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The News Air - NEWS-TICKER - खुद को ‘आजीवन राष्ट्रपति’ घोषित किया, महीनों के नाम भी बदल दिए…कहानी राष्ट्रपति नियाज़ोव की

खुद को ‘आजीवन राष्ट्रपति’ घोषित किया, महीनों के नाम भी बदल दिए…कहानी राष्ट्रपति नियाज़ोव की

The News Air Team by The News Air Team
मंगलवार, 20 फ़रवरी 2024
in NEWS-TICKER, स्पेशल स्टोरी
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कुत्तों पर बैन-बदले महीनों के नाम, कहानी

खुद को 'आजीवन राष्ट्रपति' घोषित किया, महीनों के नाम भी बदल दिए...कहानी राष्ट्रपति नियाज़ोव की

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तुर्कमेनिस्तान, 20 फरवरी (The News Air) मध्य एशिया में बसे तुर्कमेनिस्तान देश के एक तानाशाह ने खुद को आजीवन राष्ट्रपति घोषित कर लिया था. 20 साल तक राज किया और देश में अपने हिसाब से कई तानाशाही बदलाव किए. जिसमें से एक था कैलेंडर के महीनों के नाम बदलना. इसके अलावा कुत्तों पर बैन लगाने जैसे अजीबोगरीब फैसले भी इस राष्ट्रपति ने अपने कार्यकाल में किए.

What’s in a name? मतलब नाम में क्या रखा है. विलयम शेक्सपीयर ने अपने नाटक रोमियो जूलियट में लिखा था. कहते हैं कि आप गुलाब का कोई और नाम रख दें, खुशबू उसकी वही रहेगी. लेकिन जब हम इतिहास पढ़ते हैं तो पाते हैं कि वक़्त के साथ शहरों, जगहों के नाम बदले गए. पर एक देश है जहां के राष्ट्रपति या यूं कहें कि एक तानाशाह ने कैलेंडर के महीनों के नाम इतने अजीबो गरीब रखे थे कि लोग भारी कंफ्यूजन में थे. एक महीने का नाम लोगों को याद हो भी जाए तो दूसरे का नाम गुल होना तय था. अप्रैल की जगह यहां के लोग गुर्बनसोलटन कहते थे. मध्य एशिया में बसे इस देश का नाम- तुर्कमेनिस्तान है और वहां के इस राष्ट्रपति का नाम था -सपरमुरत नियाज़ोव. जिसने 20 साल तक राज किया और देश में अपने हिसाब से कई तानाशाही बदलाव किए.

आगे बढ़ें उससे पहले तुर्कमेनिस्तान के बारे में थोड़ा जान लीजिए. तुर्कमेनिस्तान कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान जैसे पड़ोसियों से घिरा हुआ है. इसकी कैस्पियन सागर तक पहुंच है और इसकी आबादी 5.6 मिलियन है. इसकी राजधानी अश्गाबात है. अपनी एकतंत्र सरकार और बड़े गैस भंडार के लिए जाना जाना जाता है. तुर्कमेनिस्तान हर साल लगभग 70 बिलियन क्यूबिक मीटर नेचुरल गैस का उत्पादन करता है, और इसके निर्यात का लगभग दो-तिहाई हिस्सा रूस को जाता है. हालांकि गैस भंडार में समृद्ध होने के बावजूद अधिकांश आबादी गरीबी में रहती है.

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सपरमुरत नियाज़ोव का बचपन और राजनीति में एंट्री : नियाज़ोव का बचपन बहुत ही दुख में बीता. उनका जन्म 19 फरवरी 1940 को किपचक में एक गरीब परिवार में हुआ था. उसके पिता की मृत्यु दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हुई. फिर विनाशकारी अश्गाबात भूकंप के दौरान परिवार के बाकी सदस्य भी मारे गए. उसके बाद नियाज़ोव का बचपन एक अनाथालय में ही बीता. स्कूल ख़त्म करने के बाद उसने लेनिनग्राद पॉलिटेक्निक इंस्टीट्यूट में पढ़ाई की और 1967 में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा भी कर लिया. अब यह सब तो एक बहुत ही बेसिक जानकारी हो गई. अब उसके राजनीतिक करियर की तरफ बढ़ते हैं जो ज्यादा दिलचस्प है.

 

बात है 1991 से पहले की. सोवियत संघ के बिखरने से पहले तक तुर्कमेनिस्तान उसी का हिस्सा था. 1991 में रूस से अलग होकर यह आजाद देश बन गया. पर आजादी के बाद भी यह देश अपने तानाशाहों से आजाद नहीं हो सका. खैर, आगे बढ़ते हैं. नियाज़ोव 1962 में कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए, और 1985 तक वह पहले से ही तुर्कमेन एसएसआर की कम्युनिस्ट पार्टी के पहले सचिव थे. फिर सिर्फ पांच वर्षों में वह सोवियत महासचिव बने और 13 जनवरी, 1990 को आधिकारिक तौर पर तुर्कमेन एसएसआर के सर्वोच्च सोवियत के अध्यक्ष का पद संभाला.

सोवियत संघ के पहले वफादर थे, फिर… : शुरुआत में नियाज़ोव यूएसएसआर के प्रति बेहद वफादार था, लेकिन जैसे ही सोवियत संघ टूटने लगा, उसने तुरंत तुर्कमेनिस्तान को अलग कर दिया और खुद को देश का पहला राष्ट्रपति घोषित कर दिया. बेशक, यह किसी की अनुमति या राय पूछे बिना किया गया था. लेकिन एक साल में ही उसने राष्ट्रपति चुनाव कराया और जीत हासिल की. वह एकमात्र उम्मीदवार जो था. ऐसे महान अवसर का जश्न मनाने के लिए उसने खुद को ”तुर्कमेनबाशी” घोषित किया. जिसका हिंदी तर्जुमा है-“सभी तुर्कमेनिस्तान का नेता”. यह तो बस शुरूआत थी.

फिर आया 1992. इस साल नियाज़ोव ने अपना शासन 10 साल तक बढ़ा दिया और 1999 में खुद को “आजीवन राष्ट्रपति” घोषित कर दिया. अपने शासन के दौरान नियाज़ोव ने देश की तरक्की के लिए तेल रिफाइनरी, कारखानों और उत्पादन में निवेश किया, कपड़ा उद्योग शुरू किया, मृत्युदंड को खत्म कर दिया, सभी को मानव अधिकार दिए (कम से कम आधिकारिक तौर पर), तुर्कमेनिस्तान को किसी भी युद्ध से दूर रखा, वगैरह वगैरह. यह सब तो गंभीर बातें हो गईं.

हर चीज़ का नाम अपने नाम पर रखा : नियाज़ोव इससे कहां संतुष्ट होने वाले थे. उनपर तो अपना फैन क्लब और बढ़ाने का भूत सवार था. बस फिर क्या था नियाज़ोव जुट गये इस काम में. नियाज़ोव ने कस्बों, स्कूलों, हवाई अड्डों और उनके बीच की हर चीज़ का नाम अपने नाम पर रखने से शुरुआत की. हर साल के हर महीने और सप्ताह के दिन का नाम महत्वपूर्ण तुर्कमेन हस्तियों, लेखकों, कवियों, घटनाओं और, सबसे महत्वपूर्ण रूप से, अपने और अपने करीबी परिवार के सदस्यों के नाम पर रखा. हर सड़क, घर और सार्वजनिक भवन पर उनकी बड़ी फोटो लगती थी. वो कितना अच्छा राष्ट्रपति और इंसान है, यह बताने के लिए राष्ट्रगान तक बदल दिया था! सभी को बार-बार सुनने को मजबूर भी किया.

नियाज़ोव को प्रतिबंध लगाना बहुत पसंद था! : हर दूसरे तानाशाह की तरह नियाज़ोव को भी चीजों पर बैन यानी प्रतिबंध लगाना पसंद था. नतीजन इंटरनेट कैफे, सार्वजनिक समारोहों में लिप-किसिंग पर टोटल बैन लगा दिया. चौंकिएगा मत प्रतिबंधों की लिस्ट में कुत्तों का नाम भी था, क्योंकि नियाज़ोव का मानना था कुत्तों में से बदबू आती है. ओपेरा, सर्कस से लेकर पुरुषों के लंबे बाल और दाढ़ी रखने, टेलीविजन पर महिलाओं के लिए मेकअप करने तक पर भी प्रतिबंध लगा दिया. फ्री प्रेस/मीडिया पर भी बैन लगा दिया. जिसकी वर्तमान में भी स्थिती खराब ही है. नियाज़ोव ने 20 से ज्यादा सालों तक राज किया. दिसंबर, 2006 में निधन हो गया.

सरकार का मीडिया पर है टोटल कंट्रोल : नियाज़ोव की मौत के बादगर्बनगुली बर्दाइमुश्खामेदोव राष्ट्रपति बने. इनका इरादा भी ताउम्र राज करने का था. 2022 तक राज किया. 2015 में तुर्कमेनिस्तान के इस शासक ने अपनी सुनहरी मूर्ति भी बनवाई थी. फिलहाल पीप्लस कांउसिल ऑफ तुर्कमेनिस्तान के चेयरमैन हैं. और उनके बेटे सेरदार बर्दाइमुश्खामेदोव राष्ट्रपति. यह भी ताजिंदगी राज ही करना चाहते हैं. देश में स्वतंत्र प्रेस की हालत उत्तर कोरिया से भी खराब है. सरकार का मीडिया पर पूरा एकाधिकार है और टीवी रेडियो लगातार सरकार का प्रचार प्रसार करते हैं. कोई पत्रकार अगर आवाज उठाए भी तो या उसकी गिरफ्तारी, प्रताणना, या काम पर पाबंदी तय है.

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