Bureaucratic Power Structure Change India: आजाद भारत में एक बात लगभग पत्थर की लकीर मानी जाती रही है। अगर देश चलाना है, नीतियां बनानी हैं, तो आईएएस अफसर ही सब कुछ संभालेंगे। चाहे बात जिले की हो या दिल्ली के नॉर्थ ब्लॉक की। लेकिन पिछले दस साल का डेटा कुछ और ही कहानी बयान कर रहा है। एक ऐसी कहानी जो शायद भारतीय प्रशासनिक ढांचे में एक चुप क्रांति की शुरुआत है।
देखा जाए तो यह बदलाव चौंकाने वाला है। जॉइंट सेक्रेटरी लेवल पर जहां कभी 100 फीसदी पदों पर IAS Officers का कब्जा हुआ करता था, वहीं आज यह आंकड़ा महज 33.8 प्रतिशत रह गया है। यानी दो-तिहाई से ज्यादा पद अब दूसरी सेवाओं के अधिकारियों के पास हैं।
यह आंकड़ा आरटीआई के जरिए सामने आया है। और इससे साफ होता है कि केंद्र सरकार की सोच में कोई बुनियादी बदलाव आ रहा है। सवाल उठता है – क्या यह आईएएस के साम्राज्य के अंत की शुरुआत है?
‘सब कुछ क्या बाबू ही करेंगे’ – PM मोदी का बयान
2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बयान दिया था जो शायद इस बदलाव की दिशा को समझने की चाबी है। उन्होंने कहा था, “कहेंगे आईएएस बन गया मतलब वो फर्टिलाइजर का कारखाना भी चलाएगा। आईएएस हो गया तो वो केमिकल का कारखाना भी चलाएगा। आईएएस हो गया वो हवाई जहाज भी चलाएगा। ये कौन सी बड़ी ताकत बना के रख दी हमने?”
यह सिर्फ एक भाषण नहीं था। यह एक फिलॉसफी लेवल का बदलाव था। यह दर्शाता है कि सरकार अब जनरलिस्ट की जगह स्पेशलिस्ट्स को तरजीह दे रही है।
नंबर्स की कहानी: आंकड़े क्या बोलते हैं
अगर गौर करें तो यह गिरावट अचानक नहीं हुई। यह एक सुनियोजित बदलाव है। दस साल पहले केंद्र सरकार में जॉइंट सेक्रेटरी जैसे महत्वपूर्ण पदों पर सिर्फ और सिर्फ आईएएस अफसर ही होते थे। यह पद पॉलिसी मेकिंग के लिहाज से बेहद अहम माना जाता है।
| साल | Joint Secretary Level पर IAS Officers का प्रतिशत |
|---|---|
| 2014 | लगभग 100% |
| 2019 | लगभग 65% |
| 2024 | 33.8% |
यह ट्रेंड साफ बताता है कि धीरे-धीरे आईएएस का एकाधिकार खत्म हो रहा है। और यह गिरावट सिर्फ संयोग नहीं है।
Central Services बनाम All India Services: असली अंतर
समझने वाली बात यह है कि आईएएस, आईपीएस और इंडियन फॉरेस्ट सर्विस को All India Services कहा जाता है। इन सेवाओं में भर्ती होने के बाद अधिकारी अपने राज्य कैडर में काम करते हैं। उनकी वफादारी (loyalty) कहीं न कहीं अपने राज्य के प्रति भी होती है।
वहीं, Central Services जैसे कि इंडियन रेवेन्यू सर्विस, इंडियन रेलवे सर्विस, इंडियन पोस्टल सर्विस आदि के अधिकारी पहले दिन से ही केंद्र सरकार को रिपोर्ट करते हैं। उनकी accountability पूरी तरह केंद्र के प्रति होती है।
दिलचस्प बात यह है कि केंद्र सरकार अब ऐसे अधिकारियों को तरजीह दे रही है जो सीधे उन्हें जवाबदेह हों। यह एक बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक बदलाव है।
जनरलिस्ट vs स्पेशलिस्ट: पुरानी बहस, नया मोड़
आईएएस अफसरों को जनरलिस्ट कहा जाता है। मतलब उन्हें हर विषय की थोड़ी-बहुत जानकारी होती है। आज वो रेलवे मंत्रालय में हैं, कल स्वास्थ्य में और परसों वित्त में। यही उनकी खासियत मानी जाती रही है।
लेकिन अब सरकार का मानना है कि जटिल होती अर्थव्यवस्था में डोमेन एक्सपर्ट्स की जरूरत ज्यादा है। उदाहरण के लिए, वित्त मंत्रालय में जहां टैक्सेशन, जीएसटी, enforcement जैसे जटिल मुद्दे हैं, वहां Indian Revenue Service के अधिकारी ज्यादा कारगर साबित हो सकते हैं।
सिमिलरली, रेलवे मंत्रालय में रेलवे इंजीनियर्स की अहमियत बढ़ रही है। ISRO जैसी संस्थाओं का उदाहरण सामने है जहां स्पेशलिस्ट्स ने कमाल किया है।
PMO का बढ़ता केंद्रीकरण: असली पावर कहां है?
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि आज के दौर में असली पॉलिसी मेकिंग Prime Minister’s Office (PMO) में होती है। विभिन्न मंत्रालयों का काम ज्यादातर उन नीतियों को लागू करना रह गया है जो पीएमओ तय करता है।
और पीएमओ एक बेहद लीन ऑर्गनाइजेशन की तरह काम करता है। वहां ऐसे लोगों को शामिल किया जाता है जो अपने-अपने क्षेत्र में एक्सपर्ट हों। जनरलिस्ट फ्रेमवर्क वाले लोगों की जगह, वहां स्पेशलाइज्ड नॉलेज वाले लोग प्राथमिकता पाते हैं।
यह centralization भी एक बड़ा कारण है कि आईएएस की संख्या घट रही है।
Lateral Entry: बाहरी लोगों का प्रवेश
सरकार ने कई बार लेटरल एंट्री (पार्श्व प्रवेश) के जरिए प्राइवेट सेक्टर और डोमेन एक्सपर्ट्स को सरकार में लाने की कोशिश की है। 2019 में UPSC ने जॉइंट सेक्रेटरी, डायरेक्टर और डिप्टी सेक्रेटरी लेवल के पदों के लिए नोटिफिकेशन जारी की थी।
राहत की बात यह रही कि शुरुआत में करीब 6000 आवेदन आए थे। लेकिन चिंता का विषय यह है कि 2021 में यह संख्या घटकर महज 2000 रह गई।
इसके पीछे कई कारण हैं। कुछ लेटरल एंट्री अधिकारियों ने बिना नाम लिए मीडिया को बताया कि ट्रेनिंग के दौरान उन्हें कहा गया, “अपनी औकात में रहना। आप 3 साल के लिए आए हैं, स्थापित hierarchy के साथ पंगा मत लेना।”
यह hostility एक बड़ी समस्या है। इसके अलावा, लेटरल एंट्री में reservation का प्रावधान नहीं होता, जो social justice के नजरिए से विवादास्पद है।
आईएएस खुद सेंटर नहीं जाना चाहते!
अब यहां एक और मजेदार twist है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, केंद्र सरकार में आईएएस अधिकारियों की deputation strength 1,469 है। लेकिन वास्तव में सिर्फ 442 आईएएस अधिकारी ही केंद्र में तैनात हैं (2024 का डेटा)।
| विवरण | संख्या |
|---|---|
| केंद्र में IAS Deputation Strength | 1,469 |
| वास्तविक में तैनात IAS Officers | 442 |
| कमी | 1,027 |
यह बताता है कि आईएएस अधिकारी खुद ही केंद्र में जाना नहीं चाहते। क्योंकि राज्यों में उन्हें जिलाधिकारी, सचिव जैसे पावरफुल पद मिलते हैं। वहां उनकी tangible power होती है। केंद्र में वह power नहीं मिलती।
Mission Karmayogi: भविष्य की तैयारी
हैरान करने वाली बात यह है कि सरकार को इस समस्या का एहसास है। इसीलिए Mission Karmayogi जैसी योजना लाई गई है। इसके तहत सिविल सर्वेंट्स को डोमेन-स्पेसिफिक ट्रेनिंग दी जाएगी ताकि अगले 15 सालों में वे किसी एक क्षेत्र में एक्सपर्ट बन सकें।
यह long-term solution है। लेकिन अभी के लिए, सरकार दूसरी सेवाओं से अधिकारी ला रही है।
क्या यह राजनीतिक है या व्यावहारिक?
यह सबसे बड़ा सवाल है। क्या यह बदलाव सिर्फ इसलिए है क्योंकि सरकार चाहती है कि केंद्र के प्रति loyal लोग ही ऊपर बैठें? या यह वाकई में expertise की जरूरत है?
शायद दोनों ही कारण हैं। एक तरफ, central services के अधिकारी केंद्र के प्रति ज्यादा accountable होते हैं। दूसरी तरफ, ग्लोबलाइजेशन और जटिल अर्थव्यवस्था में domain knowledge की जरूरत भी बढ़ी है।
साइलेंट रेवोल्यूशन: अगले 10 साल
देखिए, यह कोई overnight बदलाव नहीं है। यह एक चुप क्रांति है जो धीरे-धीरे भारतीय प्रशासनिक ढांचे को बदल रही है।
आने वाले 10 सालों में यह संभव है कि आईएएस का जो एकाधिकार (hegemony) था, वो पूरी तरह खत्म हो जाए। और हर सेवा को बराबरी का मौका मिले।
क्या यह अच्छा होगा या बुरा? यह समय ही बताएगा। लेकिन बदलाव तो हो रहा है, और वह भी तेजी से।
मुख्य बातें (Key Points)
- Joint Secretary level पर IAS officers की संख्या 100% से घटकर 33.8% हो गई है
- PM Modi का स्पष्ट संकेत कि “सब कुछ बाबू ही नहीं करेंगे”
- केंद्र सरकार अब generalists की जगह domain experts को प्राथमिकता दे रही है
- Central Services के अधिकारियों की संख्या बढ़ रही है क्योंकि वे केंद्र के प्रति ज्यादा जवाबदेह हैं
- PMO में centralization और policy-making का तरीका बदला है
- Lateral entry को प्रोत्साहन, लेकिन challenges भी हैं
- IAS officers खुद center deputation नहीं लेना चाहते, 1027 पदों की कमी
- Mission Karmayogi के जरिए long-term solution की कोशिश













