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The News Air - Breaking News - राज्यपाल कितने दिन बिल को पास होने से रोक सकता है?

राज्यपाल कितने दिन बिल को पास होने से रोक सकता है?

बंगाल सरकार ने SC में दर्ज कराई शिकायत

The News Air Team by The News Air Team
शनिवार, 13 जुलाई 2024
in Breaking News, NEWS-TICKER, राष्ट्रीय, सियासत
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बंगाल सरकार
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पश्चिम बंगाल, 13 जुलाई (The News Air): पश्चिम बंगाल में राज्य सरकार और राज्यपाल एक बार फिर आमने-सामने हैं. बंगाल में ममता सरकार ने राज्यपाल सीवी आनंद बोस के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की है. राज्य सरकार की शिकायत है कि गवर्नर बोस विधानसभा में पारित विधायकों पर फैसला लेने में जानबूझकर देरी कर रहे हैं. मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने याचिका को स्वीकार कर लिया है. ऐसे में आइए जानते हैं कि विधानसभा में पारित बिलों यानी विधेयकों को राज्यपाल कितने दिनों तक रोक सकता है.

राज्यपाल सीवी आनंद बोस पर बंगाल सरकार ने आठ महत्वपूर्ण विधेयकों को रोके रखने का आरोप लगाया है. इनमें से 6 विधेयक तब पारित किए गए थे जब जगदीप धनखड़ बंगाल के राज्यपाल थे. दो विधेयकों को सीवी आनंद के राज्यपाल बनने के बाद पारित किया गया था. राज्य सरकार ने आरोप लगाया कि सभी आठ विधेयक फिलहाल राजभवन में अटके हैं.

बिल को लेकर राज्यपाल के पास होते हैं 3 विकल्प

संविधान ने राज्यपाल की एक विशेष भूमिका बनाई है. संवैधानिक तौर पर राज्यपाल राज्य सरकार का कार्यकारी प्रमुख होते हैं. राज्य सरकार के सभी कार्यकारी निर्णय उनके नाम पर लिए जाते हैं. इसलिए, हर बिल जो विधानसभा में पास होते हैं, उन्हें मंजूरी के लिए राज्यपाल के पास भेजा जाता है.

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बिल पहुंच जाने के बाद, राज्यपाल के पास 3 विकल्प होते हैं. एक, वह विधेयक पर अनुमति दे सकते हैं. दूसरा, विधेयक से असहमत होने पर उसे वापस भेज सकते हैं. तीसरा, वह विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रख सकते हैं.

संविधान की धारा 200 के मुताबिक, विधेयक से असहमत होने पर राज्यपाल उसे विधानसभा को वापस भेज सकता है. हालांकि, राज्यपाल के सामने विधेयक प्रस्तुत किए जाने के बाद उन्हें जल्द से जल्द उस विधेयक को सदन को वापस भेजना होगा. इसके अलावा, उसके साथ एक संदेश भेजना होगा जिसमें विधेयक की किसी बात को संशोधित करने की सिफारिश होगी.

इस मामले में राज्य सरकार संशोधन के साथ या वैसे के वैसे ही बिल को दोबारा पेश कर सकती है. अगर दूसरी बार भी विधेयक पारित हो जाता है, तो राज्यपाल को उसे अनुमति देनी पड़ती है. वह उसे खारिज या लौटा नहीं सकते.

कितने दिन तक विधेयक को अपने पास आरक्षित रख सकता है राज्यपाल

सदन में पारित विधेयकों को राज्यपाल अपने पास राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित भी रख सकते हैं. अगर राज्यपाल को लगता है कि विधेयक संविधान के प्रावधानों के खिलाफ या देश के व्यापक हित के खिलाफ है, तब ही वो विधेयक को आरक्षित रख सकता है.

अगर धन विधेयक यानी मनी बिल को आरक्षित रखा गया है, तो उस मामले में राष्ट्रपति घोषणा करता है कि वह विधेयक पर अनुमति देता है या नहीं. गैर-मनी बिल के मामले में राष्ट्रपति राज्यपाल को यह निदेश दे सकता कि वह विधेयक को राज्य की विधानसभा को एक संदेश के साथ वापस लौटा दे. अनुच्छेद 200 की तरह इस संदेश में संशोधनों की सिफारिश होती है.

जब कोई विधेयक इस प्रकार लौटा दिया जाता है, तब ऐसा संदेश मिलने की तारीख से 6 महीने के भीतर सदन को उसपर फिर से विचार करना होता है. यदि वह विधेयक सदन द्वारा संशोधन के साथ या उसके बिना फिर से पारित कर दिया जाता हे तो उसे राष्ट्रपति के सामने विचार के लिए फिर से पेश किया जाएगा.

संविधान में इस बात का जिक्र नहीं कि राज्यपाल को कितने दिनों के भीतर विधेयक पर फैसला लेना होगा. इस वजह से कई दफा महीनों तक विधानसभा से पारित बिल राजभवन में अटके रहते हैं.

विधेयक पर फैसला लेने में देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

पश्चिम बंगाल से पहले दूसरे राज्य सरकारों ने भी अपने-अपने राज्यपाल के खिलाफ विधेयकों पर फैसला लेने में देरी करने की शिकायत सुप्रीम कोर्ट में की थी. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने 10 नवंबर 2023 को पंजाब, केरल और तमिलनाडु की सरकारों की याचिकाओं में उठाए गए मुद्दों पर अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि राज्यपाल किसी विधेयक को अनिश्चित काल तक लंबित नहीं रख सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यदि कोई राज्यपाल किसी विधेयक पर सहमति रोकने का फैसला करता है, तो उसे विधेयक को पुनर्विचार के लिए विधानसभा को वापस करना होगा.

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