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The News Air - Breaking News - सुप्रीम कोर्ट पहुंची दिल्ली सरकार, असंवैधानिक अध्यादेश पर तुरंत रोक की मांग

सुप्रीम कोर्ट पहुंची दिल्ली सरकार, असंवैधानिक अध्यादेश पर तुरंत रोक की मांग

The News Air Team by The News Air Team
शुक्रवार, 30 जून 2023
in Breaking News, NEWS-TICKER, राष्ट्रीय, सियासत
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Arvind Kejriwal

Arvind Kejriwal

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  • केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में ट्रांसफर-पोस्टिंग पर केंद्र सरकार के नियंत्रण को दी चुनौती
  • केंद्र सरकार का अध्यादेश असंवैधानिक है और इस पर तुरंत रोक लगाई जानी चाहिए- दिल्ली सरकार
  • ये अध्यादेश संघीय और लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को खत्म करता है, जो अनुच्छेद 239एए में दिल्ली को संवैधानिक रूप से मिला है
  • ये अध्यादेश चुनी हुई सरकार को सिविल सेवा पर से नियंत्रण पूरी तरह से खत्म कर देता है
  • ट्रांसफर-पोस्टिंग का अधिकार केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के बिना राज्य सरकार को दिया जाए- दिल्ली सरकार
  • केंद्र ने 19 मई को दिल्ली में एक अध्यादेश जारी कर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटते हुए चुनी हुई सरकार से ट्रांसफर-पोस्टिंग का अधिकार छीन लिया था
  • 11 मई को सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने दिल्ली सरकार के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए उसे दिल्ली में ट्रांसफर-पोस्टिंग और सर्विसेज पर अधिकार दिया था
  • अध्यादेश के जरिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को जल्दबाजी में पलटना लोकतांत्रिक और न्यायिक विचार-विमर्श से बचने का साफ इरादा दर्शाता है- दिल्ली सरकार

नई दिल्ली, 30 जून (The News Air) दिल्ली सरकार ने केंद्र सरकार के असंवैधानिक अध्यादेश पर तत्काल रोक की मांग को लेकर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। केजरीवाल सरकार ने इस असंवैधानिक अध्यादेश के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए दिल्ली में ट्रांसफर-पोस्टिंग पर केंद्र सरकार के नियंत्रण को चुनौती दी है। 19 मई को आए केंद्र के अध्यादेश की दिल्ली सरकार ने कड़ी आलोचना की है। दिल्ली सरकार का कहना है कि यह अध्यादेश लाकर केंद्र ने संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन किया है और निर्वाचित सरकार के अधिकारों को हड़पने की कोशिश की है। केंद्र का अध्यादेश पूरी तरह से असंवैधानिक है और संघवाद के बुनियादी सिद्धांतों को कमजोर करता है। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने 11 मई को दिल्ली सरकार को ट्रांसफर-पोस्टिंग के अधिकार सौंपे थे, जिसके बाद केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर कोर्ट का फैसला पलट दिया है।

दिल्ली सरकार ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) अध्यादेश 2023 की संवैधानिकता को चुनौती दी है। अध्यादेश के जरिए दिल्ली सरकार में सेवारत सिविल सर्वेंट्स की ट्रांसफर-पोस्टिंग का अधिकार दिल्ली सरकार से छीनकर अनिर्वाचित उपराज्यपाल को दे दिया है। जबकि संविधान के अनुसार सर्विसेज को लेकर पावर और कंट्रोल निर्वाचित सरकार का होना चाहिए।

ऐसे में दिल्ली सरकार ने एक अंतरिम आवेदन दायर कर अध्यादेश पर तत्काल रोक की मांग की है। हालंकि, दिल्ली सरकार ने अपनी मुख्य याचिका के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) अध्यादेश 2023 को असंवैधानिक घोषित करने और रद्द करने के लिए एक निर्देश, आर्डर या उचित रिट पारित करें।

-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) अध्यादेश 2023 द्वारा पेश किए गए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार अधिनियम, 1991 की धारा 3ए को असंवैधानिक घोषित करने और रद्द करने के लिए एक निर्देश, आर्डर या उचित रिट पारित करें।
-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) अध्यादेश 2023 द्वारा संशोधित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार अधिनियम, 1991 की धारा 41 को असंवैधानिक घोषित करने और रद्द करने के लिए एक निर्देश, आर्डर या उचित रिट पारित की जाए।

-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) अध्यादेश 2023 द्वारा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार अधिनियम 1991 की धारा 45 बी, 45 सी, 45 डी, 45 ई, 45 एफ, 45 जी, 45 एच, 45 आई, 45 जे, और 45 को रद्द करने की घोषणा और रद्द करने के लिए एक निर्देश, आर्डर या उचित रिट पारित करें।

याचिका में सरकार ने कहा है कि अनुच्छेद 239एए दिल्ली विधानसभा और संसद को सर्विसेज पर विधायी अधिकार प्रदान करता है। हालांकि यह संविधान का एक मौलिक सिद्धांत है कि सक्षमता का प्रश्न ऐसी क्षमता के प्रयोग में पारित कानून की वैधता से अलग है।

सुप्रीम कोर्ट की दो संविधान पीठों द्वारा व्याख्या की गई कि संविधान के अनुच्छेद 239एए की मूल आवश्यकताओं का उल्लंघन करके अध्यादेश सक्षमता का एक वैध अभ्यास होने में विफल रहता है। खासकर विवादित अध्यादेश कार्यकारी आदेश का एक असंवैधानिक अभ्यास है जो अनुच्छेद 239एए में दिल्ली के लिए निहित संघीय, लोकतांत्रिक व्यवस्था का उल्लंघन करता है और स्पष्ट रूप से मनमाना है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 11 मई 2023 के फैसले को आधार में बदलाव किए बिना विधायी रूप से समीक्षा की, जिसके अनुसार दिल्ली सरकार के अधिकारियों की जवाबदेही और सिविल सर्विस पर दिल्ली की चुनी हुई सरकार का कंट्रोल है। संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत अध्यादेश बनाने की शक्तियों का एक अनुचित और असंवैधानिक दुरुपयोग किया गया है।

दिल्ली सरकार ने अध्यादेश की कुछ धाराओं की संवैधानिकता को निम्नानुसार चुनौती दी है –

1-जीएनसीटीडी अधिनियम की धारा 3ए यह निर्धारित करती है कि राज्य सूची की प्रविष्टि 41 अब दिल्ली की विधानसभा के लिए उपलब्ध नहीं होगी।
2-जीएनसीटीडी अधिनियम की धारा 45ई से 45एच के अनुसार दिल्ली सरकार में काम करने वाले अधिकारियों पर एलजी का कंट्रोल है और अधिकारियों की ट्रांसफर-पोस्टिंग और अनुशासन सहित मामलों पर एलजी को सिफारिशें करने के लिए राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण का गठन करती है।
3-जीएनसीटीडी अधिनियम की धारा 41 में जीएनसीटीडी अधिनियम के भाग 4ए से संबंधित मामलों में एलजी के स्वविवेक का प्रावधान है।
4-जीएनसीटीडी अधिनियम की धारा 45डी निर्धारित करती है कि किसी अन्य कानून के बावजूद, दिल्ली सरकार में कोई भी प्राधिकरण, बोर्ड, आयोग या कोई वैधानिक निकाय का गठन और उसके सभी सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी।
5-जीएनसीटीडी अधिनियम की धारा 45 के(3) और 45के(5) के तहत ब्यूरोक्रेट्स और एलजी को मंत्रिपरिषद और प्रभारी मंत्रियों द्वारा लिए गए निर्णयों को रद्द करने की अनुमति है।
6-जीएनसीटीडी अधिनियम की धारा 45के (1) के तहत ब्यूरोक्रेट्स को कैबिनेट नोट्स को अंतिम रूप देने का अधिकार है और उन्हें मंत्रिपरिषद द्वारा विचार किए जाने से पहले किसी भी प्रस्ताव रोकने की अनुमति है।

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दिल्ली सरकार ने अपनी याचिका में अध्यादेश की वैधता पर कड़ा सवाल उठाया है। दिल्ली सरकार ने कहा कि यह अध्यादेश देश के संघीय ढांचे, वेस्टमिंस्टर शैली के लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को नष्ट करता है, जो कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के अनुच्छेद 239एए में संवैधानिक रूप को निहित करता है।

दिल्ली सरकार ने कहा कि यह अध्यादेश पूरी तरह से निर्वाचित सरकार के सिविल सर्विसेज के ऊपर अधिकार को खत्म करता है। इसी के साथ यह अध्यादेश संस्थाओं का निर्वाचन करने की शक्ति केंद्र को देकर इसे निर्वाचित सरकार को और भी कमजोर बना रहा है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सिविल सेवा प्राधिकरण (एनसीसीएसए) को इस तरह से बनाया गया है कि इसके अध्यक्ष तो दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री रहेंगे, लेकिन वो हमेशा अल्पमत में रहेंगे। समिति में बाकी दो अधिकारी कभी भी उनके खिलाफ वोट डाल सकते हैं, सीएम की अनुपस्थिति में बैठक बुला सकते हैं और सिफारिशें कर सकते हैं। यहां तक कि एकतरफा सिफारिशें करने का काम किसी अन्य संस्था को सौंप सकते हैं।

दिल्ली सरकार ने अपनी याचिका में यह भी कहा है कि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने स्पष्ट रूप से माना है कि संविधान का अनुच्छेद 239एए न केवल भारतीय संघ और जीएनसीटीडी के बीच शक्तियों का वितरण निर्धारित करता है, बल्कि सर्विसेज के मामले में दोनों की विधायी शक्तियों के प्रयोग और सीमाओं को भी निर्धारित करता है। भले ही संसद राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के संबंध में सभी विषयों पर कानून बनाने में सक्षम है, लेकिन उसके पास इसकी शक्ति पूर्ण नहीं है। बल्कि यह अनुच्छेद 239एए के सिद्धांतों द्वारा लगाई गई वास्तविक सीमा से बाध्य है, जिसकी सर्वाेच्च न्यायालय की दो संविधान पीठों द्वारा व्याख्या की गई है। यह अध्यादेश संविधान में संशोधन किए बिना, केवल जीएनसीटीडी अधिनियम में संशोधन करके इन दोनों पहलुओं में से प्रत्येक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने का प्रयास करता है।

दिल्ली सरकार ने आगे कहा है कि नौकरशाहों और एलजी को निर्वाचित सरकार के निर्णयों की वैधता पर निर्णय लेने और उस आधार पर कार्रवाई करने की अनुमति देकर अध्यादेश अनुच्छेद 239एए के तहत अधिकारों और शासन की शक्तियों के विभाजन को पूरी तरह से ध्वस्त कर देता है।

चूकि जहां जरूरत होती है, वहां हर विभाग व मंत्रालय के कानूनी विशेषज्ञों द्वारा निर्णयों की जांच की जाती है। इसलिए इस विवादित अध्यादेश में यह प्रवाधान लाया गया है कि केवल एलजी और नौकरशाहों के माध्यम से ही केंद्र के कहने पर शासन को रोकने का काम किया जा सके। यह पूरी तरह से मनमाना है।

स्वतंत्र निकायों और आयोगों पर नियंत्रण की धारा 45डी की वैधता को चुनौती देते हुए दिल्ली सरकार ने कहा कि यहां स्पष्ट रूप से मनमाने ढंग से काम किया गया है। जीएनसीटीडी अधिनियम की धारा 45डी में कहा गया है कि एनसीटीडी में सभी वैधानिक निकाय, आयोग, बोर्ड और प्राधिकरण का गठन राष्ट्रपति द्वारा किया जाएगा और उनके सदस्यों को राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाएगा। ऐसा न करना पड़े, इसके लिए इस अध्यादेश को इस तरह से तैयार किया गया है कि केंद्र सरकार को दिल्ली में शासन संभालने की अनुमति दी जा सके।

दिल्ली के लोगों के लिए काम करने वाली 50 से अधिक संस्थाएं इस एक व्यापक प्रावधान से प्रभावित होंगी। इनका नियंत्रण दिल्ली के लोगों से लेकर केंद्र के पास चला जाएगा। यह संस्थाएं दिल्ली के यातायात-परिवहन, जल और बिजली आपूर्ती जैसे विभिन्न क्षेत्रों में काम करती हैं। जिसमें दिल्ली ट्रांस्पोर्ट कॉर्पाेरेशन, दिल्ली जल बोर्ड, दिल्ली स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पाेरेशन, दिल्ली वुमन कमीशन, दिल्ली इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेट्री बोर्ड सहित कई महत्वपूर्ण संस्थाएं शामिल हैं। इन सभी संस्थाओं को विशेष रूप से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के मतदाताओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए गठित किया गया है औ यह दिल्ली की जनता की रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करती हैं। इस संस्थाएं राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली द्वारा वित्तपोषित हैं। सिविल सर्विसेज के बाद यह संस्थाएं दिल्ली में प्रशासनिक कार्य करती हैं और प्रशासन का केंद्र हैं। इस प्रावधान के तहत सबसे बड़ी मनमानी यह की गई है कि इन सभी संस्थाओं के लिए बजट दिल्ली विधानसभा और दिल्ली सरकार से ही पारित किया जाएगा, मगर इनमें नियुक्तियां केंद्रीय राजनीतिक अधिकारियों द्वारा की जाएंगी।

दिल्ली सरकार ने याचिका में कहा है कि वर्तमान में अध्यादेश की घोषणा लोकतांत्रिक और न्यायिक विचार-विमर्श को दरकिनार करने का एक स्पष्ट प्रयास है। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की 2023 संविधान पीठ के फैसले के महज 6 दिन बाद ही 17 मई 2023 को अध्यादेश को मंजूरी देने वाला कैबिनेट प्रस्ताव पारित किया गया था। जबकि अध्यादेश को 19 मई को ही कानूनी रूप दिया गया और उसी शाम जैसे ही सुप्रीम कोर्ट की छुट्टियां शुरू हुई इस अध्यादेश को जनता के लिए लागू कर दिया गया।

याचिका में कहा गया है कि अध्यादेश लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने की जल्दबादी और इसकी घोषणा का समय इनके इदारों को साफ दर्शाता है कि वो किसी भी ऐसे लोकतांत्रिक और न्यायिक विचार-विमर्श से बचना चाहते हैं जो दिल्ली के लोगों के हितों की रक्षा कर सके।

विवादित अध्यादेश सिविल अपील संख्या 2357/2017 में न्यायालय की संविधान पीठ के फैसले को अस्वीकार्य रूप से खारिज कर देता है।

सरकार ने याचिका में यह भी कहा है कि यह पहले से स्थापित कानून है कि विधान मंडल के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को खारिज करना अस्वीकार्य है। इसे केवल न्यायिक निर्णय के आधार पर हटाने या बदलने की अनुमति है, ताकि निर्णय उस परिवर्तित पृष्ठभूमि में प्रस्तुत न किया गया हो। यह अध्यादेश स्थापित कानून की सीधा उल्लंघन है और इसी के साथ यह संविधान के अनुच्छेद 239एए में किसी भी तरह का बदलाव करने का प्रयास किए बिना सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ के फैसले को पटलने का प्रयास है।

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