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The News Air - Breaking News - Delhi Riots Case: 5 आरोपियों को राहत, मगर उमर-शरजील को नहीं मिली बेल

Delhi Riots Case: 5 आरोपियों को राहत, मगर उमर-शरजील को नहीं मिली बेल

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- एक साल बाद फिर से अपील कर सकते हैं उमर खालिद और शरजील इमाम, गुलफिशा समेत पांच को 12 कठोर शर्तों पर मिली जमानत

The News Air Team by The News Air Team
सोमवार, 5 जनवरी 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, सियासत
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Delhi Riots Case
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Delhi Riots Case Umar Khalid Bail Rejected : दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी को बड़ा फैसला सुनाया है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी है, जबकि इसी मामले में गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफाउर रहमान, सलीम खान और शादाब अहमद को 12 कठोर शर्तों के साथ जमानत दे दी गई है। कोर्ट ने कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम एक साल बाद या संरक्षित गवाहों से पूछताछ की प्रक्रिया पूरी होने पर दोबारा जमानत के लिए अपील कर सकते हैं।


पांच साल से जेल में बंद, अभी तक ट्रायल भी शुरू नहीं

यह मामला 2020 के दिल्ली दंगों की कथित साजिश से जुड़ा है। उमर खालिद को 13 सितंबर 2020 को गिरफ्तार किया गया था। तब से लेकर आज तक यानी करीब साढ़े चार साल से अधिक समय से वे जेल में बंद हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इतने लंबे समय में इस मामले में ट्रायल तक शुरू नहीं हो पाया है।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि एक साल के भीतर संरक्षित गवाहों की पूछताछ का काम पूरा हो जाना चाहिए। संरक्षित गवाह वे गवाह होते हैं जिनसे सामने वाला पक्ष सीधे सवाल-जवाब नहीं कर सकता। इन गवाहों के बयानों के आधार पर सरकार ने दलील दी थी कि आरोपी साजिश रचने के लिए मीटिंग किया करते थे।


उमर खालिद के पिता का टूटा हौसला

फैसले से पहले उमर खालिद के पिता सैयद कासिम रसूल इलियास बहुत उत्साह में कोर्ट पहुंचे थे। जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि क्या कोई उम्मीद है, तो उन्होंने कहा था – “पॉजिटिव एक्सपेक्टेशन… बेहतर फैसला आएगा।”

लेकिन जब फैसला आया तो उनका हौसला टूट गया। फैसले के बाद वे कहते रहे कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। एक पिता के लिए अपने बेटे को पांच साल से जेल में देखना और फिर जमानत न मिलने की खबर सुनना कितना तकलीफदेह होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है।


उमर खालिद की प्रतिक्रिया: “अब यही जिंदगी है”

उमर खालिद के साथी बानो ज्योत्सना ने फैसले के बाद उमर के साथ अपनी बातचीत को ट्वीट किया। उमर ने कहा – “मैं बाकियों के लिए वाकई बहुत खुश हूं जिन्हें बेल मिली है। बहुत राहत मिली है।”

जब बानो ज्योत्सना ने कहा कि वे कल मुलाकात में मिलने आएंगी, तो उमर ने जवाब दिया – “गुड गुड, आ जाना। अब यही जिंदगी है।” ये शब्द किसी भी इंसान की मनोदशा को बयान करने के लिए काफी हैं।


कोर्ट ने क्या कहा: दोनों की भूमिका “केंद्रीय और ठोस”

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष के पास जो प्रथम दृष्ट्या साक्ष्य हैं, उसके आधार पर प्रदर्शनों को स्थानीय स्तर से आगे ले जाने में योजना बनाने, लोगों को गोलबंद करने और रणनीतिक रूप से दिशा देने में उमर खालिद और शरजील इमाम की “केंद्रीय और ठोस भूमिका” स्पष्ट होती है।

कोर्ट ने कहा कि सभी आरोपी एक ही पायदान पर खड़े नहीं हैं क्योंकि सबकी भूमिका अलग-अलग है। सबको एक समान देखना मुकदमा शुरू होने से पहले ही हिरासत में रखने का खतरा पैदा करता है। कोर्ट की नजर में उमर खालिद और शरजील इमाम बाकी आरोपियों से अलग पायदान पर हैं।


UAPA की धारा 43D(5) का हवाला

कोर्ट ने यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) की धारा 43D(5) का हवाला देते हुए कहा कि अगर कोर्ट को लगता है कि किसी के खिलाफ प्रथम दृष्ट्या मामला बनता है, तो उसे जमानत नहीं दी जाएगी।

कोर्ट ने यह भी कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम को लगातार जेल में रखना अभी “असंवैधानिक नहीं हुआ है”। यानी कोर्ट के मुताबिक संवैधानिक सीमा का उल्लंघन नहीं हुआ है जो जमानत के लिए जरूरी होता।


ट्रायल में देरी को “ट्रंप कार्ड” नहीं माना जा सकता

फैसले में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी यह भी है कि ट्रायल में देरी को “ट्रंप कार्ड” के रूप में नहीं देखा जा सकता। ट्रायल नहीं होना अपने आप में कानून के प्रावधानों को विस्थापित नहीं कर सकता है।

यह टिप्पणी कानूनी हलकों में लंबे समय तक बहस का विषय बनी रहेगी। सवाल यह उठता है कि अगर पांच साल तक जेल में रहना संविधान की सीमा को पार नहीं करता, तो आखिर संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन कब माना जाएगा? क्या जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन अभी तक नहीं हुआ है?


पांच आरोपियों को जमानत, लेकिन 12 कठोर शर्तों के साथ

गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफाउर रहमान, सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत मिल गई है, लेकिन उन्हें 12 कठोर शर्तों का पालन करना होगा। अगर किसी भी शर्त का उल्लंघन होता है, तो जमानत रद्द कर दी जाएगी।

ये सभी आरोपी भी लगभग उसी समय से गिरफ्तार हैं जिस समय से उमर खालिद और शरजील इमाम जेल में हैं। सवाल यह है कि जिन पांच को आज जमानत मिली है, उन्हें पहले क्यों नहीं मिली? यह सवाल कहां और किसके सामने पूछा जाए?


मीरान हैदर की कहानी: राहत कार्यों में जुटे थे तब हुई गिरफ्तारी

जामिया से मैकेनिकल इंजीनियर और एमबीए की पढ़ाई करने वाले मीरान हैदर को तब गिरफ्तार किया गया जब देश भर में कोरोना लॉकडाउन लगा था और वे राहत कार्यों में जुटे थे। मीरान बिहार के सिवान जिले के रहने वाले हैं।

जमानत मिलने के बाद उनके वकील ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने जो टिप्पणियां की हैं, उनसे वे बहुत खुश हैं। कोर्ट ने कहा है कि वह हमेशा आरोपियों के संवैधानिक संरक्षण का ध्यान रखेगा और सिर्फ पुलिस या अभियोजन पक्ष की बातों पर नहीं चलेगा।


पुराने मामलों की याद: सफूरा, नताशा और देवांगना को कब मिली थी जमानत?

इसी तरह के आरोपों में 2020 में सफूरा जरगर को जमानत दी गई थी। 2021 में नताशा नरवाल और देवांगना कालिता को जमानत मिली। लेकिन गुलफिशा और अन्य को जमानत के लिए पांच साल से अधिक का इंतजार करना पड़ा।

दिलचस्प बात यह है कि अब दिल्ली पुलिस कह रही है कि नताशा और देवांगना के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने जमानत देते हुए यूएपीए की गलत व्याख्या कर दी थी। इतने साल बाद यह कहा जा रहा है कि अदालत की व्याख्या गलत थी।


आतंकी गतिविधि की व्यापक परिभाषा: दूरगामी असर की आशंका

फैसले में एक और महत्वपूर्ण बात लिखी गई है। यूएपीए के सेक्शन 15 के अनुसार आतंकी गतिविधि में सिर्फ परोक्ष रूप से हिंसक गतिविधि ही शामिल नहीं है। तबाही और मौत के अलावा इसकी परिभाषा में ऐसे कृत्य भी गिने जाते हैं जो सेवाओं को बाधित करते हैं और अर्थव्यवस्था के लिए खतरा पैदा करते हैं।

सवाल यह है कि क्या इस टिप्पणी के बाद किसी धरना-प्रदर्शन की योजना को भी “अर्थव्यवस्था के लिए खतरा” बताकर यूएपीए के तहत कार्रवाई की जा सकती है? इन पंक्तियों के दूरगामी असर क्या होंगे, यह आने वाले समय में पता चलेगा।


जीएन साईबाबा का उदाहरण: 10 साल जेल में रहे, आरोपों से मुक्त हुए

इस संदर्भ में जीएन साईबाबा का मामला याद आता है। वे 10 साल तक जेल में रहे। मुंबई हाईकोर्ट की एक बेंच ने उन्हें बरी किया तो सुप्रीम कोर्ट ने फैसले पर रोक लगा दी और मुंबई हाईकोर्ट की दूसरी बेंच से सुनवाई के लिए कहा। इस प्रक्रिया में करीब डेढ़ साल और गुजर गए।

दूसरी बेंच ने भी साईबाबा को बरी कर दिया। जेल से बाहर आने के बाद साईबाबा ज्यादा दिन तक जीवित नहीं रहे। उनकी हालत बहुत खराब हो चुकी थी।


2006 मुंबई बम धमाके: 20 साल जेल में रहे 12 लोगों को जमानत

हाल ही में 2006 के मुंबई बम धमाकों के आरोपों में 20 साल से जेल में बंद 12 लोगों को जमानत मिली। कोर्ट ने कहा कि कोई सबूत नहीं है। लेकिन बेकसूर पाए जाने वाले फैसले पर रोक लगा दी गई है।


राम रहीम की परोल और न्याय व्यवस्था पर सवाल

इस फैसले के संदर्भ में बाबा राम रहीम की परोल का जिक्र भी हो रहा है। हत्या और बलात्कार के दोषी राम रहीम को फिर से 40 दिनों की परोल मिली है। 2017 से अब तक उन्हें 14-15 बार परोल मिल चुकी है। कहा जा रहा है कि जितने दिन वे जेल में रहे, उससे कम बाहर नहीं रहे।

एक तरफ किसी को पांच साल तक जमानत नहीं मिलती और दूसरी तरफ हत्या और बलात्कार के मामले में सजा मिलने पर भी बार-बार परोल मिल जाती है। यह विरोधाभास न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।


सोनम वांगचुक: 100 दिनों से जेल में

सोनम वांगचुक का जिक्र भी इस संदर्भ में आ रहा है। सेना के लिए बंकर बनाने वाले व्यक्ति को देश की सुरक्षा के लिए खतरा बताकर पिछले 100 दिनों से जेल में रखा गया है।

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सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का लंबा इतिहास

इस मामले में 10 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित कर लिया था। 5 जनवरी को फैसला आया है।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में अप्रैल 2023 से लेकर फरवरी 2024 तक 14 बार उमर खालिद की सुनवाई अलग-अलग कारणों से टलती गई। इस कारण फरवरी 2024 में उमर खालिद ने अपनी याचिका वापस ले ली और ट्रायल कोर्ट लौट गए।

इसके बाद उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में जमानत याचिका दायर की। हाईकोर्ट द्वारा जमानत खारिज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट का रुख किया गया।


एक साल तक अपील नहीं: क्या यह चुप कराने का तरीका है?

कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को एक साल तक जमानत के लिए अपील करने से रोक दिया है। इसका मतलब यह भी है कि अब उमर खालिद की जमानत सुनवाई और सार्वजनिक अभियानों, अपील को लेकर खबरों का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।

कुछ लोगों का कहना है कि लगता है जमानत याचिका ही खारिज नहीं हुई, बल्कि उसके लिए अपील करने वालों को भी चुप रहने की सजा दी गई है।


विदेशी दबाव का असर? या उल्टा असर?

कुछ लोगों का मानना है कि उमर खालिद के मामले में न्यूयॉर्क के मेयर ममदानी और अमेरिका के सेनेटर का पत्र लिखना भी असर कर गया – उल्टा असर।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि सोशल मीडिया में जो चल रहा है उसका असर उसके फैसलों पर नहीं पड़ता और न ही उसे देखकर फैसला दिया जाता है।

गुलफिशा, मीरान और शिफाउर रहमान के लिए बहुत कम अभियान चले, लेकिन उनकी चुप्पी के बावजूद भी पांच साल तक जमानत का इंतजार करना पड़ा।


जमानत के लिए संवैधानिक सीमा क्या है?

इस फैसले के बाद एक बड़ा सवाल खड़ा होता है – संवैधानिक रूप से किसी को जेल में रखने की सीमा क्या होनी चाहिए? अगर पांच साल संविधान की सीमा को पार नहीं करता, तो क्या छह साल करेगा? सात साल? दस साल?

क्या जांच एजेंसी के लिए किसी मामले के ट्रायल को पांच साल तक शुरू नहीं कर पाना भी संविधान की किसी सीमा का उल्लंघन नहीं है?

अब यह कहना मुश्किल है कि “जमानत नियम है और जेल अपवाद है।” यह फैसला आने वाले मुकदमों में मिसाल बन सकता है।


मुख्य बातें (Key Points)

🔹 सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत खारिज कर दी है, जबकि गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफाउर रहमान, सलीम खान और शादाब अहमद को 12 कठोर शर्तों के साथ जमानत दी गई है।

🔹 उमर खालिद और शरजील इमाम एक साल बाद या संरक्षित गवाहों की पूछताछ पूरी होने पर दोबारा जमानत के लिए अपील कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि दोनों की भूमिका “केंद्रीय और ठोस” थी।

🔹 पांच साल से ट्रायल शुरू नहीं हुआ, फिर भी कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक सीमा का उल्लंघन नहीं हुआ। यूएपीए की धारा 43D(5) के तहत जमानत देने से इनकार किया गया।

🔹 यह फैसला आने वाले मुकदमों में मिसाल बन सकता है और “जमानत नियम है, जेल अपवाद” की अवधारणा पर सवाल खड़े करता है।


FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1: उमर खालिद को जमानत क्यों नहीं मिली?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों के आधार पर उमर खालिद और शरजील इमाम की दिल्ली दंगों की साजिश में “केंद्रीय और ठोस भूमिका” स्पष्ट होती है। यूएपीए की धारा 43D(5) के तहत प्रथम दृष्ट्या मामला बनने पर जमानत नहीं दी जा सकती।

Q2: उमर खालिद कब से जेल में हैं?

उमर खालिद को 13 सितंबर 2020 को गिरफ्तार किया गया था। तब से वे लगातार जेल में हैं, यानी लगभग साढ़े चार साल से अधिक समय से।

Q3: उमर खालिद दोबारा जमानत के लिए कब अपील कर सकते हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम एक साल बाद जमानत के लिए अपील कर सकते हैं, या इससे पहले अगर संरक्षित गवाहों से पूछताछ की प्रक्रिया पूरी हो जाती है।

Q4: दिल्ली दंगों केस में किन आरोपियों को जमानत मिली?

गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफाउर रहमान, सलीम खान और शादाब अहमद को 12 कठोर शर्तों के साथ जमानत दी गई है।

Q5: UAPA की धारा 43D(5) क्या है?

यूएपीए की धारा 43D(5) के तहत अगर कोर्ट को लगता है कि किसी आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्ट्या मामला बनता है, तो उसे जमानत नहीं दी जाएगी। यह प्रावधान आतंकवाद संबंधी मामलों में जमानत को बेहद कठिन बना देता है।

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