी की जेब पर सीधा असर पड़ेगा।
FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न








