India-bound Ship Attacked की खबर ने पूरी दुनिया में तेल संकट की आशंका को और गहरा कर दिया है। गुजरात के कांडला पोर्ट की तरफ आ रहे थाईलैंड के ध्वज वाले कार्गो जहाज “मयूरी नारी” पर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के पास दो प्रोजेक्टाइल्स (संभवतः मिसाइलों) से हमला किया गया। जहाज पर सवार 23 नाविकों में से 20 को ओमान की रॉयल नेवी ने बचा लिया, लेकिन 3 क्रू मेंबर्स अभी भी लापता हैं। हमले से जहाज के इंजन रूम में भीषण विस्फोट हुआ, आग लगी और पावर व नेविगेशन सिस्टम पूरी तरह ठप हो गया।
इसी बीच ईरान ने खुली धमकी दी है कि “स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से एक लीटर भी तेल नहीं गुजरने दिया जाएगा” और कच्चे तेल की कीमत $200 प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। यह आंकड़ा इतिहास में कभी देखा ही नहीं गया। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने इस संकट से निपटने के लिए अपने इतिहास का सबसे बड़ा कदम उठाते हुए सदस्य देशों के स्ट्रैटेजिक रिजर्व से 400 मिलियन बैरल तेल रिलीज करने का प्रस्ताव रखा है।
कैसे हुआ India-bound Ship पर हमला: पूरी घटना
India-bound Ship Attacked की यह घटना तब हुई जब थाई ध्वज वाला कार्गो जहाज “मयूरी नारी” संयुक्त अरब अमीरात के अबू धाबी स्थित खलीफा पोर्ट से निकलकर भारत के गुजरात स्थित कांडला पोर्ट की ओर आ रहा था। रास्ते में स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पार करना जरूरी था, और ठीक वहीं पर इस जहाज को निशाना बनाया गया।
दो प्रोजेक्टाइल्स जहाज पर आकर गिरे, जिन्हें मिसाइलें बताया जा रहा है। इंजन रूम में जबरदस्त विस्फोट सुनाई दिया और भयंकर आग लग गई। जहाज का पावर सिस्टम और नेविगेशन सिस्टम पूरी तरह खराब हो गया। क्रू मेंबर्स जान बचाने के लिए लाइफ बोट्स पर कूदने लगे।
रेस्क्यू ऑपरेशन में ओमान की रॉयल नेवी ने अहम भूमिका निभाई। ओमान का खसाब पोर्ट स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के बिल्कुल करीब स्थित है, जहां से तुरंत बचाव दल भेजा गया। 23 नाविकों में से 20 को सुरक्षित बचा लिया गया, लेकिन 3 क्रू मेंबर्स अभी तक लापता हैं और उनकी तलाश जारी है।
ओमान को मिडिल ईस्ट का “स्विट्जरलैंड” कहा जाता है क्योंकि यह हमेशा से तटस्थ रहा है। हाल ही में जब मिडिल ईस्ट में हमले बढ़े और एक प्रोजेक्टाइल गलती से ओमान पर भी गिरा, तो ईरान ने माफी मांगी। इससे पता चलता है कि ओमान की तटस्थता का सम्मान किया जाता है।
कांडला पोर्ट को क्यों निशाना बनाया: भारत के लिए खतरे का संकेत
यह India-bound Ship Attacked की घटना इसलिए भी गंभीर है क्योंकि जहाज भारत के सबसे बड़े कार्गो पोर्ट कांडला की ओर आ रहा था। कांडला पोर्ट पर पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स, केमिकल्स, फर्टिलाइजर और फूड ग्रेन्स जैसे महत्वपूर्ण सामान की हैंडलिंग होती है। इस पोर्ट पर आने वाले कार्गो पर हमला होना साफ संकेत है कि अब स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से कोई भी जहाज सुरक्षित नहीं निकल सकता।
इस हमले का सीधा असर शिपिंग इंश्योरेंस कॉस्ट पर पड़ेगा। एक-एक जहाज पर करोड़ों का खर्च आता है और एक भी हमला होने पर भारी नुकसान होता है। इंश्योरेंस कंपनियां अपनी दरें आसमान पर ले जाएंगी, शिपिंग फर्म्स अपने जहाज इस रूट पर भेजने से मना कर देंगी और कार्गो की कीमतें बेतहाशा बढ़ जाएंगी।
ईरान की $200 की धमकी: इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ
ईरान ने जो धमकी दी है वह पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी है। ईरान का साफ कहना है कि वह फिजिकली सभी टैंकरों को स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से गुजरने से रोकेगा। इसके लिए नेवल माइंस बिछाएगा, मिसाइल अटैक करेगा और ड्रोन हमले करेगा। ईरान पहले भी यह कर चुका है: 1980 के दशक में इराक के साथ चले “टैंकर वॉर” के दौरान भी उसने ऐसी ही रणनीति अपनाई थी।
$200 प्रति बैरल क्रूड ऑयल की कीमत इतिहास में कभी नहीं देखी गई। अभी तक के सबसे बड़े संकटों का हाल देखें तो 2020 में महामारी के दौरान तेल की कीमत गिरकर नेगेटिव तक चली गई थी, खासकर अमेरिका का शेल ऑयल। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान एनर्जी क्राइसिस में यह $120 तक पहुंचा। और अभी मौजूदा संकट में ब्रेंट क्रूड $120 के आसपास पहुंच गया था, फिर डोनाल्ड ट्रंप के युद्ध विराम के संकेतों से $80 के करीब आया, लेकिन India-bound Ship Attacked जैसी घटनाओं और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर बढ़ते खतरे से यह फिर $100 से ऊपर जाने लगा है।
अगर सच में $200 प्रति बैरल हो गया तो भारत जैसे देश के लिए यह विनाशकारी होगा। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और तेल की कीमत दोगुनी होने का मतलब है: पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छूना, महंगाई का सुनामी आना, और पूरी अर्थव्यवस्था का संकट में फंसना। पूरी वर्ल्ड इकॉनमी रिसेशन में जा सकती है।
20 मिलियन बैरल रोजाना: स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज क्यों है दुनिया की नस
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज की अहमियत समझने के लिए एक आंकड़ा काफी है: दुनिया भर में हर रोज 100 मिलियन बैरल क्रूड ऑयल का इस्तेमाल होता है, जिसमें से 20 मिलियन बैरल अकेले इसी जलडमरूमध्य से गुजरता है। यानी दुनिया के कुल तेल व्यापार का पांचवां हिस्सा। अगर अचानक यह पांचवां हिस्सा गायब हो जाए तो तेल बाजार में भूचाल आना तय है।
ईरान की धमकी सिर्फ बातों तक सीमित नहीं है। भले ही स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पूरी तरह बंद न भी हो, लेकिन जो डर का माहौल बनेगा वही काफी है। कोई भी शिपिंग कंपनी अपना जहाज जोखिम में नहीं डालना चाहेगी। इंश्योरेंस प्रीमियम इतना बढ़ जाएगा कि तेल का प्रवाह वैसे ही रुक जाएगा। और यही ईरान की असली रणनीति है: बिना पूरी तरह रोके भी, डर के माहौल से ही पूरी सप्लाई चेन तोड़ देना।
अमेरिकी नौसेना क्यों नहीं बचा सकती हॉर्मुज: भौगोलिक सच्चाई
ट्रंप ने दावा किया था कि अमेरिका हर एक जहाज को एस्कॉर्ट करेगा ताकि कोई भी शिप स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से सुरक्षित गुजर सके। अमेरिकी नौसेना की फिफ्थ फ्लीट बहरीन में तैनात है, जो कतर के ठीक ऊपर एक छोटा सा द्वीप है। लेकिन भौगोलिक हकीकत कुछ और ही कहती है।
पहली बात, स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बेहद संकरा जलमार्ग है। दूसरी बात, यहां भारी टैंकर ट्रैफिक रहता है। तीसरी बात, हजारों ऐसी जगहें हैं जहां माइंस बिछाई जा सकती हैं। और चौथी बात सबसे खतरनाक: ईरान अपने मिसाइल लॉन्चर्स आसपास की पहाड़ियों में छिपाकर रखता है, जिन्हें ढूंढना और नष्ट करना बेहद मुश्किल है।
माइंस हटाने का ऑपरेशन कई महीनों तक चल सकता है और तेल का निर्यात इतने महीने इंतजार नहीं कर सकता। इसीलिए ट्रंप कभी कहते हैं “हम अलाउ करेंगे” और कभी यू-टर्न ले लेते हैं। प्रैक्टिकली 100% सुरक्षा देना संभव ही नहीं है। India-bound Ship Attacked जैसी घटनाएं इसी सच्चाई को उजागर करती हैं।
IEA का सबसे बड़ा दांव: 400 मिलियन बैरल ऑयल रिलीज
तेल की बढ़ती कीमतों पर काबू पाने के लिए अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने अब तक का सबसे बड़ा कदम उठाने का प्रस्ताव रखा है: सदस्य देशों के स्ट्रैटेजिक रिजर्व से 400 मिलियन बैरल तेल बाजार ��ें रिलीज करना। यह इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा कोऑर्डिनेटेड ऑयल रिलीज होगा।
IEA की स्थापना 1974 में हुई थी, ठीक 1973 के तेल संकट के बाद। उस समय अरब तेल उत्पादकों ने ओपेक (OPEC) बनाकर एम्बार्गो लगा दिया था, जिससे तेल की कीमत चार गुना बढ़ गई थी, पश्चिमी अर्थव्यवस्थाएं मंदी में आ गई थीं और ऊर्जा सुरक्षा राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गई थी। IEA का मुख्य उद्देश्य यही था कि भविष्य में ऐसा संकट दोबारा न आए।
अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, फ्रांस समेत IEA के सदस्य देशों के पास कुल 1.5 बिलियन बैरल इमरजेंसी ऑयल रिजर्व रखा हुआ है। IEA का नियम है कि हर सदस्य देश के पास अपने तेल आयात के 90 दिन का रिजर्व होना चाहिए। इमरजेंसी मीटिंग में सामूहिक निर्णय लेकर ऑक्शन या डायरेक्ट सेल्स के जरिए बाजार में तेल रिलीज किया जाता है ताकि कीमतों में स्थिरता लाई जा सके।
पिछले संकटों से कितना अलग है यह रिलीज
400 मिलियन बैरल का आंकड़ा कितना बड़ा है, इसे समझने के लिए पिछले संकटों से तुलना करें। 1991 के गल्फ वॉर में 60 मिलियन बैरल रिलीज किए गए थे। 2005 में हरिकेन कैटरीना के दौरान भी 60 मिलियन बैरल रिलीज हुए। 2011 में लीबिया के गृहयुद्ध में 60 मिलियन बैरल और 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान 182 मिलियन बैरल रिलीज किए गए। अब जो प्रस्ताव है वह 2022 के दोगुने से भी ज्यादा है।
हालांकि 400 मिलियन बैरल दुनिया के सिर्फ 4 दिन के कुल तेल उपभोग के बराबर है और संख्या छोटी लग सकती है, लेकिन तेल बाजार पर इसका मनोवैज्ञानिक असर बड़ा होता है। यह बाजार को संकेत देता है कि सप्लाई पूरी तरह नहीं रुकेगी और कीमतें काबू में रहेंगी। असली सवाल यही है कि क्या सभी सदस्य देश इतनी बड़ी मात्रा में अपने रिजर्व से तेल निकालने को तैयार होंगे।
भारत के पास सिर्फ 25 दिन का तेल भंडार: सबसे बड़ी चिंता
India-bound Ship Attacked की घटना के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। भारत IEA का पूर्ण सदस्य नहीं है, और इसकी वजह बेहद चिंताजनक है। IEA सदस्यता के लिए 90 दिन का तेल आयात रिजर्व जरूरी है, जबकि भारत के पास विशाखापट्टनम और पादुर में बने अंडरग्राउंड रॉक कैवर्न्स में सिर्फ 10-12 दिन का क्रूड ऑयल रिजर्व है।
प्राइवेट कंपनियों के पास रखे रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स को मिलाकर भी भारत के पास अधिकतम 25 दिन का ऑयल रिजर्व है, जो IEA की 90 दिन की शर्त से बहुत कम है। इसका मतलब यह है कि अगर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज लंबे समय तक बंद रहा और IEA की इमरजेंसी रिलीज भी सिर्फ सदस्य देशों तक सीमित रही, तो भारत को सबसे पहले और सबसे ज्यादा मार झेलनी पड़ेगी।
यह वही चिंता है जिसे लेकर कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने हाल ही में संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरते हुए पूछा था कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा की तैयारी कितनी है। देश भर में एलपीजी सिलेंडरों की किल्लत और तेल सप्लाई में बाधा इसी संकट का नतीजा है।
अगर $200 प्रति बैरल हुआ तेल तो क्या होगा भारत का
ईरान की $200 प्रति बैरल की धमकी अगर हकीकत बनी तो भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए यह किसी आर्थिक सुनामी से कम नहीं होगा। India-bound Ship Attacked जैसी घटनाएं शिपिंग कॉस्ट को पहले ही आसमान पर ले जा रही हैं। ऊपर से अगर कच्चे तेल की कीमत $200 पहुंची तो पेट्रोल-डीजल की कीमतें अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच जाएंगी, ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ने से हर चीज महंगी होगी, खाद्य पदार्थों से लेकर दवाइयों तक सब पर असर पड़ेगा और भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट खतरनाक स्तर पर जा सकता है।
दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं मंदी की चपेट में आ सकती हैं, ठीक वैसे ही जैसे 1973 के तेल संकट में पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्थाएं रिसेशन में चली गई थीं। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार दांव पर सिर्फ पश्चिमी देश नहीं, बल्कि भारत, चीन, जापान समेत पूरी एशियाई अर्थव्यवस्था है।
मुख्य बातें (Key Points)
- India-bound Ship Attacked: गुजरात आ रहे थाई जहाज “मयूरी नारी” पर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के पास दो मिसाइलों से हमला, 20 नाविक बचाए गए, 3 लापता
- ईरान ने धमकी दी कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से एक लीटर भी तेल नहीं गुजरने देगा, नेवल माइंस, मिसाइल और ड्रोन हमलों की चेतावनी, कच्चा तेल $200/बैरल तक जा सकता है
- IEA ने इतिहास का सबसे बड़ा 400 मिलियन बैरल ऑयल रिलीज का प्रस्ताव रखा, यह 2022 के रूस-यूक्रेन संकट से दोगुने से भी ज्यादा है
- भारत IEA का सदस्य नहीं, उसके पास सिर्फ 25 दिन का ऑयल रिजर्व (IEA की शर्त 90 दिन), विशाखापट्टनम और पादुर में 10-12 दिन का अंडरग्राउंड रिजर्व
- अमेरिकी नौसेना की फिफ्थ फ्लीट बहरीन में तैनात, लेकिन संकरे जलमार्ग, माइंस और पहाड़ों में छिपे मिसाइल लॉन्चर्स के कारण 100% सुरक्षा देना प्रैक्टिकली नामुमकिन







