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The News Air - NEWS-TICKER - Explained: देश में अब भी सरकारी नौकरियों की जबर्दस्त लालसा, क्या दूर होगी यह चाहत?

Explained: देश में अब भी सरकारी नौकरियों की जबर्दस्त लालसा, क्या दूर होगी यह चाहत?

The News Air Team by The News Air Team
मंगलवार, 2 अप्रैल 2024
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नई दिल्ली, 2 अप्रैल (The News Air): : भारत में सरकारी नौकरी की दौड़ किसी से छिपी नहीं है। यह दौड़ ऐसी है कि लाखों लोग कम वेतन के बावजूद सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करते हैं। इसके पीछे कई कारण हैं। भारत में सरकारी नौकरी के पीछे मुख्य कारण यह भी है कि यह प्राइवेट नौकरी के मुकाबले कई फायदे देती है। भारत में लाखों लोग कोई भी सरकारी नौकरी पाने के लिए संघर्ष करते हैं। सिर्फ दो उदाहरण लीजिए। हाल ही में 60,000 यूपी पुलिस कांस्टेबल नौकरियों के लिए, 48 लाख आवेदक थे। यहां चयन अनुपात 1.25% है। वहीं दूसरी ओर सेना जवानों की भर्ती के लिए चयन अनुपात 3% से 4% है। भारत में रोजगार पर ILO (International Labor Organization) की 2024 रिपोर्ट स्पष्ट रूप से रोजगार सृजन में संकट की ओर इशारा करती है। साथ ही यह भी सवाल है कि दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था में सरकारी नौकरी इतनी प्रतिष्ठित क्यों है?

पहली तस्वीर इससे हो जाती है साफ

आमतौर पर मुख्य कारण यही माना जाता है कि सरकारी नौकरी यानी पक्की नौकरी और सुरक्षा। सरकारी नौकरी में आपको नौकरी से निकाले जाने का डर कम रहता है। प्राइवेट कंपनियों में परफॉर्मेंस या कंपनी के हालात के हिसाब से कभी भी नौकरी जाने का खतरा रहता है। सरकारी नौकरियों में भले ही शुरुआती तनख्वाह उतनी ना हो, पर सरकारी कर्मचारियों को कई तरह के भत्ते मिलते हैं। ये फायदे प्राइवेट नौकरियों में हमेशा नहीं मिलते। सरकारी दफ्तरों में आम तौर पर तयशुदा काम के घंटे होते हैं। इससे प्राइवेट क्षेत्र की तरह ज्यादा ओवरटाइम करने की जरूरत नहीं पड़ती है। यह कुछ ऐसी बातें हैं जो आमतौर पर प्रमुख कारणों में गिनी जाती हैं।

भारत में सरकारी नौकरी की दौड़ इतनी तेज क्यों है, इसके असली कारण को समझने के लिए इन आंकड़ों को देखे-

➤कुल काम करने लायक आबादी (97.2 करोड़ लोग, 15-64 आयु वर्ग, 2023 का आंकड़ा)
➤नौकरी करने वाले भारतीय (58.6 करोड़, 2023 का आंकड़ा)
➤कुल नौकरियों में से सिर्फ 25% ही संगठित क्षेत्र (private + govt) की हैं। (15.2 करोड़) और इनमें से भी सरकारी नौकरियां (केंद्र + राज्य) सिर्फ 1.4 करोड़ हैं। यानी भारत में हर 100 नौकरियों में से सिर्फ 2 ही सरकारी हैं।
➤काम करने लायक आबादी के सिर्फ 1.4% लोग ही सरकारी नौकरी पा सकते हैं। जबकि भारत में श्रम बल सहभागिता दर (LFPR) 49.9% है। इसका मतलब है कि काम करने लायक आबादी का लगभग आधा हिस्सा काम के लिए तैयार है।

इससे साफ है कि सरकारी नौकरियां बहुत कम हैं। लेकिन सिर्फ यही वजह इस दौड़ को नहीं बताती। असल में यह दौड़ इसलिए है क्योंकि ज्यादातर गैर-सरकारी नौकरियां आकर्षक नहीं हैं। सरकारी नौकरियां वो चीजें देती हैं जो ज्यादातर प्राइवेट सेक्टर की नौकरियां नहीं देतीं। दोनों ही बातें सच हैं।

गैर-सरकारी नौकरियों की समस्याएं

तनख्वाह और छुट्टियां जैसी सुविधाओं वाली नियमित वेतनभोगी नौकरियां कम हैं। शहरों में भी सिर्फ लगभग 50% ही नौकरियां नियमित वेतन वाली हैं।
इनमें से सिर्फ 47% ही पेड लीव वाली हैं। असंगठित क्षेत्र की 43 करोड़ से ज्यादा नौकरियों में तो हालात और भी खराब हैं।

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सरकारी नौकरियों के फायदे

सरकारी नौकरी में कम स्किल वाली शुरुआती नौकरी के लिए वेतन 33,000 रुपये (HRA, DA, पेड लीव जैसे फायदों के साथ) मिलती है। प्राइवेट सेक्टर में कम स्किल वाली शुरुआती नौकरी के लिए तनख्वाह लगभग 10,000 रुपये होती है, और अक्सर इसमें कोई फायदे नहीं मिलते। सरकारी नौकरियां, चाहे कम स्किल वाली हों, सुरक्षा देती हैं। ज्यादातर कम स्किल वाली प्राइवेट सेक्टर की नौकरियां सुरक्षा नहीं देतीं। लाखों लोगों की सरकारी नौकरी की इस दौड़ को कम करने के लिए, जरूरी है कि कम स्किल वाले कर्मचारियों के लिए कई फायदों वाली नियमित वेतनभोगी प्राइवेट सेक्टर की नौकरियां हों। लेकिन अभी ऐसा नहीं हो रहा है। उदाहरण के लिए, मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में सिर्फ 3.5 करोड़ लोग कार्यरत हैं।

यह सवाल सबसे बड़ा

भारत में लाखों लोगों की सरकारी नौकरी की दौड़ को कम करने के लिए क्या समाधान है? इस पर कई सुझाव दिए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को हल्के विनिर्माण पर ध्यान देना चाहिए। इस क्षेत्र में ज्यादा कुशल कर्मचारियों की जरूरत नहीं होती और यह ज्यादा रोजगार पैदा कर सकता है। उदाहरण के तौर पर बांग्लादेश वस्त्र उद्योग में आगे निकल चुका है। लेकिन भारत के लिए चुनौती यह है कि पूर्वी एशिया के देश पहले से ही इस क्षेत्र में काफी आगे हैं।
एक और समाधान है शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाना, खासकर तकनीकी शिक्षा पर ध्यान देना। इससे एक ऐसा कुशल कार्यबल तैयार होगा जो 21वीं सदी की जरूरतों के अनुकूल होगा। लेकिन यह मुश्किल है। इसमें सिर्फ समय ही नहीं बल्कि मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की भी जरूरत है।

आखिर कैसे बनेगी बात

एक सुझाव यह भी है कि कारखानों के बजाय सेवा क्षेत्र पर ध्यान दिया जाए। सेवा क्षेत्र में कई तरह की नौकरियां होती हैं, जैसे डॉक्टर या वकील जैसी उच्च-विशिष्ट नौकरियां या फिर डिलीवरी कर्मचारी जैसी बुनियादी नौकरियां। लेकिन इसकी भी अपनी चुनौतियां हैं। पहली चुनौती है कि अभी तक किसी भी विकासशील देश ने सिर्फ सेवा क्षेत्र के जरिए रोजगार की समस्या नहीं सुलझाई है। दूसरी चुनौती ये है कि सेवा क्षेत्र में रोजगार इस बात पर निर्भर करता है कि भारत उच्च और मध्यम स्तर की सेवाओं का निर्यात लगातार कर पाए या नहीं।
भारत में अभी तक सभी के लिए बेरोजगारी भत्ता नहीं है। अगर ऐसा होता, तो गैर-सरकारी नौकरियां उतनी अनाकर्षक नहीं होतीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि कम वेतन/खराब काम करने की स्थिति वाली निजी क्षेत्र की नौकरियां भत्ते की संभावना के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगी। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि निजी क्षेत्र की नौकरी छूट जाने से कोई बड़ी मुसीबत नहीं खड़ी होगी। इसलिए, सरकारी नौकरी की दौड़ कम हो जानी चाहिए। सवाल यह है कि सरकार को इसके लिए पैसा कहां से मिलेगा। एक तरीका कल्याणकारी वित्तपोषण को दोबारा व्यवस्थित करना है। भत्ता पाने वाले लोगों (या नौकरी करने वाले) को शायद मुफ्त अनाज/मुफ्त बिजली/मुफ्त ईंधन आदि की जरूरत न पड़े।

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