Hyderabad 1948 Massacre – झूठ बोलना खतरनाक होता है, उम्मीदों का टूटना खतरनाक होता है, वादों से मुकर जाना खतरनाक होता है। मगर सबसे खतरनाक होता है किसी इतिहास को भुला देना, उसकी सच्चाई को समय के गर्द में दफन कर देना। देखा जाए तो जितना घातक इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करना होता है, उतना ही घातक है किसी घटना को मिटा देना।
दोस्तों, ऐसी ही एक घटना है जिसे आज लोगों ने भुला दिया है। यह घटना है आजाद भारत में एक क्रूर नरसंहार की। साल 1947 में भारत-पाकिस्तान के बंटवारे में जो नरसंहार हुआ, उसे भुलाया नहीं जा सकता। लेकिन आजादी के बाद हैदराबाद में जो नरसंहार हुआ वह भी भुलाने लायक नहीं है।
इसमें 4000 से ज्यादा लोगों ने अपनी जान गंवाई और न जाने कितने लोगों ने अपने प्रियजनों को खोया। अगर गौर करें तो सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ था और वह लोग कौन थे जिन्होंने इस नरसंहार को अंजाम दिया? वे थे रजाकार – एक कट्टर अर्धसैनिक बल जिन्होंने हैदराबाद में खूनी खेल खेला।
562 रियासतों से एक भारत तक का सफर
यह बात तो हम सभी जानते हैं कि जब भारत आजाद हुआ तो उस वक्त 562 रियासतों में बंटा हुआ था। इनमें से 559 रियासतों को तो भारत में मिला लिया गया था। लेकिन कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद अभी स्वतंत्र थीं। कश्मीर और जूनागढ़ तो भारत में शामिल हो गईं, लेकिन बाकी रह गया था हैदराबाद।
एक साल बाद 1948 में हैदराबाद के अंतिम निजाम मीर उस्मान अली खान ने हैदराबाद को पाकिस्तान में मिलाने का फैसला किया। दिलचस्प बात यह है कि सितंबर 1948 में मुख्य संघर्ष निजाम और भारतीय संघ के बीच नहीं, बल्कि रजाकारों और भारतीय संघ के बीच था। यही रजाकार थे जिन्होंने हैदराबाद में नरसंहार किया।
कौन थे रजाकार: इतिहास के काले पन्ने
20वीं सदी की शुरुआत से ही हैदराबाद राज्य लगातार धार्मिक कट्टरपंथ की ओर बढ़ता जा रहा था। इसी बीच 1926 में हैदराबाद के एक सेवानिवृत्त अधिकारी महमूद नवाज खान ने मजलिस-इत्तेहादुल-मुस्लिमीन (MIM) की स्थापना की।
धीरे-धीरे एमआईएम एक शक्तिशाली संगठन बन गया। समझने वाली बात है कि इसका मुख्य ध्यान अपने कार्यों के माध्यम से हिंदुओं और प्रगतिशील मुसलमानों की राजनीतिक आकांक्षाओं को हाशिए पर रखना था, जिसमें हैदराबाद को मुस्लिम राज्य घोषित करने का आग्रह भी शामिल था।
1938 में मजलिस-इत्तेहादुल-मुस्लिमीन नेता बहादुर यार जंग ने खाकी पहने एक अर्धसैनिक स्वयंसेवी बल का गठन किया, जिसे रजाकार कहा गया। रजाकार एक अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है ‘स्वयंसेवक’। अक्सर इसे अल्लाह के सिपाही के रूप में जाना जाता है। यह आम लोगों की ऐसी सेना थी जो जरूरत पड़ने पर हथियार उठा सके।
कासिम रिज़वी का उदय: आतंक की शुरुआत
जून 1944 में बहादुर यार जंग की मृत्यु के बाद 1946 में रजाकारों की कमान कासिम रिज़वी ने संभाली। रिज़वी ने राज्य भर में मुस्लिम सर्वहारा वर्ग को ऐसे पैमाने पर संगठित किया जो पहले कभी नहीं देखा गया था। एक अनुमान के अनुसार 2 लाख रजाकार थे।
हैरान करने वाली बात तो यह है कि रजाकार का आदर्श वाक्य पूरे राज्य में गूंजने लगा – “मदर हैदराबाद पदाबाद”, जिसका मतलब था “मदर हैदराबाद बी इटर्नल”। बता दें कि कासिम रिज़वी लातूर का एक कट्टरपंथी और अलीगढ़ से शिक्षित वकील था।
उनके नेतृत्व में रजाकारों के उद्देश्य और संचालन में नाटकीय रूप से विस्तार हुआ। वे निजाम की राज्य की अखंडता की रक्षा के लिए संगठित हुए और उन्होंने स्वायत्तता और स्वतंत्रता के लिए अपना जोर दिया।
रजाकारों का असली चेहरा
1947 तक रजाकारों की गतिविधियां आमतौर पर परेड करने, निजाम के आसफजाही झंडे को सलामी देने और सार्वजनिक बैठकों में व्यवस्था बनाए रखने तक ही सीमित थीं। मगर समय के साथ रजाकार पूर्ववर्ती हैदराबाद राज्य में निजाम के शासन को कायम रखने के लिए एक सशस्त्र समूह की तरह स्थापित हो चुके थे।
यहां ध्यान देने वाली बात है कि रजाकार एक कट्टर खूंखार मिलिशिया थे जो मुसोलिनी के ब्लैक शर्ट्स और हिटलर के स्टॉर्म सैनिकों के बराबर थे और इसे निजाम का आशीर्वाद प्राप्त था। इन लोगों का उद्देश्य था इस्लामिक राज्य बनाना। यह डेमोक्रेसी को नहीं मानते थे।
राजनीतिक उथल-पुथल: कैसे बदली हैदराबाद की किस्मत
आजादी के तुरंत बाद हैदराबाद खुद को आजाद मुल्क घोषित करना चाहता था। लेकिन जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल को यह कतई मंजूर नहीं था कि हैदराबाद एक आजाद मुल्क हो, वह भी भारत के उस इलाके के बीचों-बीच जहां चारों ओर हिंदू आबादी थी।
सियासत करवटें बदल रही थी। पहले ब्रिटिश सरकार की ओर से हैदराबाद को आजाद रहने का भरोसा दिया गया था। लेकिन बाद में लॉर्ड माउंटबेटन ने उस्मान अली खान से साफ मना कर दिया कि हैदराबाद अलग मुल्क नहीं बन सकता, क्योंकि यहां पहले से ही सांप्रदायिक तनाव था।
11 जुलाई 1947 को वायसराय के पास निजाम की तरफ से एक प्रतिनिधिमंडल दिल्ली पहुंचा ताकि हैदराबाद को एक आजाद मुल्क घोषित कराया जा सके। इनमें हैदराबाद के प्रधानमंत्री मीर लायक अली, छतारी के नवाब मोहम्मद अहमद सईद खान, गृह मंत्री अली यावर जंग, सर वाल्टर मटन और हैदराबाद के हिंदू-मुस्लिम समुदायों के प्रतिनिधि शामिल थे।
वो काला मोड़ जिसने तय की हैदराबाद की किस्मत
सितंबर 1947 में भारत और निजाम के बीच एक स्टैंड स्टिल एग्रीमेंट हुआ। इसमें निजाम को कुछ स्वायत्तता देने का प्रस्ताव था। लेकिन कट्टरपंथी रजाकारों के कहने पर मीर उस्मान अली ने उसे स्वीकार नहीं किया। फिर भी नेहरू सरकार चाहती थी कि मामला बातचीत से सुलझे।
निजाम ने इस समझौते को मौखिक तौर पर मंजूरी दे दी थी और कहा था कि 28 अक्टूबर 1947 को वो दस्तखत कर देंगे। मगर इस फैसले से निजाम का करीबी रजाकारों का लीडर कासिम रिज़वी भड़क गया।
और बस यहीं से शुरू हुई असली कहानी। उसने रात में ही रजाकारों से सर वाल्टर मटन, सर सुल्तान अहमद और नवाब छतारी के घर का घेराव करवा दिया और धमकी दी कि अगर सुबह निजाम ने समझौते पर दस्तखत किए तो घर जला दिए जाएंगे। हैदराबाद की किस्मत का यही वो टर्निंग पॉइंट था जब हैदराबाद बदनसीबी की राह पर चल पड़ा।
कासिम रिज़वी की भड़काऊ बातें
के एम मुंशी ने अपनी किताब ‘द एंड ऑफ एन एरा’ में लिखा – कासिम रिज़वी का कहना था कि कागज पर कलम से लिखी इबारत से बेहतर है कि हाथ में तलवार लेकर मारा जाए। उसने निजाम से कहा कि अगर आप हमारे साथ रहे तो बंगाल की खाड़ी की लहरें निजाम के कदमों को चूमेंगी।
चिंता का विषय यह था कि रिज़वी ने दावा किया – “हम महमूद गजनवी की नस्ल के हैं। अगर हमने तय कर लिया तो हम लाल किले पर आसफजाही का झंडा फहरा देंगे।”
रजाकारों का आतंक: खून से लथपथ हैदराबाद
15 अगस्त 1948 को देश ने स्वतंत्रता की पहली सालगिरह मनाई। इसके कुछ समय बाद ही हैदराबाद से दंगे-फसाद की खबरें आना शुरू हो गईं। कासिम रिज़वी के हुक्म के मुताबिक रजाकारों ने एक तरह से व्यवस्था अपने हाथ में ले ली। उन्होंने जमकर लूटपाट मचानी शुरू कर दी। हिंदुओं पर जुल्म ढहाए जाने लगे।
हालांकि मुख्य तौर पर हिंदू ही उनके टारगेट थे, मगर ऐसा नहीं था कि उन्होंने मुसलमानों को छोड़ दिया। जो भी उनके खिलाफ था या जिन पर शक था, सब पर रजाकारों का कहर टूटने लगा।
भैरनपल्ली गांव नरसंहार: इतिहास का सबसे काला दिन
27 अगस्त 1948 को रजाकारों की फौज ने राज्य की पुलिस से मिलकर भैरनपल्ली गांव पर आक्रमण कर दिया। जून 1948 से ही रजाकार बार-बार भैरनपल्ली पर आक्रमण कर रहे थे। ग्रामीण स्थानीय स्तर पर संगठित होकर कुल्हाड़ी, लाठी, फरसा, गुलेल इत्यादि पारंपरिक हथियारों से उन्हें भगा रहे थे।
ग्राम रक्षक टोलियां हर रात पहरा देती थीं। चरवाहे दूर-दूर तक जाकर रजाकारों के आने की सूचना देते थे। ग्रामीणों ने बहुत से गुलेल के पत्थर इकट्ठे कर लिए थे। जो जो मिला उसी से ग्रामीणों ने रजाकारों का जमकर मुकाबला किया।
इन ग्रामीण तरीकों से ही वे रजाकारों के तीन हमले विफल करने में सफल हो गए। परंतु चौथी बार रजाकारों की संख्या बहुत बड़ी थी। ग्रामीण मुकाबला नहीं कर पाए।
घिनौना नरसंहार: जो आंखें नम कर दे
जनजातीय समाज का वार्षिक त्योहार बैठक कुमा मनाया जा रहा था। 27 अगस्त को रजाकार और हैदराबाद स्टेट पुलिस ने मिलकर भैरनपल्ली पर आक्रमण कर दिया।
ग्रामीण सुरक्षा गार्डों को पकड़कर गोली मार दी गई। निहत्ते निर्दोष ग्रामीणों को चुन-चुनकर कतार में खड़ा करके मारा गया। गोलियां बचाने के लिए एक के पीछे एक खड़ा कर इकट्ठे तीन-तीन लोगों को एक ही गोली से मारा गया।
हैरान करने वाली बात तो यह है कि औरतों को निर्वस्त्र करके मृत ग्रामीणों के पास जबरदस्ती नाच कराया गया और उनसे बलात्कार किया गया। अनेक स्त्रियों ने कुएं में कूदकर अपनी जान दे दी। 120 से ज्यादा लोग मारे गए।
इस घिनौने अत्याचार ने पूरे हैदराबाद की जनता में आक्रोश भर दिया। वर्ष 2017 में ‘द हिंदू’ में एक क्षेत्रीय वरिष्ठ नागरिक चलाचंद्र रेड्डी के शब्दों में इसका आंखों देखा हाल प्रकाशित हुआ। उन्होंने बताया कि गुलेल जैसे पारंपरिक हथियार से भी ग्रामीणों ने क्रूर रजाकारों को रोके रखा। परंतु रजाकारों की बंदूकों के सामने ग्रामीण कब तक लड़ पाते?
ऑपरेशन पोलो: रजाकारों के अंत की शुरुआत
मगर जिस तरह हर रात की सुबह होती है, वैसे ही हैदराबाद की इस रात की भी सुबह हुई – और सुबह भी ऐसी कि जिसने इतिहास रच दिया। सितंबर 1948 में भारतीय सेना ने कमान संभाली। लेकिन इसे हैदराबाद पुलिस एक्शन कहा गया।
हैदराबाद पर होने जा रहे इस एक्शन को ऑपरेशन पोलो का नाम दिया गया था। और ऐसा इसलिए था क्योंकि उस समय हैदराबाद में विश्व में सबसे ज्यादा 17 पोलो के मैदान थे।
13 सितंबर 1948 को मेजर जनरल जे एन चौधरी के नेतृत्व में भारतीय सेना ने हैदराबाद पर कुल पांच तरफ से धावा बोल दिया। यहां तक कि किसी तरह के हवाई हमले का तुरंत जवाब देने के लिए पोलो एयर टास्क फोर्स भी बनाई गई थी।
मात्र 5 दिन में रजाकारों का सफाया
मगर लड़ाई शुरू होने के साथ ही पता चल गया कि निजाम और रजाकारों की ताकत को कितना बढ़ा-चढ़ाकर आंका गया था। रजाकारों को केवल अत्याचार करना आता था। वे निहत्ते आम लोगों से लूटपाट कर सकते थे। युद्ध करना, और वह भी बेहद प्रशिक्षित भारतीय सेना से, उनके बस का नहीं था।
न तो उनके पास हथियार थे और न लोग। निजाम की कोई एयरफोर्स भी नहीं थी और बख्तरबंद गाड़ियां इस लायक नहीं थीं कि इस्तेमाल में लाई जा सकें। जंग लगी बंदूकें भारतीय जवानों के सामने कितनी गोलियां उगलतीं?
कुछ ही वक्त में रजाकार यह लड़ाई हार चुके थे। रजाकारों को उम्मीद थी कि इस लड़ाई में पाकिस्तान उनका साथ देगा। लेकिन इस सब के दो दिन पहले ही मुहम्मद अली जिन्ना की मौत हो गई थी। इसलिए पाकिस्तान की तरफ से हस्तक्षेप की संभावना शून्य हो चुकी थी।
भारतीय सेना ने मात्र 5 दिन में ही इस अभियान को निपटा दिया।
18 सितंबर 1948: रजाकारों का अंत
इंडियन आर्मी द्वारा मेंटेन रिकॉर्ड्स के अनुसार जनरल चौधरी के नेतृत्व वाली भारतीय सशस्त्र बलों के सामने 18 सितंबर को शाम 4:00 बजे मेजर जनरल एल एड्रूस के नेतृत्व वाली हैदराबाद आर्मी ने सरेंडर कर दिया।
यही नहीं, निजाम के प्रधानमंत्री मीर लायक अली और रजाकारों के नेता कासिम रिज़वी को भी गिरफ्तार कर लिया गया। भारत में हैदराबाद के विलय के साथ ही रजाकारों को भी भंग कर दिया गया। साथ ही मजलिस-इत्तेहादुल-मुस्लिमीन संगठन को भी लगभग एक दशक के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया।
यही नहीं, कासिम रिज़वी भी 1957 तक भारतीय जेलों में रहा। जिसके बाद उसे जेल से निकालकर 48 घंटों के अंदर ही हमेशा के लिए पाकिस्तान चले जाने की शर्त पर रिहा किया गया। और इस तरह रजाकारों का काला अध्याय हमेशा के लिए खत्म हो गया।
सरदार पटेल का अमूल्य योगदान
भैरनपल्ली का हादसा और ऑपरेशन पोलो इस बात को दर्शाते हैं कि रियासतों का विलय कितना जटिल और विशाल कार्य था। इस अमूल्य योगदान के लिए देश सदा सरदार पटेल का आभारी रहेगा। देश उन वीरों के प्रति भी कृतज्ञ है जिन्होंने राष्ट्रीय एकता और संप्रभुता की रक्षा स्थानीय स्तर पर भैरनपल्ली गांव में की और सर्वस्व बलिदान कर दिया।
क्यों भुला दिया गया इस नरसंहार को
इससे साफ होता है कि इतिहास के कुछ पन्नों को जानबूझकर छुपाया गया है। 1947 के विभाजन के नरसंहार के बारे में तो हर कोई जानता है, लेकिन 1948 के हैदराबाद नरसंहार को इतिहास की किताबों में जगह नहीं मिली। यह दर्शाता है कि कैसे राजनीतिक कारणों से कुछ घटनाओं को दबा दिया जाता है।
मुख्य बातें (Key Points)
• हैदराबाद 1948 में 4000 से अधिक लोगों का नरसंहार हुआ था
• रजाकार एक कट्टर अर्धसैनिक बल था जो 1938 में बहादुर यार जंग ने बनाया
• कासिम रिज़वी के नेतृत्व में 2 लाख रजाकारों ने हैदराबाद में आतंक फैलाया
• 27 अगस्त 1948 को भैरनपल्ली गांव में 120 से ज्यादा लोगों की हत्या हुई
• 13 सितंबर 1948 को ऑपरेशन पोलो शुरू हुआ
• मात्र 5 दिन में भारतीय सेना ने रजाकारों को परास्त कर दिया
• 18 सितंबर 1948 को हैदराबाद आर्मी ने सरेंडर कर दिया
• सरदार वल्लभभाई पटेल की दृढ़ता से हैदराबाद भारत में विलय हुआ
• कासिम रिज़वी को 1957 में पाकिस्तान जाने की शर्त पर रिहा किया गया
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न











